Bheem Space House Concept: चांद-मंगल पर बनेंगे इंसानों के घर, जानिए शुभांशु शुक्ला का BHEEM प्लान कैसे करेगा काम?
शुभांशु शुक्ला और IISc के शोधकर्ताओं ने BHEEM स्पेस हैबिटैट कॉन्सेप्ट तैयार किया है। इसमें पैनल्स को रॉकेट से Moon या Mars तक ले जाकर जोड़ा जाएगा। मॉड्यूलर डिजाइन से भविष्य में इंसानों के रहने, रिसर्च और खेती के लिए स्पेस बेस विकसित किया जा सकेगा।
Bheem Space House Concept: भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने धरती के बाहर इंसानों के रहने के लिए एक खास स्पेस हाउसिंग कॉन्सेप्ट BHEEM साझा किया है। इसका पूरा नाम Bhartiya Extraterrestrial Expandable Modular Habitat है। यह कॉन्सेप्ट शुभांशु शुक्ला और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं की रिसर्च से सामने आया है। इसका मकसद ऐसा मॉड्यूलर स्पेस हैबिटैट तैयार करना है, जिसे कॉम्पैक्ट रूप में रॉकेट से Moon या Mars तक पहुंचाया जा सके और वहां जोड़कर इंसानों के रहने की जगह बनाई जा सके।
शुभांशु शुक्ला ने 1 सितंबर 2026 को इस रिसर्च के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि उनके लिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि इंसान अंतरिक्ष तक कैसे पहुंचेगा, बल्कि यह भी था कि दूसरी दुनिया पर पहुंचने के बाद वह रहेगा कहां? यही सोच आगे चलकर BHEEM स्पेस हाउस कॉन्सेप्ट की दिशा में गई।
रूस से लौटने के बाद शुरू हुई थी रिसर्च
शुभांशु शुक्ला और दूसरे भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों के रूस में ट्रेनिंग पूरी करने के बाद भारत लौटने पर उनके प्रशिक्षण का अगला चरण शुरू हुआ। इसमें भारत के लॉन्च व्हीकल और ऑर्बिटल मॉड्यूल के सिस्टम को समझने के साथ फिजिकल कंडीशनिंग और स्पेसफ्लाइट ट्रेनिंग शामिल थी।
इस दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों से जुड़े अकादमिक रिसर्च पर भी काम करने का मौका दिया गया। शुभांशु शुक्ला ने इसी दौरान अपना ध्यान एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल हैबिटैट, यानी धरती के बाहर इंसानों के रहने की जगह पर लगाया। उनका सवाल था कि अगर भविष्य में इंसान Moon, Mars या किसी दूसरे खगोलीय पिंड पर पहुंचे तो उसके रहने और काम करने के लिए किस तरह की संरचना चाहिए।
इस रिसर्च से जुड़ा पेपर मृतुंजय बरुआह, अमोघ जाधव, बिमलेंदु महापात्र और शुभांशु शुक्ला ने तैयार किया है। यह काम IISc के प्रोफेसर अलोक कुमार की लैब से जुड़ा है। रिसर्च में BHEEM को एक मॉड्यूलर, पैनल-बेस्ड हैबिटैट के रूप में प्रस्तावित किया गया है।

BHEEM में खास क्या है, जो इसे दूसरे स्पेस हैबिटैट से अलग बनाता है?
BHEEM का सबसे अहम विचार है कि पूरा घर एक बड़े, तैयार मॉड्यूल के रूप में रॉकेट में ले जाने के बजाय उसे छोटे-छोटे पैनल्स में तैयार किया जाए। लॉन्च के समय इन पैनल्स को एक साथ स्टैक करके कम जगह में रखा जा सकता है। दूसरी दुनिया पर पहुंचने के बाद इन्हें जोड़कर अलग-अलग प्रेशराइज्ड रहने की जगह बनाई जा सकती है।रिसर्च में अलग-अलग ज्योमेट्रिक शेप वाले पैनल्स, जैसे ट्रायंगल, स्क्वायर और पेंटागन, की संभावनाओं का अध्ययन किया गया। इनके आधार पर ऐसी संरचनाएं चुनी गईं जिनमें पर्याप्त जगह के साथ बेहतर स्ट्रक्चरल मजबूती मिल सके। डिजाइन की मजबूती को न्यूमेरिकल और एनालिटिकल तरीकों से जांचा गया।
इसका फायदा यह है कि किसी मिशन की जरूरत के हिसाब से हैबिटैट का आकार बदला जा सकता है। शुरुआत में कुछ मॉड्यूल भेजे जा सकते हैं और बाद में नए मॉड्यूल जोड़कर रहने की जगह बढ़ाई जा सकती है। यानी फ्यूचर स्पेस हाउस एक बार बनकर खत्म होने वाली संरचना के बजाय धीरे-धीरे विकसित होने वाले सिस्टम की तरह काम कर सकते हैं। इसका फायदा यह है कि किसी मिशन की जरूरत के हिसाब से हैबिटैट का आकार बदला जा सकता है। शुरुआत में कुछ मॉड्यूल भेजे जा सकते हैं और बाद में नए मॉड्यूल जोड़कर रहने की जगह बढ़ाई जा सकती है। यानी फ्यूचर स्पेस हाउस एक बार बनकर खत्म होने वाली संरचना के बजाय धीरे-धीरे विकसित होने वाले सिस्टम की तरह काम कर सकते हैं।
Starship में पैक होकर Moon या Mars तक पहुंच सकता है B.H.E.E.M.
B.H.E.E.M. की डिजाइन में सबसे बड़ी चुनौती स्पेस ट्रांसपोर्टेशन को ध्यान में रखा गया है। रिसर्च में इसे ऐसे डिजाइन किया गया है कि इसके पैनल्स को भविष्य के बड़े रॉकेट SpaceX Starship के पेलोड वॉल्यूम में स्टैक किया जा सके।
रिसर्च के प्रस्तावित डिजाइन में कुल 422 पैनल्स की जरूरत बताई गई है। इनमें 312 स्क्वायर, 108 ट्रायएंगुलर और 2 पेंटागोनल पैनल शामिल हैं। इन पैनल्स का कुल स्टैक्ड वॉल्यूम करीब 700 घन मीटर बताया गया है, जबकि रिसर्च के अनुसार Starship के करीब 800 घन मीटर पेलोड वॉल्यूम में इन्हें समायोजित किया जा सकता है। हालांकि इसमें अन्य जरूरी सिस्टम और उपकरणों के लिए अतिरिक्त लॉन्च की जरूरत पड़ सकती है।
यानी B.H.E.E.M. का मूल विचार है कि लॉन्च के दौरान कम जगह घेरो और दूसरी दुनिया पर पहुंचने के बाद ज्यादा रहने की जगह तैयार करो।
रिसर्च के प्रस्तावित पूरे लेआउट का इस्तेमाल होने के बाद हैबिटैट का कुल वॉल्यूम करीब 2,130 घन मीटर हो सकता है। पेपर के अनुसार यह एक Starship पेलोड से बनाए जाने पर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) की तुलना में लगभग दोगुना वॉल्यूम उपलब्ध करा सकता है।
सिर्फ रहने का कमरा नहीं, लैब और ग्रीनहाउस भी
B.H.E.E.M. को केवल अंतरिक्ष यात्रियों के सोने या रहने की जगह के तौर पर नहीं सोचा गया है। इसके प्रस्तावित डिजाइन में हैबिटैट को अलग-अलग चरणों में विस्तार देने की कल्पना की गई है।
शुरुआत में एक बेस मॉड्यूल में कॉमन वर्क क्वार्टर, कंप्यूटर, रोबोटिक सिस्टम, टेली-ऑपरेशन की सुविधा, एयरलॉक और हाइजीन से जुड़े हिस्से हो सकते हैं। इसके बाद निजी क्रू क्वार्टर जोड़े जा सकते हैं, जिनमें सोने, खाना बनाने और खाने, एक्सरसाइज और मनोरंजन के लिए जगह होगी।
आगे चलकर स्टोरेज मॉड्यूल जोड़ा जा सकता है, जहां उपकरण और लंबे मिशन के लिए जरूरी राशन रखा जाएगा। प्रस्तावित अंतिम चरण में फिजिकल और बायोलॉजिकल साइंस के लिए लैब, नियंत्रित खेती के लिए ग्रीनहाउस और मेडिकल डायग्नोसिस, ट्रीटमेंट तथा सर्जरी के लिए अलग मॉड्यूल जोड़े जाने की कल्पना की गई है।
इस तरह भारत का यह स्पेस हैबिटैट कॉन्सेप्ट सिर्फ रहने की जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संभावित मानव मिशन के लिए एक छोटे बेस या सेटलमेंट की दिशा दिखाता है।
मॉड्यूल खराब हो जाए तो पूरा हैबिटैट बंद नहीं होगा
B.H.E.E.M. की मॉड्यूलर डिजाइन का एक और फायदा सुरक्षा और मेंटेनेंस से जुड़ा है। अगर किसी एक मॉड्यूल या हिस्से में खराबी आती है तो पूरे हैबिटैट के फेल होने का जोखिम कम किया जा सकता है।
अलग-अलग मॉड्यूल स्वतंत्र रूप से काम कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बाद के मिशनों के साथ नए हिस्से जोड़े जा सकते हैं। रिसर्च में यह भी बताया गया है कि आग या एयर लीकेज जैसी आपात स्थिति में अलग-अलग मॉड्यूल और बैकअप व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। पैनल-बेस्ड डिजाइन के कारण रिपेयर और मेंटेनेंस भी अपेक्षाकृत आसान रखने का लक्ष्य है।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि B.H.E.E.M. अभी ऑपरेशनल स्पेस हाउस नहीं, बल्कि एक रिसर्च और डिजाइन कॉन्सेप्ट है। इसे वास्तविक Moon या Mars मिशन में इस्तेमाल करने से पहले मटेरियल, सीलिंग, लाइफ सपोर्ट, रेडिएशन प्रोटेक्शन, तापमान नियंत्रण और वास्तविक परिस्थितियों में टेस्टिंग जैसी कई चुनौतियां हल करनी होंगी।
इंसान धरती के बाहर कब तक रह सकेगा?
यही B.H.E.E.M. स्पेस हैबिटैट के पीछे सबसे बड़ा सवाल है। Moon और Mars का वातावरण इंसानों के लिए धरती जैसा नहीं है। रेडिएशन, अत्यधिक तापमान, कम या अनुपयुक्त वायुमंडलीय परिस्थितियां, ऊर्जा की जरूरत, पानी और भोजन की व्यवस्था तथा लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट चलाना बड़ी चुनौतियां होंगी।
इसलिए ह्यूमन हैबिटेशन यानी इंसानों के धरती के बाहर रहने की तैयारी केवल रॉकेट बनाने तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें वहां सुरक्षित रखने के लिए रहने की जगह, ऊर्जा, लाइफ सपोर्ट और निर्माण की तकनीक भी पहले से विकसित करनी होगी।
शुभांशु शुक्ला ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा कि अगर हम चाहते हैं कि आज से 20 साल बाद इंसान धरती के बाहर रहें, तो उस काम की शुरुआत 20 साल बाद नहीं हो सकती। इसकी तैयारी आज से ही करनी होगी।
शुभांशु शुक्ला के लिए यह रिसर्च क्यों अहम है?
शुभांशु शुक्ला भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री हैं जो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) तक पहुंचे। उन्होंने 2025 में Axiom-4 मिशन के पायलट के रूप में ISS की यात्रा की थी और वहां भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों से जुड़े माइक्रोग्रैविटी प्रयोग भी किए। ISRO के अनुसार यह मिशन भारत के भविष्य के ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम और Gaganyaan कार्यक्रम की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण रहा।
B.H.E.E.M. रिसर्च इस अनुभव से आगे की एक बड़ी सोच को दिखाती है। अभी तक अंतरिक्ष कार्यक्रमों का बड़ा ध्यान इंसानों को पृथ्वी से अंतरिक्ष तक पहुंचाने और सुरक्षित वापस लाने पर रहा है। लेकिन भविष्य में सवाल यह होगा कि इंसान किसी दूसरे ग्रह या चंद्रमा पर पहुंचने के बाद वहां लंबे समय तक कैसे रह सकता है।
भारत के ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम में Gaganyaan एक अहम आधार है। इसके बाद मानव अंतरिक्ष अभियानों की क्षमता बढ़ने के साथ Moon और उससे आगे की खोज को लेकर भी संभावनाएं खुल सकती हैं। ऐसे में भारत में स्पेस आर्किटेक्चर से जुड़ी शुरुआती रिसर्च भविष्य के मिशनों के लिए आधार तैयार कर सकती है।
शुभांशु शुक्ला के शब्दों में, किसी दूसरी दुनिया पर हैबिटैट बनाने का पहला कदम शायद वहां पहली ईंट रखना नहीं, बल्कि यह कल्पना करने की हिम्मत करना हो सकता है कि वह घर आखिर दिखेगा कैसा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Shubhanshu Shukla ने B.H.E.E.M. Space House Concept क्या पेश किया है?
B.H.E.E.M. यानी Bhartiya Extraterrestrial Expandable Modular Habitat एक मॉड्यूलर स्पेस हैबिटैट का कॉन्सेप्ट है। इसमें छोटे पैनल्स को रॉकेट से दूसरी दुनिया तक ले जाकर वहां जोड़कर इंसानों के रहने की जगह बनाने का प्रस्ताव है।
B.H.E.E.M. Concept का उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य Moon और Mars जैसे स्थानों पर लंबे समय तक इंसानों के रहने के लिए ऐसी संरचना की कल्पना करना है, जिसे कॉम्पैक्ट तरीके से लॉन्च किया जा सके और वहां जरूरत के अनुसार विस्तार दिया जा सके।
B.H.E.E.M. Space House में लोग कैसे रह सकते हैं?
प्रस्तावित डिजाइन में रहने, सोने, खाना बनाने, एक्सरसाइज, काम, स्टोरेज, रिसर्च और मेडिकल सुविधाओं के लिए अलग-अलग मॉड्यूल जोड़े जा सकते हैं। आगे चलकर ग्रीनहाउस भी इसमें शामिल किया जा सकता है।
Shubhanshu Shukla कौन हैं?
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला भारतीय अंतरिक्ष यात्री और ISRO के Gaganyatri हैं। वे 2025 के Axiom-4 मिशन के पायलट के रूप में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन जाने वाले पहले भारतीय बने।
Space Habitat क्या होता है?
Space Habitat ऐसी रहने और काम करने की संरचना होती है, जिसमें इंसानों को अंतरिक्ष या किसी दूसरे खगोलीय पिंड पर सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जाता है। इसमें प्रेशर, लाइफ सपोर्ट, ऊर्जा और अन्य जरूरी सुविधाएं शामिल होती हैं।
पृथ्वी के बाहर Houses बनाने की जरूरत क्यों पड़ सकती है?
अगर भविष्य में इंसान Moon या Mars पर लंबे समय तक वैज्ञानिक या अन्य मिशन चलाते हैं, तो उन्हें रहने, काम करने और सुरक्षित रहने के लिए पृथ्वी से अलग स्थायी या अर्ध-स्थायी Habitat की जरूरत होगी।
B.H.E.E.M. Concept में Space Housing को लेकर क्या खास है?
इसकी सबसे बड़ी खासियत मॉड्यूलर और पैनल-बेस्ड डिजाइन है। इसे लॉन्च के दौरान कॉम्पैक्ट रखा जा सकता है और दूसरी दुनिया पर पहुंचने के बाद बड़े रहने वाले क्षेत्र में बदला जा सकता है। रिसर्च में अलग-अलग मॉड्यूल को बाद में जोड़ने की भी संभावना रखी गई है।
क्या B.H.E.E.M. Concept Moon या Mars पर इस्तेमाल किया जा सकता है?
B.H.E.E.M. को खास तौर पर Moon और Mars जैसे एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल वातावरण में लंबे समय तक मानव निवास की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रस्तावित किया गया है। लेकिन अभी यह एक रिसर्च कॉन्सेप्ट है। वास्तविक मिशन में इस्तेमाल से पहले इसकी तकनीक और सुरक्षा की व्यापक टेस्टिंग जरूरी होगी।