देश में लगातार बढ़ते हवाई किराए को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि एयरफेयर यानी हवाई किराए में कुछ संतुलन होना चाहिए, ताकि यात्रियों को राहत मिल सके। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर एक ही दिन, एक ही रूट पर उड़ान भरने वाली दो अलग-अलग एयरलाइंस के किराए में इतना बड़ा अंतर कैसे हो सकता है।
यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन ने दाखिल की है। उन्होंने मांग की है कि देश में ऐसा स्वतंत्र और मजबूत रेगुलेटर बनाया जाए, जो एयरलाइंस के किराए, अतिरिक्त शुल्क और यात्रियों से वसूले जाने वाले दूसरे चार्जेस पर नजर रख सके।
कोर्ट ने कहा- लोगों को राहत देने की जरूरत
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार एक ही सेक्टर में उड़ान भरने वाली एयरलाइंस के टिकटों में बहुत ज्यादा अंतर देखने को मिलता है।
बेंच ने कहा कि एक एयरलाइन जहां इकोनॉमी क्लास का टिकट 8 हजार रुपए में बेचती है, वहीं दूसरी एयरलाइन उसी रूट पर 18 हजार रुपए तक वसूल रही होती है। कोर्ट ने केंद्र से कहा कि इस तरह की असमानता को कम करने की जरूरत है और यात्रियों को कुछ राहत दी जानी चाहिए।
जस्टिस संदीप मेहता ने साफ कहा कि हवाई किराए में “रैशनलाइजेशन” यानी संतुलन जरूरी है। हालांकि सरकार की ओर से कहा गया कि नया कानून लागू होने के बाद नए नियम बनाने की प्रक्रिया जारी है और इस मुद्दे को गंभीरता से देखा जा रहा है।
याचिकाकर्ता बोले- कई बार 300% तक बढ़ जाता है किराया
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रविंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि एयरलाइंस कई बार अचानक किराए में 300 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर देती हैं। त्योहारों, खराब मौसम, आपात स्थिति या आखिरी समय में टिकट बुक करने पर यात्रियों को बहुत ज्यादा पैसा देना पड़ता है।
इस पर कोर्ट ने हल्के अंदाज में कहा कि कई बार वकीलों की फीस भी 400 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, अब उसका क्या किया जाए। हालांकि इसके बाद अदालत ने साफ किया कि एयरफेयर में पारदर्शिता जरूरी है।
याचिका में कहा गया है कि अभी एयरलाइंस अपनी मर्जी से किराए तय कर रही हैं और यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए कोई मजबूत निगरानी व्यवस्था नहीं है।
पुराने नियम मौजूद, लेकिन पालन नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एयरक्राफ्ट एक्ट 1937 के तहत पहले से नियम मौजूद हैं। इन नियमों में यह भी प्रावधान है कि अगर DGCA को लगे कि एयरलाइंस जरूरत से ज्यादा किराया वसूल रही हैं, तो वह निर्देश जारी कर सकता है।
लेकिन आरोप है कि इन नियमों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। याचिकाकर्ता ने कहा कि कानून और अधिकार दोनों मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा।
सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि जनवरी 2025 से नया “भारतीय वाययान अधिनियम 2024” लागू हो चुका है और उसके तहत नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। अभी इस पर सलाह-मशविरा चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से केंद्र सरकार द्वारा दायर काउंटर एफिडेविट का जवाब देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी जता चुका है चिंता
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किराए के मुद्दे पर चिंता जताई हो। इससे पहले भी अदालत कई बार एयरलाइंस की मनमानी पर सवाल उठा चुकी है।
30 अप्रैल को सरकार को लगाई थी फटकार
अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इसलिए फटकार लगाई थी क्योंकि उसने समय पर एफिडेविट दाखिल नहीं किया था। अदालत ने सरकार से पूछा था कि आखिर जवाब दाखिल करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
कोर्ट ने केंद्र से लिखित रूप में यह बताने को कहा था कि उसे अतिरिक्त समय की जरूरत क्यों पड़ी।
त्योहारों में बढ़ते किराए पर भी सवाल
फरवरी 2026 में भी सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों और आपात हालात के दौरान बढ़ते हवाई किराए पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने तब कहा था कि अगर यह मामला गंभीर नहीं होता तो अदालत इतनी सारी याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करती।
केंद्र सरकार ने उस समय कहा था कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय इस पूरे मामले पर विचार कर रहा है।
नवंबर 2025 में जारी हुआ था नोटिस
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, DGCA और एयरपोर्ट इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी AERA को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अदालत ने पूछा था कि यात्रियों से मनमाने तरीके से वसूले जा रहे किराए और अतिरिक्त शुल्क को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
एयरलाइंस पर क्या-क्या आरोप लगे हैं?
याचिका में सिर्फ टिकट कीमतों का मुद्दा ही नहीं उठाया गया, बल्कि कई दूसरी शिकायतें भी की गई हैं।
फ्री बैगेज सीमा घटाने का आरोप
याचिका में कहा गया है कि ज्यादातर निजी एयरलाइंस ने बिना किसी ठोस वजह के इकोनॉमी क्लास यात्रियों के लिए फ्री चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है।
इससे यात्रियों को अतिरिक्त वजन के नाम पर अलग से पैसे देने पड़ते हैं। आरोप है कि एयरलाइंस ने पहले से मिलने वाली सुविधा को ही कमाई का नया जरिया बना लिया।
एक बैग नियम पर सवाल
याचिका में यह भी कहा गया कि कई एयरलाइंस केवल एक ही बैग चेक-इन करने की अनुमति देती हैं। अगर कोई यात्री सामान नहीं ले जाता, तब भी उसे कोई छूट या फायदा नहीं मिलता।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था मनमानी और भेदभावपूर्ण है।
छिपे हुए चार्जेस का आरोप
याचिका में कहा गया कि अभी कोई ऐसी एजेंसी नहीं है जो एयरफेयर या अतिरिक्त शुल्क की सीमा तय कर सके। इसी वजह से एयरलाइंस यात्रियों से छिपे हुए चार्जेस वसूल रही हैं।
कई बार टिकट की शुरुआती कीमत कम दिखाई जाती है, लेकिन बाद में सीट चयन, बैगेज, खाने और सुविधा शुल्क जोड़कर रकम काफी बढ़ जाती है।
क्या डिमांड के हिसाब से किराया बढ़ाना सही है?
एयरलाइंस की ओर से आमतौर पर कहा जाता है कि टिकट कीमतें “डायनामिक प्राइसिंग” के आधार पर तय होती हैं। यानी मांग ज्यादा होने पर किराया बढ़ जाता है और सीटें खाली होने पर सस्ता टिकट मिल सकता है।
लेकिन याचिका में कहा गया कि जरूरी सेवाओं में इस तरह पूरी छूट देना सही नहीं है। खासकर तब, जब त्योहार, मौसम खराब होने या अचानक यात्रा की जरूरत पड़ने पर लोगों के पास दूसरा विकल्प नहीं होता।
याचिकाकर्ता ने कहा कि गरीब और अंतिम समय में यात्रा करने वाले यात्रियों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
कोर्ट में यात्रियों के अधिकारों की भी चर्चा
याचिका में कहा गया कि अनियमित किराए, सेवाओं में कटौती, शिकायत निवारण की कमजोर व्यवस्था और मनमानी कीमतें यात्रियों के अधिकारों को प्रभावित करती हैं।
याचिका के मुताबिक, यह केवल एक व्यावसायिक मामला नहीं है, बल्कि लोगों के समानता, सम्मान और आवाजाही के अधिकार से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र सरकार की दलीलें रिकॉर्ड पर ली हैं और कहा है कि नए नियमों पर विचार जारी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या सरकार ऐसा सिस्टम बना पाती है, जिससे एयरलाइंस की मनमानी पर रोक लगे और यात्रियों को राहत मिल सके।

