Pakistan Japan Démarche: आतंकवाद पर भारत की कूटनीतिक जीत से बेचैन पाकिस्तान, जापान के सामने जताया कड़ा विरोध – जानिए इसके मायने..

Pakistan Japan Démarche

Pakistan Japan Démarche: भारत और जापान के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से पाकिस्तान की बेचैनी अब खुलकर सामने आ गई है। इस्लामाबाद ने भारत-जापान के नवीनतम संयुक्त बयान में “पाकिस्तान से होने वाले सीमा पार आतंकवाद” का स्पष्ट उल्लेख किए जाने पर जापान के सामने औपचारिक और कड़ा राजनयिक विरोध दर्ज कराया है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने 16 जुलाई 2026 को इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि जापान को एक Strong Démarche दिया गया है। इस्लामाबाद का आरोप है कि भारत अपने रणनीतिक साझेदार देशों पर संयुक्त बयानों में पाकिस्तान विरोधी भाषा शामिल करने का दबाव डालता है। पाकिस्तान ने इस भाषा को “एकतरफा” और जमीनी तथ्यों के विपरीत बताया है।

यह विवाद 2 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के संयुक्त बयान से जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करते हुए पहली बार सीधे शब्दों में “cross-border terrorism from Pakistan” का उल्लेख किया। दोनों नेताओं ने पहलगाम आतंकी हमले, दिल्ली में 10 नवंबर 2025 की आतंकी घटना और लश्कर-ए-तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद जैसे संयुक्त राष्ट्र में सूचीबद्ध संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की मांग भी की।

यह भाषा अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के बीच जारी बयान की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है। पुराने बयान में सीमा पार आतंकवाद की निंदा तो की गई थी, लेकिन पाकिस्तान का नाम सीधे नहीं लिखा गया था। जुलाई 2026 के बयान में “from Pakistan” जोड़ना जापान के रुख में महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव माना जा रहा है।

टोक्यो के सामने पाकिस्तान ने दर्ज कराया औपचारिक विरोध

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में पुष्टि की कि इस्लामाबाद ने जापान के सामने राजनयिक माध्यमों से अपनी आपत्ति रखी है। उन्होंने कहा कि सामान्य चिंता जताने के बजाय जापान को एक मजबूत और औपचारिक démarche दिया गया है।

अंद्राबी ने दावा किया कि भारत जब भी किसी देश के साथ उच्चस्तरीय बैठक करता है, तो संयुक्त बयान में पाकिस्तान को निशाना बनाने वाली भाषा शामिल कराने की कोशिश करता है। उनके मुताबिक ऐसा केवल जापान के साथ नहीं, बल्कि भारत के दूसरे साझेदार देशों के साथ जारी दस्तावेजों में भी किया जाता है।

पाकिस्तान ने जापान से कहा कि संयुक्त बयान की भाषा उसके आतंकवाद विरोधी अभियानों, सैनिकों और नागरिकों की मौतों तथा चरमपंथ के खिलाफ उसके दावों को नजरअंदाज करती है। इस्लामाबाद के अनुसार जापान ने भारत के पक्ष को स्वीकार कर एकतरफा दृष्टिकोण अपनाया है।

हालांकि पाकिस्तान ने इस दावे के समर्थन में कोई नया प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया कि संयुक्त बयान में संबंधित शब्द भारत के दबाव पर जोड़े गए थे। आधिकारिक भारत-जापान दस्तावेज इसे दोनों प्रधानमंत्रियों की साझा सहमति से जारी बयान बताता है।

 

जापान ने कहा – पाकिस्तान को लेकर नीति में कोई बदलाव नहीं

कड़ी आपत्ति के बावजूद पाकिस्तान ने दावा किया कि जापान के अधिकारियों ने उसे आश्वासन दिया है कि इस घटनाक्रम से टोक्यो की इस्लामाबाद के प्रति व्यापक नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

पाकिस्तानी प्रवक्ता के अनुसार दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनयिक, आर्थिक और संस्थागत संबंध हैं। द्विपक्षीय मुद्दों को उठाने के लिए नियमित परामर्श और दूसरे स्थापित तंत्र मौजूद हैं। पाकिस्तान ने कहा कि वह जापान के साथ बातचीत जारी रखेगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जापान की ओर से इस कथित आश्वासन का अलग सार्वजनिक बयान उपलब्ध नहीं है। फिलहाल यह जानकारी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के बयान पर आधारित है।

पाकिस्तान ने जापान से यह भी कहा कि वह भारत के कथित दबाव से प्रभावित न हो और भविष्य के संयुक्त दस्तावेजों में इस तरह की भाषा से बचे। इससे साफ है कि इस्लामाबाद की चिंता केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आने वाले वर्षों में जापान की दक्षिण एशिया नीति की दिशा को लेकर भी सतर्क है।

 

नए बयान में पहली बार सीधे जोड़ा गया पाकिस्तान का नाम

2 जुलाई 2026 का भारत-जापान संयुक्त बयान पिछली कूटनीतिक भाषा की तुलना में अधिक स्पष्ट और सख्त है। इसमें आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के सभी रूपों की निंदा करते हुए सीधे पाकिस्तान से होने वाले सीमा पार आतंकवाद का उल्लेख किया गया।

बयान में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई। इसके साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की निगरानी टीम की 29 जुलाई 2025 की उस रिपोर्ट का उल्लेख किया गया, जिसमें द रेजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF का नाम आया था।

भारत और जापान ने 10 नवंबर 2025 की दिल्ली आतंकी घटना की भी निंदा की और इसके अपराधियों, योजनाकारों तथा वित्तपोषकों को बिना देरी न्याय के दायरे में लाने की मांग की।

दोनों देशों ने अल-कायदा, ISIS/Daesh, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और उनके सहयोगी संगठनों के खिलाफ संगठित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की जरूरत बताई। संयुक्त बयान में आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म करने, उनकी फंडिंग रोकने और सीमा पार आवाजाही पर लगाम लगाने की बात भी कही गई।

इस पूरे हिस्से का कूटनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि जापान आमतौर पर अपने आधिकारिक दस्तावेजों में संतुलित और सावधानीपूर्ण भाषा का इस्तेमाल करता रहा है। पाकिस्तान का सीधे नाम लिया जाना भारत की आतंकवाद पर कूटनीतिक मुहिम के लिए महत्वपूर्ण समर्थन माना जा सकता है।

 

अगस्त 2025 और जुलाई 2026 के बयानों में बड़ा अंतर

अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा के दौरान जारी संयुक्त बयान में दोनों नेताओं ने आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के सभी रूपों की निंदा की थी। उसमें सीमा पार आतंकवाद का उल्लेख जरूर था, लेकिन किसी देश का नाम नहीं लिखा गया था।

जुलाई 2026 के बयान में “from Pakistan” शब्द जोड़ दिया गया। यही बदलाव पाकिस्तान की कड़ी प्रतिक्रिया का मुख्य कारण बना।

नया बयान केवल पाकिस्तान का नाम लेने तक सीमित नहीं रहा। इसमें पहलगाम हमले, दिल्ली की आतंकी घटना, TRF, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया। इससे भारत-जापान का आतंकवाद विरोधी सहयोग सामान्य सिद्धांतों से आगे बढ़कर दक्षिण एशिया की विशेष सुरक्षा परिस्थितियों से जुड़ गया है।

यह बदलाव जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची की अधिक सक्रिय सुरक्षा और विदेश नीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि जापान ने पाकिस्तान के साथ संबंध समाप्त करने या उसकी पूरी विदेश नीति बदलने का निर्णय ले लिया है। संयुक्त बयान आतंकवाद के मुद्दे पर सख्त रुख दिखाता है, लेकिन पाकिस्तान के साथ जापान के राजनयिक संबंध अभी जारी हैं।

 

Démarche सामान्य विरोध से ज्यादा गंभीर राजनयिक कदम

Démarche फ्रेंच मूल का एक राजनयिक शब्द है। इसका अर्थ है किसी देश की सरकार के सामने दूसरे देश द्वारा औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति, चिंता, मांग या चेतावनी रखना।

यह हमेशा संबंध तोड़ने या राजदूत वापस बुलाने जैसा कदम नहीं होता। कई बार विदेश मंत्रालय संबंधित देश के राजदूत को बुलाकर लिखित या मौखिक आपत्ति सौंपता है। कभी दूतावास के माध्यम से विरोध पत्र दिया जाता है और कभी उच्चस्तरीय राजनयिक बैठक में संबंधित स्थिति स्पष्ट की जाती है।

“Strong Démarche” का मतलब है कि आपत्ति सामान्य बातचीत की तुलना में अधिक कठोर और औपचारिक तरीके से दर्ज कराई गई। हालांकि इसकी कोई ऐसी सार्वभौमिक कानूनी श्रेणी नहीं होती, जिससे स्वतः प्रतिबंध या दूसरी कार्रवाई लागू हो जाए।

इस मामले में पाकिस्तान ने जापान से संयुक्त बयान की भाषा पर असहमति जताई है, लेकिन न तो राजदूत वापस बुलाया गया है और न ही दोनों देशों के संबंधों को कम करने की कोई घोषणा हुई है। इसलिए इसे फिलहाल एक कड़े राजनयिक विरोध के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि जापान-पाकिस्तान संबंधों के टूटने के रूप में।

 

पहलगाम हमले के बाद तेज हुई भारत की कूटनीतिक मुहिम

22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई कदम उठाए थे। भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित स्थिति में रखने, राजनयिक संपर्क सीमित करने और पाकिस्तान स्थित आतंकी ढांचे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई।

मई 2025 में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाकर पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने की बात कही थी। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव कई दिनों तक बना रहा।

इसी पृष्ठभूमि में भारत ने अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ होने वाली बैठकों में सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा प्रमुखता से उठाना शुरू किया। भारत का प्रयास रहा कि संयुक्त बयानों में केवल आतंकवाद की सामान्य निंदा न हो, बल्कि उसके स्रोत, संगठन, वित्तपोषक और सुरक्षित ठिकानों का भी स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

जुलाई 2026 के भारत-जापान बयान को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। इसमें पाकिस्तान का नाम, पहलगाम हमला और भारत के खिलाफ सक्रिय बताए जाने वाले संगठनों का उल्लेख भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं से मेल खाता है।

 

भारत-जापान संबंध अब व्यापार से आगे सुरक्षा तक पहुंचे

जापान और भारत के संबंध लंबे समय तक मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग, इंफ्रास्ट्रक्चर, हाई-स्पीड रेल और निवेश के इर्द-गिर्द केंद्रित थे। अब दोनों देश रक्षा, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में तेजी से साझेदारी बढ़ा रहे हैं।

2 जुलाई 2026 के शिखर सम्मेलन में दोनों पक्षों ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को साझेदारी के तीन प्रमुख आधारों में शामिल किया। उन्होंने इस वर्ष के अंत तक जापान में चौथी 2+2 विदेश और रक्षा मंत्री स्तरीय बैठक आयोजित करने पर सहमति जताई।

दोनों देशों ने समुद्री क्षेत्र की निगरानी, संयुक्त सैन्य अभ्यास, नौसैनिक रखरखाव, उपग्रह क्षमताओं और रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात कही।

UNICORN यानी Unified Complex Radio Antenna परियोजना के शेष तकनीकी मुद्दों पर सैद्धांतिक सहमति भी इसी यात्रा के दौरान बनी। यह प्रणाली युद्धपोतों पर लगाई जाने वाली उन्नत संचार एंटीना तकनीक से जुड़ी है।

भारत और जापान ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और भरोसेमंद सप्लाई चेन के लिए अलग-अलग सहयोग व्यवस्थाओं को भी आगे बढ़ाया। Reuters के अनुसार यात्रा के दौरान AI, धातुओं और ऊर्जा सहयोग से जुड़े कई समझौते हुए।

ऐसे में आतंकवाद पर मजबूत भाषा को केवल एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारत-जापान के तेजी से बढ़ते रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों के व्यापक संदर्भ का हिस्सा है।

 

इंडो-पैसिफिक में जापान तलाश रहा भरोसेमंद साझेदार

जापान की सुरक्षा चिंताएं पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली हैं। पूर्वी चीन सागर, दक्षिण चीन सागर, उत्तर कोरिया के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता टोक्यो की रणनीतिक नीति के केंद्र में हैं।

भारत-जापान संयुक्त बयान में पूर्वी और दक्षिण चीन सागर की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई। दोनों देशों ने बल या दबाव के जरिए यथास्थिति बदलने के प्रयासों का विरोध किया और समुद्री विवादों को अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की जरूरत बताई।

दोनों देशों ने क्वाड के तहत समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, महत्वपूर्ण तकनीक और आपदा राहत में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। इसके साथ फिलीपींस के साथ नया Track 1.5 त्रिपक्षीय संवाद शुरू करने की दिशा में तैयारी करने पर भी सहमति बनी।

इस रणनीतिक माहौल में भारत जापान के लिए तेजी से महत्वपूर्ण साझेदार बन रहा है। भारत के पास बड़ा बाजार, मजबूत नौसेना, हिंद महासागर में महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। दूसरी ओर भारत को जापान से निवेश, तकनीक, रक्षा सहयोग और इंडो-पैसिफिक में कूटनीतिक समर्थन मिलता है।

पाकिस्तान की आपत्ति इसी बदलते शक्ति संतुलन से भी जुड़ी है। इस्लामाबाद को आशंका है कि जापान जैसे प्रभावशाली देश यदि भारत की आतंकवाद संबंधी भाषा को स्वीकार करते हैं, तो इससे दूसरे देशों के संयुक्त बयानों में भी ऐसे संदर्भों की संभावना बढ़ सकती है।

 

पाकिस्तान ने खुद को आतंकवाद का पीड़ित बताया

पाकिस्तान लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि उसने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी संख्या में सैनिकों और नागरिकों को खोया है। उसका कहना है कि उसे आतंकवाद का प्रायोजक बताने के बजाय स्वयं आतंकवाद से प्रभावित देश के रूप में देखा जाना चाहिए।

जापान को दिए गए démarche में भी पाकिस्तान ने इसी बात पर जोर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि संयुक्त बयान की भाषा पाकिस्तान के योगदान और बलिदानों को नजरअंदाज करती है।

भारत इस तर्क को स्वीकार नहीं करता। नई दिल्ली का आरोप है कि पाकिस्तान ने लंबे समय तक भारत विरोधी आतंकी संगठनों, उनके नेताओं और ढांचे के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। भारत ने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और उनके सहयोगी संगठनों को लेकर बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठाए हैं।

भारत-जापान संयुक्त बयान ने मूल रूप से भारत के इसी दृष्टिकोण को समर्थन दिया है। इसमें पाकिस्तान का नाम लेने के साथ ऐसे संगठनों और उनके सुरक्षित ठिकानों, फंडिंग तथा सीमा पार गतिविधियों को समाप्त करने का आह्वान किया गया।

 

जापान-पाकिस्तान संबंध फिलहाल सामान्य रास्ते पर

पाकिस्तान और जापान के बीच कई दशकों पुराने राजनयिक और आर्थिक संबंध हैं। जापान ने पाकिस्तान को विकास सहायता, बुनियादी ढांचा सहयोग और मानवीय मदद दी है। दोनों देश व्यापार, शिक्षा और विकास परियोजनाओं पर भी काम करते रहे हैं।

इसीलिए पाकिस्तान ने अपना विरोध दर्ज कराते समय संबंधों के सकारात्मक पहलुओं का भी उल्लेख किया। उसने कहा कि दोनों देशों के बीच कई संस्थागत व्यवस्थाएं हैं और असहमति को उन्हीं माध्यमों से उठाया जाता रहेगा।

इस समय ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि démarche के बाद जापान पाकिस्तान के साथ संबंध कम करेगा या पाकिस्तान जापान के खिलाफ कोई जवाबी कदम उठाएगा।

विवाद का तत्काल प्रभाव इसलिए सीमित रह सकता है। हालांकि इसका दीर्घकालिक कूटनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य के भारत-जापान संयुक्त बयानों में भी पाकिस्तान का नाम दोहराया जाता है या जापान फिर से अधिक सामान्य भाषा का उपयोग करता है।

 

भारत को मिला महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन

भारत के दृष्टिकोण से जुलाई 2026 का बयान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता है। जापान जी7 का सदस्य, क्वाड साझेदार और एशिया की प्रमुख आर्थिक तथा तकनीकी शक्ति है। ऐसे देश द्वारा आधिकारिक संयुक्त बयान में पाकिस्तान से होने वाले सीमा पार आतंकवाद का सीधा उल्लेख भारत के पक्ष को अंतरराष्ट्रीय वैधता देता है।

यह समर्थन कानूनी रूप से पाकिस्तान पर कोई प्रतिबंध लागू नहीं करता। फिर भी कूटनीतिक दस्तावेजों में इस्तेमाल की गई भाषा वैश्विक धारणा और भविष्य की वार्ताओं को प्रभावित कर सकती है।

यदि दूसरे रणनीतिक साझेदार भी इसी तरह पाकिस्तान का सीधे नाम लेने लगते हैं, तो इस्लामाबाद के लिए आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी छवि सुधारना कठिन हो सकता है। पाकिस्तान की तीखी प्रतिक्रिया से भी संकेत मिलता है कि वह इस बदलाव को सामान्य बयानबाजी नहीं, बल्कि अपनी कूटनीतिक स्थिति के लिए गंभीर चुनौती मानता है।

 

टोक्यो के सामने अब संतुलन साधने की चुनौती

जापान के सामने भारत और पाकिस्तान के साथ संबंधों के बीच सीधी बराबरी का प्रश्न नहीं है। भारत जापान का Special Strategic and Global Partner है और दोनों देश क्वाड, रक्षा, तकनीक, व्यापार तथा इंडो-पैसिफिक में गहरे सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

पाकिस्तान के साथ जापान के संबंध अपेक्षाकृत विकास सहायता और पारंपरिक राजनयिक सहयोग पर आधारित हैं। फिर भी टोक्यो दक्षिण एशिया में स्थिरता चाहता है और भारत-पाकिस्तान तनाव बढ़ने पर दोनों देशों से संयम बरतने की अपील करता रहा है। मई 2025 में जापान ने दोनों देशों से तनाव कम करने और बातचीत के जरिए स्थिति स्थिर करने का आग्रह किया था।

इसलिए जापान संभवतः आतंकवाद पर भारत के साथ सख्त भाषा अपनाते हुए भी पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखना चाहेगा। पाकिस्तान को कथित तौर पर नीति में बदलाव न होने का आश्वासन इसी संतुलन का हिस्सा माना जा सकता है।

 

Strong Démarche से नहीं बदली जमीनी स्थिति

पाकिस्तान ने जापान के सामने कड़ा विरोध दर्ज करा दिया है, लेकिन इससे 2 जुलाई का संयुक्त बयान वापस नहीं हुआ और न ही उसकी भाषा में कोई संशोधन किया गया है।

भारत और जापान के रक्षा, आर्थिक और रणनीतिक समझौते भी अपनी जगह जारी हैं। दोनों देशों ने आगामी 2+2 वार्ता, रक्षा तकनीक, आर्थिक सुरक्षा, AI, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है।

ऐसे में démarche का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की असहमति को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज कराना और जापान को भविष्य के लिए संदेश देना दिखाई देता है।

इस्लामाबाद यह साफ करना चाहता है कि वह किसी तीसरे देश के साथ जारी भारतीय संयुक्त बयान में अपने खिलाफ प्रत्यक्ष संदर्भ को बिना प्रतिक्रिया स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन जापान ने भारत के साथ जिस स्तर का रणनीतिक सहयोग विकसित किया है, उसे देखते हुए पाकिस्तान के विरोध से टोक्यो की व्यापक भारत नीति बदलने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।

 

FAQ

1. पाकिस्तान ने जापान को Strong Démarche क्यों जारी किया?

पाकिस्तान ने 2 जुलाई 2026 के भारत-जापान संयुक्त बयान में “cross-border terrorism from Pakistan” लिखे जाने पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। इस्लामाबाद का कहना है कि यह भाषा एकतरफा है और आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के योगदान को नजरअंदाज करती है।

 

2. भारत-जापान संयुक्त बयान में क्या कहा गया था?

बयान में पाकिस्तान से होने वाले सीमा पार आतंकवाद की निंदा की गई। पहलगाम और दिल्ली की आतंकी घटनाओं का उल्लेख करते हुए अपराधियों, योजनाकारों तथा वित्तपोषकों को न्याय के दायरे में लाने की मांग की गई। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और दूसरे सूचीबद्ध आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की बात भी कही गई।

 

3. Démarche का क्या अर्थ होता है?

Démarche किसी सरकार द्वारा दूसरी सरकार के सामने औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति, चिंता, मांग या चेतावनी दर्ज कराने की राजनयिक प्रक्रिया है। Strong Démarche सामान्य बातचीत की तुलना में अधिक कड़ा औपचारिक विरोध होता है, लेकिन इससे अपने आप राजनयिक संबंध समाप्त नहीं होते।

 

4. पाकिस्तान को संयुक्त बयान पर आपत्ति क्यों है?

पाकिस्तान का कहना है कि उसे सीमा पार आतंकवाद के स्रोत के रूप में पेश करना तथ्यों के अनुरूप नहीं है। उसने आरोप लगाया कि भारत दूसरे देशों पर ऐसी भाषा शामिल कराने का दबाव डालता है। पाकिस्तान स्वयं को आतंकवाद से प्रभावित और उसके खिलाफ लड़ने वाला देश बताता है।

 

5. इस विवाद का भारत-जापान संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

इस विवाद से भारत-जापान संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना नहीं दिखाई देती। इसके विपरीत संयुक्त बयान दोनों देशों के गहरे होते रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को दर्शाता है। पाकिस्तान की आपत्ति का असर मुख्य रूप से जापान-पाकिस्तान कूटनीतिक बातचीत पर पड़ सकता है, लेकिन दोनों पक्ष फिलहाल संबंध जारी रखने की बात कर रहे हैं।