Anti-Cruelty Law: क्या अब Live-in में रहने वाली महिलाओं को भी मिलेगा शादीशुदा महिलाओं जैसा कानूनी संरक्षण? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Anti-Cruelty Law

Anti-Cruelty Law को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो Live-in Relationship Law और महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि यदि कोई लिव-इन रिलेशनशिप विवाह की प्रकृति (in the nature of marriage) का है, तो ऐसी महिला को भी क्रूरता और उत्पीड़न से सुरक्षा मिलेगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शादीशुदा महिलाओं तक ही सुरक्षा सीमित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन होगा।

Anti-Cruelty Law पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि Anti-Cruelty Law के तहत मिलने वाला संरक्षण उन महिलाओं को भी मिलेगा जो ऐसे लिव-इन रिश्ते में हैं, जिसकी प्रकृति विवाह जैसी हो और जहां शादी का स्पष्ट इरादा साबित हो। अदालत ने माना कि घरेलू हिंसा या मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना केवल शादी के बाद ही नहीं, बल्कि विवाह जैसे रिश्तों में भी हो सकती है।

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Image: NDTV

Anti-Cruelty Law के दायरे में अब कौन आएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं को पति या ससुराल पक्ष द्वारा की जाने वाली क्रूरता और उत्पीड़न से सुरक्षा देना है।

अदालत के अनुसार अब यह सुरक्षा उन महिलाओं को भी मिलेगी

  • जो विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिलेशनशिप में हों। 
  • जहां दोनों पक्षों के बीच शादी करने का स्पष्ट इरादा साबित हो। 
  • जहां महिला को मानसिक, शारीरिक या अन्य प्रकार की प्रताड़ना का सामना करना पड़ा हो। 

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला हर प्रकार के लिव-इन रिलेशनशिप पर स्वतः लागू नहीं होगा।

Live-in Relationship Law को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि यदि शादीशुदा महिला को कानूनी सुरक्षा मिले लेकिन विवाह जैसे रिश्ते में रहने वाली महिला को वही सुरक्षा न मिले, तो यह अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

कोर्ट ने कहा कि:

  • घरेलू हिंसा और उत्पीड़न केवल कानूनी विवाह तक सीमित नहीं है। 
  • यदि रिश्ता विवाह जैसा है, तो महिला के अधिकारों की भी समान सुरक्षा होनी चाहिए। 
  • कानून का उद्देश्य महिलाओं को हिंसा और क्रूरता से बचाना है, न कि केवल विवाह की औपचारिकता को महत्व देना। 

 

क्या यह फैसला सभी लिव-इन रिश्तों पर लागू होगा?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल उन मामलों पर लागू होगा जहां

  • रिश्ता In the Nature of Marriage हो। 
  • दोनों के बीच स्थायी संबंध और साथ रहने के पर्याप्त प्रमाण हों। 
  • शादी करने का इरादा या प्रतिबद्धता साबित हो सके। 

यदि रिश्ता केवल अस्थायी, आकस्मिक या बिना किसी वैवाहिक प्रकृति के है, तो यह फैसला स्वतः लागू नहीं होगा।

 

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आज भारत में बड़ी संख्या में लोग लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। इस फैसले से

  • महिलाओं को कानूनी सुरक्षा का दायरा बढ़ेगा। 
  • घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना के मामलों में राहत मिल सकेगी। 
  • कानून की व्याख्या सामाजिक बदलावों के अनुरूप होगी। 
  • महिलाओं के समान अधिकारों को संविधान के अनुरूप मजबूती मिलेगी। 

 

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी किस मामले में की?

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखते हुए की। मामले में एक व्यक्ति ने धारा 498A के तहत चल रही कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उसका तर्क था कि यह धारा लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होती। हालांकि हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी थी और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को सही ठहराया।

 

निष्कर्ष

Anti-Cruelty Law पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई Live-in Relationship Law के तहत विवाह जैसी प्रकृति का संबंध साबित होता है, तो ऐसी महिला को भी धारा 498A (और वर्तमान कानूनों के समकक्ष प्रावधानों) के तहत कानूनी संरक्षण मिल सकता है। यह फैसला महिलाओं की सुरक्षा और संविधान में समानता के सिद्धांत को और मजबूत करता है।

 

FAQs

Q1. सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर क्या फैसला सुनाया?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को भी Anti-Cruelty Law के तहत कानूनी संरक्षण मिल सकता है।

 

Q2. क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी क्रूरता विरोधी कानून का संरक्षण मिलेगा?

हाँ, लेकिन केवल उन मामलों में जहां रिश्ता विवाह जैसा हो और शादी का स्पष्ट इरादा साबित किया जा सके।

 

Q3. किन प्रकार के लिव-इन संबंध इस फैसले के दायरे में आएंगे?

वे संबंध जो स्थायी हों, विवाह जैसी प्रकृति के हों और जिनमें दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक प्रतिबद्धता के पर्याप्त प्रमाण हों।

 

Q4. क्या यह फैसला सभी लिव-इन रिश्तों पर लागू होगा?

नहीं। यह फैसला हर लिव-इन रिश्ते पर लागू नहीं होगा, बल्कि केवल उन संबंधों पर लागू होगा जो अदालत की कसौटी पर विवाह की प्रकृति वाले पाए जाएं।

 

Q5. धारा 498A (या संबंधित BNS प्रावधान) का उद्देश्य क्या है?

इसका उद्देश्य महिलाओं को पति या उसके परिवार द्वारा की जाने वाली शारीरिक, मानसिक या अन्य प्रकार की क्रूरता और उत्पीड़न से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है।

 

Q6. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला क्यों दिया?

अदालत ने माना कि विवाह जैसी प्रकृति वाले रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को संरक्षण से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा, क्योंकि उत्पीड़न केवल औपचारिक विवाह में ही नहीं बल्कि ऐसे रिश्तों में भी हो सकता है।