भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: परिसर को बताया मां सरस्वती का मंदिर, हिंदू पक्ष को मिला पूजा का अधिकार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर विवाद पर लंबे समय से इंतजार किया जा रहा फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक साक्ष्य और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट इस ओर संकेत करते हैं कि यह स्थल मूल रूप से वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा केंद्र था। कोर्ट ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार देते हुए केंद्र सरकार और ASI से परिसर के प्रबंधन को लेकर व्यवस्था तय करने को कहा है।

इस फैसले के बाद भोजशाला विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। हिंदू संगठनों ने इसे ऐतिहासिक जीत बताया है, जबकि मुस्लिम और जैन पक्ष ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। अदालत के आदेश के बाद धार शहर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और भोजशाला परिसर के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

 

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

हाईकोर्ट ने कहा कि उसने ASI की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक तथ्यों, पुरानी संरचनाओं, शिलालेखों और पुरातात्विक प्रमाणों का अध्ययन किया। अदालत ने यह भी कहा कि उसने अपने निर्णय में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा।

कोर्ट के अनुसार, भोजशाला एक संरक्षित ऐतिहासिक स्थल है और वहां मां सरस्वती से जुड़े प्रमाण मिले हैं। अदालत ने कहा कि इस परिसर के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यहां पूजा की अनुमति दी जा सकती है।

अदालत ने ASI के 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग दिनों की व्यवस्था तय की गई थी। उस आदेश के तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी जाती थी।

कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुझाव दिया कि वे सरकार से मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन की मांग कर सकते हैं।

 

आखिर क्या है भोजशाला विवाद

धार जिले में स्थित भोजशाला लंबे समय से विवाद का केंद्र रही है। हिंदू पक्ष का कहना है कि यह मां वाग्देवी यानी सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का बड़ा केंद्र था। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है।

वर्षों से दोनों पक्ष इस स्थल पर अपने धार्मिक अधिकार का दावा करते रहे हैं। खासतौर पर वसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ने पर कई बार तनाव की स्थिति बनी। प्रशासन को कई बार अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने पड़े।

जैन समाज के कुछ संगठनों ने भी दावा किया कि यह स्थल प्राचीन जैन शिक्षण केंद्र रहा है और यहां मिली प्रतिमाएं जैन परंपरा से जुड़ी हैं।

 

करीब हजार साल पुराना बताया जाता है भोजशाला का इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने लगभग 11वीं सदी में कराया था। कहा जाता है कि यहां मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी और यह संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।

राजा भोज को विद्या और कला का संरक्षक माना जाता है। उनके शासनकाल में कई मंदिर, तालाब, घाट और अध्ययन केंद्र बनाए गए। मान्यता है कि भोजशाला में विद्वानों की सभाएं होती थीं और यहां धार्मिक व साहित्यिक चर्चाएं आयोजित होती थीं।

कुछ इतिहासकार इसे नालंदा और तक्षशिला की तरह बड़ा अध्ययन केंद्र भी बताते हैं। कहा जाता है कि यहां लाल पत्थरों के स्तंभ, देवी-देवताओं की आकृतियां और विशाल सभा भवन हुआ करते थे।

High Court historic decision on the Bhojshala dispute

कैसे शुरू हुआ विवाद

इतिहास में कई बार भोजशाला पर हमले होने के दावे किए जाते हैं। कहा जाता है कि 14वीं और 15वीं सदी में मुस्लिम शासकों के समय यहां की मूल संरचना को नुकसान पहुंचाया गया। बाद में यहां मस्जिदनुमा ढांचा बनाया गया।

मुस्लिम पक्ष का कहना है कि सदियों से यहां नमाज अदा की जाती रही है, इसलिए इसे मस्जिद माना जाना चाहिए। वहीं हिंदू पक्ष का दावा रहा कि मंदिर के अवशेषों का उपयोग कर बाद में मस्जिद संरचना बनाई गई।

ब्रिटिश शासनकाल में भी इस स्थल का सर्वे हुआ था। बाद में इसे संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया।

 

1990 के दशक में बढ़ा विवाद

1995 के बाद भोजशाला को लेकर विवाद और बढ़ गया। प्रशासन ने तनाव को देखते हुए पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग दिन तय किए। बाद में कई बार यहां प्रवेश पर रोक भी लगाई गई।

2003 में ASI ने आदेश जारी कर मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी। इसी व्यवस्था के खिलाफ बाद में अदालत में याचिकाएं दायर हुईं।

2003 में यहां बड़े आंदोलन भी हुए। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोगों पर केस दर्ज किए गए।

 

2022 में शुरू हुई नई कानूनी लड़ाई

साल 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नाम के संगठन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर घोषित करने की मांग की। साथ ही रोजाना पूजा की अनुमति और 2003 का ASI आदेश रद्द करने की अपील की गई।

इसके बाद मामला तेजी से आगे बढ़ा और मार्च 2024 में हाईकोर्ट ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया।

 

ASI सर्वे में क्या मिला

ASI ने करीब 98 दिनों तक भोजशाला परिसर का सर्वे किया। इस दौरान आधुनिक तकनीकों जैसे GPR सर्वे, खुदाई, वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी का उपयोग किया गया।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि परिसर में मंदिर स्थापत्य से जुड़े कई प्रमाण मिले हैं। सर्वे में देवी-देवताओं की आकृतियां, संस्कृत शिलालेख, मूर्तियों के अवशेष और पुराने स्तंभ पाए गए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परिसर में मिले कई स्तंभ मूल रूप से मंदिर संरचना का हिस्सा थे और बाद में उनका दोबारा उपयोग किया गया।

ASI की रिपोर्ट में “ॐ सरस्वत्यै नमः” लिखे स्तंभों का भी जिक्र किया गया। रिपोर्ट के अनुसार परिसर में परमारकालीन वास्तुकला के संकेत मिले हैं।

 

हिंदू पक्ष ने अदालत में क्या कहा

हिंदू पक्ष ने दलील दी कि भोजशाला ASI संरक्षित स्मारक है, इसलिए उस पर प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह स्थल मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर था और यहां पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।

हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया कि ASI की रिपोर्ट मंदिर के पक्ष में स्पष्ट संकेत देती है। उन्होंने अदालत से 2003 की व्यवस्था खत्म करने की मांग की।

 

मुस्लिम पक्ष की दलील

मुस्लिम पक्ष ने अदालत में कहा कि अभी तक यह साफ नहीं है कि यह मंदिर था, मस्जिद थी या जैन स्थल। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है।

वरिष्ठ वकीलों ने ASI सर्वे की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि कई वीडियो और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं।

मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा कि वे लंबे समय से यहां नमाज पढ़ते आए हैं, इसलिए उनके धार्मिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

 

जैन समाज ने क्या दावा किया

जैन समाज की ओर से कहा गया कि यहां मिली प्रतिमाएं जैन परंपरा से जुड़ी हो सकती हैं। उनका दावा था कि जिस प्रतिमा को वाग्देवी कहा जा रहा है, वह मां अंबिका की प्रतिमा भी हो सकती है।

जैन पक्ष ने भोजशाला को जैन तीर्थ घोषित करने की मांग रखी।

 

फैसले के बाद क्या प्रतिक्रियाएं आईं

हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया और इसे सांस्कृतिक पहचान की जीत बताया। कई संगठनों ने कहा कि वर्षों बाद उन्हें न्याय मिला है।

वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस तरह के निर्णय भविष्य में दूसरे धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद बढ़ा सकते हैं।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि फैसले का अध्ययन किया जाएगा और अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट में साफ होगी।

मुस्लिम पक्ष ने भी कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।

 

धार में बढ़ाई गई सुरक्षा

फैसले के बाद धार में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। शहर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। रिजर्व पुलिस बल और रैपिड एक्शन फोर्स को भी अलर्ट पर रखा गया है।

प्रशासन ने भोजशाला परिसर के मुख्य गेट पर बैरिकेडिंग कर दी है ताकि किसी तरह की अप्रिय घटना न हो।

 

अब आगे क्या होगा

हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है। मुस्लिम और जैन पक्ष पहले ही सर्वोच्च अदालत जाने की बात कह चुके हैं। दूसरी तरफ हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर अनुरोध किया है कि उनकी बात सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में अब यह बहस हो सकती है कि धार्मिक स्थलों के विवादों में ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों की क्या भूमिका होनी चाहिए। साथ ही प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट और ASI संरक्षित स्मारकों के अधिकारों पर भी चर्चा हो सकती है।

फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले ने भोजशाला विवाद को नया मोड़ दे दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या यह फैसला अंतिम साबित होगा या आगे फिर कोई बड़ा कानूनी मोड़ देखने को मिलेगा?