Indian Railways Freight Lines 2026: 15,976 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट, प्राइवेट कंपनियां बनाएंगी 6 नई मालगाड़ी लाइनें, जानिए क्या है रेलवे का नया प्लान?
भारतीय रेलवे माल ढुलाई का नेटवर्क बढ़ाने के लिए एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है। वित्त मंत्रालय की पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (PPPAC) ने अगस्त में 6 नई फ्रेट रेल लाइनों को मंजूरी दी है।
Indian Railways Freight Lines 2026: भारतीय रेलवे माल ढुलाई का नेटवर्क बढ़ाने के लिए एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है। वित्त मंत्रालय की पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (PPPAC) ने अगस्त में 6 नई फ्रेट रेल लाइनों को मंजूरी दी है। इनकी कुल लंबाई करीब 647 किलोमीटर होगी और पहली बार रेलवे इन परियोजनाओं को हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) पर निजी कंपनियों के साथ मिलकर विकसित करेगा।
इन 6 परियोजनाओं की कुल बिड प्रोजेक्ट कॉस्ट ₹15,976 करोड़ है, जबकि पूरे कन्सेशन पीरियड में इनकी कुल कैपिटल कॉस्ट करीब ₹40,866 करोड़ रहने का अनुमान है। कन्सेशन पीरियड 17 से 19 साल का होगा। इन लाइनों पर मुख्य रूप से कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, कोक, रासायनिक खाद, सीमेंट और खाद्यान्न की ढुलाई की जाएगी।
फिलहाल इन परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास भेजा जाना है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद निजी कंपनियों से बोली मंगाई जाएगी। निर्माण अप्रैल 2028 से शुरू करने का प्रस्ताव है।
6 नई फ्रेट लाइनें ओडिशा, तेलंगाना और झारखंड में बनेंगी
छह में से चार परियोजनाएं ओडिशा में प्रस्तावित हैं। इनमें 49.58 किलोमीटर लंबा बलराम-पुटगड़िया-तेंतलोई इनर कॉरिडोर, 112.56 किलोमीटर का बुधपंक-तेंतलोई-लुबुरी आउटर कॉरिडोर, 101.26 किलोमीटर का जाजपुर-केओंझर रोड-अराडी-धामरा पोर्ट कॉरिडोर और 48.96 किलोमीटर की टिकिरी स्टेशन-वॉल्टेयर बॉक्साइट माइंस लाइन शामिल है।
बाकी दो परियोजनाएं तेलंगाना और झारखंड में हैं। तेलंगाना में 207.80 किलोमीटर लंबी मनुगुरु-रामागुंडम रेल लाइन और झारखंड में 126.52 किलोमीटर लंबी पाकुड़/नागरनाबी-गोड्डा रेल लाइन बनाई जाएगी।
इन सभी लाइनों की कुल लंबाई करीब 646.68 किलोमीटर बैठती है, जिसे रिपोर्टों में लगभग 647 किलोमीटर बताया गया है। इनका मुख्य उद्देश्य उन इलाकों को बेहतर रेल कनेक्टिविटी देना है जहां से बड़े पैमाने पर खनिज और दूसरे माल की ढुलाई होती है।
हाईवे की तरह अब रेलवे में भी चलेगा HAM मॉडल
इन परियोजनाओं की सबसे खास बात यह है कि रेलवे में पहली बार हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) का इस्तेमाल किया जाएगा। यह मॉडल हाईवे सेक्टर में पहले से इस्तेमाल होता रहा है। इसमें सरकार और निजी कंपनी मिलकर परियोजना की लागत और जिम्मेदारियां संभालते हैं।
रेलवे के प्रस्तावित मॉडल में निर्माण के दौरान बिड प्रोजेक्ट कॉस्ट का 40% हिस्सा रेलवे ग्रांट के रूप में देगा, जबकि बाकी 60% पैसा निजी कंपनी लगाएगी।
लाइन तैयार होने के बाद निजी कंपनी के लगाए गए पैसे को रेलवे एक साथ वापस नहीं करेगा। इसके बजाय तय अवधि में एन्युटी यानी किस्तों के रूप में भुगतान किया जाएगा। इस रकम पर ब्याज भी दिया जाएगा। इसके अलावा ट्रैक, स्टेशन और दूसरे संबंधित एसेट्स के रखरखाव के लिए रेलवे निजी कंपनी को नियमित भुगतान करेगा।
इस मॉडल में ट्रेन चलाने और माल ढुलाई से कमाई करने की जिम्मेदारी रेलवे की ही रहेगी।
प्राइवेट कंपनी पैसा लगाएगी, लेकिन मालगाड़ी रेलवे चलाएगा
इन परियोजनाओं में निजी कंपनी की भूमिका मुख्य रूप से रेल लाइन के निर्माण और उसके रखरखाव से जुड़ी होगी। रेलवे खुद ट्रेनों का संचालन करेगा और माल ढुलाई से मिलने वाला फ्रेट रेवेन्यू भी रेलवे के पास रहेगा।
यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निजी कंपनी को माल ढुलाई से होने वाली कमाई पर निर्भर नहीं रहना होगा। उसकी कमाई मुख्य रूप से अनुबंध के तहत मिलने वाली एन्युटी और रखरखाव भुगतान से होगी।
इसके साथ ट्रैफिक और टैरिफ रिस्क भी रेलवे खुद उठाएगा। यानी अगर किसी लाइन पर अनुमान के मुताबिक माल नहीं आता या रेलवे की कमाई उम्मीद से कम रहती है, तो निजी कंपनी को उस वजह से सीधे नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा।
यही व्यवस्था निजी निवेशकों के लिए इन परियोजनाओं को अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला बनाती है।
पहले DBFOT मॉडल था, फिर क्यों बदला गया?
इन छह परियोजनाओं को शुरुआत में डिजाइन, बिल्ड, फाइनेंस, ऑपरेट एंड ट्रांसफर (DBFOT) मॉडल के तहत आगे बढ़ाने की योजना थी। लेकिन बाजार से मिले फीडबैक के बाद रेलवे ने परियोजना का मॉडल बदलकर HAM करने का प्रस्ताव रखा।
DBFOT में निजी कंपनी पर परियोजना के निर्माण के साथ वित्तीय और संचालन संबंधी ज्यादा जिम्मेदारियां आती हैं। वहीं HAM में सरकार शुरुआती लागत का हिस्सा देती है और ट्रैफिक से जुड़े जोखिम को अपने पास रखती है।
रेलवे के लिए इसका मकसद साफ है - ऐसा ढांचा तैयार करना जिसमें निजी कंपनियां लंबे समय की पूंजी लगाने के लिए तैयार हों और रेलवे को नई रेल लाइन बनाने के लिए पूरी रकम अकेले न लगानी पड़े।
₹15,976 करोड़ की लागत, लेकिन पूरे प्रोजेक्ट पर खर्च ₹40,866 करोड़
छह परियोजनाओं की कुल बिड प्रोजेक्ट कॉस्ट ₹15,976 करोड़ है। लेकिन 17 से 19 साल के पूरे कन्सेशन पीरियड को शामिल करने पर कुल कैपिटल कॉस्ट करीब ₹40,866 करोड़ रहने का अनुमान है।
इस अंतर की वजह यह है कि लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट में सिर्फ शुरुआती निर्माण लागत ही नहीं होती। निजी कंपनी को उसके निवेश की वापसी, ब्याज और एसेट्स के रखरखाव से जुड़े भुगतान भी पूरे कन्सेशन पीरियड में किए जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर 207.80 किलोमीटर की मनुगुरु-रामागुंडम लाइन की कुल कैपिटल कॉस्ट करीब ₹9,986 करोड़ बताई गई है। वहीं 112.56 किलोमीटर की बुधपंक-तेंतलोई-लुबुरी आउटर कॉरिडोर की कुल कैपिटल कॉस्ट करीब ₹8,328 करोड़ और 101.26 किलोमीटर की जाजपुर-केओंझर रोड-अराडी-धामरा पोर्ट लाइन की करीब ₹7,581 करोड़ है।
कोयला और खनिजों की ढुलाई पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस
इन रेल लाइनों का बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से होकर गुजरेगा जहां कोयला और खनिजों का उत्पादन होता है। इसलिए इनका सबसे बड़ा फायदा फ्रेट ट्रांसपोर्ट को मिलने की उम्मीद है।
इन रास्तों पर कोयले के अलावा लौह अयस्क, बॉक्साइट, कोक, रासायनिक खाद, सीमेंट और खाद्यान्न जैसी वस्तुओं की ढुलाई की जाएगी। नई लाइनों से खदानों, औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी।
खासकर ओडिशा की परियोजनाएं खनिज और पोर्ट कनेक्टिविटी के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। वहीं तेलंगाना की मनुगुरु-रामागुंडम लाइन कोयला क्षेत्र से माल ढुलाई के लिए अहम होगी।
2027-28 में हो सकती है बोली, 2028 से निर्माण का लक्ष्य
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक इन परियोजनाओं की बिडिंग वित्त वर्ष 2027-28 में होने की संभावना है। लेकिन उससे पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की अंतिम मंजूरी जरूरी होगी। मंजूरी मिलने के बाद रेलवे की ओर से आरएफपी यानी औपचारिक टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
सभी छह परियोजनाओं पर निर्माण अप्रैल 2028 से शुरू करने का प्रस्ताव है।
इन छह परियोजनाओं के अलावा रेलवे के पास PPP मॉडल के तहत 49 अन्य प्रोजेक्ट भी पाइपलाइन में हैं। इनकी कुल अनुमानित लागत करीब ₹1.80 लाख करोड़ है।
भारतीय रेलवे में PPP मॉडल के जरिए अब तक 18 परियोजनाएं करीब ₹16,686 करोड़ की लागत से पूरी हो चुकी हैं। वहीं 7 परियोजनाएं करीब ₹16,362 करोड़ की लागत से निर्माणाधीन हैं। इनमें कोयला और पोर्ट कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट भी शामिल हैं।
रेलवे ने अपनी पार्टिसिपेटिव पॉलिसी में HAM के साथ डेवलपमेंट पार्टनर मॉडल (DPM) को भी शामिल किया है। इसका मकसद रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार में निजी क्षेत्र की लंबी अवधि की पूंजी को आकर्षित करना है।
रेलवे के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
भारतीय रेलवे को आने वाले वर्षों में माल ढुलाई की क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में नई लाइन और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट तैयार करने होंगे। लेकिन हर परियोजना की पूरी लागत सरकारी बजट से उठाना आसान नहीं है।
HAM मॉडल रेलवे को इसी चुनौती से निपटने का एक नया रास्ता देता है। निजी कंपनी शुरुआती निर्माण में 60% पैसा लगाएगी, जबकि रेलवे 40% देगा। लाइन चालू होने के बाद रेलवे ही ट्रेन चलाएगा, माल ढुलाई की कमाई रखेगा और निजी निवेश की रकम को तय एन्युटी के जरिए लौटाएगा।
अगर यह मॉडल इन छह परियोजनाओं में सफल रहता है, तो भविष्य में दूसरे फ्रेट और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में भी निजी निवेश बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा कदम कैबिनेट की मंजूरी और उसके बाद होने वाली बिडिंग है। इसके बाद ही यह साफ होगा कि कौन-कौन सी निजी कंपनियां इन 6 रेल लाइनों के निर्माण की जिम्मेदारी लेती हैं।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Indian Railways 6 नई Freight Lines क्यों बनाने जा रहा है?
इनका मुख्य उद्देश्य कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, कोक, खाद, सीमेंट और खाद्यान्न जैसी वस्तुओं की माल ढुलाई क्षमता बढ़ाना है। ये लाइनें खनन क्षेत्रों, औद्योगिक इलाकों और बंदरगाहों की कनेक्टिविटी मजबूत करेंगी।
इन Freight Lines के निर्माण में Private Firms की क्या भूमिका होगी?
निजी कंपनियां परियोजनाओं के निर्माण के लिए 60% फंडिंग करेंगी और अनुबंध के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रखरखाव की जिम्मेदारी भी निभाएंगी। रेलवे 40% लागत निर्माण के दौरान ग्रांट के रूप में देगा और बाद में निजी निवेश की रकम annuity के जरिए लौटाएगा।
Indian Railways के लिए Hybrid Funding Model क्या है?
यहां Hybrid Annuity Model यानी HAM का मतलब है कि परियोजना की लागत सरकार और निजी कंपनी दोनों मिलकर उठाते हैं। इस मामले में रेलवे 40% और निजी कंपनी 60% लागत वहन करेगी। लाइन चालू होने के बाद रेलवे निजी कंपनी को annuity के जरिए भुगतान करेगा।
Highway Projects में इस्तेमाल होने वाला Hybrid Annuity Model Railways में कैसे लागू होगा?
हाईवे की तरह यहां भी सरकार निर्माण लागत का एक हिस्सा देगी और निजी कंपनी बाकी रकम लगाएगी। फर्क यह है कि रेल परियोजना में रेलवे खुद ट्रेन चलाएगा और freight revenue भी रेलवे के पास रहेगा। निजी कंपनी को अनुबंध के अनुसार annuity और maintenance payment मिलेगा।
6 Freight Lines बनाने में कितनी लागत आएगी?
छह परियोजनाओं की कुल Bid Project Cost ₹15,976 करोड़ है, जबकि पूरे concession period में इनकी कुल capital cost करीब ₹40,866 करोड़ है। परियोजनाओं की लंबाई करीब 647 किमी है।
Private Companies को Railway Freight Projects में क्यों शामिल किया जा रहा है?
रेलवे के सामने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की जरूरत है। PPP और HAM के जरिए निजी क्षेत्र की लंबी अवधि की पूंजी का इस्तेमाल करके परियोजनाएं आगे बढ़ाई जा सकती हैं। HAM में traffic और tariff risk रेलवे उठाएगा, जिससे निजी निवेशकों के लिए परियोजना का जोखिम कम होगा।