China Iran Air Defence Deal: क्या चीन ईरान को 400 एयर डिफेंस मिसाइलें देने जा रहा है, अमेरिका-इजराइल के लिए कितना बड़ा खतरा?

China Iran Air Defence Deal

China Iran Air Defence Deal: अमेरिका और इजराइल के साथ महीनों से जारी संघर्ष के बीच ईरान अपनी कमजोर पड़ चुकी हवाई सुरक्षा को मजबूत करने की तैयारी कर रहा है। समाचार एजेंसी Reuters ने मामले की जानकारी रखने वाले तीन सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि तेहरान ने चीन में बनी 300 से 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम यानी MANPADS खरीदने के लिए करीब 6 से 7 करोड़ डॉलर का समझौता किया है। इनमें QW-12 और FN-16 जैसे कंधे से दागे जाने वाले एयर डिफेंस मिसाइल लॉन्चर शामिल बताए गए हैं। पहली खेप कुछ सप्ताह के भीतर ईरान पहुंचने की संभावना जताई गई है। हालांकि चीन ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह निराधार बताया है और पाकिस्तान ने भी हथियारों की ढुलाई में किसी भूमिका से साफ इनकार किया है।

यह कथित China Iran Air Defence Deal ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी और इजराइली हमलों ने ईरान की स्थिर एयर डिफेंस बैटरियों, मिसाइल ठिकानों, ड्रोन सुविधाओं और दूसरे सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में मौजूद कमियां उजागर कर दी हैं। यदि यह सौदा पूरा होता है तो यह युद्ध शुरू होने के बाद ईरान द्वारा अपनी कम दूरी की वायु रक्षा मजबूत करने के सबसे बड़े ज्ञात प्रयासों में शामिल होगा। इसके साथ ही चीन और ईरान के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग तथा पश्चिम एशिया के बदलते सैन्य समीकरणों पर भी नई बहस शुरू हो गई है।

हांगकांग की कंपनी के जरिए 7 करोड़ डॉलर का सौदा

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते पर ईरानी अधिकारियों और हांगकांग स्थित कंपनी Zhongqing Baoshang International Investment के बीच हस्ताक्षर किए गए हैं। सूत्रों का दावा है कि यह कंपनी ईरान और वास्तविक चीनी आपूर्तिकर्ता के बीच मध्यस्थ के रूप में काम कर रही है। सौदे का अनुमानित मूल्य 6 से 7 करोड़ डॉलर है और इसके अंतर्गत कुल 300 से 400 पोर्टेबल एयर डिफेंस लॉन्चर खरीदे जाने की बात कही गई है।

रिपोर्ट में प्रारंभिक आपूर्ति के आकार को लेकर शब्दावली पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कुछ विवरणों में पहली खेप में “400 तक” लॉन्चर पहुंचने की बात कही गई है, जबकि व्यापक सौदे में कुल 300 से 400 प्रणालियों का उल्लेख है। इसलिए अभी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि शुरुआती खेप में पूरी मात्रा भेजी जाएगी या डिलीवरी कई चरणों में होगी। ईरान और कथित मध्यस्थ कंपनी ने फिलहाल इस सौदे की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की है।

 

Urumqi से पाकिस्तान के रास्ते ईरान पहुंचने का दावा

सूत्रों के मुताबिक, मिसाइल प्रणालियों की पहली खेप पश्चिमी चीन के Urumqi से हवाई मार्ग द्वारा भेजे जाने की योजना है। इसके बाद इन्हें पाकिस्तान से होते हुए ईरान पहुंचाया जा सकता है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पाकिस्तान से ईरान तक अंतिम चरण की यात्रा सड़क मार्ग से होगी या हवाई मार्ग से। दो पश्चिमी खुफिया सूत्रों और एक ईरानी अधिकारी के अनुसार, तेहरान ने सैन्य सामान तथा दोहरे उपयोग वाले उपकरणों को अधिक गोपनीय तरीके से लाने के लिए जमीनी मार्गों की संभावना भी तलाशी है।

पाकिस्तान की सेना के मीडिया विभाग Inter-Services Public Relations यानी ISPR ने इस दावे को खारिज कर दिया। ISPR ने कहा कि चीन से ईरान को एयर डिफेंस हथियार पहुंचाने में पाकिस्तान की भागीदारी से जुड़ी अटकलें “मनगढ़ंत और झूठी” हैं। इस इनकार के बाद प्रस्तावित आपूर्ति मार्ग भी विवाद का हिस्सा बन गया है।

 

चीन का जवाब – रिपोर्ट पूरी तरह निराधार

चीन के विदेश मंत्रालय ने भी मिसाइल आपूर्ति की रिपोर्ट को खारिज किया है। मंत्रालय ने Reuters से कहा कि संबंधित दावे “पूरी तरह निराधार” हैं और चीन लगातार शांति को बढ़ावा देने तथा संघर्ष समाप्त कराने की भूमिका निभाता रहा है। चीन की ओर से न तो सौदे, न आपूर्तिकर्ता और न ही प्रस्तावित मार्ग की पुष्टि की गई है।

यह इनकार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में दावा किया था कि चीन और रूस ने ईरान को हथियार न बेचने का भरोसा दिया है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि ऐसा हुआ तो यह उन देशों के लिए “बहुत बुरा” होगा। ऐसे में यदि भविष्य में हथियार आपूर्ति की स्वतंत्र पुष्टि होती है तो यह चीन-अमेरिका संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर सकती है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी केवल सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट है और बीजिंग ने इसे आधिकारिक रूप से अस्वीकार किया है।

 

महीनों के युद्ध ने उजागर की ईरान की कमजोर वायु रक्षा

ईरान ने पिछले दो दशकों में बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन, रडार और घरेलू एयर डिफेंस प्रणालियों पर भारी निवेश किया है। इसके बावजूद अमेरिका और इजराइल के साथ हालिया युद्ध में कई स्थिर सैन्य ठिकाने लगातार हवाई हमलों का निशाना बने। हमलों में ईरान के मिसाइल, ड्रोन और एयर डिफेंस कार्यक्रमों से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया, जबकि तेहरान ने जवाब में बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन की लहरें छोड़ीं।

युद्ध के शुरुआती दिनों में इजराइल ने दावा किया था कि उसने ईरान की हवाई सुरक्षा के बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया है और उसके विमान पश्चिमी ईरान तथा तेहरान के ऊपर अपेक्षाकृत स्वतंत्रता से कार्रवाई कर रहे हैं। इस दावे की पूरी स्वतंत्र पुष्टि कठिन है, लेकिन लगातार हमलों ने यह जरूर दिखाया कि बड़े और स्थिर एयर डिफेंस ठिकानों को आधुनिक लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और सटीक निर्देशित हथियारों से बचाना आसान नहीं है।

इसी कमजोरी को देखते हुए ईरान अब ऐसी Air Defence Missile Systems पर जोर देता दिखाई दे रहा है, जिन्हें छोटे दल संचालित कर सकें, तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जा सके और जिन्हें दुश्मन के लिए पहले से तलाशकर नष्ट करना मुश्किल हो।

 

MANPADS बड़े एयर डिफेंस सिस्टम से अलग कैसे हैं

MANPADS का पूरा नाम Man-Portable Air Defence System है। सामान्य भाषा में ये ऐसी हल्की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियां हैं, जिन्हें एक सैनिक या छोटी टीम कंधे पर रखकर ले जा सकती है। इन्हें किसी बड़े रडार स्टेशन, भारी लॉन्चर वाहन या स्थायी एयर डिफेंस बेस की आवश्यकता नहीं होती।

इन प्रणालियों का इस्तेमाल आम तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ रहे लड़ाकू विमानों, हेलिकॉप्टरों, परिवहन विमानों और ड्रोन को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। सैनिक इन्हें सैन्य अड्डों, तेल और गैस प्रतिष्ठानों, बिजली संयंत्रों, रडार स्थलों तथा दूसरे संवेदनशील ठिकानों के आसपास छिपाकर तैनात कर सकते हैं।

इनकी सबसे बड़ी ताकत गतिशीलता है। मिसाइल दागने के बाद टीम तुरंत अपनी जगह बदल सकती है। इसके कारण दुश्मन के विमानों के लिए लॉन्च स्थान का पता लगाना और जवाबी हमला करना कठिन हो जाता है। हालांकि ये बड़े क्षेत्र को कवर करने वाले लंबी दूरी के एयर डिफेंस नेटवर्क का विकल्प नहीं हैं। इनका काम मुख्य रूप से निचली ऊंचाई पर अंतिम सुरक्षा परत तैयार करना होता है।

QW-12 और FN-16 की भूमिका

रिपोर्ट में जिन QW-12 और FN-16 प्रणालियों का नाम लिया गया है, वे चीन में विकसित कंधे से दागी जाने वाली इंफ्रारेड-गाइडेड सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें हैं। इनका सीकर लक्ष्य के इंजन या दूसरे गर्म हिस्सों से निकलने वाली इंफ्रारेड ऊर्जा का पीछा करता है। इसलिए इन्हें आम तौर पर कम ऊंचाई वाले विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है।

इन प्रणालियों के आने से ईरान अपने बड़े सैन्य ठिकानों के आसपास बिखरी हुई सुरक्षा टीमें बना सकता है। इससे हमलावर विमानों और ड्रोन के लिए कम ऊंचाई पर उड़ना अधिक जोखिमपूर्ण हो सकता है। ईरान इन्हें परमाणु प्रतिष्ठानों, मिसाइल बेस, रडार केंद्रों, ऊर्जा ढांचे और सैन्य कमांड सुविधाओं के आसपास तैनात कर सकता है।

फिर भी इनकी सीमाएं हैं। MANPADS की मारक दूरी और ऊंचाई बड़े एयर डिफेंस सिस्टम की तुलना में कम होती है। बहुत ऊंचाई पर उड़ रहे बमवर्षक विमानों, लंबी दूरी से छोड़े गए क्रूज मिसाइलों या स्टील्थ विमानों के खिलाफ केवल इन प्रणालियों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसलिए इनका वास्तविक उपयोग ईरान की मौजूदा लंबी और मध्यम दूरी की रक्षा प्रणालियों के साथ एक अतिरिक्त निचली परत बनाने में होगा।

 

स्थिर ठिकानों के बजाय बिखरी हुई सुरक्षा पर जोर

हालिया युद्ध से ईरान के लिए सबसे बड़ा सैन्य सबक यह रहा कि स्थायी एयर डिफेंस बैटरियां हमले की शुरुआत में ही निशाना बन सकती हैं। बड़े रडार और लॉन्चर की स्थिति उपग्रहों, ड्रोन तथा इलेक्ट्रॉनिक खुफिया साधनों से पता लगाई जा सकती है। इसके विपरीत, सैकड़ों MANPADS को अलग-अलग स्थानों पर तैनात करना, छिपाना और लगातार उनकी स्थिति बदलना अपेक्षाकृत आसान है।

यदि ईरान को 300 से 400 प्रणालियां मिलती हैं तो वह इन्हें एक ही जगह लगाने के बजाय कई सैन्य और औद्योगिक ठिकानों के आसपास फैला सकता है। इससे इजराइली या अमेरिकी विमानों को अभियान की योजना बनाते समय कम ऊंचाई वाले खतरे को भी गंभीरता से लेना पड़ेगा। इसका अर्थ यह नहीं होगा कि ईरान का पूरा हवाई क्षेत्र सुरक्षित हो जाएगा, लेकिन हमले की लागत, जोखिम और संचालन की जटिलता बढ़ सकती है।

 

घरेलू हथियारों के साथ विदेशी आपूर्ति पर भरोसा

ईरान लंबे समय से प्रतिबंधों के बीच घरेलू मिसाइल, ड्रोन और एयर डिफेंस प्रणालियां विकसित करता रहा है। उसकी प्रमुख प्रणालियों में Bavar-373 जैसे लंबी दूरी के सिस्टम शामिल हैं। इसके बावजूद युद्ध में हुए नुकसान ने दिखाया कि घरेलू उत्पादन अकेले पर्याप्त गति से रक्षा नेटवर्क की भरपाई नहीं कर सकता।

इसी कारण तेहरान स्थानीय हथियार निर्माण के साथ विदेशी आपूर्तिकर्ताओं की तलाश भी कर रहा है। Reuters ने इससे पहले रिपोर्ट किया था कि ईरान चीन से सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल खरीदने के एक अलग समझौते के करीब पहुंच गया था, हालांकि यह स्पष्ट नहीं हुआ कि वह सौदा पूरा हुआ या नहीं। उस समय भी चीन ने कहा था कि उसे ऐसी बातचीत की जानकारी नहीं है।

MANPADS सौदे की रिपोर्ट इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत ईरान जमीन, समुद्र और हवा – तीनों क्षेत्रों में अपनी सैन्य क्षमता फिर से तैयार करना चाहता है। हालांकि चीन के आधिकारिक इनकार के कारण इस कथित रक्षा सहयोग की वास्तविक सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।

 

युद्धविराम के बावजूद हमले दोबारा शुरू होने का खतरा

अमेरिका ने सप्ताहांत में अपनी बमबारी अस्थायी रूप से रोक दी थी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि बातचीत से पांच महीने पुराने संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकला तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। संघर्ष तकनीकी रूप से अप्रैल से युद्धविराम की स्थिति में बताया जा रहा था, लेकिन जमीन पर हमले और जवाबी कार्रवाइयां पूरी तरह बंद नहीं हुईं।

तेहरान के लिए इसका अर्थ है कि एयर डिफेंस नेटवर्क को फिर से खड़ा करने के लिए उसके पास सीमित समय है। इसी वजह से ऐसी प्रणालियों को प्राथमिकता दी जा रही है जिन्हें तेजी से हासिल, वितरित और तैनात किया जा सके। यदि सौदा वास्तविक है और पहली खेप कुछ सप्ताह में पहुंचती है तो ईरान इसे संभावित नए अमेरिकी या इजराइली हमलों से पहले अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने की कोशिश के रूप में इस्तेमाल करेगा।

 

अमेरिकी और इजराइली विमानों के लिए बढ़ सकता है निचली ऊंचाई का खतरा

QW-12 और FN-16 जैसी MANPADS प्रणालियां लंबी दूरी पर उड़ रहे लड़ाकू विमानों को रोकने के लिए नहीं बनाई गई हैं। इनका मुख्य उद्देश्य कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन को निशाना बनाना है। इसलिए इनकी तैनाती से ईरान अपने पूरे हवाई क्षेत्र को सुरक्षित नहीं कर पाएगा, लेकिन सैन्य अड्डों, मिसाइल प्रतिष्ठानों, परमाणु सुविधाओं और ऊर्जा ढांचे के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा जरूर खड़ी कर सकता है।

अमेरिका और इजराइल के लड़ाकू विमान आमतौर पर लंबी दूरी के सटीक हथियार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, स्टील्थ तकनीक और खुफिया निगरानी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में MANPADS उनके बड़े हवाई अभियानों को पूरी तरह रोकने की स्थिति में नहीं होंगे। इसके बावजूद कम ऊंचाई पर होने वाले हमलों, हेलिकॉप्टर अभियानों और ड्रोन संचालन में जोखिम बढ़ सकता है। हमलावर पक्ष को पहले से अधिक निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा और दूर से हथियार दागने वाली रणनीति अपनानी पड़ सकती है।

 

ईरान तैयार कर सकता है तीन स्तरों वाला एयर डिफेंस नेटवर्क

ईरान के पास पहले से घरेलू और विदेशी मूल की कई मध्यम तथा लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणालियां हैं। नई MANPADS मिलने पर वह अपनी सुरक्षा को तीन स्तरों में बांट सकता है। लंबी दूरी की प्रणालियां ऊंचाई पर मौजूद विमानों और बड़े लक्ष्यों से निपटेंगी, मध्यम दूरी की बैटरियां महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा करेंगी, जबकि QW-12 और FN-16 जैसे हथियार निचली ऊंचाई पर अंतिम रक्षा पंक्ति तैयार करेंगे।

इस तरह का नेटवर्क किसी एक मिसाइल प्रणाली पर निर्भर नहीं रहता। यदि बड़े रडार या स्थिर लॉन्चर नष्ट भी हो जाएं, तो छोटे दलों के पास मौजूद पोर्टेबल मिसाइलें सक्रिय रह सकती हैं। हालिया संघर्ष में स्थिर एयर डिफेंस प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों को देखते हुए यह बदलाव ईरान की सैन्य रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। Reuters के अनुसार, ईरान की कोशिश तेजी से तैनात होने वाली और आसानी से स्थान बदल सकने वाली रक्षा प्रणालियां हासिल करने की है।

 

ड्रोन हमलों के खिलाफ भी बढ़ सकती है क्षमता

ईरान के लिए चुनौती केवल लड़ाकू विमानों से नहीं है। आधुनिक युद्ध में छोटे निगरानी ड्रोन, आत्मघाती ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हथियारों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। MANPADS की कुछ प्रणालियां ऐसे ड्रोन को निशाना बना सकती हैं, बशर्ते उनका इंफ्रारेड सिग्नेचर मिसाइल के सीकर के लिए पर्याप्त हो।

फिर भी हर ड्रोन के खिलाफ महंगी मिसाइल दागना व्यावहारिक नहीं होगा। छोटे और सस्ते ड्रोन के सामने MANPADS का बड़े पैमाने पर प्रयोग आर्थिक रूप से बोझिल हो सकता है। इसलिए ईरान को इनके साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, विमानरोधी तोपों और छोटी दूरी की दूसरी मिसाइल प्रणालियों का भी उपयोग करना होगा।

 

पश्चिम एशिया में हथियारों की नई होड़ का खतरा

यदि चीन से ईरान को इस तरह की बड़ी सैन्य आपूर्ति की पुष्टि होती है तो क्षेत्र के दूसरे देश भी अपनी रक्षा तैयारियां बढ़ा सकते हैं। इजराइल अपनी हवाई कार्रवाई की रणनीति में बदलाव कर सकता है, जबकि खाड़ी के देश ईरान की नई क्षमता को देखते हुए अतिरिक्त रडार, ड्रोन-रोधी हथियार और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर जोर दे सकते हैं।

इसका परिणाम पश्चिम एशिया में हथियारों की नई होड़ के रूप में सामने आ सकता है। पहले से तनावपूर्ण क्षेत्र में अधिक मिसाइलों और रक्षा प्रणालियों की तैनाती से किसी गलत पहचान, दुर्घटना या सीमित हमले के बड़े संघर्ष में बदलने का खतरा भी बढ़ेगा।

 

चीन के सामने कूटनीति और रणनीतिक हितों का टकराव

चीन सार्वजनिक रूप से खुद को पश्चिम एशिया में शांति, बातचीत और मध्यस्थता का समर्थक बताता है। उसने पाकिस्तान सहित दूसरे देशों के शांति प्रयासों का समर्थन भी किया है। साथ ही चीन ईरान का बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसके तेल का प्रमुख खरीदार है। ऐसे में बीजिंग नहीं चाहेगा कि क्षेत्र का युद्ध लंबा खिंचे और तेल आपूर्ति मार्ग लगातार बाधित रहें।

दूसरी ओर, ईरान का कमजोर होना चीन के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के लिए भी अनुकूल नहीं होगा। अमेरिका की सैन्य मौजूदगी वाले क्षेत्र में ईरान चीन के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार है। यही कारण है कि कथित मिसाइल सौदे को केवल वाणिज्यिक लेनदेन नहीं, बल्कि चीन की व्यापक रणनीतिक गणना से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

हालांकि बीजिंग ने साफ कहा है कि रिपोर्ट निराधार है और चीन संघर्ष समाप्त कराने के लिए काम कर रहा है। इसलिए किसी आधिकारिक दस्तावेज, प्रत्यक्ष डिलीवरी या स्वतंत्र पुष्टि के बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि चीन की सरकार स्वयं इस सौदे में शामिल है।

 

अमेरिका की चेतावनी से बढ़ सकता है चीन पर दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चीन और रूस को ईरान को हथियार न बेचने की चेतावनी दे चुके हैं। यदि मिसाइल डिलीवरी की पुष्टि होती है तो वॉशिंगटन चीनी कंपनी, मध्यस्थ संस्था और परिवहन नेटवर्क पर प्रतिबंध लगा सकता है। इससे चीन-अमेरिका व्यापार और कूटनीतिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

अमेरिका कथित हांगकांग कंपनी Zhongqing Baoshang International Investment की भूमिका की जांच भी कर सकता है। यदि यह साबित होता है कि कंपनी ने प्रतिबंधित सैन्य सामान की खरीद या भुगतान में मदद की, तो उसके बैंकिंग लेनदेन, संपत्तियों और कारोबारी साझेदारों पर कार्रवाई संभव है। फिलहाल कंपनी ने Reuters के सवालों का सार्वजनिक जवाब नहीं दिया है।

 

पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक मुश्किल

रिपोर्ट में पाकिस्तान को संभावित ट्रांजिट मार्ग बताए जाने से इस्लामाबाद के सामने भी संवेदनशील स्थिति बन गई है। पाकिस्तान के चीन से करीबी रक्षा संबंध हैं, लेकिन वह अमेरिका, खाड़ी देशों और ईरान के साथ भी संतुलन बनाए रखना चाहता है। ईरान के लिए सैन्य सामान के ट्रांजिट की पुष्टि होने पर उसे अमेरिका और क्षेत्रीय साझेदारों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

इसी कारण पाकिस्तान ने आरोपों को सख्ती से खारिज करते हुए इन्हें मनगढ़ंत और झूठा बताया है। पाकिस्तान की ओर से यह भी कहा गया कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध है।

पाकिस्तान इस समय अमेरिका-ईरान वार्ता दोबारा शुरू कराने के प्रयासों में भी भूमिका निभा रहा है। ऐसे में हथियारों की आपूर्ति का रास्ता उपलब्ध कराने का आरोप उसकी मध्यस्थ की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। Reuters ने हाल में बताया था कि चीन की पहल पर पाकिस्तान और ईरान अमेरिकी पक्ष के साथ नई बातचीत का रास्ता तलाश रहे हैं।

 

ईरान और चीन के रक्षा संबंधों में बड़े बदलाव के संकेत

चीन और ईरान के बीच आर्थिक और ऊर्जा संबंध लंबे समय से मजबूत हैं, लेकिन बीजिंग ने अब तक ईरान को सीधे बड़े पैमाने पर हथियार देने के मामले में सावधानी बरती है। कथित MANPADS सौदे की पुष्टि होती है तो यह संकेत होगा कि दोनों देशों का संबंध व्यापार और ऊर्जा से आगे बढ़कर अधिक सक्रिय सैन्य सहयोग की दिशा में जा रहा है।

Reuters इससे पहले यह भी रिपोर्ट कर चुका है कि ईरान चीन से CM-302 सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों की खरीद के एक अलग समझौते के करीब था। यह स्पष्ट नहीं है कि वह सौदा अंतिम रूप तक पहुंचा या नहीं। यदि दोनों प्रकार के समझौते आगे बढ़ते हैं तो ईरान एक ओर अपनी वायु रक्षा मजबूत करेगा और दूसरी ओर समुद्र में अमेरिकी तथा सहयोगी देशों के जहाजों के लिए खतरा बढ़ा सकता है।

सौदा महत्वपूर्ण, लेकिन निर्णायक नहीं

कई सौ MANPADS मिलने से ईरान की कम दूरी की वायु रक्षा निश्चित रूप से मजबूत हो सकती है, लेकिन इससे अमेरिका और इजराइल की हवाई बढ़त पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। आधुनिक सैन्य अभियान केवल विमानों पर निर्भर नहीं होते। इनमें लंबी दूरी की मिसाइलें, स्टील्थ विमान, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर हमले, उपग्रह निगरानी और ड्रोन शामिल रहते हैं।

ईरान की वास्तविक सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह नई मिसाइलों को अपने रडार, कमांड सिस्टम और दूसरी एयर डिफेंस बैटरियों के साथ कितनी प्रभावी तरीके से जोड़ पाता है। प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और सुरक्षित संचार व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी जितनी मिसाइलों की संख्या।

 

रिपोर्ट की पुष्टि अभी सबसे बड़ा सवाल

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सौदे की जानकारी तीन अज्ञात सूत्रों के हवाले से सामने आई है। चीन ने रिपोर्ट को खारिज किया है, पाकिस्तान ने ट्रांजिट भूमिका से इनकार किया है और ईरान ने तत्काल कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी। इसलिए फिलहाल इसे आधिकारिक रूप से प्रमाणित हथियार डिलीवरी नहीं, बल्कि मजबूत सूत्रों पर आधारित एक रिपोर्ट के रूप में देखा जाना चाहिए।

आने वाले सप्ताह में वास्तविक स्थिति तब अधिक स्पष्ट होगी, जब किसी खेप की आवाजाही, आयात दस्तावेज, उपग्रह तस्वीर, ईरानी सैन्य प्रदर्शन या अमेरिकी प्रतिबंध जैसी स्वतंत्र पुष्टि सामने आएगी। तब तक यह सौदा चीन, ईरान और पाकिस्तान तीनों के आधिकारिक इनकार के बीच विवादित बना रहेगा।

 

FAQs

1. चीन और ईरान के बीच एयर डिफेंस समझौता क्या है?

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने चीन में बने 300 से 400 पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने के लिए करीब 6 से 7 करोड़ डॉलर का समझौता किया है। यह कथित सौदा हांगकांग की एक मध्यस्थ कंपनी के जरिए किया गया है। चीन ने इस रिपोर्ट को निराधार बताया है।

 

2. रिपोर्ट के अनुसार चीन ईरान को कौन-सी मिसाइल प्रणाली देगा?

रिपोर्ट में QW-12 और FN-16 MANPADS का नाम लिया गया है। ये कंधे से दागी जाने वाली इंफ्रारेड-गाइडेड सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियां हैं, जिनका उपयोग कम ऊंचाई वाले विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन के खिलाफ किया जा सकता है।

 

3. इस समझौते का पश्चिम एशिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

सौदे की पुष्टि होने पर ईरान की कम दूरी की वायु रक्षा मजबूत होगी और अमेरिकी तथा इजराइली हवाई अभियानों का जोखिम बढ़ सकता है। इससे क्षेत्र में नए हथियारों की खरीद, अतिरिक्त सैन्य तैनाती और चीन-अमेरिका तनाव बढ़ने की आशंका भी रहेगी।

 

4. क्या चीन ने इस रिपोर्ट की पुष्टि की है?

नहीं। चीन के विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह निराधार बताया है और कहा है कि बीजिंग शांति को बढ़ावा देने तथा संघर्ष समाप्त कराने के लिए काम कर रहा है। पाकिस्तान ने भी हथियारों की ढुलाई में किसी भूमिका से इनकार किया है।

 

5. ईरान को एयर डिफेंस सिस्टम की आवश्यकता क्यों है?

अमेरिका और इजराइल के साथ संघर्ष में ईरान के कई सैन्य, मिसाइल, ड्रोन और वायु रक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। स्थिर एयर डिफेंस बैटरियों की कमजोरी सामने आने के बाद ईरान ऐसी मोबाइल प्रणालियां चाहता है जिन्हें छोटे दल संचालित कर सकें और हमले से बचाने के लिए लगातार स्थान बदला जा सके।