MP Farmers Protest: मध्य प्रदेश में किसान प्रोटेस्ट ने राज्य की राजनीति और कृषि नीति दोनों को केंद्र में ला दिया है। हजारों किसान मूंग की फसल की 100 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद, उर्वरकों के वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था समाप्त करने और खाद की समय पर उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर भोपाल पहुंच गए हैं। आंदोलन की शुरुआत नर्मदापुरम से हुई और किसानों का लक्ष्य मुख्यमंत्री मोहन यादव के श्यामला हिल्स स्थित आवास तक मार्च करना था। पुलिस की बैरिकेडिंग और प्रशासन की रोक के बावजूद किसान राजधानी के बाहरी हिस्से तक पहुंच गए, जिसके बाद सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ।

नर्मदापुरम से भोपाल तक पहुंचा किसान मार्च
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के बैनर तले किसानों ने 27 जुलाई को नर्मदापुरम के सेठानी घाट से ‘किसान क्रांति पदयात्रा’ शुरू की। तिरंगा हाथ में लेकर और ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे लगाते हुए हजारों किसान करीब 80 किलोमीटर का सफर तय कर भोपाल पहुंचे। प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या ऐसे किसानों की थी जो अपने साथ कपड़े, बिस्तर और लगभग एक सप्ताह का राशन लेकर निकले थे, ताकि जरूरत पड़ने पर लंबे समय तक राजधानी में डटे रह सकें।
रास्ते में कई स्थानों पर पुलिस ने बैरिकेड लगाकर मार्च रोकने की कोशिश की, लेकिन किसान उन्हें पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। अंततः उन्होंने भोपाल के सावरकर ब्रिज के पास डेरा डाल दिया, जो मुख्यमंत्री आवास से लगभग आठ किलोमीटर दूर है।

मूंग की रिकॉर्ड पैदावार बनी आंदोलन की सबसे बड़ी वजह
इस बार मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन (जायद) मूंग की रिकॉर्ड पैदावार हुई है। राज्य में लगभग 14.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मूंग की बुवाई हुई और औसत उत्पादन करीब 1,410 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है। इसके आधार पर कुल उत्पादन लगभग 20.16 लाख मीट्रिक टन आंका गया है।
किसानों का कहना है कि जब उत्पादन इतना अधिक हुआ है, तब सरकार को पूरी फसल MSP पर खरीदनी चाहिए। उनका आरोप है कि सीमित सरकारी खरीद के कारण बड़ी मात्रा में मूंग खुले बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है, जिससे भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।

Price Support Scheme से क्यों नाराज हैं किसान
किसानों की नाराजगी का मुख्य कारण Price Support Scheme (PSS) है। केंद्र सरकार उड़द, तुअर और मसूर जैसी कई दालों की 100 प्रतिशत खरीद कर रही है, जबकि मूंग की खरीद अभी भी PSS के तहत होती है। इस योजना के नियमों के अनुसार किसी राज्य की अनुमानित कुल पैदावार का अधिकतम 25 प्रतिशत ही MSP पर खरीदा जा सकता है।
इसी नियम के कारण मध्य प्रदेश में लगभग 20.16 लाख मीट्रिक टन अनुमानित उत्पादन के मुकाबले केंद्र ने केवल 4.54 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदने की मंजूरी दी। किसानों का कहना है कि इससे अधिकांश उत्पादकों को MSP का लाभ ही नहीं मिल पा रहा है।
प्रति एकड़ खरीद सीमा भी बनी विवाद का कारण
किसान संगठनों का कहना है कि राज्य सरकार ने MSP पर खरीद की सीमा 1.2 क्विंटल (120 किलोग्राम) प्रति एकड़ तय कर रखी है। जबकि सामान्य परिस्थितियों में एक एकड़ खेत से लगभग 4 से 5 क्विंटल मूंग का उत्पादन हो जाता है।
इसका मतलब यह है कि किसान की पूरी फसल MSP पर नहीं खरीदी जाती। बची हुई उपज उसे खुले बाजार में बेचनी पड़ती है, जहां कीमत MSP से काफी कम मिलती है। यही कारण है कि किसान 100 प्रतिशत सरकारी खरीद की मांग पर अड़े हुए हैं।
MSP और बाजार भाव के अंतर से बढ़ा नुकसान
वर्ष 2025-26 के लिए मूंग का MSP 8,668 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। किसानों का दावा है कि सरकारी खरीद से बाहर रह जाने वाली फसल उन्हें खुले बाजार में केवल 4,000 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बेचनी पड़ रही है।
यानी हर क्विंटल पर करीब 3,000 से 4,000 रुपये तक का नुकसान हो रहा है। किसान संगठनों का कहना है कि यही आर्थिक दबाव इस आंदोलन की सबसे बड़ी वजह बना है।
ई-टोकन व्यवस्था भी बनी किसानों की नाराजगी की वजह
आंदोलन केवल MSP तक सीमित नहीं है। किसानों की दूसरी प्रमुख मांग उर्वरकों के वितरण में लागू ई-टोकन प्रणाली को समाप्त करना या उसमें व्यापक सुधार करना है।
सरकार का कहना है कि डिजिटल टोकन व्यवस्था से वितरण पारदर्शी बनता है और भीड़ कम होती है, लेकिन किसानों का आरोप है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या, तकनीकी गड़बड़ियों और स्लॉट बुकिंग की कठिन प्रक्रिया के कारण समय पर खाद नहीं मिल पाती। बुवाई जैसे संवेदनशील समय में यह देरी सीधे उत्पादन को प्रभावित करती है। इसी कारण किसान ई-टोकन व्यवस्था हटाने की मांग कर रहे हैं।
कई जिलों के किसान आंदोलन में शामिल
यह आंदोलन केवल भोपाल या नर्मदापुरम तक सीमित नहीं है। इसमें हरदा, सीहोर, रायसेन, विदिशा, देवास, उज्जैन, इंदौर, धार, खंडवा और खरगोन जैसे उन जिलों के किसान बड़ी संख्या में शामिल हैं, जहां मूंग की खेती बड़े पैमाने पर होती है। पिछले कई सप्ताह से इन जिलों में मूंग खरीद को लेकर अलग-अलग स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। भोपाल मार्च उसी आंदोलन का सबसे बड़ा चरण माना जा रहा है।
सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना, लेकिन पहली बैठक बेनतीजा रही
भोपाल पहुंचने के बाद राज्य सरकार ने आंदोलन को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश की। कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधियों से करीब दो घंटे तक चर्चा की, लेकिन शुरुआती दौर की वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों से लगातार संवाद बनाए रखने के लिए चार मंत्रियों की एक समिति गठित कर दी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य प्रदेश में ‘किसान कल्याण वर्ष’ मनाया जा रहा है और सरकार किसानों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि आंदोलन का समाधान टकराव नहीं बल्कि संवाद के जरिए निकाला जाएगा।
मंत्रियों की समिति को सौंपी गई जिम्मेदारी
सरकार ने किसानों से बातचीत के लिए कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना, मंत्री कृष्णा गौर, विश्वास सारंग और राकेश सिंह को जिम्मेदारी दी। वरिष्ठ अधिकारियों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया ताकि किसानों की मांगों पर प्रशासनिक और वित्तीय दोनों स्तरों पर फैसला लिया जा सके।
केंद्र और राज्य के बीच खरीद को लेकर अलग-अलग दलीलें
वार्ता के समानांतर कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मूंग खरीद की स्वीकृत मात्रा बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा कि इस वर्ष अनुमान से अधिक उत्पादन हुआ है, इसलिए खरीद का लक्ष्य 4.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 8 लाख मीट्रिक टन किया जाए, ताकि अधिक किसानों को MSP का लाभ मिल सके।

कंसाना ने यह भी बताया कि राज्य में लगभग 4.19 लाख मीट्रिक टन मूंग की खरीद हो चुकी है और मौजूदा स्वीकृत मात्रा जल्द पूरी होने वाली है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि देश के कुल मूंग उत्पादन में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है।
इसके जवाब में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि PM-AASHA योजना के तहत केंद्र किसी राज्य के अनुमानित उत्पादन का अधिकतम 25 प्रतिशत ही Price Support Scheme (PSS) के अंतर्गत खरीद सकता है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश को पहले ही 4,54,580 मीट्रिक टन मूंग खरीद की मंजूरी दी जा चुकी है, जो देशभर में स्वीकृत कुल मात्रा का लगभग 87 प्रतिशत है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार इससे अधिक खरीद करना चाहती है तो वह अपने संसाधनों से ऐसा कर सकती है।
आंदोलन के बीच बदला सरकार का रुख
कई दौर की बातचीत के बाद राज्य सरकार ने किसानों को राहत देने वाले कई बड़े फैसले किए। सरकार ने प्रति पात्र किसान मूंग खरीद की सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दी। इसका लाभ विशेष रूप से नर्मदापुरम, हरदा और सीहोर जैसे जिलों के किसानों को मिलेगा, जहां औसतन प्रति एकड़ लगभग तीन क्विंटल उत्पादन होता है। यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू करने की घोषणा की गई।
इसके साथ ही सरकार ने मूंग खरीद की अंतिम तिथि 10 अगस्त से बढ़ाकर 20 अगस्त कर दी, जबकि स्लॉट बुकिंग की समय सीमा भी 30 जुलाई से बढ़ाकर 10 अगस्त तक कर दी गई।
ई-टोकन व्यवस्था पर भी बड़ा फैसला
किसानों की दूसरी प्रमुख मांग को स्वीकार करते हुए सरकार ने उर्वरकों के वितरण के लिए लागू ई-टोकन प्रणाली को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की घोषणा की। सरकार ने कहा कि यह व्यवस्था सुधार के उद्देश्य से लागू की गई थी, लेकिन शुरुआती चरण में किसानों को कई व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
अब कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जाएगी, जो इस व्यवस्था की कमियों की समीक्षा करेगी। जब तक समिति अपनी रिपोर्ट नहीं देती और आवश्यक सुधार नहीं हो जाते, तब तक खाद वितरण पुरानी व्यवस्था के अनुसार किया जाएगा।
भोपाल में सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य बनाई गई
आंदोलन के दौरान हजारों किसानों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च करने का ऐलान किया। इसके बाद पुलिस ने मुख्यमंत्री निवास के आसपास बहुस्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार किया। राजधानी की प्रमुख सड़कों पर कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई और लगभग 20 पुलिस थानों का बल, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), स्पेशल एक्शन फोर्स (SAF), जल तोप और अन्य दंगा नियंत्रण उपकरण तैनात किए गए। कई स्थानों पर यातायात भी प्रभावित रहा और कुछ स्कूलों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी।
राकेश टिकैत और नई राजनीतिक हलचल
इसी दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं ने दिल्ली में भारतीय किसान यूनियन (BKU) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत से मुलाकात की। बैठक में किसानों, छात्रों और युवाओं के लिए साझा मंच बनाने की संभावना पर चर्चा हुई। टिकैत 2020-21 के किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। हालांकि मध्य प्रदेश के वर्तमान आंदोलन में BKU की औपचारिक भूमिका घोषित नहीं की गई है, लेकिन इस मुलाकात ने आंदोलन के राजनीतिक आयामों को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी। साथ ही, कुछ Gen-Z युवाओं के भी प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर किसानों का समर्थन करने की खबरें सामने आईं।

आंदोलन फिलहाल थमा, लेकिन बहस जारी
सरकार द्वारा खरीद सीमा बढ़ाने, खरीद अवधि आगे बढ़ाने और ई-टोकन प्रणाली स्थगित करने के फैसले के बाद किसान संगठनों ने अपना आंदोलन वापस लेने का ऐलान कर दिया। हालांकि किसानों की मूल मांग 100 प्रतिशत MSP खरीद की थी, लेकिन सरकार के फैसलों को फिलहाल एक अंतरिम समाधान माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि खरीद प्रक्रिया कितनी प्रभावी रहती है और ई-टोकन व्यवस्था में प्रस्तावित सुधार कितनी जल्दी लागू होते हैं।
FAQs
- भोपाल में किसान प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
किसान मूंग की 100 प्रतिशत MSP पर खरीद, ई-टोकन व्यवस्था समाप्त करने और उर्वरकों की समय पर उपलब्धता की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। - मध्य प्रदेश सरकार ने मंत्रियों की समिति क्यों बनाई है?
सरकार ने किसानों से संवाद कर आंदोलन का समाधान निकालने और उनकी मांगों पर निर्णय लेने के लिए चार मंत्रियों की समिति बनाई थी। - किसानों की मुख्य मांगें क्या थीं?
मुख्य मांगों में मूंग की 100 प्रतिशत MSP पर खरीद, ई-टोकन व्यवस्था समाप्त करना, पर्याप्त खाद उपलब्ध कराना और खरीद प्रक्रिया को आसान बनाना शामिल था। - क्या सरकार और किसानों के बीच बातचीत शुरू हो गई थी?
हाँ। कई दौर की बातचीत हुई, जिसके बाद सरकार ने खरीद सीमा बढ़ाने और ई-टोकन व्यवस्था स्थगित करने जैसे फैसले लिए। - इस समिति में कौन-कौन से मंत्री शामिल थे?
समिति में ऐदल सिंह कंसाना, कृष्णा गौर, विश्वास सारंग और राकेश सिंह शामिल थे। - किसानों के आंदोलन का कृषि क्षेत्र पर क्या असर पड़ा?
आंदोलन के कारण भोपाल में यातायात और प्रशासनिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। वहीं सरकार को खरीद नीति और उर्वरक वितरण व्यवस्था में तत्काल बदलाव करने पड़े, जिससे हजारों किसानों को राहत मिली।

