Trump Global Tariffs : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की नई टैरिफ नीति एक बार फिर कानूनी विवादों में घिर गई है। इस बार मामला केवल दूसरे देशों से व्यापार का नहीं है, बल्कि अमेरिका के भीतर ही 25 राज्यों ने उनकी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन राज्यों ने US Court of International Trade में मुकदमा दायर कर ट्रंप प्रशासन के Section 301 Tariffs को अवैध घोषित करने की मांग की है।
यह विवाद भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका ने 60 देशों पर लगाए गए नए टैरिफ में भारत को भी शामिल किया है। फिलहाल भारतीय उत्पादों पर 10% टैरिफ लागू है, जबकि एक अन्य अमेरिकी जांच पूरी होने के बाद अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की संभावना भी बनी हुई है।
यह मामला केवल आयात शुल्क का नहीं, बल्कि अमेरिका के संविधान, राष्ट्रपति की शक्तियों, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से भी जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा मामला, जिसने अमेरिका में कानूनी लड़ाई शुरू करा दी
जुलाई 2026 में ट्रंप प्रशासन ने Section 301 of the Trade Act, 1974 के तहत 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर नए आयात शुल्क लागू करने की घोषणा की थी।
सरकार का दावा था कि कई देशों ने Forced Labour (जबरन श्रम) से बने उत्पादों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी आधार पर अमेरिका ने 10% से 12.5% तक के नए टैरिफ लागू कर दिए।
ये टैरिफ उस 10% वैश्विक शुल्क की जगह लाए गए, जिसकी अवधि 24 जुलाई 2026 को समाप्त हो गई थी।
हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इसे मानवाधिकार और जबरन श्रम के खिलाफ कार्रवाई बताया, लेकिन कई अमेरिकी राज्यों ने इसे कानून का गलत इस्तेमाल करार दिया।
25 अमेरिकी राज्यों ने अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाया
अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने सोमवार को US Court of International Trade में ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया।
इन राज्यों का कहना है कि राष्ट्रपति फिर से वही व्यापक आयात शुल्क लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें अमेरिकी अदालतें पहले ही अवैध ठहरा चुकी हैं।
मुकदमे में शामिल प्रमुख राज्यों में न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, ओरेगन समेत कई राज्य शामिल हैं।
इन राज्यों का तर्क है कि नए टैरिफ लागू होने से अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों की लागत बढ़ेगी, जिससे महंगाई और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने ट्रंप पर क्या आरोप लगाए
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स (Letitia James) ने कहा कि ट्रंप प्रशासन सुप्रीम कोर्ट में हारने के बावजूद फिर से उसी तरह का टैक्स लोगों पर थोपने की कोशिश कर रहा है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने तरीके से व्यापक टैरिफ लगाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
उनके मुताबिक टैरिफ वास्तव में आयात कर (Import Tax) हैं और इनका बोझ अंततः अमेरिकी नागरिकों और उद्योगों पर ही पड़ता है।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोन्टा (Rob Bonta) ने भी कहा कि अमेरिकी परिवारों को राष्ट्रपति की असफल आर्थिक नीतियों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।
भारत पर अभी कितना टैरिफ लागू है
भारत इस समय उन 17 देशों में शामिल है जिन पर अमेरिका ने 10% टैरिफ लगाया है। शुरुआत में अमेरिका भारत पर 12.5% शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10% कर दिया गया।
रिपोर्टों के अनुसार भारत ने 14 जून 2026 को अपनी Foreign Trade Policy में संशोधन करते हुए जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर रोक लगाने का फैसला किया था। इसके बाद भारत को अपेक्षाकृत कम टैरिफ दर मिली।
हालांकि भारत पर लागू 10% शुल्क अंतिम नहीं माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका की एक अलग जांच अभी जारी है, जिसके आधार पर आगे अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
Section 301 आखिर है क्या, जिसके सहारे ट्रंप टैरिफ लगा रहे हैं
Section 301 of the Trade Act, 1974 अमेरिका का एक व्यापार कानून है। इस कानून के तहत अमेरिकी सरकार उन देशों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है जो अमेरिका के साथ अनुचित व्यापारिक व्यवहार (Unfair Trade Practices) करते हैं।
आमतौर पर इस प्रावधान का इस्तेमाल किसी एक देश या किसी विशेष उद्योग के खिलाफ किया जाता रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इसी कानून के तहत चीन पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे। उस समय अदालतों ने इन्हें वैध माना था क्योंकि कार्रवाई एक विशेष देश और उसके व्यापारिक व्यवहार तक सीमित थी।
लेकिन इस बार मामला अलग है क्योंकि Section 301 का इस्तेमाल एक साथ 60 देशों पर व्यापक आयात शुल्क लगाने के लिए किया गया है।

अमेरिकी राज्यों का सबसे बड़ा कानूनी तर्क क्या है
मुकदमे में कहा गया है कि Section 301 का उद्देश्य किसी विशेष व्यापारिक विवाद का समाधान करना है, न कि दुनिया के दर्जनों देशों पर एक साथ व्यापक टैरिफ लगाना।
राज्यों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन Forced Labour का मुद्दा केवल बहाना बना रहा है, जबकि असली उद्देश्य उन्हीं व्यापक टैरिफ को दोबारा लागू करना है जिन्हें अमेरिकी अदालतें पहले खारिज कर चुकी हैं।
ओरेगन के अटॉर्नी जनरल डैन रेफील्ड (Dan Rayfield) ने कहा कि ट्रंप लगातार अदालतों में हारने के बावजूद नए कानूनी रास्ते तलाशकर वही नीति लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।
टैरिफ को लेकर अदालत में और क्या दलीलें दी गईं
25 राज्यों द्वारा दायर मुकदमे में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने Section 301 के तहत टैरिफ लगाने की पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। राज्यों का आरोप है कि सरकार यह साबित ही नहीं कर सकी कि लगाए गए टैरिफ का Forced Labour (जबरन श्रम) से सीधा संबंध है।
याचिका में कहा गया है कि प्रशासन ने दर्जनों देशों पर शुल्क लगाने के लिए केवल तीन ऐसे उत्पादों का हवाला दिया, जिनके बारे में दावा किया गया कि वे जबरन श्रम से जुड़े हो सकते हैं। राज्यों का कहना है कि इतनी सीमित जानकारी के आधार पर 60 देशों पर व्यापक टैरिफ लगाना उचित नहीं माना जा सकता।
मुकदमे में यह भी कहा गया कि टैरिफ व्यवस्था में कई Product-Specific Exemptions (उत्पाद आधारित छूट) दी गई हैं। इससे खुद सरकार का तर्क कमजोर पड़ जाता है, क्योंकि यदि उद्देश्य वास्तव में Forced Labour रोकना होता, तो इतने बड़े पैमाने पर छूट नहीं दी जाती।
USTR पर भी उठे सवाल
याचिका में Office of the United States Trade Representative (USTR) की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।
राज्यों का आरोप है कि USTR ने प्रभावित देशों की ओर से दिए गए जवाब, उद्योग संगठनों की राय और सार्वजनिक टिप्पणियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। मुकदमे के अनुसार अधिकांश प्रतिक्रियाओं में यह कहा गया था कि नए टैरिफ Forced Labour की समस्या का समाधान नहीं करेंगे, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन और व्यापार को और अधिक प्रभावित करेंगे।
ट्रंप की नई कानूनी रणनीति क्या है
यह मामला केवल टैरिफ का नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन की नई कानूनी रणनीति का भी है। दरअसल, इसी वर्ष अमेरिकी Supreme Court ने फैसला दिया था कि International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति पूरी दुनिया पर व्यापक आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं रखते। इस फैसले के बाद ट्रंप की एक बड़ी टैरिफ नीति कानूनी रूप से कमजोर पड़ गई।
इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने Section 122 of the Trade Act, 1974 के तहत अस्थायी वैश्विक टैरिफ लागू किए थे, लेकिन बाद में US Court of International Trade ने उन पर भी सवाल उठाए। हालांकि अंतिम फैसला आने तक वे अस्थायी रूप से लागू रहे।
इन कानूनी चुनौतियों के बाद ट्रंप प्रशासन ने अब Section 301 का सहारा लिया है, जिसे पहले चीन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा चुका है। लेकिन इस बार इसका दायरा कई गुना बड़ा है, इसलिए यह फिर अदालत की जांच के दायरे में आ गया है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है
भारत फिलहाल 10% अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहा है। अमेरिका ने भारत पर प्रस्तावित 12.5% शुल्क घटाकर 10% इसलिए किया क्योंकि भारत ने जून 2026 में अपनी Foreign Trade Policy में संशोधन कर Forced Labour से बने उत्पादों के आयात पर रोक लगाने का फैसला किया था।
फिर भी भारत पूरी तरह राहत की स्थिति में नहीं है। अमेरिका की एक अन्य जांच अभी जारी है और उसके परिणाम के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
यदि अदालत ट्रंप प्रशासन के खिलाफ फैसला देती है, तो भारत समेत कई देशों को राहत मिल सकती है। वहीं यदि प्रशासन मुकदमा जीत जाता है, तो भारत के निर्यातकों को आगे भी अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय निर्यात पर कितना असर पड़ सकता है
भारत अमेरिका का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। इंजीनियरिंग सामान, रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, ऑटो कंपोनेंट्स और कई मैन्युफैक्चरिंग उत्पाद बड़ी मात्रा में अमेरिकी बाजार में निर्यात किए जाते हैं।
10% अतिरिक्त टैरिफ लागू रहने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अपेक्षाकृत महंगे हो सकते हैं। इससे कुछ क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि कई आवश्यक उत्पादों को अमेरिकी प्रशासन ने फिलहाल छूट दी है। इनमें कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, उर्वरक तथा US-Mexico-Canada Agreement (USMCA) के तहत आने वाले कुछ उत्पाद शामिल हैं।

वैश्विक व्यापार पर क्या असर पड़ सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका लगातार व्यापक टैरिफ लागू करता है, तो वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और बढ़ सकती है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन बदलनी पड़ सकती है। कई देशों के निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है और वैश्विक व्यापार युद्ध (Trade War) जैसी स्थिति फिर पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर यदि अदालत इन टैरिफ को अवैध ठहराती है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति की व्यापारिक शक्तियों की सीमाएं तय करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला साबित हो सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा विवाद
यह मामला केवल ट्रंप प्रशासन और 25 अमेरिकी राज्यों के बीच कानूनी लड़ाई नहीं है। इसका असर दुनिया की व्यापार व्यवस्था, अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था और भारत जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भी पड़ सकता है।
एक तरफ ट्रंप प्रशासन का दावा है कि वह Forced Labour के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ राज्यों का आरोप है कि यह केवल पुराने व्यापक टैरिफ दोबारा लागू करने का तरीका है।
अब सभी की नजर US Court of International Trade के फैसले पर रहेगी। अदालत का निर्णय यह तय करेगा कि राष्ट्रपति व्यापार नीति के नाम पर कितनी दूर तक जाकर आयात शुल्क लगा सकते हैं और भारत समेत अन्य देशों के साथ अमेरिकी व्यापार संबंध आगे किस दिशा में बढ़ेंगे।
निष्कर्ष
Trump Global Tariffs को लेकर शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा तय कर सकती है। भारत पर फिलहाल 10% टैरिफ लागू है, लेकिन आगे की अमेरिकी जांच और अदालत के फैसले दोनों महत्वपूर्ण होंगे। यदि अदालत राज्यों के पक्ष में फैसला देती है तो कई देशों को राहत मिल सकती है, जबकि ट्रंप प्रशासन के पक्ष में निर्णय आने पर वैश्विक व्यापार तनाव और बढ़ने की संभावना रहेगी। फिलहाल यह मामला अमेरिका की अदालत में है, लेकिन इसके प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकते हैं।
FAQs
1. ट्रंप के नए टैरिफ फैसले पर 25 अमेरिकी राज्यों ने मुकदमा क्यों दायर किया?
राज्यों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने Section 301 का गलत इस्तेमाल करते हुए 60 देशों पर व्यापक टैरिफ लगाए हैं और इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का सही पालन नहीं किया गया।
2. यह टैरिफ किन देशों पर लागू हुआ है?
अमेरिका ने 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर नए टैरिफ लगाए हैं, जिनमें भारत, यूरोपीय संघ सहित कई अन्य देश शामिल हैं।
3. भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?
फिलहाल भारत पर 10% टैरिफ लागू है। इससे कुछ भारतीय निर्यात महंगे हो सकते हैं और अमेरिका में उनकी प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
4. क्या भारतीय निर्यात पूरी तरह प्रभावित होंगे?
नहीं। कई उत्पादों को फिलहाल छूट मिली हुई है, लेकिन जिन वस्तुओं पर टैरिफ लागू है, उनके निर्यातकों को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है।
5. अमेरिकी राज्यों की मुख्य आपत्ति क्या है?
उनका कहना है कि राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर मनमाने ढंग से व्यापक टैरिफ लगाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है और प्रशासन Forced Labour को केवल बहाना बना रहा है।
6. वैश्विक व्यापार पर इसका क्या असर होगा?
यदि टैरिफ लागू रहते हैं तो वैश्विक व्यापार लागत बढ़ सकती है, सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और व्यापारिक तनाव बढ़ने की आशंका है। वहीं अदालत का फैसला भविष्य की अमेरिकी व्यापार नीति पर भी असर डालेगा।

