Consumer Forums Pending Cases: 32 साल से नहीं सुलझा कंज्यूमर केस, देशभर में 5.93 लाख मामले पेंडिंग; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मांगा जवाब?
देशभर के कंज्यूमर फोरम में 5.93 लाख मामले पेंडिंग हैं। महाराष्ट्र में करीब 32 साल पुराना केस लंबित है। खाली पद, धीमी सुनवाई और आदेश अपलोड में देरी से बैकलॉग बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से जवाब मांगा है।
Consumer Forums Pending Cases : देश में कंज्यूमर फोरम यानी उपभोक्ता विवाद निपटाने वाली संस्थाओं में मामलों की पेंडेंसी गंभीर समस्या बन गई है। सुप्रीम कोर्ट में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र का एक कंज्यूमर केस करीब 32 साल से लंबित है और यह किसी स्टेट कंज्यूमर कमीशन में सबसे पुराना लंबित मामला बताया गया है। केरल में दिसंबर 1995 से और उत्तर प्रदेश में जुलाई 2000 से मामले अटके हुए हैं। रिपोर्ट में 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से मिले आंकड़ों के आधार पर स्टेट कंज्यूमर कमीशन में 1,13,276 मामले लंबित बताए गए हैं।इसी बीच केंद्र सरकार ने 29 जुलाई को संसद में बताया था कि देश के नेशनल, स्टेट और डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन में कुल 5,93,109 मामले लंबित हैं। इनमें सबसे ज्यादा 4,48,687 मामले डिस्ट्रिक्ट कमीशन में हैं। दूसरी बड़ी समस्या इन फोरम में खाली पदों की है। स्टेट और डिस्ट्रिक्ट स्तर पर प्रेसिडेंट और मेंबर्स के सैकड़ों पद खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अब राज्यों से इस स्थिति पर जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी।
32 साल पुराना केस और कई राज्यों में 15-30 साल की पेंडेंसी
सुप्रीम कोर्ट की मदद कर रहे एमिकस क्यूरी की टीम ने स्टेट और डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार की है। इसमें महाराष्ट्र का करीब 32 साल पुराना केस सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। इसके अलावा केरल का एक मामला दिसंबर 1995 से लंबित है, जबकि उत्तर प्रदेश में जुलाई 2000 का मामला अभी तक नहीं निपटा है।रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और असम के स्टेट कंज्यूमर फोरम में भी करीब दो दशक पुराने मामले हैं। गोवा, बिहार, तमिलनाडु, तेलंगाना और राजस्थान में 15 साल से ज्यादा पुराने मामले लंबित हैं। यानी समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों के कंज्यूमर कमीशन लंबे समय से बैकलॉग से जूझ रहे हैं।
26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से मिले आंकड़ों के मुताबिक स्टेट कमीशन में कुल 1,13,276 मामले पेंडिंग हैं। इनमें महाराष्ट्र 34,203 मामलों के साथ सबसे ऊपर है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 15,657, कर्नाटक में 9,244, हरियाणा में 8,719 और गुजरात में 6,414 मामले लंबित हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि स्टेट कमीशन में तय हुए मामलों में भी करीब आधे मामलों को निपटने में एक साल से ज्यादा समय लग रहा है। सिर्फ केस की सुनवाई और फैसला ही समस्या नहीं है। फैसला होने के बाद भी उसे समय पर अपलोड नहीं किया जा रहा।
कर्नाटक में 460 मामलों के फैसले छह महीने से अपलोड नहीं हुए थे। महाराष्ट्र की दो बेंच में करीब 800 और पश्चिम बंगाल में 70 आदेश महीनों से अपलोड नहीं किए गए थे। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें फैसला मिलने के बाद भी उसकी कॉपी हासिल करने में देरी होती है।
डिस्ट्रिक्ट कमीशन में भी हजारों मामले वर्षों से अटके
डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन की स्थिति भी चिंताजनक है। देश में कुल 632 डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन हैं, लेकिन एमिकस की ओर से भेजी गई प्रश्नावली का जवाब केवल 598 कमीशन ने दिया। इसलिए रिपोर्ट में सभी जिलों की पूरी स्थिति शामिल नहीं हो सकी।पुराने मामलों के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे खराब नजर आई। वहां 1990 से 2000 के बीच के 13 मामले और 2001 से 2010 के बीच के 40 मामले अब भी लंबित हैं। बिहार में करीब तीन दशक पुराना एक मामला और 2001 से लंबित 11 मामले मिले। केरल और झारखंड में भी 30 साल पुराने एक-एक मामले लंबित हैं। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में भी डेढ़ दशक से ज्यादा पुराने मामले मौजूद हैं।
रिपोर्ट में रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ी देरी भी सामने आई। कुछ डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम में जिन मामलों की सुनवाई किसी दिन नहीं हो पाती, उन्हें दोबारा सुनवाई के लिए तीन हफ्ते या उससे ज्यादा समय बाद लगाया जाता है। छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और गुजरात समेत कई राज्यों में ऐसी स्थिति सामने आई।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर और बिहार के कई जिलों में आदेश अपलोड करने में भी दो हफ्ते से ज्यादा की देरी देखी गई।
खाली पदों ने बढ़ाई कंज्यूमर कमीशन की परेशानी
मामलों की लंबी पेंडेंसी के पीछे एक बड़ी वजह खाली पद भी हैं। महाराष्ट्र के स्टेट कंज्यूमर कमीशन की मुंबई, छत्रपति संभाजीनगर और नागपुर बेंच में कोई प्रेसिडेंट नहीं है। गोवा और झारखंड में प्रेसिडेंट की नियुक्ति 2020 से लंबित बताई गई है। जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी और उत्तराखंड में भी 2022 से 2024 के बीच खाली हुए पदों पर नियुक्ति का इंतजार है।छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और झारखंड के स्टेट कमीशन में सदस्यों के पूरे स्वीकृत पद ही खाली बताए गए हैं। इन राज्यों में पिछले तीन साल यानी 2023 से 2026 के बीच मामलों की पेंडेंसी करीब दोगुनी हो गई।
उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में करीब 87% पद खाली हैं। बिहार में 75% और सात अन्य स्टेट कमीशन में करीब 50% पद खाली बताए गए हैं। दिल्ली भी इस स्थिति वाले राज्यों में शामिल है।
नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन यानी NCDRC की स्थिति भी बेहतर नहीं है। उसकी अलग रिपोर्ट के मुताबिक तीन पद खाली हैं और दो मेंबर्स एक्सटेंशन पर काम कर रहे हैं। प्रेसिडेंट और आठ मेंबर्स के सामने 31 जुलाई तक 18,767 मामलों का बोझ था।
देशभर में 5.93 लाख कंज्यूमर केस पेंडिंग
सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश रिपोर्ट सिर्फ स्टेट और डिस्ट्रिक्ट कमीशन की समस्या दिखाती है, लेकिन केंद्र सरकार का देशभर का आंकड़ा इससे भी बड़ी तस्वीर बताता है।29 जुलाई को संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक देश के तीनों स्तर के कंज्यूमर कमीशन में कुल 5,93,109 मामले लंबित थे। इनमें NCDRC में 16,915, स्टेट कंज्यूमर कमीशन में 1,27,507 और डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन में 4,48,687 मामले थे। यानी कुल पेंडेंसी का सबसे बड़ा हिस्सा डिस्ट्रिक्ट कमीशन के पास है।
खाली पदों की स्थिति भी गंभीर है। स्टेट कमीशन में 36 प्रेसिडेंट पदों में 18 और 167 मेंबर पदों में 74 खाली थे। डिस्ट्रिक्ट स्तर पर 637 प्रेसिडेंट पदों में 234 और 1,416 मेंबर पदों में 538 खाली थे। यानी स्टेट और डिस्ट्रिक्ट स्तर पर मिलाकर 864 प्रेसिडेंट और मेंबर पद खाली थे।
Consumer Protection Act, 2019 के तहत स्टेट और डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन में खाली पदों को भरने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की है। राज्यों को पद खाली होने से छह महीने पहले नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करनी होती है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल भी है कि जब नियुक्ति की प्रक्रिया समय से शुरू की जानी चाहिए, तो इतने पद लंबे समय तक खाली क्यों हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने कंज्यूमर फोरम की इस स्थिति को गंभीरता से लिया है। 2 सितंबर को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने रिपोर्ट पर सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र को NCDRC के प्रेसिडेंट जस्टिस एपी साही की रिपोर्ट पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार कर तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने को कहा।साथ ही सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट पर तीन हफ्ते में जवाब देने का निर्देश दिया गया। मामले को 1 अक्टूबर को आगे सुनवाई के लिए लगाया गया है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट की उस सू-मोटो कार्रवाई से जुड़ा है जिसमें कंज्यूमर फोरम के कामकाज में सुधार पर विचार किया जा रहा है। कोर्ट ने मामलों के निपटारे की रफ्तार, लंबित मामलों, खाली पदों और दूसरे प्रशासनिक मुद्दों की जानकारी मांगी थी।
आम उपभोक्ता के लिए इसका मतलब क्या है?
कंज्यूमर फोरम का उद्देश्य आम लोगों को सामान या सर्विस से जुड़ी शिकायतों का अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला समाधान देना है। लेकिन अगर किसी शिकायत का फैसला कई साल तक नहीं होता, तो उपभोक्ता को उस व्यवस्था का वास्तविक फायदा मिलने में देरी होती है।इसलिए सिर्फ नए केस जल्दी दर्ज करना या डिजिटल सिस्टम शुरू करना काफी नहीं होगा। खाली पदों को समय पर भरना, सुनवाई की तारीखों के बीच अनावश्यक अंतर कम करना, फैसलों को समय पर अपलोड करना और पुराने मामलों को प्राथमिकता देकर निपटाना जरूरी होगा।
देश में 5.93 लाख मामलों की पेंडेंसी और 32 साल पुराने मामलों का सामने आना बताता है कि कंज्यूमर जस्टिस सिस्टम में सिर्फ केसों की संख्या नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की स्पीड और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Consumer Forums में 30 साल से ज्यादा पुराने केस क्यों पेंडिंग हैं?
लंबी पेंडेंसी के पीछे कई कारण सामने आए हैं। इनमें कंज्यूमर कमीशन में प्रेसिडेंट और मेंबर्स की भारी कमी, सुनवाई में देरी, प्रशासनिक समस्याएं और आदेश समय पर अपलोड न होना शामिल हैं। रिपोर्ट में महाराष्ट्र का करीब 32 साल पुराना मामला सबसे पुराना बताया गया है। केरल में दिसंबर 1995 से एक मामला लंबित है।
Supreme Court ने Consumer Forums की pendency को लेकर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट और डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कमीशन की पेंडेंसी और खाली पदों की स्थिति पर राज्यों से जवाब मांगा है। 2 सितंबर की सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र को NCDRC प्रेसिडेंट की रिपोर्ट पर तत्काल सुधारात्मक कदमों पर विचार करने को कहा और राज्यों को एमिकस रिपोर्ट पर तीन हफ्ते में जवाब देने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी।
Consumer Courts में cases की इतनी बड़ी backlog क्यों है?
बड़ी वजह खाली पद और धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया हैं। कई कमीशन में प्रेसिडेंट और मेंबर्स के पद लंबे समय से खाली हैं। इसके अलावा सुनवाई के बीच लंबा अंतर और फैसलों को समय पर अपलोड न करने जैसी समस्याएं भी बैकलॉग बढ़ा रही हैं।
Consumer Commission में delayed justice की मुख्य वजह क्या है?
मुख्य वजहों में स्टाफ और सदस्यों की कमी, लंबे समय से खाली पद, सुनवाई की धीमी प्रक्रिया और फैसलों को अपलोड करने में देरी शामिल हैं। इसलिए सिर्फ अदालत में केस की संख्या कम करना पर्याप्त नहीं होगा, पूरी डिस्पोजल प्रक्रिया को तेज करना जरूरी है।
Consumer Forums में vacancies का case disposal पर क्या असर पड़ रहा है?
जब प्रेसिडेंट और मेंबर्स के पद खाली रहते हैं तो उपलब्ध बेंचों पर मामलों का बोझ बढ़ता है और केस निपटाने की क्षमता प्रभावित होती है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ राज्यों में पूरे स्वीकृत मेंबर पद तक खाली हैं और वहां पिछले तीन साल में पेंडेंसी करीब दोगुनी हुई है।
Consumer Cases को जल्दी dispose करने के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
सबसे पहले खाली प्रेसिडेंट और मेंबर्स के पद समय पर भरने होंगे। इसके साथ पुराने मामलों की प्राथमिकता से सुनवाई, तारीखों के बीच अनावश्यक अंतर कम करना और फैसलों को समय पर अपलोड करना जरूरी है। डिजिटल सिस्टम का प्रभावी इस्तेमाल भी प्रक्रिया को तेज करने में मदद कर सकता है।