Home / National / Animal Tallow in Currency Notes: भारत में आएंगे प्लास्टिक नोट, लेकिन चीन-पाकिस्तान से लेकर पशु चर्बी तक पर क्यों रखी गई नजर?
National

Animal Tallow in Currency Notes: भारत में आएंगे प्लास्टिक नोट, लेकिन चीन-पाकिस्तान से लेकर पशु चर्बी तक पर क्यों रखी गई नजर?

भारत में पॉलिमर करेंसी नोट लाने की तैयारी तेज हो गई है। BRBNMPL ने 68 हजार रीम पॉलिमर सब्सट्रेट के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किया है। इसमें एनिमल टैलो और चीन-पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को लेकर सख्त शर्तें रखी गई हैं।

Animal Tallow in Currency Notes: भारत में आएंगे प्लास्टिक नोट, लेकिन चीन-पाकिस्तान से लेकर पशु चर्बी तक पर क्यों रखी गई नजर?

Animal Tallow in Currency Notes: भारत में पॉलिमर यानी प्लास्टिक करेंसी नोट लाने की तैयारी अब एक कदम आगे बढ़ गई है। RBI की करेंसी प्रिंटिंग सब्सिडियरी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने पॉलिमर सब्सट्रेट की सप्लाई के लिए ग्लोबल एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया था। अब इसमें भारतीय और विदेशी कंपनियों ने बोली लगाई है।

इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ कीमत और क्वालिटी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का भी ध्यान रखा गया है। बोली लगाने वाली कंपनियों से कहा गया है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाले पॉलिमर सब्सट्रेट में एनिमल टैलो यानी पशु वसा या उसका DNA नहीं होना चाहिए। साथ ही कंपनियों को भारत में अपने ऑपरेशन को चीन और पाकिस्तान में मौजूद अपने ऑपरेशन से अलग रखने की शर्त भी माननी होगी।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अभी पॉलिमर करेंसी को पूरी तरह लागू नहीं कर रहा है। पहले सब्सट्रेट और उससे बने नोटों का भारतीय परिस्थितियों में परीक्षण होगा। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगस्त 2026 में कहा था कि सफल फील्ड ट्रायल और ऑपरेशनल आकलन के बाद FY28 की शुरुआत से पॉलिमर बैंकनोट पेश करने का लक्ष्य है।

68 हजार रीम से शुरू हुई भारत की प्लास्टिक करेंसी की तैयारी

BRBNMPL ने शुरुआती जरूरत के तौर पर करीब 68,000 रीम पॉलिमर सब्सट्रेट मांगा है। एक रीम में 500 शीट होती हैं, यानी यह कुल करीब 3.4 करोड़ शीट का शुरुआती सब्सट्रेट है। EOI में दो डिनॉमिनेशन के लिए 34,000-34,000 रीम का संकेत दिया गया है। रिपोर्टों में इन शुरुआती नोटों के लिए ₹10 और ₹20 को संभावित डिनॉमिनेशन बताया गया है, लेकिन इसे अभी अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

यह पॉलिमर फिल्म साधारण प्लास्टिक नहीं होगी। इसमें बैंकनोट की सुरक्षा के लिए कई फीचर पहले से शामिल होंगे। इनमें क्लियर विंडो, पोर्ट्रेट, मेटैलिक नंबर, मैग्नेटिक स्यूडो थ्रेड, शैडो इमेज और इरिडिसेंट पैटर्न जैसे सिक्योरिटी फीचर शामिल हैं। नमूनों को अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में टेस्ट किया जाएगा। जो कंपनियां इन परीक्षणों में योग्य पाई जाएंगी, वही आगे अंतिम टेंडर प्रक्रिया में जा सकेंगी।

इसका मतलब साफ है कि भारत पहले यह देखना चाहता है कि पॉलिमर नोट गर्मी, नमी, धूल, लगातार इस्तेमाल और भारतीय करेंसी मशीनों में प्रोसेसिंग के दौरान कैसा प्रदर्शन करते हैं।

चीन और पाकिस्तान का नाम क्यों आया?

पॉलिमर करेंसी के टेंडर में चीन और पाकिस्तान का नाम आने की वजह यह नहीं है कि सरकार ने किसी चीनी या पाकिस्तानी कंपनी पर भारतीय करेंसी से छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। मामला इससे अलग है।

रिपोर्ट के मुताबिक, बोली लगाने वाली कंपनियों को कई सुरक्षा शर्तों का पालन करना होगा। इनमें इंटीग्रिटी पैक्ट, कॉन्फिडेंशियलिटी एग्रीमेंट और नो-एजेंट पैक्ट शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत के लिए काम करने वाले उनके ऑपरेशन चीन और पाकिस्तान में मौजूद उनके किसी भी ऑपरेशन से अलग और सुरक्षित रहें।

इसे आसान भाषा में समझें तो सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भारतीय करेंसी के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक, जानकारी, कर्मचारी, उत्पादन प्रक्रिया या संवेदनशील सप्लाई चेन किसी दूसरे देश में मौजूद उसी कंपनी के ऑपरेशन के जरिए एक्सेस न हो सके।

इसी को टेंडर में फायरवॉल करने की शर्त कहा गया है। यहां फायरवॉल का मतलब कंप्यूटर वाला सामान्य नेटवर्क सिक्योरिटी सिस्टम नहीं, बल्कि कारोबारी और ऑपरेशनल अलगाव है।

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक टेंडर की शर्तों में चीन या पाकिस्तान से कच्चा माल न लेने और वहां से जुड़े कुछ कर्मचारियों को लेकर भी सख्त प्रावधान हैं। यानी सरकार पॉलिमर सब्सट्रेट की पूरी सप्लाई चेन पर नियंत्रण रखना चाहती है।

Animal Tallow आखिर करेंसी नोट में क्यों आया?

सबसे ज्यादा चर्चा Animal Tallow in Currency Notes को लेकर है। टैलो का मतलब जानवरों से प्राप्त वसा को प्रोसेस करके बनाया गया पदार्थ है। इसका इस्तेमाल अलग-अलग औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जा सकता है।

भारत के पॉलिमर करेंसी टेंडर में कंपनियों को यह प्रमाणित करना होगा कि उनके द्वारा सप्लाई किए जाने वाले सब्सट्रेट में एनिमल टैलो या उसका DNA नहीं है।

यह शर्त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दूसरे देशों में पॉलिमर बैंकनोट्स में पशु-आधारित सामग्री से जुड़े विवाद सामने आ चुके हैं। खास तौर पर ब्रिटेन में पॉलिमर नोटों से जुड़े टैलो विवाद ने धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का मुद्दा खड़ा किया था। ऐसी घटनाओं को देखते हुए भारत ने पहले से ही सप्लायर के लिए स्पष्ट शर्त रखी है कि भारतीय करेंसी के लिए इस्तेमाल होने वाले सब्सट्रेट में पशु-आधारित टैलो या उसका DNA नहीं होना चाहिए।

यानी यहां सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि मुख्य पॉलिमर किस चीज से बना है। भारत यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि पूरी निर्माण प्रक्रिया में ऐसा कोई पशु-आधारित घटक शामिल न हो, जो बाद में विवाद का कारण बने।

कंपनियों की बोली में कौन-कौन शामिल हैं?

इस प्रक्रिया में भारतीय और विदेशी कंपनियों की दिलचस्प प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक Cosmo First ने ब्रिटेन की बैंकनोट कंपनी De La Rue के साथ साझेदारी में बोली लगाई है। ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure भी इस प्रक्रिया में शामिल है। वियतनाम की Q&T Hi-Tech Polymer का नाम भी संभावित बोलीदाताओं में सामने आया है।

Cosmo First BOPP यानी Biaxially Oriented Polypropylene बनाने वाली भारतीय कंपनी है और De La Rue के साथ उसका कारोबारी संबंध रहा है। CCL Secure लंबे समय से पॉलिमर बैंकनोट तकनीक में काम कर रही है। वहीं Q&T Hi-Tech Polymer वियतनाम में बैंकनोट-ग्रेड पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और उसकी सामग्री वियतनामी करेंसी में इस्तेमाल होने का दावा करती है।

यह बाजार काफी तकनीकी है, क्योंकि यहां केवल प्लास्टिक फिल्म तैयार करना पर्याप्त नहीं है। सब्सट्रेट में ऐसे सुरक्षा फीचर भी चाहिए जो नकली नोट बनाना मुश्किल करें और लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद भी काम करते रहें।

Polymer Notes और Paper Currency में क्या फर्क है?

भारत में अभी बैंकनोट के लिए इस्तेमाल होने वाला करेंसी पेपर 100 प्रतिशत कॉटन आधारित है। पॉलिमर नोट पतली और लचीली प्लास्टिक फिल्म से बने होते हैं।

पॉलिमर का सबसे बड़ा फायदा इसकी टिकाऊपन माना जाता है। यह पानी और नमी के प्रति ज्यादा प्रतिरोधी होता है और सामान्य कॉटन-पेपर नोट की तुलना में लंबे समय तक चल सकता है। इससे बार-बार खराब होने वाले नोटों को बदलने की जरूरत कम हो सकती है।

पॉलिमर नोटों में पारदर्शी विंडो और सब्सट्रेट में मौजूद दूसरे सुरक्षा फीचर भी नकली नोटों के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा दे सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पॉलिमर नोटों की नकली कॉपी बनाना असंभव हो जाता है। बैंकनोट की सुरक्षा कई तकनीकों के संयोजन पर निर्भर करती है।

भारत ने इससे पहले भी पॉलिमर नोटों का प्रयोग करने की कोशिश की थी। 2012 में ₹10 के करीब एक अरब पॉलिमर नोटों को पांच शहरों में फील्ड ट्रायल के लिए लाने की योजना बनाई गई थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

अब करीब 14 साल बाद RBI ने इस विचार को नए सिरे से आगे बढ़ाया है।

क्या भारत में सभी नोट प्लास्टिक के हो जाएंगे?

अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह बात सबसे ज्यादा समझना जरूरी है।

RBI ने जून 2026 में स्पष्ट किया था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव विचाराधीन है और उस समय कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ था। इसके बाद BRBNMPL ने सब्सट्रेट की खरीद के लिए EOI जारी किया और अगस्त में RBI ने सफल परीक्षणों के बाद FY28 की शुरुआत से पॉलिमर बैंकनोट लाने का लक्ष्य बताया।

इसलिए फिलहाल इसे पूरी करेंसी को प्लास्टिक में बदलने की योजना कहना सही नहीं होगा। शुरुआत कम मूल्य वाले नोटों से होने की संभावना है और आगे का फैसला फील्ड ट्रायल के नतीजों पर निर्भर करेगा।

सोशल मीडिया पर जून 2026 से सभी कागजी नोट हटाकर प्लास्टिक नोट शुरू करने जैसी खबरें भी वायरल हुई थीं, लेकिन PIB Fact Check ने इन्हें गलत बताया था।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Plastic Currency Notes में Animal Tallow को लेकर क्या विवाद है?

Animal tallow यानी पशु वसा से जुड़े घटक कुछ देशों में पॉलिमर बैंकनोट्स को लेकर विवाद का कारण रहे हैं। इसलिए भारत के टेंडर में सप्लायर से यह प्रमाणित करने को कहा गया है कि उसके सब्सट्रेट में animal tallow या उसका DNA नहीं होगा।

Bidders को Animal Tallow नहीं होने का Certificate क्यों देना होगा?

इसका उद्देश्य भारतीय करेंसी के निर्माण में किसी पशु-आधारित घटक के इस्तेमाल की संभावना को खत्म करना है। इससे धार्मिक, सांस्कृतिक और सार्वजनिक स्वीकार्यता से जुड़े विवादों से बचा जा सकेगा।

Plastic या Polymer Banknotes क्या होते हैं?

Polymer banknotes पतली और लचीली प्लास्टिक आधारित फिल्म से बने करेंसी नोट होते हैं। इनमें पारंपरिक कॉटन-पेपर नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊपन, पानी और नमी के प्रति बेहतर प्रतिरोध और अलग तरह के सुरक्षा फीचर हो सकते हैं।

Currency Notes में Animal Tallow का इस्तेमाल क्यों चर्चा में आया?

कुछ देशों में पॉलिमर बैंकनोट्स से जुड़े निर्माण घटकों में animal-derived सामग्री को लेकर विवाद सामने आए थे। ब्रिटेन में tallow से जुड़ा विवाद भी चर्चा में रहा। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने अपने टेंडर में animal tallow और उसके DNA को लेकर स्पष्ट शर्त रखी है।

Polymer Notes और Paper Currency में क्या अंतर है?

पारंपरिक भारतीय बैंकनोट 100 प्रतिशत कॉटन आधारित करेंसी पेपर पर छपते हैं, जबकि पॉलिमर नोट प्लास्टिक आधारित सब्सट्रेट से बनते हैं। पॉलिमर नोट आम तौर पर अधिक टिकाऊ और नमी के प्रति ज्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

India में Plastic Notes बनाने की योजना क्यों बनाई जा रही है?

मुख्य वजह नोटों की टिकाऊ उम्र बढ़ाना, बार-बार खराब होने वाले नोटों को बदलने की जरूरत कम करना और आधुनिक सुरक्षा फीचर का इस्तेमाल करना है। हालांकि भारत में इसकी शुरुआत परीक्षण के आधार पर होगी और आगे का फैसला फील्ड ट्रायल के परिणामों पर निर्भर करेगा।

Was this article useful?