Saudi Pipeline Outage Oil Prices: सऊदी तेल पाइपलाइन बंद और हूतियों के हमले से क्रूड 107 डॉलर के पार, ग्लोबल इकोनॉमी पर क्यों मंडराया बड़ा खतरा?
सऊदी की ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन बंद होने और बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़ती मौजूदगी से वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ा। होर्मुज संकट के बीच ब्रेंट क्रूड 107.51 डॉलर पहुंच गया। लंबे व्यवधान से तेल कीमतें और महंगाई बढ़ने का खतरा है।
Saudi Pipeline Outage Oil Prices: सऊदी अरब की अहम ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन बंद होने और यमन में हूतियों की बाब-अल-मंदेब के पास बढ़ती पकड़ ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड 2.77% बढ़कर 107.51 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 2.27% चढ़कर 102.32 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। कारोबार की शुरुआत में दोनों बेंचमार्क 3% से ज्यादा उछले थे।तेल बाजार पर एक साथ कई दबाव काम कर रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही पहले ही बुरी तरह कम हो चुकी है। इसके बीच सऊदी की वह पाइपलाइन बंद हो गई है, जो होर्मुज को बायपास करके तेल को लाल सागर तक पहुंचाने का अहम रास्ता है। दूसरी तरफ हूती लड़ाकों की बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में बढ़त से एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को लेकर जोखिम बढ़ गया है।

सऊदी की तेल पाइपलाइन बंद होने से बाजार क्यों घबराया
सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए सऊदी अरब फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता कम कर सकता है।ताजा रिपोर्टों के मुताबिक पाइपलाइन को ड्रोन हमले के बाद बंद किया गया। रॉयटर्स के अनुसार इस मार्ग से हाल में करीब 40 लाख बैरल तेल रोजाना भेजा जा रहा था, जो वैश्विक तेल सप्लाई के लगभग 4% के बराबर है। इसलिए अगर पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहती है तो इसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है।
सऊदी के पास यानबू में मौजूद तेल भंडार कुछ दिनों तक निर्यात जारी रखने में मदद कर सकते हैं। रॉयटर्स के मुताबिक मौजूदा स्टॉक से करीब 5 से 7 दिन तक निर्यात संभाला जा सकता है। मिस्र के ऐन सोखना और सिदी केरिर बंदरगाहों पर भी कुछ स्टॉक मौजूद है, लेकिन वह भी सीमित है।
सबसे बड़ी चिंता पाइपलाइन की मरम्मत में लगने वाले समय को लेकर है। रिपोर्टों में नुकसान को ठीक करने में 5 से 6 सप्ताह तक लगने का अनुमान दिया गया है, हालांकि कुछ हिस्सों में इससे पहले आंशिक संचालन शुरू होने की संभावना भी बताई गई है। ऐसे में अगले कुछ दिन वैश्विक तेल बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सऊदी का तेल उत्पादन पहले ही काफी नीचे आ चुका है
पाइपलाइन संकट ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब का तेल उत्पादन पहले ही युद्ध के कारण काफी कम हो चुका है। रियाद की ओर से ओपेक को दिए गए आंकड़ों के मुताबिक सऊदी उत्पादन फरवरी के 1.09 करोड़ बैरल प्रतिदिन से घटकर अगस्त में करीब 62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार के पास पहले से उपलब्ध अतिरिक्त सप्लाई की गुंजाइश सीमित है। अगर पाइपलाइन बंद रहने से यानबू के जरिए निर्यात प्रभावित होता है, तो सऊदी के लिए तेल को वैकल्पिक रास्तों से बाहर भेजना और मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि बाजार पाइपलाइन की मरम्मत को लेकर आने वाली हर खबर पर नजर रख रहा है। अगर कुछ दिनों में पंपिंग शुरू हो जाती है तो दबाव कम हो सकता है, लेकिन लंबा शटडाउन तेल की कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है।
बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की बढ़त ने दूसरी चिंता बढ़ाई
सऊदी पाइपलाइन के साथ ही बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर भी जोखिम बढ़ा है। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। एशिया, यूरोप और मध्य-पूर्व के बीच तेल और दूसरे सामान की आवाजाही के लिए इसका रणनीतिक महत्व है।ताजा घटनाक्रम में हूती लड़ाके जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित पेरिम द्वीप तक पहुंच गए हैं। इससे उन्हें इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते के आसपास अपनी सैन्य मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल सकता है। रॉयटर्स ने इसे बाब-अल-मंदेब को संभावित रूप से बाधित करने वाली स्थिति बताया है।
हालांकि यहां एक बात साफ समझना जरूरी है कि सऊदी पाइपलाइन पर ड्रोन हमला और बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़त एक ही घटना नहीं हैं। पाइपलाइन हमले को ताजा रिपोर्टों में इराक से आए ड्रोन से जोड़ा गया है, जबकि हूतियों की गतिविधि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के आसपास अलग समुद्री जोखिम पैदा कर रही है।

होर्मुज पहले से बना हुआ है सबसे बड़ा दबाव
इन दोनों घटनाओं का असर इसलिए ज्यादा है क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पहले ही जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है। युद्ध से पहले इस रास्ते से दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और एलएनजी की आवाजाही होती थी। लेकिन हालिया दिनों में यहां जहाजों की संख्या सामान्य स्तर के मुकाबले काफी कम हो गई है। रॉयटर्स के मुताबिक सप्ताहांत में केवल कुछ ही कमोडिटी जहाज खाड़ी से बाहर निकले, जबकि युद्ध से पहले यहां रोजाना करीब 125 जहाजों की आवाजाही होती थी।इस स्थिति में सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यह होर्मुज के बाहर निकलने का वैकल्पिक रास्ता देती है। अब इसी विकल्प के बाधित होने से बाजार को डर है कि अगर होर्मुज में सामान्य आवाजाही बहाल नहीं हुई और सऊदी पाइपलाइन भी लंबे समय तक बंद रही तो तेल की सप्लाई के विकल्प तेजी से सीमित हो सकते हैं।
IEA ने भी तेल सप्लाई को लेकर दिया बड़ा अनुमान
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA ने सितंबर की रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि 2026 में वैश्विक तेल सप्लाई में करीब 57 लाख बैरल प्रतिदिन, यानी लगभग 6% की गिरावट हो सकती है। एजेंसी के मुताबिक मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण खाड़ी से सामान्य तेल प्रवाह की वापसी अब 2027 तक खिसक सकती है।IEA पहले ही बता चुका है कि होर्मुज बंद रहने और ऊंची ईंधन कीमतों के कारण 2026 में वैश्विक तेल मांग पर भी असर पड़ रहा है। अगस्त की रिपोर्ट में एजेंसी ने बताया था कि जुलाई में वैश्विक तेल सप्लाई बढ़ने के बावजूद यह पिछले साल के मुकाबले काफी नीचे थी और खाड़ी क्षेत्र का बड़ा उत्पादन अभी भी बंद था।
यानी मौजूदा संकट सिर्फ कच्चे तेल की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है। अगर सप्लाई लंबे समय तक कम रहती है तो रिफाइनरी, पेट्रोल-डीजल, विमान ईंधन और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर देश के आयात बिल पर पड़ सकता है। अगर क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है तो रुपये पर दबाव, व्यापार घाटे और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है।हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ते ही भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगी। घरेलू ईंधन कीमतों पर टैक्स, तेल कंपनियों की कीमत नीति, रुपये-डॉलर विनिमय दर और सरकार के फैसलों का भी असर होता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि अगर होर्मुज, बाब-अल-मंदेब और सऊदी का वैकल्पिक तेल मार्ग तीनों लंबे समय तक जोखिम में रहे तो समुद्री परिवहन की लागत और बीमा खर्च भी बढ़ सकते हैं। इसका असर कच्चे तेल के अलावा दूसरे आयात-निर्यात पर भी पड़ सकता है।
अब तेल बाजार की नजर अगले कुछ दिनों पर
फिलहाल बाजार के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन कितनी जल्दी दोबारा शुरू होती है और होर्मुज में जहाजों की आवाजाही कब सामान्य होती है। अगर पाइपलाइन जल्दी चालू हो जाती है और मध्य-पूर्व में तनाव कम होता है तो तेल की कीमतों पर कुछ दबाव घट सकता है।लेकिन अगर पाइपलाइन की मरम्मत लंबी खिंचती है, होर्मुज में आवाजाही कम रहती है और बाब-अल-मंदेब में हूतियों का दबाव बढ़ता है तो वैश्विक तेल बाजार के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है। सोमवार को ब्रेंट का 107 डॉलर से ऊपर पहुंचना इसी बढ़ती सप्लाई चिंता का संकेत है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Saudi pipeline outage से oil prices क्यों बढ़ रहे हैं?
सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन होर्मुज को बायपास करके तेल को लाल सागर तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण रास्ता है। इसके बंद होने से करीब 40 लाख बैरल प्रतिदिन की सप्लाई प्रभावित होने का जोखिम है। इसी वजह से बाजार में सप्लाई की चिंता बढ़ी और ब्रेंट 107.51 डॉलर तक पहुंचा।
Saudi Arabia का East-West oil pipeline क्यों बंद किया गया?
ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को बंद कर दिया। ताजा रिपोर्टों में इस हमले को इराक से आए ड्रोन से जोड़ा गया है। पाइपलाइन का संचालन कब पूरी तरह सामान्य होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
Houthi attacks से global oil supply को कितना खतरा है?
हूतियों की बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में बढ़त से लाल सागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर जोखिम बढ़ा है। अगर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो तेल और दूसरे सामान की ढुलाई महंगी और धीमी हो सकती है।
Saudi oil supply disruption का India पर क्या असर पड़ सकता है?
लंबे समय तक तेल सप्लाई बाधित रहने पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड महंगा हो सकता है। इससे भारत का आयात बिल, रुपये पर दबाव और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है। घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों पर असर हालांकि कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगा।
क्या Houthi moves से Red Sea shipping प्रभावित हो सकती है?
हां, बाब-अल-मंदेब के आसपास हूतियों की बढ़ती सैन्य मौजूदगी से जहाजों की सुरक्षा को लेकर जोखिम बढ़ सकता है। इससे शिपिंग कंपनियों की सुरक्षा, बीमा और रूट बदलने की लागत बढ़ने की आशंका रहती है।