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चिदंबरम का बड़ा हमला: क्या 1991 से भी खराब हो गया भारत का Economic Regulations सिस्टम?

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मौजूदा आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत का Economic Regulations ढांचा 1991 से भी ज्यादा जटिल हो गया है। उन्होंने नियमन, जांच, नौकरशाही और घटती प्रतिस्पर्धा को आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती बताया।

चिदंबरम का बड़ा हमला: क्या 1991 से भी खराब हो गया भारत का Economic Regulations सिस्टम?

भारत की आर्थिक व्यवस्था को लेकर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मौजूदा नीतियों और नियम-कायदों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि देश का Economic Regulations ढांचा अब 1991 के दौर से भी ज्यादा जटिल और बाधक हो गया है। उनके मुताबिक, अर्थव्यवस्था नियमन, जांच, नौकरशाही की अड़चनों और घटती प्रतिस्पर्धा के ऐसे दबाव में है, जो आर्थिक विकास की राह में बड़ी चुनौती बन रहे हैं। चिदंबरम ने साथ ही मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर निवेश, विदेशी व्यापार समझौतों और चीन पर निर्भरता को लेकर भी अपनी चिंताएं सामने रखीं।

चिदंबरम ने Economic Regulations को लेकर क्या कहा?

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भारत की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि देश का Economic Regulations ढांचा अब ऐसे नियम-कायदों के जाल में फंस गया है, जो पुराने लाइसेंस राज जितने ही प्रभावशाली और बाधक साबित हो रहे हैं। उनके मुताबिक मौजूदा आर्थिक मॉडल में गहरे विश्लेषण और आर्थिक विशेषज्ञता की कमी दिखाई देती है। बिजनेस टुडे इंडिया@100 कार्यक्रम में बोलते हुए चिदंबरम ने कहा कि वर्तमान आर्थिक मॉडल नियमन, जांच और प्रवर्तन, क्रोनी कैपिटलिज्म तथा नौकरशाही की बाधाओं के एक घेरे में फंसा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक रूप से मजबूत शीर्ष नेतृत्व को भी बेहतर फैसलों के लिए एक मजबूत आर्थिक सोच और विशेषज्ञता की जरूरत होती है।

Economic Regulations पर चिदंबरम का 1991 से तुलना वाला तर्क

चिदंबरम ने मौजूदा नियम-कायदों की तुलना 1991 के दौर से करते हुए कहा कि आज कानूनों और नियमों का बोझ उस समय से भी ज्यादा गंभीर है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था भले ही पुराने लाइसेंस राज जैसी न हो, लेकिन इसका प्रभाव उतना ही formidable यानी बाधक हो सकता है। 1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। उस समय विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम हो गया था और देश को व्यापक आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा। इसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उदारीकरण और आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई।

चिदंबरम ने राव को राजनीतिक नेतृत्व और मनमोहन सिंह को आर्थिक सोच का मजबूत आधार बताते हुए कहा कि आज मनमोहन सिंह के समान आर्थिक विशेषज्ञता वाले व्यक्ति की तुलना करना मुश्किल है।

मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर नीति पर भी उठाए सवाल

भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिशों पर भी चिदंबरम ने सवाल उठाए। उन्होंने विशेष रूप से सेमीकंडक्टर क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि इन परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन का इस्तेमाल हो रहा है। उनका दावा था कि सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने वाली कंपनियों को 80-85 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या यह वास्तव में निजी निवेश है या इसमें सरकारी धन की बड़ी भूमिका है। चिदंबरम ने यह भी सवाल उठाया कि 1991 में मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए गए बड़े आर्थिक विजन जैसा व्यापक प्लान आज कहां है। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत होने का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे मौजूदा पहलों की बड़ी उपलब्धि के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

भारत के FTAs और चीन पर निर्भरता को लेकर चिंता

पूर्व वित्त मंत्री ने भारत के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTAs की पहुंच पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि भारत ने कुछ छोटे देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं, लेकिन अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और चीन जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापक समझौतों की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने माना कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करना मुश्किल है, खासकर वहां की अप्रत्याशित राजनीतिक परिस्थितियों के बीच। वहीं चीन की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता की कमी को भी उन्होंने एक चुनौती बताया। चिदंबरम ने भारत से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने की अपील की। उनके मुताबिक, भारत चीन से कच्चा माल, कैपिटल गुड्स और अन्य जरूरी सामान आयात करता है। जहां दुर्लभ खनिज जैसे संसाधन देश में उपलब्ध नहीं हैं, वहां भी आयात पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करने की कोशिश होनी चाहिए, जहां यह संभव है।

घटती प्रतिस्पर्धा और बढ़ते एकाधिकार पर चिंता

चिदंबरम ने भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के कमजोर होने पर भी चिंता जताई। उन्होंने टेलीकॉम, पेट्रोलियम, सीमेंट, स्टील, एयरपोर्ट और पोर्ट जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई सेक्टर अब मोनोपॉली या ओलिगोपॉली की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग यानी Competition Commission of India (CCI) की भूमिका पर भी सवाल उठाया। चिदंबरम ने कहा कि CCI प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रहा है और सवाल किया कि हाल के समय में उसने आखिर कौन-सा बड़ा विलय रोका है। उनके अनुसार, किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद जरूरी है। अगर कुछ बड़ी कंपनियों के हाथों में बाजार की शक्ति लगातार केंद्रित होती जाती है, तो इससे उपभोक्ताओं, छोटे कारोबारों और व्यापक आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।

भारत को किस तरह के आर्थिक सुधारों की जरूरत?

चिदंबरम की टिप्पणियों का व्यापक संदेश यह है कि भारत को केवल नई योजनाएं और सब्सिडी देने के बजाय आर्थिक नीति के बुनियादी ढांचे पर भी ध्यान देना चाहिए। नियमों को सरल बनाना, नौकरशाही की बाधाओं को कम करना, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। साथ ही, भारत को वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ अधिक व्यापक समझौतों पर काम करने की आवश्यकता होगी। हालांकि, ऐसे समझौतों में घरेलू उद्योग, रोजगार और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

पी. चिदंबरम की Economic Regulations पर टिप्पणी ने भारत की आर्थिक नीति को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को फिर सामने ला दिया है। उनका तर्क है कि नियमों और नौकरशाही का बढ़ता बोझ, कमजोर होती प्रतिस्पर्धा और सीमित घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता आर्थिक विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में भारत को विकास के साथ-साथ एक सरल, प्रतिस्पर्धी और विशेषज्ञता-आधारित आर्थिक ढांचे पर भी जोर देना होगा।

FAQ:

P Chidambaram ने India की Economic Regulations को 1991 से भी खराब क्यों बताया?

चिदंबरम के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में नियम-कायदे, जांच, प्रवर्तन और नौकरशाही की बाधाएं इतनी बढ़ गई हैं कि उनका प्रभाव पुराने लाइसेंस राज जैसा महसूस होता है।

Chidambaram ने Indian Economy को लेकर क्या चिंता जताई?

उन्होंने आर्थिक नीति में गहरे विश्लेषण और विशेषज्ञता की कमी, कमजोर होती प्रतिस्पर्धा, चीन पर आयात निर्भरता और मैन्युफैक्चरिंग की सीमित हिस्सेदारी पर चिंता जताई।

1991 में India के सामने कौन-सा Economic Crisis था?

1991 में भारत गंभीर भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था। इसके बाद देश में बड़े आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की शुरुआत हुई।

Manmohan Singh ने 1991 में Indian Economy को कैसे बदला था?

वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने 1991 में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, जिसमें लाइसेंस व्यवस्था में बदलाव, व्यापार उदारीकरण और अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने जैसे कदम शामिल थे।

क्या भारत को फिर बड़े Economic Reforms की जरूरत है?

यह एक नीतिगत बहस का विषय है। चिदंबरम के तर्क के अनुसार, भारत को नियमों को सरल बनाने, प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग मजबूत करने और आर्थिक नीति में विशेषज्ञता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

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