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Marital Rape Exception Supreme Court: पत्नी की मर्जी के खिलाफ सेक्स पर पति पर रेप केस चलेगा या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मैरिटल रेप एक्सेप्शन पर सुनवाई के दौरान पूछा कि संवैधानिक वैधता तय होने तक पत्नी से जबरन सेक्स के आरोपी पति पर रेप केस चल सकता है या नहीं। कोर्ट मौजूदा कानून और एक्सेप्शन की संवैधानिकता, दोनों पहलुओं पर अंतिम सुनवाई करेगा

Marital Rape Exception Supreme Court: पत्नी की मर्जी के खिलाफ सेक्स पर पति पर रेप केस चलेगा या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल

Marital Rape Exception Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 9 सितंबर को वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप के मामले में एक अहम सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि जब कानून में शादीशुदा पत्नी के साथ यौन संबंध को कुछ परिस्थितियों में रेप की श्रेणी से बाहर रखने वाला स्पष्ट अपवाद मौजूद है, तो उस अपवाद की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने से पहले क्या पति के खिलाफ रेप का मुकदमा चलाया जा सकता है? तीन जजों की बेंच ने साफ किया कि वह इस मामले में दो पहलुओं पर विचार करेगी - अगर मैरिटल रेप एक्सेप्शन बना रहता है तो भी पति पर मुकदमा चल सकता है या नहीं, और अगर यह अपवाद ही असंवैधानिक पाया जाता है तो उसका क्या असर होगा।सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने मामले को तीन हफ्ते बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है। सुनवाई की शुरुआत कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील से होगी, जिसमें पत्नी के साथ जबरन सेक्स के आरोप में पति के खिलाफ रेप की कार्रवाई को आगे बढ़ने दिया गया था।

कानून में पति को मिली छूट पर ही पूरा विवाद

पुराने भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 375 में रेप की परिभाषा दी गई थी। इसमें अपवाद-2 के तहत कहा गया था कि 18 साल से अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया यौन संबंध रेप नहीं माना जाएगा। बीएनएस लागू होने के बाद यही व्यवस्था धारा 63 में बनी हुई है। यानी मौजूदा कानून में शादीशुदा पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को, पत्नी के 18 साल से अधिक होने की स्थिति में, रेप की कानूनी परिभाषा से बाहर रखा गया है।हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि शादी के भीतर महिला के साथ हर तरह की हिंसा को कानून से सुरक्षा मिल गई है। उदाहरण के लिए, बीएनएस की धारा 67 में अलग रह रही पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने पर पति के लिए 2 से 7 साल तक की सजा का प्रावधान है।
विवाद यह है कि साथ रह रही वयस्क पत्नी के साथ उसकी इच्छा के खिलाफ जबरन सेक्स को रेप माना जाए या नहीं। इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती लंबित है।

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

मामले की एक अहम कड़ी हृषिकेश साहू बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक है। मार्च 2022 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि पत्नी के साथ जबरन सेक्स करने के आरोपी पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 के तहत रेप का मुकदमा चलाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप एक्सेप्शन को इस मामले में पूर्ण सुरक्षा देने से इनकार किया था।इसी फैसले को पति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब यही अपील उन दूसरी याचिकाओं के साथ जुड़ी है, जिनमें मैरिटल रेप एक्सेप्शन की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय चार तरह की कार्यवाहियां हैं। इनमें दिल्ली हाईकोर्ट के 2022 के विभाजित फैसले के खिलाफ अपील, मैरिटल रेप एक्सेप्शन को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाएं, कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील और अलग-अलग पक्षों की ओर से दाखिल हस्तक्षेप आवेदन शामिल हैं।

कोर्ट ने कहा- शादी से महिला की अपनी इच्छा खत्म नहीं होती

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि मैरिटल रेप एक्सेप्शन मौजूद होने के बावजूद इस मामले के तथ्यों के आधार पर पति के खिलाफ अभियोजन चलाया जा सकता है। उनका तर्क था कि यह मामला एक्सेप्शन की व्याख्या से जुड़ा है, न कि फिलहाल उसकी संवैधानिक वैधता तय करने से।दूसरी ओर वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि अगर कोर्ट संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है तो यह भी देखना होगा कि इस प्रावधान को पढ़कर सीमित यानी रीड डाउन किया जा सकता है या नहीं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट दोनों पहलुओं पर सुनवाई करेगा। यानी मैरिटल रेप एक्सेप्शन को पूरी तरह खत्म करने का सवाल हो या उसकी व्याख्या करके उसके दायरे को सीमित करने का, दोनों पक्षों को सुना जाएगा।
इसी दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने अहम सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोर्ट इस बात को समझता है कि शादी का मतलब किसी महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म होना नहीं है, लेकिन जब मौजूदा आपराधिक कानून किसी खास कृत्य को रेप की परिभाषा से बाहर रखता है तो संवैधानिक अदालत के फैसला देने से पहले उस कृत्य के लिए रेप का मुकदमा चलाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?
कोर्ट की चिंता सिर्फ महिला की सुरक्षा तक सीमित नहीं थी। जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान को अलग-अलग हिस्सों में नहीं देखा जा सकता। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ अनुच्छेद 20 में मौजूद आपराधिक कानून से जुड़ी सुरक्षा को भी ध्यान में रखना होगा। अदालत के अनुसार किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए आपराधिक मुकदमे का सामना नहीं कराना चाहिए, जिसे उस समय लागू कानून अपराध नहीं मानता था।

केंद्र बोला- मैरिटल रेप को अपराध बनाना संसद का काम

सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। उनका कहना था कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने का फैसला संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि अदालत के।केंद्र ने अक्टूबर 2024 में दाखिल अपने हलफनामे में मैरिटल रेप एक्सेप्शन हटाने का विरोध किया था। सरकार ने कहा था कि शादी के भीतर महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए मौजूदा कानूनों में दूसरे उपाय मौजूद हैं। उसका तर्क था कि पति-पत्नी के रिश्ते में हर गैर-सहमति वाले यौन कृत्य को रेप के अपराध के रूप में शामिल करना अत्यधिक कठोर और असंगत हो सकता है। केंद्र ने यह भी कहा था कि मामला सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और नीतिगत सवालों से जुड़ा है और राज्यों से विचार-विमर्श की जरूरत है।
हालांकि केंद्र ने यह भी कहा था कि शादी महिला की सहमति को खत्म नहीं करती और पति को पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। विवाद मुख्य रूप से इस बात पर है कि ऐसे उल्लंघन को कानूनी रूप से ‘रेप’ की श्रेणी में रखा जाए या उसके लिए अलग आपराधिक और वैवाहिक कानूनों का इस्तेमाल किया जाए।

धारा 377 को लेकर भी कोर्ट में सवाल उठा

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी पूछा कि अगर पति पत्नी के साथ आईपीसी की धारा 377 के तहत आने वाला कृत्य करता है तो क्या उस पर मुकदमा चल सकता है।सॉलिसिटर जनरल ने इसका जवाब नकारात्मक दिया और पहले के न्यायिक रुख का हवाला दिया। यहां एक अहम बात यह है कि बीएनएस में आईपीसी की धारा 377 जैसी अलग धारा नहीं रखी गई है। दिल्ली हाईकोर्ट के एक बाद के आदेश में भी इस अंतर को दर्ज किया गया है।
सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि ‘नेचुरल’ और ‘अननेचुरल’ क्या माना जाए, यह तय करना संसद का विषय है। इस पर करुणा नंदी ने केंद्र से अपना रुख स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर रखने के लिए जवाबी हलफनामा दाखिल करने की मांग की।

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने दो बड़े सवाल

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट को अब मूल रूप से दो सवालों का जवाब देना है। पहला, अगर मौजूदा मैरिटल रेप एक्सेप्शन संवैधानिक रूप से कायम रहता है तो क्या किसी पति के खिलाफ रेप का मुकदमा फिर भी चलाया जा सकता है। दूसरा, क्या खुद यह एक्सेप्शन संविधान के अनुरूप है या इसे खत्म किया जाना चाहिए।कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दोनों पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित नहीं किया है और न ही मौजूदा अपवाद को असंवैधानिक ठहराया है। अंतिम फैसला आने तक वयस्क पत्नी से जुड़े मामले में धारा 63 का मैरिटल रेप एक्सेप्शन कानून का हिस्सा बना हुआ है।
आने वाली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फैसला सिर्फ एक पति-पत्नी के मामले तक सीमित नहीं रहेगा। इससे यह तय होगा कि भारतीय आपराधिक कानून में शादी के भीतर सहमति, महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता और पति के खिलाफ रेप के आरोप को किस तरह देखा जाएगा।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Marital Rape Exception Supreme Court ने इस मामले में क्या सवाल उठाया?

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब कानून में वयस्क पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को रेप की परिभाषा से बाहर रखने वाला स्पष्ट अपवाद मौजूद है, तो उस अपवाद की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने से पहले पति के खिलाफ रेप का मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है।

Supreme Court Marital Rape मामले में पति पर rape charge को लेकर क्या कहा गया?

कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। उसने यह सवाल उठाया है कि मौजूदा मैरिटल रेप एक्सेप्शन रहते हुए पति पर रेप का मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं। इस सवाल पर अंतिम सुनवाई होनी है।

Marital Rape Law India में current legal position क्या है?

फिलहाल वयस्क पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया यौन संबंध बीएनएस की धारा 63 के अपवाद-2 के तहत रेप नहीं माना जाता। हालांकि अलग रह रही पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने पर बीएनएस की धारा 67 के तहत अलग अपराध का प्रावधान है।

Marital Rape Exception IPC क्या है?

आईपीसी की धारा 375 के अपवाद-2 में 18 साल से अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को रेप की श्रेणी से बाहर रखा गया था। आईपीसी की जगह बीएनएस लागू होने के बाद यही व्यवस्था धारा 63 में बनी हुई है।

Marital Rape Exception BNS में क्या provision है?

बीएनएस की धारा 63 के अपवाद-2 के अनुसार 18 साल से कम उम्र की नहीं होने वाली पत्नी के साथ पति का यौन संबंध या यौन कृत्य रेप नहीं माना जाता।

Section 375 Marital Rape exception को लेकर Supreme Court क्या तय करेगा?

सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि मैरिटल रेप एक्सेप्शन संवैधानिक है या नहीं। साथ ही यह भी तय करना होगा कि अगर एक्सेप्शन बना रहता है तो क्या किसी मामले में पति के खिलाफ रेप का अभियोजन फिर भी चलाया जा सकता है। कोर्ट ने इन दोनों सवालों पर अंतिम सुनवाई करने की बात कही है।

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