LeT Threat to Kashmiri Pandits: 1990 जैसा फिर वही डर, ‘नौकरी छोड़ो या मौत का सामना करो’, कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी- 7,000 लोगों पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ULC ने कश्मीर घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित पीएम पैकेज कर्मचारियों को फिर धमकी दी है। करीब 7,000 कर्मचारियों की निजी जानकारी ऑनलाइन लीक होने का दावा है। सुरक्षा को लेकर प्रशासन पर सवाल उठे हैं।
LeT Threat to Kashmiri Pandits: “1990 के दशक में भी उनका तरीका कुछ ऐसा ही था, बस तब इंटरनेट नहीं था। उनके पास टाइप की हुई सूचियां होती थीं, जिन्हें दीवारों पर चिपका दिया जाता था।”मुंबई में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित ने यह बात बताई। उनका परिवार श्रीनगर में रहता है। वह जम्मू-कश्मीर में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिली ताजा धमकियों को लेकर चिंता जता रहे थे।
लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC/ULF) की ओर से जारी ताजा धमकी भरे पत्रों के बाद घाटी में काम कर रहे करीब 7,000 कश्मीरी पंडित पीएम पैकेज कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। दावा है कि इन कर्मचारियों के निजी फोन नंबर, घर के पते और गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन नंबर ऑनलाइन लीक किए गए हैं।
आतंकियों की ओर से पिछले एक महीने से ज्यादा समय में कम से कम पांच ऐसी धमकियां दी जा चुकी हैं। ताजा धमकी में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों से नौकरी छोड़ने को कहा गया है और ऐसा नहीं करने पर जान से मारने की धमकी दी गई है।
इंडिया टुडे डिजिटल ने इस मामले को समझने के लिए कश्मीरी पंडित एसोसिएशन (KPA), ऑल इंडिया कश्मीरी समाज (AIKS) और मुंबई व दिल्ली में रहने वाले कई कश्मीरी पंडितों से बात की, जिनके परिवार अभी भी घाटी में हैं। KPA और AIKS के अधिकारियों ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। हालांकि, घाटी में परिवार रखने वाले समुदाय के कुछ लोगों ने कहा कि हाल के समय में ऐसी धमकियां बढ़ी हैं।
दिल्ली में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित वकील ने कहा कि उनका परिवार सरकारी कर्मचारी नहीं है, बल्कि कारोबार से जुड़ा है। इस बार धमकी सरकारी कर्मचारियों को दी गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर में कश्मीरी पंडित सुरक्षित हैं। उनके मुताबिक घाटी में ऐसी धमकियां काफी आम हैं।
निजी फोन नंबर और घर के पते ऑनलाइन लीक होने का दावा
7 सितंबर को समुदाय की आवाज के तौर पर सक्रिय सबा कौल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मामले को “बड़ा और गंभीर सुरक्षा संकट” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि ULC ने पीएम पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को सीधे धमकी दी है।कौल के मुताबिक कर्मचारियों के निजी फोन नंबर, घर के पते और वाहन रजिस्ट्रेशन की जानकारी ऑनलाइन लीक की गई है। साथ ही उन्हें नौकरी छोड़ने या गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई है।
उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से मामले की जांच करने और घाटी में काम कर रहे कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
एक दिन पहले पीएम पैकेज कर्मचारी और एक्टिविस्ट होने का दावा करने वाले राकेश हंडू ने भी इस मामले को उठाया था। उन्होंने 6 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और जम्मू-कश्मीर पुलिस की साइबर क्राइम विंग को शिकायत भेजकर FIR दर्ज करने की मांग की।
हंडू ने 5 सितंबर की ULC से जुड़ी बताई जा रही धमकी भरी चिट्ठी का हवाला दिया। उनके अनुसार इसमें गैर-स्थानीय कर्मचारियों को धमकी दी गई और कहा गया कि उन्हें महिला या पुरुष, उनकी स्थिति चाहे जो भी हो, निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने पत्र में लिखी उस धमकी का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि “बॉडी बैग उनके घर भेजे जाएंगे।”
पीएम पैकेज के तहत हजारों नौकरियां दी गई थीं
कश्मीरी प्रवासियों के लिए पीएम पैकेज रोजगार योजना की शुरुआत 2008 में हुई थी। उस समय केंद्र सरकार ने कश्मीरी प्रवासियों की वापसी और पुनर्वास के लिए एक पैकेज घोषित किया था, जिसमें केंद्र की आर्थिक मदद से जम्मू-कश्मीर सरकार में 3,000 नौकरियां देने की योजना थी।नवंबर 2015 में केंद्र ने प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत 3,000 और सरकारी नौकरियों को मंजूरी दी। इस तरह दोनों योजनाओं के तहत केंद्र द्वारा वित्त पोषित पदों की संख्या बढ़कर 6,000 हो गई।
हालांकि, आतंकियों की ताजा धमकी में करीब 7,000 कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने की बात सामने आई है।
करीब 6,000 कर्मचारी घाटी में कर रहे काम
श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि धमकी भरे पत्र पहले डार्क वेब पर जारी किए गए और बाद में उन्हें वॉट्सऐप और टेलीग्राम के जरिए फैलाया गया।राकेश हंडू के मुताबिक करीब 6,000 पीएम पैकेज कर्मचारी पिछले लगभग 15 वर्षों से कश्मीर घाटी में काम कर रहे हैं। इनमें से कई किराए के मकानों में रहते हैं।
उन्होंने दावा किया कि श्रीनगर के जेवान, अनंतनाग के मट्टन और वीरिनाग में कर्मचारियों के लिए 6,042 क्वार्टर बनाए गए हैं, लेकिन तीन साल में इनमें से केवल करीब 800 क्वार्टर ही कर्मचारियों को दिए गए।
हंडू ने ट्रांजिट कॉलोनियों और किराए के मकानों का तुरंत सुरक्षा ऑडिट कराने, धमकी की जानकारी कहां से लीक हुई इसकी जांच करने और कर्मचारियों की वापसी व पुनर्वास के अधिकार के साथ नौकरी और जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली नीति बनाने की मांग की।
एक महीने में पांचवीं धमकी से बढ़ी चिंता
कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों को पिछले एक महीने में कई बार धमकियां मिल चुकी हैं। 1 सितंबर को ULC ने एक महीने के भीतर पांचवीं धमकी भरी चिट्ठी जारी की थी।इस पत्र में दावा किया गया था कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा बैठक के बाद प्रशासन कश्मीरी प्रवासी पंडित कर्मचारियों को हल्के हथियार देने पर विचार कर रहा है।
7 सितंबर को हंडू ने कुलगाम के चोगाम रोड स्थित नोआ में अल्पसंख्यक पीएम पैकेज कर्मचारियों के लिए बनाए गए ट्रांजिट आवास की तस्वीरें भी साझा कीं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ आवास सुनसान और असुरक्षित जगहों पर हैं। वहां सड़क और ड्रेनेज की उचित व्यवस्था नहीं है, कुछ इमारतें अधूरी हैं और पर्याप्त सुरक्षा या बाउंड्री भी नहीं है।
उन्होंने सरकार की ओर से कश्मीर में सामान्य स्थिति होने के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस कर्मचारी को धमकी मिली हो, उसके लिए सामान्य स्थिति का मतलब सुरक्षित घर, सुरक्षित कॉलोनी और पूरा आवास होना है।
आतंकियों की धमकियों ने फिर खड़ा किया बड़ा सुरक्षा सवाल
यह विवाद 7 अगस्त की एक धमकी भरी चिट्ठी के बाद और गंभीर हुआ था। ULC ने दावा किया था कि उसके पास कश्मीरी पंडित अधिकारियों, उनके परिवारों, रहने की जगह और कार्यस्थलों की जानकारी है। संगठन ने यह भी धमकी दी थी कि अगर कर्मचारी जम्मू चले जाते हैं, तब भी उन्हें निशाना बनाया जा सकता है।इंडिया टुडे डिजिटल ने उस समय श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार के हवाले से पत्र को प्रामाणिक बताया था। इस तरह की धमकियों से कश्मीरी पंडित समुदाय में डर पैदा होता है, जिसमें जम्मू में रहने वाले लोग भी शामिल हैं।
अगस्त की धमकी में छह सरकारी कर्मचारियों के नाम लिए गए थे, हालांकि उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले पनुन कश्मीर ने इन कर्मचारियों और उनके परिवारों की तत्काल सुरक्षा जांच की मांग की थी। संगठन के संयोजक अग्निशेखर ने नाम और निजी संपर्क जानकारी के साथ धमकी जारी किए जाने को गंभीर चिंता का विषय बताया था।
धमकियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
इन धमकियों को लेकर जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने पिछले सप्ताह सवाल उठाया था कि कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को ही धमकियां क्यों मिल रही हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में काम कर रहे वरिष्ठ हिंदू अधिकारियों को ऐसी धमकियां क्यों नहीं मिल रही हैं।उन्होंने आरोप लगाया कि ये धमकियां उपराज्यपाल के नेतृत्व वाले प्रशासन की उस कथित साजिश का हिस्सा हो सकती हैं, जिसका मकसद डर पैदा करना और जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी करना है।
बीजेपी ने इस बयान को खारिज कर दिया। पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी प्रदीप भंडारी ने फारूक अब्दुल्ला पर आतंकियों के प्रति “सॉफ्ट सपोर्ट” दिखाने का आरोप लगाया और कहा कि उनके बयान कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को कम करके आंकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने पिता से अलग रुख अपनाया। अगस्त में पहली धमकी सामने आने के बाद उन्होंने कहा था कि अल्पसंख्यकों की लक्षित हत्याएं हुई हैं और नई धमकी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई और कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा की मांग की थी।
दूसरी चिट्ठी सामने आने के बाद भी उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि ये धमकियां आखिर कहां से आ रही हैं।
1990 के दशक के बाद वापसी की कोशिशों के सामने फिर चुनौती
कश्मीरी पंडितों का यह मुद्दा 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में घाटी में बढ़े सशस्त्र आतंकवाद से जुड़ा है। उस दौर में लक्षित हत्याओं, धमकियों और स्थानीय मस्जिदों से दी गई चेतावनियों के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। इनमें से कई जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में जाकर बस गए।बाद में सरकार ने उन्हें घाटी में वापस लाने और उनका पुनर्वास करने के लिए सरकारी नौकरियों समेत कई योजनाएं शुरू कीं। पीएम पैकेज भी इसी कोशिश का हिस्सा था।
लेकिन 2022 में चाडूरा के तहसील कार्यालय के अंदर राहुल भट की हत्या ने घाटी में काम करने के लिए लौटे कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी थी।
ताजा धमकियों ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास को केवल दी गई नौकरियों या बनाए गए मकानों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि घाटी में काम करने वाले कर्मचारी खुद को सुरक्षित महसूस करें और उन्हें सिर्फ उनकी पहचान के कारण निशाना न बनाया जाए।
FAQ:
LeT Threat to Kashmiri Pandits में क्या चेतावनी दी गई है?
लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े बताए जा रहे ULC ने कश्मीरी पंडित पीएम पैकेज कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने की धमकी दी है। पत्रों में कथित तौर पर नौकरी जारी रखने पर जान से मारने और उनके निजी विवरण सार्वजनिक करने की चेतावनी दी गई है।
7000 Kashmiri Pandits Threat मामले में कौन से कर्मचारी प्रभावित हैं?
मुख्य रूप से घाटी में पीएम पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारी निशाने पर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 7,000 लोगों को धमकी दी गई है, जबकि लगभग 6,000 पीएम पैकेज कर्मचारी करीब 15 वर्षों से घाटी में काम कर रहे हैं।
Kashmiri Pandit Employees को Quit Job or Face Death Threat क्यों मिला?
धमकी देने वाले संगठन ने इन कर्मचारियों को घाटी में काम करने के कारण निशाना बनाया है। पत्रों में आरोप लगाया गया कि वे प्रशासन के साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, इन धमकियों के पीछे संगठन की वास्तविक मंशा और सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
Kashmiri Pandit PM Package Employees की सुरक्षा को लेकर क्या चिंता है?
कर्मचारियों के नाम, पते और वाहन नंबर जैसी संवेदनशील जानकारी कथित तौर पर लीक होने से उनकी पहचान और लोकेशन सार्वजनिक होने का खतरा बढ़ गया है। कई कर्मचारी किराए के मकानों या ट्रांजिट कॉलोनियों में रहते हैं, जिनकी सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठे हैं।
Kashmir Security Threat के बीच सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
अगस्त में सामने आई धमकी के बाद अधिकारियों ने कश्मीरी पंडित और अन्य अल्पसंख्यक कर्मचारियों को कुछ समय तक कार्यालय नहीं जाने की मौखिक सलाह दी थी। कर्मचारियों ने सुरक्षा बढ़ाने, ट्रांजिट कॉलोनियों का सुरक्षा ऑडिट और धमकी की जांच की मांग की है।