RSS Registration Row: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के बीच संगठन के रजिस्ट्रेशन को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, रजिस्ट्रेशन, फंडिंग, आय-व्यय और संपत्तियों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
इसके जवाब में मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा कि RSS को किसी से अपनी वैधता साबित करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ कोई गुप्त संगठन नहीं है, बल्कि पिछले 100 वर्षों से खुले तौर पर काम कर रहा है। भागवत ने यह भी कहा कि देश में कई संस्थाएं ऐसी हैं जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं है, इसलिए केवल RSS को निशाना बनाना राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित लगता है। यही बयान अब कर्नाटक सरकार और RSS के बीच नए टकराव की वजह बन गया है।

RSS Registration Row: विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
15 जून 2026 को कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखा। यह पत्र ऐसे समय आया जब RSS अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है।
खड़गे ने अपने पत्र में कहा कि RSS का देशभर में व्यापक नेटवर्क है और केवल कर्नाटक में ही हजारों शाखाएं संचालित होती हैं। ऐसे में इतने बड़े संगठन की कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने पूछा कि जब देश में नागरिक, एनजीओ, ट्रस्ट, कंपनियां, धार्मिक संस्थाएं और अन्य संगठन कानून के तहत रजिस्ट्रेशन कराते हैं, तो RSS को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए। खड़गे ने यह भी मांग की कि RSS अपने फंडिंग स्रोत, दान, आय, खर्च और संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक करे।


प्रियांक खड़गे ने क्या सवाल उठाए?
अपने पत्र में प्रियांक खड़गे ने कहा कि RSS का संगठनात्मक ढांचा बहुत बड़ा है और इसका प्रभाव सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक में RSS की 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन और 60 मासिक मंडलियां संचालित होती हैं। इसके अलावा हजारों सम्मेलन और सैकड़ों रूट मार्च भी आयोजित किए जाते हैं।

खड़गे के अनुसार इतनी बड़ी गतिविधियों को केवल एक अनौपचारिक व्यवस्था नहीं माना जा सकता। ऐसे में संगठन की कानूनी स्थिति और जवाबदेही स्पष्ट होना जरूरी है।
उन्होंने RSS से पूछा कि संगठन किस कानूनी ढांचे के तहत काम करता है, उसकी आय का स्रोत क्या है, क्या वह लागू करों का भुगतान करता है और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए किस आधार पर अनुमति प्राप्त करता है।
मोहन भागवत का जवाब
केरल के त्रिशूर में आयोजित संघ के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम में मोहन भागवत ने इन सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि RSS को किसी के सामने अपनी वैधता साबित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि संगठन पिछले 100 वर्षों से खुले रूप में कार्य कर रहा है।
भागवत ने कहा कि संघ की शाखाएं खुले मैदानों में लगती हैं, सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और कार्यकर्ता समाज के बीच काम करते हैं। इसलिए RSS को गुप्त संगठन कहना गलत है।

उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं को सरकार से आर्थिक सहायता चाहिए, उन्हें रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती है। RSS सरकार से कोई फंड नहीं लेता, इसलिए उसके लिए ऐसी आवश्यकता नहीं है।
भागवत ने यह भी कहा कि संघ की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में हुई थी और तब से लेकर आज तक किसी भी सरकार ने यह नहीं कहा कि RSS को अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
RSS की कानूनी स्थिति क्या है?
RSS भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी सामाजिक संगठन माना जाता है। हालांकि यह किसी राजनीतिक दल, ट्रस्ट, सोसाइटी या एनजीओ के रूप में पंजीकृत नहीं है।
संघ का दावा है कि वह एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है। पहले भी RSS की ओर से कहा गया है कि आयकर विभाग और अदालतों ने कई मामलों में उसे “Association of Individuals” यानी व्यक्तियों के समूह के रूप में स्वीकार किया है।
संघ यह भी कहता रहा है कि उसे आयकर छूट संबंधी लाभ भी प्राप्त हैं। यही कानूनी स्थिति वर्तमान विवाद का मुख्य केंद्र बनी हुई है।

भागवत ने अपने बयान में और क्या कहा?
मोहन भागवत ने कहा कि RSS पर पहले भी दो बार प्रतिबंध लगाया गया था। एक बार न्यायिक प्रक्रिया के तहत और दूसरी बार राजनीतिक परिस्थितियों में। बाद में दोनों प्रतिबंध हटा लिए गए।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार को RSS के अस्तित्व पर संदेह होता, तो वह कभी प्रतिबंध लगाने या हटाने जैसी कार्रवाई नहीं करती।
भागवत ने यह भी कहा कि संघ ने कई दशक पहले सरकार को अपना लिखित संविधान सौंप दिया था और उस समय भी रजिस्ट्रेशन की मांग नहीं की गई।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू धर्म स्वयं रजिस्टर्ड नहीं है और देश में कई ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो औपचारिक रजिस्ट्रेशन के बिना अस्तित्व में हैं।
कर्नाटक सरकार का पलटवार
मोहन भागवत के बयान के बाद प्रियांक खड़गे ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था कानून और जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि RSS देश और विदेश से चंदा प्राप्त करता है, उसके पदाधिकारियों को सरकारी सुरक्षा भी मिलती है और संगठन का सार्वजनिक प्रभाव भी बहुत बड़ा है। ऐसे में पारदर्शिता की मांग पूरी तरह उचित है।
खड़गे ने यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर जो दावा किया जा रहा है कि भागवत ने उनके पत्र का जवाब दिया है, वह तथ्यात्मक रूप से गलत है। उनके अनुसार उन्होंने 15 जून को पत्र भेजा था, जबकि भागवत की टिप्पणी उससे पहले 13 या 14 जून को की गई थी।
पुराना टकराव भी बना वजह
RSS और प्रियांक खड़गे के बीच यह पहला विवाद नहीं है। जुलाई 2025 में खड़गे ने कहा था कि यदि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनती है तो RSS पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाएगा। उन्होंने संघ पर धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया था।
इसके बाद अक्टूबर 2025 में भी RSS और भीम आर्मी के प्रस्तावित मार्च को लेकर विवाद हुआ था। उस समय खड़गे ने आरोप लगाया था कि उन्हें कुछ RSS कार्यकर्ताओं की ओर से धमकियां मिली थीं। इन पुराने बयानों के कारण भी वर्तमान विवाद को राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है।
क्या RSS का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है?
उपलब्ध कानूनी जानकारी के अनुसार, भारतीय कानून किसी भी नागरिक समूह या स्वैच्छिक संगठन के लिए अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन की शर्त नहीं लगाता। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) नागरिकों को संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है। इसलिए केवल लोगों के एक समूह के रूप में कार्य करने के लिए पंजीकरण जरूरी नहीं है। RSS का भी यही तर्क रहा है कि वह व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक संगठन (body of individuals) है और स्वतंत्रता के बाद ऐसा कोई कानून नहीं बना जिसने उसके लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया हो।
संपत्ति, फंडिंग और कानूनी पहचान
यह बात काफी हद तक सही है कि RSS स्वयं किसी एक केंद्रीय रजिस्टर्ड संस्था के रूप में कार्य नहीं करता और उसके कई कार्यालय तथा संपत्तियाँ अलग-अलग पंजीकृत ट्रस्टों या समितियों के माध्यम से संचालित होती हैं। वहीं शिक्षा, सेवा और सामाजिक कार्यों से जुड़े संगठन जैसे Vidya Bharati और Seva Bharati अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं और नियामकीय नियमों का पालन करते हैं। हालांकि “RSS के नाम से कोई केंद्रीय बैंक खाता नहीं है” या “कोई सदस्यता रिकॉर्ड बिल्कुल नहीं है” जैसे दावों पर स्वतंत्र और आधिकारिक सार्वजनिक दस्तावेज सीमित हैं, इसलिए इन्हें पूर्ण तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि RSS की गैर-पंजीकृत संरचना और उसके वित्तीय संचालन को लेकर राजनीतिक बहस जारी है, जबकि RSS नेतृत्व का कहना है कि उसका संचालन भारतीय कानून के दायरे में और वैध रूप से होता है।
राजनीतिक महत्व क्यों बढ़ गया है?
RSS भारतीय जनता पार्टी (BJP) का वैचारिक स्रोत माना जाता है। ऐसे में RSS से जुड़ा कोई भी विवाद सीधे राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन जाता है।
कांग्रेस लंबे समय से RSS की कार्यप्रणाली और विचारधारा पर सवाल उठाती रही है। वहीं RSS और BJP कांग्रेस पर वैचारिक विरोध के कारण संघ को निशाना बनाने का आरोप लगाते हैं।
इसी वजह से रजिस्ट्रेशन का यह मुद्दा भी सामान्य प्रशासनिक बहस से आगे बढ़कर राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है।
निष्कर्ष
यह मामला (RSS Registration Row) केवल एक प्रशासनिक या कानूनी बहस नहीं है। यह पारदर्शिता, जवाबदेही, संगठनात्मक स्वतंत्रता और राजनीतिक विचारधाराओं के टकराव का मामला बन चुका है।
एक तरफ प्रियांक खड़गे और कर्नाटक सरकार RSS की कानूनी स्थिति और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर मोहन भागवत और RSS का कहना है कि संगठन ने 100 वर्षों तक खुले तौर पर काम किया है और उसके अस्तित्व या गतिविधियों में कुछ भी छिपा हुआ नहीं है।
आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है, क्योंकि मामला केवल रजिस्ट्रेशन तक सीमित नहीं बल्कि देश की सबसे प्रभावशाली वैचारिक संस्थाओं में से एक की जवाबदेही और भूमिका से भी जुड़ा हुआ है।
FAQs
1. What is the RSS registration controversy?
यह विवाद RSS के रजिस्ट्रेशन, कानूनी स्थिति, फंडिंग और जवाबदेही को लेकर शुरू हुआ है। कर्नाटक सरकार ने संगठन से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है।
2. Why are Mohan Bhagwat and Priyank Kharge involved?
प्रियांक खड़गे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी और वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की थी। इसके बाद भागवत ने सार्वजनिक मंच से जवाब दिया।
3. What sparked the political debate?
RSS के 100 वर्ष पूरे होने के दौरान प्रियांक खड़गे द्वारा भेजे गए पत्र और रजिस्ट्रेशन की मांग ने इस राजनीतिक बहस को जन्म दिया।
4. What is the RSS’s position on the issue?
RSS का कहना है कि वह कोई गुप्त संगठन नहीं है, सरकार से फंड नहीं लेता और पिछले 100 वर्षों में कभी किसी सरकार ने अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की मांग नहीं की।
5. How has the Karnataka government responded?
कर्नाटक सरकार का कहना है कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती और RSS को अपनी कानूनी स्थिति तथा फंडिंग से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

