Indus Waters Treaty Arbitration: सिंधु जल संधि पर भारत को कोर्ट ले जाने की कीमत चुका रहा पाकिस्तान, खर्च 6 लाख डॉलर के पार – जानिए क्या है मामला?

Indus Waters Treaty Arbitration

भारत को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में ले जाने की पाकिस्तान की कोशिश अब उसी पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। Indus Waters Treaty Arbitration से जुड़ी कार्यवाही जारी रखने के लिए इस्लामाबाद को न केवल अपना खर्च उठाना पड़ रहा है, बल्कि भारत की ओर से जमा की जाने वाली राशि भी देनी पड़ रही है।

Economic Times की 17 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान अब तक मध्यस्थता प्रक्रिया में भारत के हिस्से के रूप में 6 लाख डॉलर से अधिक, यानी मौजूदा विनिमय दर के आधार पर करीब ₹5 करोड़ से ज्यादा की रकम जमा कर चुका है। पाकिस्तान का अपना हिस्सा और दूसरी संबंधित कार्यवाहियों का खर्च जोड़ने पर वास्तविक वित्तीय बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। भारत ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बना रखी है, जबकि पाकिस्तान इसे रुकने नहीं देना चाहता।

इस विवाद के केंद्र में जम्मू-कश्मीर में भारत की किशनगंगा जलविद्युत परियोजना और चिनाब नदी पर बन रही रतले जलविद्युत परियोजना हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि इन परियोजनाओं का डिजाइन सिंधु जल संधि की शर्तों के अनुरूप नहीं है। भारत इस दावे को स्वीकार नहीं करता और उसका कहना है कि परियोजनाएं संधि में दी गई सीमाओं के भीतर हैं।

दोनों देशों के बीच मतभेद केवल बांधों के डिजाइन तक सीमित नहीं है। असली कानूनी टकराव इस बात पर है कि विवाद का फैसला कौन करेगा – तकनीकी मामलों के लिए नियुक्त Neutral Expert या पाकिस्तान की मांग पर गठित Court of Arbitration

भारत की गैरमौजूदगी में पाकिस्तान पर आया पूरा वित्तीय बोझ

सिंधु जल संधि की विवाद निपटान व्यवस्था के तहत मध्यस्थता से जुड़े खर्चों के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों को धन उपलब्ध कराना होता है। लेकिन भारत ने पाकिस्तान द्वारा शुरू कराई गई Court of Arbitration की कार्यवाही को वैध मानने से इनकार कर दिया है।

भारत के कार्यवाही में भाग नहीं लेने और पैसा जमा नहीं करने के बावजूद पाकिस्तान ने मामले को आगे बढ़ाने का फैसला किया। नतीजा यह हुआ कि प्रक्रिया को जारी रखने के लिए इस्लामाबाद को भारत की ओर से मांगी गई राशि भी जमा करनी पड़ी।

Economic Times की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से जमा की गई $600,000 से अधिक रकम भारत के हिस्से से संबंधित है। इसलिए इसे केवल दोनों देशों का मिला-जुला कुल खर्च बताना सही नहीं होगा। पाकिस्तान का अपना कानूनी खर्च, वकीलों की फीस, विशेषज्ञों का खर्च, सुनवाई की लागत और Neutral Expert प्रक्रिया से जुड़ी राशि अलग हो सकती है।

यही इस मामले की सबसे असामान्य स्थिति है। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ मुकदमे जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया शुरू कराई, लेकिन भारत के बहिष्कार के बाद उस प्रक्रिया को जीवित रखने का खर्च भी उसे ही उठाना पड़ रहा है।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि को स्थगित स्थिति में रखा

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कूटनीतिक कदम उठाए। 23 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक के बाद भारत ने घोषणा की कि 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित स्थिति में रखा जाएगा

भारत सरकार ने कहा था कि यह स्थिति तब तक जारी रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से समर्थन देना बंद नहीं करता।

इस फैसले के बाद भारत ने संधि के तहत चलने वाली कई प्रक्रियाओं से दूरी बना ली। इनमें Court of Arbitration के साथ Neutral Expert की बैठकों से गैरहाजिरी भी शामिल रही।

हालांकि भारत का PCA की कार्यवाही से टकराव पहलगाम हमले से पहले ही शुरू हो चुका था। नई दिल्ली 2023 से ही पाकिस्तान द्वारा शुरू कराई गई मध्यस्थता का बहिष्कार कर रही थी। भारत का तर्क था कि उन्हीं परियोजनाओं पर Neutral Expert की प्रक्रिया पहले से चल रही है, इसलिए समानांतर रूप से Court of Arbitration चलाना संधि की निर्धारित व्यवस्था के विपरीत है।

किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर वर्षों से चल रहा विवाद

किशनगंगा परियोजना जम्मू-कश्मीर में झेलम नदी की सहायक किशनगंगा नदी पर स्थित है। वहीं रतले जलविद्युत परियोजना चिनाब नदी पर बनाई जा रही है। दोनों नदियां सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों की श्रेणी में आती हैं।

पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों – सिंधु, झेलम और चिनाब – के पानी के बड़े हिस्से के उपयोग का अधिकार दिया गया है। भारत को इन नदियों पर घरेलू उपयोग, सिंचाई की सीमित जरूरतों और संधि की शर्तों के तहत रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति है। इसके विपरीत पूर्वी नदियों – रावी, ब्यास और सतलुज – का पानी मुख्य रूप से भारत को आवंटित किया गया है।

पाकिस्तान को किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के कुछ तकनीकी पहलुओं पर आपत्ति है। इनमें बांध की ऊंचाई, पानी रोकने की क्षमता, जल निकासी के द्वार, स्पिलवे और अधिकतम पोंडेज जैसे मुद्दे शामिल हैं।

भारत का कहना है कि ये इंजीनियरिंग और तकनीकी प्रकृति के सवाल हैं, इसलिए इनका फैसला Neutral Expert को करना चाहिए। पाकिस्तान इन्हें व्यापक कानूनी व्याख्या का विषय मानते हुए Court of Arbitration में ले गया।

Neutral Expert और Arbitration Court के रास्ते पर टकराव

सिंधु जल संधि विवादों को अलग-अलग स्तरों पर हल करने की व्यवस्था देती है। सबसे पहले दोनों देशों के स्थायी सिंधु आयुक्तों के बीच मामला सुलझाने की कोशिश होती है। तकनीकी मतभेद होने पर मामला Neutral Expert के पास भेजा जा सकता है, जबकि व्यापक कानूनी विवाद को निश्चित परिस्थितियों में Court of Arbitration के सामने रखा जा सकता है।

विश्व बैंक के मुताबिक Neutral Expert और Court of Arbitration दोनों अलग तथा स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं और दोनों को अपने अधिकार क्षेत्र पर निर्णय देने की शक्ति है। विश्व बैंक की भूमिका मुख्य रूप से संधि में निर्धारित नियुक्ति और प्रशासनिक दायित्वों तक सीमित है; वह स्वयं यह फैसला नहीं करता कि दोनों में से कौन-सी प्रक्रिया पहले चलेगी।

भारत का तर्क है कि एक ही परियोजना और समान मुद्दों पर दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ चलना विरोधाभासी फैसलों की स्थिति पैदा कर सकता है। नई दिल्ली ने इसी कारण पाकिस्तान द्वारा गठित करवाए गए Arbitration Court को शुरू से अस्वीकार किया।

दूसरी ओर पाकिस्तान का कहना है कि उसके द्वारा उठाए गए प्रश्न संधि की व्यापक व्याख्या से जुड़े हैं और इसलिए Court of Arbitration को उन पर सुनवाई करने का अधिकार है।

 

2023 से मध्यस्थता अदालत का बहिष्कार कर रहा भारत

भारत ने पाकिस्तान की मांग पर शुरू हुई Arbitration Court की बैठकों में भाग नहीं लिया। नई दिल्ली ने न तो अदालत के गठन में सहयोग किया और न ही अपनी ओर से कोई प्रतिनिधि भेजा।

इसके बावजूद अदालत की कार्यवाही जारी रही। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में किसी एक पक्ष की अनुपस्थिति से प्रक्रिया अपने आप समाप्त नहीं होती। यदि ट्रिब्यूनल यह तय कर ले कि उसके पास मामले को सुनने का अधिकार है, तो वह अनुपस्थित पक्ष के बिना भी सुनवाई आगे बढ़ा सकता है।

जून 2025 में Court of Arbitration ने एक पूरक निर्णय जारी कर कहा कि भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित स्थिति में रखने से अदालत की योग्यता समाप्त नहीं होती और वह पाकिस्तान की शिकायत पर सुनवाई जारी रख सकती है।

भारत ने इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया। नई दिल्ली का कहना है कि जिस अदालत के गठन को वह शुरुआत से अवैध मानती है, उसके अधिकार क्षेत्र पर उसी अदालत का फैसला भारत के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकता।

 

अगस्त 2025 में अदालत ने संधि की व्याख्या पर दिया फैसला

8 अगस्त 2025 को Court of Arbitration ने सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या से जुड़े मुद्दों पर अपना फैसला जारी किया। PCA ने इसकी जानकारी 11 अगस्त 2025 को सार्वजनिक की थी।

इस निर्णय में अदालत ने पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन से संबंधित कई सिद्धांतों की व्याख्या की। अदालत ने अपने दस्तावेज में यह भी दर्ज किया कि भारत ने न तो कार्यवाही में भाग लिया और न ही अदालत द्वारा मांगी गई लागत के लिए धन उपलब्ध कराया।

भारत ने इस निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि पाकिस्तान के कहने पर गठित अदालत को वैध अधिकार नहीं है। नई दिल्ली ने अदालत के फैसले को कानूनी आधार से रहित बताते हुए कहा कि इसका भारत के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 

मई 2026 के फैसले में पाकिस्तान को मिली राहत

Court of Arbitration ने बाद में अधिकतम पोंडेज से जुड़े मुद्दे पर एक पूरक फैसला दिया। PCA ने 5 जून 2026 को इस निर्णय की घोषणा की। यह फैसला अधिकतम पोंडेज यानी परियोजना में बिजली उत्पादन के संचालन के दौरान पानी के स्तर में अनुमत बदलाव से संबंधित था।

इस निर्णय को पाकिस्तान के पक्ष में माना गया, क्योंकि अदालत ने परियोजनाओं की डिजाइन स्वतंत्रता पर अपेक्षाकृत कठोर व्याख्या अपनाई। हालांकि भारत ने फिर इसे मानने से इनकार कर दिया।

भारत सरकार ने अदालत को “अवैध रूप से गठित” बताते हुए उसके निर्णय को “शून्य और अमान्य” कहा। नई दिल्ली का रुख है कि सिंधु जल संधि स्थगित स्थिति में है और ऐसे समय किसी भी संस्था को भारत के अधिकारों पर निर्णय देने का कानूनी आधार नहीं है।

अदालत ने कार्यवाही की अंतिम लागत पर फैसला भविष्य के Final Award के लिए सुरक्षित रखा है। इसका अर्थ है कि आगे चलकर अदालत यह भी तय कर सकती है कि कुल खर्च का कितना हिस्सा किस पक्ष पर डाला जाए। हालांकि भारत इस पूरी प्रक्रिया को मान्यता ही नहीं देता।

 

Neutral Expert प्रक्रिया में भारत ने पहले किया था सहयोग

Court of Arbitration के विपरीत भारत ने Neutral Expert की प्रक्रिया में शुरुआत में भाग लिया था। इसका कारण यही था कि भारत किशनगंगा और रतले से जुड़े सवालों को तकनीकी विवाद मानता है।

विश्व बैंक ने 2022 में Michel Lino को Neutral Expert और Sean Murphy को Court of Arbitration का अध्यक्ष नियुक्त किया था। दोनों प्रक्रियाएं इसके बाद समानांतर रूप से आगे बढ़ीं।

Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जुलाई 2025 तक Neutral Expert प्रक्रिया में अपना वित्तीय योगदान दिया था। पहलगाम हमले और संधि को स्थगित स्थिति में रखने के बाद भारत ने इस प्रक्रिया को रोकने का अनुरोध किया और बाद की बैठकों से दूरी बना ली।

भारत नवंबर 2025 में हुई Neutral Expert की चौथी बैठक और मई 2026 की पांचवीं बैठक में शामिल नहीं हुआ। रिपोर्ट के अनुसार इन बैठकों और आगे की कार्यवाही से जुड़ा वित्तीय बोझ भी पाकिस्तान ने उठाया।

इससे पाकिस्तान का कुल खर्च केवल Court of Arbitration तक सीमित नहीं रह जाता। उसे Arbitration Court, Neutral Expert, कानूनी टीम, तकनीकी विशेषज्ञ और दस्तावेजी प्रक्रिया समेत कई स्तरों पर धन खर्च करना पड़ रहा है।

 

संधि के तहत दोनों देशों को मिलती हैं अलग-अलग नदियां

सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान ने हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक ने समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियां भारत को दी गईं, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकतर पानी पाकिस्तान के लिए रखा गया। इसके बावजूद भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई, घरेलू जरूरत और नियमों के तहत जलविद्युत उत्पादन की अनुमति है।

इसी अनुमति की व्याख्या दशकों से दोनों देशों के विवाद का कारण रही है। पाकिस्तान को डर रहता है कि ऊपरी धारा पर भारत की परियोजनाएं पानी के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं। भारत का कहना है कि उसकी रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं पानी का उपभोग नहीं करतीं और नदी का पानी आगे पाकिस्तान की ओर बहता रहता है।

किशनगंगा विवाद इससे पहले भी Arbitration Court तक पहुंच चुका है। वर्ष 2013 में आए फैसले ने भारत को परियोजना जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन न्यूनतम जल प्रवाह और कुछ तकनीकी शर्तें लगाई थीं।

 

संधि को एकतरफा स्थगित करने पर दोनों पक्षों के अलग दावे

पाकिस्तान का तर्क है कि सिंधु जल संधि में किसी एक पक्ष को इसे एकतरफा स्थगित या समाप्त करने का स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है। Court of Arbitration ने भी अपनी योग्यता से जुड़े फैसले में कहा कि भारत के कदम से उसकी सुनवाई करने की शक्ति समाप्त नहीं होती।

भारत का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। नई दिल्ली का कहना है कि कोई भी संधि पारस्परिक विश्वास और सद्भाव के आधार पर चलती है। सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में भारत से पुराने तरीके से सहयोग जारी रखने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

भारत ने यह भी कहा है कि संधि 1960 की परिस्थितियों में बनी थी, जबकि उसके बाद जनसंख्या, स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत, जलवायु परिवर्तन, जल उपलब्धता और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। नई दिल्ली पहले भी पाकिस्तान को संधि की समीक्षा और संशोधन के लिए नोटिस भेज चुकी है।

इसलिए मौजूदा विवाद केवल किशनगंगा और रतले परियोजनाओं का नहीं रहा। अब इसमें आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, संधि की वैधता, जल अधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या भी शामिल हो गई है।

 

पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ रहा खर्च

पाकिस्तान यह खर्च ऐसे समय उठा रहा है, जब उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से बाहरी कर्ज, कम विदेशी मुद्रा भंडार, कमजोर कर संग्रह और वित्तीय असंतुलन से जूझ रही है।

सितंबर 2024 में IMF ने पाकिस्तान के लिए 37 महीने का करीब 7 अरब डॉलर का Extended Fund Facility कार्यक्रम मंजूर किया था। इस कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को कर राजस्व बढ़ाने, ऊर्जा क्षेत्र में सुधार करने, सब्सिडी सीमित करने और सरकारी संस्थानों के निजीकरण जैसी शर्तों पर काम करना पड़ रहा है।

दिसंबर 2025 में IMF बोर्ड ने कार्यक्रम की समीक्षा मंजूर करते हुए नई किस्त जारी की और आर्थिक स्थिरता के लिए वित्तीय अनुशासन तथा संरचनात्मक सुधार जारी रखने को कहा।

इस बड़े आर्थिक संदर्भ में देखें तो 6 लाख डॉलर पाकिस्तान के राष्ट्रीय बजट के मुकाबले बहुत बड़ी रकम नहीं है। लेकिन इसका राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व ज्यादा है। जिस देश के खिलाफ पाकिस्तान ने प्रक्रिया शुरू की, उसी देश के हिस्से का खर्च भी उसे देना पड़ रहा है।

इसके अलावा अंतिम बिल अभी तय नहीं हुआ है। सुनवाई, विशेषज्ञों, प्रशासनिक व्यवस्था और अंतिम निर्णय तक खर्च लगातार बढ़ सकता है।

 

भारत के बिना भी रुकने वाली नहीं है कार्यवाही

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के सामान्य नियमों के तहत किसी पक्ष के बहिष्कार से मामला समाप्त नहीं होता। अदालत उपलब्ध दस्तावेजों और भाग लेने वाले पक्ष की दलीलों के आधार पर कार्यवाही जारी रख सकती है।

हालांकि अदालत को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि अनुपस्थित पक्ष के अधिकारों की अनदेखी न हो और केवल एक पक्ष के दावों को बिना जांच स्वीकार न किया जाए।

PCA ने भारत की अनुपस्थिति के बावजूद पहले अपने अधिकार क्षेत्र और बाद में संधि की व्याख्या से जुड़े फैसले दिए हैं। इससे यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान जब तक खर्च उठाता रहेगा, Court of Arbitration अपनी प्रक्रिया जारी रख सकता है।

दूसरी ओर भारत इन फैसलों को लागू करने के लिए बाध्य मानने से इनकार करता है। इससे ऐसी स्थिति बन सकती है, जिसमें पाकिस्तान के पास उसके पक्ष में अंतरराष्ट्रीय फैसला हो, लेकिन भारत उसे वैध ही न माने।

 

अंतिम फैसले को लागू कराना रहेगा सबसे कठिन सवाल

पाकिस्तान की रणनीति संभवतः यह है कि वह Court of Arbitration से अपने पक्ष में विस्तृत निर्णय हासिल करे और उसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बनाने में करे।

लेकिन किसी फैसले का व्यावहारिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत उसे स्वीकार करता है या नहीं। सिंधु जल संधि की व्यवस्था में कोई ऐसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय प्रवर्तन एजेंसी नहीं है, जो भारत की इच्छा के विरुद्ध परियोजनाओं के डिजाइन में बदलाव करा सके।

विश्व बैंक भी फैसले लागू कराने वाला न्यायिक प्राधिकरण नहीं है। उसकी भूमिका संधि के तहत प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने और निर्धारित नियुक्तियां करने तक सीमित है।

ऐसे में कानूनी निर्णय के बावजूद मामला राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर अटका रह सकता है। पाकिस्तान के लिए यह एक महंगी कानूनी जीत बन सकती है, जिसका जमीनी असर सीमित हो।

 

जल विवाद से भारत-पाकिस्तान संबंधों में बढ़ी नई दरार

सिंधु जल संधि को लंबे समय तक भारत-पाकिस्तान संबंधों की उन चुनिंदा व्यवस्थाओं में गिना जाता था, जो युद्धों और गंभीर तनाव के बावजूद जारी रहीं। लेकिन पहलगाम हमले के बाद पहली बार भारत ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद से सीधे जोड़ दिया।

Indus Waters Treaty Arbitration

भारत का कहना है कि आतंकवाद और संधि सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान इसे पानी को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश बताता है और कहता है कि संधि को एकतरफा रोका नहीं जा सकता।

इस विवाद का असर केवल अदालत तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में जल प्रवाह के आंकड़े साझा करने, परियोजनाओं का निरीक्षण करने, स्थायी सिंधु आयोग की बैठकें बुलाने और बाढ़ संबंधी सूचना देने जैसी व्यवस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

पाकिस्तान की कृषि और बिजली व्यवस्था पश्चिमी नदियों पर काफी निर्भर है। इसलिए संधि में लंबे समय तक गतिरोध उसके लिए रणनीतिक और आर्थिक चिंता का विषय रहेगा।

 

पाकिस्तान के सामने सीमित रह गए विकल्प

पाकिस्तान के पास फिलहाल तीन प्रमुख रास्ते दिखाई देते हैं। पहला, वह Arbitration Court और Neutral Expert की प्रक्रिया जारी रखे और पूरा खर्च उठाता रहे। दूसरा, भारत के साथ राजनीतिक या कूटनीतिक बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता तलाशे। तीसरा, विश्व बैंक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करे।

पहला रास्ता महंगा है और फैसले लागू कराने की गारंटी नहीं देता। दूसरे रास्ते के लिए दोनों देशों के संबंधों में सुधार जरूरी है, जिसकी फिलहाल संभावना कम दिखाई देती है। तीसरे विकल्प में भी विश्व बैंक की सीमित भूमिका पाकिस्तान के लिए बड़ी बाधा है।

भारत की स्थिति भी आसान नहीं है। संधि को स्थगित स्थिति में रखने के बाद नई दिल्ली को अपने कानूनी, तकनीकी और कूटनीतिक कदम सावधानी से तय करने होंगे। नदी का प्राकृतिक प्रवाह तुरंत रोकना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है और बड़ी मात्रा में पानी मोड़ने के लिए दीर्घकालीन अवसंरचना की जरूरत होगी।

 

खर्च बढ़ेगा, लेकिन दोनों देशों के रुख में बदलाव के संकेत नहीं

फिलहाल पाकिस्तान Court of Arbitration की कार्यवाही जारी रखने के पक्ष में है। इसका अर्थ है कि उसे आगे भी अदालत द्वारा मांगी जाने वाली रकम जमा करनी पड़ सकती है।

भारत अपने रुख पर कायम है कि यह अदालत अवैध रूप से गठित है और उसके फैसले मान्य नहीं हैं। साथ ही नई दिल्ली का कहना है कि सिंधु जल संधि तब तक स्थगित स्थिति में रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता।

दोनों पक्षों की ये स्थितियां एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। जब तक राजनीतिक स्तर पर कोई नया समझौता नहीं होता, कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है और उसका वित्तीय भार पाकिस्तान पर बढ़ता जा सकता है।

 

FAQ

1. सिंधु जल संधि क्या है?

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हुआ जल बंटवारा समझौता है। इसके तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियां मुख्य रूप से भारत को मिलीं, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकतर पानी पाकिस्तान के लिए आवंटित किया गया। विश्व बैंक ने इस समझौते को कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।

 

2. पाकिस्तान भारत को मध्यस्थता में क्यों ले गया?

पाकिस्तान का आरोप है कि भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं के कुछ डिजाइन प्रावधान सिंधु जल संधि का उल्लंघन करते हैं। इसी आधार पर उसने Court of Arbitration में मामला उठाया। भारत का कहना है कि ये तकनीकी प्रश्न हैं और इन पर Neutral Expert को फैसला करना चाहिए।

 

3. पाकिस्तान को भारत का बिल क्यों चुकाना पड़ रहा है?

भारत ने Arbitration Court की वैधता स्वीकार नहीं की और कार्यवाही में न भाग लेने के साथ अपना वित्तीय योगदान भी नहीं दिया। पाकिस्तान ने प्रक्रिया जारी रखने का फैसला किया, इसलिए अदालत को चलाने के लिए उसे भारत की ओर से मांगी गई राशि भी जमा करनी पड़ रही है।

 

4. इस विवाद का मुख्य कारण क्या है?

तात्कालिक विवाद किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़ा है। बड़ा विवाद इस बात पर है कि मामले की सुनवाई Neutral Expert करे या Court of Arbitration। पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा संधि को स्थगित स्थिति में रखे जाने से विवाद और गंभीर हो गया।

 

5. क्या इस मामले का भारत-पाकिस्तान संबंधों पर असर पड़ेगा?

हां। इससे दोनों देशों के बीच जल संबंधी सहयोग, आंकड़ों के आदान-प्रदान, परियोजनाओं के निरीक्षण और स्थायी सिंधु आयोग की बैठकों पर असर पड़ सकता है। यह विवाद अब जल प्रबंधन के साथ आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों से भी जुड़ गया है।