महिलाओं और पुरुषों में अलग तरह से दिखता है पार्किंसन रोग! बड़े अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले अंतर

दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही दिमाग से जुड़ी बीमारियों में Parkinson’s disease एक गंभीर समस्या मानी जाती है। इस बीमारी में शरीर की हरकतें धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती हैं। हाथ कांपना, चलने में दिक्कत, शरीर में जकड़न और संतुलन बिगड़ना इसके आम लक्षण हैं। अब एक नए बड़े अध्ययन में पता चला है कि यह बीमारी महिलाओं और पुरुषों में अलग-अलग तरीके से असर डालती है।

ऑस्ट्रेलिया में हुए इस रिसर्च में पाया गया कि पार्किंसन से पीड़ित महिलाओं में गिरने का खतरा ज्यादा होता है। इसके साथ ही उनमें दर्द, चिंता और डिप्रेशन की शिकायत भी पुरुषों की तुलना में अधिक देखी गई। वहीं पुरुषों में याददाश्त कमजोर होने और दिमागी क्षमता प्रभावित होने के मामले ज्यादा सामने आए।

यह अध्ययन QIMR Berghofer Medical Research Institute के वैज्ञानिकों ने किया और इसके नतीजे मेडिकल जर्नल The Lancet Regional Health Western Pacific में प्रकाशित हुए हैं।

 

करीब 11 हजार मरीजों पर हुआ अध्ययन

यह रिसर्च ऑस्ट्रेलियन पार्किंसन जेनेटिक्स स्टडी के आंकड़ों पर आधारित थी। इसमें लगभग 11,000 लोगों ने हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने बीमारी से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में सवालों के जवाब दिए और साथ ही अपने लार (saliva) के नमूने भी दिए।

वैज्ञानिकों ने मरीजों के लक्षण, व्यवहार, मानसिक स्थिति, नींद से जुड़ी समस्याएं और बीमारी से पहले के पर्यावरणीय जोखिमों का गहराई से अध्ययन किया।

रिसर्च से यह साफ हुआ कि पार्किंसन हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। बीमारी के असर में पुरुषों और महिलाओं के बीच बड़े अंतर दिखाई देते हैं।

 

महिलाओं में दर्द और गिरने की समस्या ज्यादा

अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में पार्किंसन की शुरुआत शरीर के एक हिस्से से होने की संभावना ज्यादा रहती है। लगभग 81 प्रतिशत महिलाओं ने बीमारी की शुरुआत शरीर के एक तरफ से होने की बात कही, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत था।

महिलाओं में गिरने की समस्या भी ज्यादा देखी गई। रिसर्च के अनुसार 45 प्रतिशत महिलाओं ने बार-बार गिरने की शिकायत की, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 41 प्रतिशत था।

इसके अलावा महिलाओं में दर्द की समस्या भी ज्यादा सामने आई। करीब 70 प्रतिशत महिलाओं ने लगातार दर्द महसूस होने की बात कही, जबकि पुरुषों में यह संख्या 63 प्रतिशत रही।

रिसर्च टीम के अनुसार महिलाओं में चिंता, तनाव और डिप्रेशन जैसी मानसिक परेशानियां भी अधिक देखने को मिलीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हार्मोन, शरीर की संरचना और दिमाग की कार्यप्रणाली में अंतर इसके पीछे वजह हो सकते हैं।

 

पुरुषों में याददाश्त और दिमागी असर ज्यादा

वहीं दूसरी ओर पुरुष मरीजों में दिमाग से जुड़ी समस्याएं ज्यादा पाई गईं। लगभग 67 प्रतिशत पुरुषों ने याददाश्त कमजोर होने की शिकायत की, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 61 प्रतिशत था।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि पुरुषों में cognitive impairment यानी सोचने-समझने और याद रखने की क्षमता पर असर अधिक पड़ा।

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि पुरुषों में impulsive behaviour यानी बिना सोचे-समझे अचानक फैसले लेने की प्रवृत्ति ज्यादा देखी गई। खासतौर पर यौन व्यवहार से जुड़ी impulsive आदतें पुरुषों में अधिक पाई गईं।

रिसर्चर्स का कहना है कि यह अंतर दिमाग में होने वाले जैविक बदलावों और अलग जीवनशैली के कारण हो सकता है।

Parkinson disease

नींद से जुड़ी समस्याओं में भी अंतर

अध्ययन में नींद से जुड़ी कई अहम बातें भी सामने आईं। पुरुषों में REM Sleep Behaviour Disorder और Sleep Apnoea की समस्या महिलाओं से ज्यादा देखी गई।

REM Sleep वह अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति सपने देखता है। सामान्य तौर पर यह नींद आने के करीब 90 मिनट बाद शुरू होती है। इस दौरान दिमाग काफी सक्रिय रहता है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि कई पुरुष मरीज नींद में अचानक हाथ-पैर चलाने, चिल्लाने या तेज हरकत करने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे थे।

Sleep Apnoea की समस्या में सोते समय सांस बार-बार रुकती है, जिससे शरीर और दिमाग पर बुरा असर पड़ता है।

 

कीटनाशकों और खतरनाक कामों से जुड़ा बड़ा खुलासा

रिसर्च में बीमारी से पहले के पर्यावरणीय जोखिमों पर भी ध्यान दिया गया। इसमें पाया गया कि पुरुषों में कीटनाशकों के संपर्क में आने की संभावना ज्यादा थी।

करीब 42 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि वे कीटनाशकों के संपर्क में रहे थे, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 28 प्रतिशत था।

इसके अलावा पुरुषों में खेती, धातु उद्योग और पेट्रोकेमिकल जैसे खतरनाक कामों में काम करने की संभावना भी ज्यादा पाई गई। लगभग 44 प्रतिशत पुरुष ऐसे कामों से जुड़े रहे, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 16 प्रतिशत था।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि केवल कीटनाशक ही पार्किंसन का कारण बनते हैं, लेकिन यह जरूर साफ है कि ऐसे जोखिम वाले माहौल में रहने वाले लोगों में बीमारी ज्यादा देखी जाती है।

 

परिवार से भी जुड़ा हो सकता है खतरा

अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर चार में से एक मरीज ने परिवार में पहले किसी सदस्य को पार्किंसन होने की जानकारी दी।

इससे संकेत मिलता है कि बीमारी में जेनेटिक यानी आनुवंशिक कारण भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा करीब 16 प्रतिशत मरीजों ने सिर में गंभीर चोट लगने का इतिहास भी बताया। वैज्ञानिकों का मानना है कि सिर की चोट भी आगे चलकर पार्किंसन के खतरे को बढ़ा सकती है।

 

“हर मरीज का अनुभव अलग”

अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक और QIMR Berghofer के एसोसिएट प्रोफेसर Miguel Renteria ने कहा कि यह रिसर्च दिखाती है कि पार्किंसन “एक जैसा” रोग नहीं है।

उनके अनुसार महिलाओं और पुरुषों में बीमारी अलग तरह से सामने आती है। इसके पीछे अलग जैविक कारण और पर्यावरणीय प्रभाव हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में सही और व्यक्तिगत इलाज विकसित करना है, तो इन अंतरों को समझना बेहद जरूरी होगा।

 

व्यक्तिगत इलाज की दिशा में बड़ा कदम

इस अध्ययन से जुड़े रिसर्चर Fangyuan Cao ने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से हुई कि पार्किंसन हर व्यक्ति में कितना अलग दिखता है।

उन्होंने कहा कि इतने बड़े डेटा की मदद से अब वैज्ञानिक केवल औसत आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह समझ पाएंगे कि बीमारी हर व्यक्ति में अलग तरह से क्यों असर डालती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में पार्किंसन के इलाज में “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” तरीका काम नहीं करेगा। यानी हर मरीज के लिए एक जैसा इलाज नहीं होगा। बीमारी के लक्षण, लिंग, जीवनशैली और पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखकर इलाज तय करना पड़ेगा।

 

क्यों अहम है यह रिसर्च?

दुनियाभर में पार्किंसन के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। बढ़ती उम्र, प्रदूषण, तनाव और बदलती जीवनशैली को इसके पीछे बड़ी वजह माना जा रहा है।

ऐसे में यह अध्ययन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे बीमारी को जल्दी पहचानने, सही इलाज चुनने और मरीजों की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

यह रिसर्च इस बात का भी संकेत देती है कि भविष्य में महिलाओं और पुरुषों के लिए पार्किंसन की देखभाल और इलाज के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।