Mizoram UCC Demand : मिजोरम में UCC की मांग, मिजो महिलाओं की कानूनी सुरक्षा पर क्या हैं मायने?
मिजोरम के BJP विधायक K. ह्राह्मो ने गैर-आदिवासी पुरुषों से शादी करने वाली मिजो महिलाओं की कानूनी सुरक्षा के लिए UCC पर विचार की मांग की है। हालांकि, राज्य में UCC लागू करने का कोई फैसला नहीं हुआ है और अनुच्छेद 371G महत्वपूर्ण है।
Mizoram UCC Demand : मिजोरम में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की मांग उठी है। BJP विधायक के. ह्राह्मो ने कहा है कि राज्य में गैर-आदिवासी लोगों की मौजूदगी और गैर-आदिवासी पुरुषों से शादी करने वाली मिजो महिलाओं से जुड़े मामलों को देखते हुए UCC की जरूरत पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उनका कहना है कि UCC में एक पत्नी की व्यवस्था और तलाक के बाद संपत्ति के बंटवारे जैसे प्रावधान हैं, जो ऐसी शादियों में महिलाओं और उनके बच्चों को कानूनी सुरक्षा देने में मदद कर सकते हैं। ह्राह्मो ने यह बात 21 सितंबर को आइजोल स्थित BJP के राज्य कार्यालय में आयोजित एक राजनीतिक सत्र में कही। हालांकि, यह फिलहाल एक विधायक की मांग है, मिजोरम सरकार की ओर से UCC लागू करने का फैसला नहीं।
मिजो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ह्राह्मो ने उठाया मुद्दा
सियाहा जिले की पलक विधानसभा सीट से BJP विधायक के. ह्राह्मो ने कहा कि मिजोरम में गैर-आदिवासी लोगों की मौजूदगी को देखते हुए UCC लागू करने के सवाल की अलग से जांच की जानी चाहिए। उन्होंने खासतौर पर गैर-आदिवासी पुरुषों और मिजो महिलाओं के बीच होने वाली शादियों का मुद्दा उठाया।ह्राह्मो ने आरोप लगाया कि कुछ गैर-आदिवासी पुरुष पहले से शादीशुदा होने के बावजूद मिजो महिलाओं से शादी करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ मामलों में ऐसे पुरुष अपनी मिजो पत्नियों को कारोबार में शामिल करते हैं, लेकिन कारोबार में असफलता के बाद पत्नी और बच्चों को छोड़ देते हैं। ये आरोप विधायक के बयान पर आधारित हैं और इनके समर्थन में किसी स्वतंत्र आंकड़े या आधिकारिक रिपोर्ट का हवाला नहीं दिया गया है।
ह्राह्मो का तर्क है कि UCC में मोनोगैमी यानी एक पत्नी की व्यवस्था और तलाक की स्थिति में संपत्ति के बंटवारे से जुड़े प्रावधान हैं। उनके मुताबिक, ऐसे नियम मिजो महिलाओं के लिए अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा उपलब्ध करा सकते हैं, खासकर उन मामलों में जहां पति पत्नी और बच्चों को छोड़ देता है।

Article 371G की वजह से मिजोरम में मामला अलग
मिजोरम में UCC की चर्चा सामान्य राज्यों से अलग इसलिए है क्योंकि राज्य को संविधान के अनुच्छेद 371G के तहत विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है। इसके तहत संसद का कोई कानून मिजो लोगों की धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, मिजो कस्टमरी लॉ और प्रक्रिया, मिजो कस्टमरी लॉ के आधार पर सिविल और क्रिमिनल जस्टिस तथा जमीन के स्वामित्व और हस्तांतरण से जुड़े मामलों में अपने आप लागू नहीं होता। इसके लिए मिजोरम विधानसभा की सहमति जरूरी है।यही वजह है कि मिजोरम में UCC लागू करने का सवाल सिर्फ समान नागरिक कानून बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मिजो कस्टमरी लॉ और संवैधानिक संरक्षण के साथ उसके तालमेल का भी सवाल होगा। मिजोरम विधानसभा की आधिकारिक जानकारी में भी अनुच्छेद 371G के तहत इन विशेष प्रावधानों का उल्लेख है।
ह्राह्मो ने खुद कहा कि आदिवासी समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था कई जगह मौजूद है। उनका तर्क है कि अगर आदिवासी समुदायों को इससे बाहर रखा जाता है, तो मिजोरम में गैर-आदिवासी आबादी और गैर-आदिवासी पुरुषों से मिजो महिलाओं की शादियों से जुड़े मामलों को ध्यान में रखते हुए इस कानून की जरूरत का अध्ययन किया जा सकता है।
हालांकि, यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि UCC के मौजूदा राज्य मॉडल में आदिवासी समुदायों को बाहर रखने की व्यवस्था है, लेकिन इससे यह अपने आप तय नहीं हो जाता कि मिजोरम में भी वही मॉडल लागू होगा। मिजोरम के लिए किसी भी प्रस्तावित कानून को राज्य की संवैधानिक और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से देखना होगा।
UCC को लेकर कांग्रेस पर लगाया राजनीतिक विरोध का आरोप
BJP विधायक ने UCC के विरोध को लेकर कांग्रेस पर भी निशाना साधा। ह्राह्मो ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने राजनीतिक फायदे के लिए UCC को खतरनाक कानून के तौर पर पेश किया, जिससे लोगों में इसके प्रावधानों को पूरी तरह समझे बिना आशंका पैदा हुई।उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कुछ कानूनों का शुरुआत में विरोध हुआ, लेकिन बाद में लोगों ने उनके फायदे समझे। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि UCC पर भी राजनीतिक विरोध के बजाय उसके वास्तविक प्रावधानों और मिजोरम की परिस्थितियों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
ह्राह्मो ने आदिवासी बहुल राज्यों में UCC की जरूरत पर विस्तृत अध्ययन कराने की मांग की। उनका कहना है कि मिजोरम में इसका मूल्यांकन खास तौर पर मिजो महिलाओं के अधिकारों और गैर-आदिवासी पुरुषों से होने वाली शादियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

देश में UCC की स्थिति क्या है?
यूनिफॉर्म सिविल कोड का उद्देश्य शादी, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े कुछ नागरिक मामलों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है।अभी उत्तराखंड देश का पहला और एकमात्र राज्य है जहां UCC लागू हो चुका है। उत्तराखंड में UCC जनवरी 2025 में लागू हुआ और इसके तहत शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों के लिए नियम बनाए गए हैं।
2026 में UCC का दायरा बढ़ाने की प्रक्रिया कई राज्यों में आगे बढ़ी है। असम, गुजरात और मध्य प्रदेश की विधानसभाएं UCC से जुड़े विधेयक पारित कर चुकी हैं, लेकिन सितंबर 2026 तक इन तीनों विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली है। इसलिए इन्हें अभी लागू UCC वाले राज्य नहीं कहा जा सकता।
मध्य प्रदेश विधानसभा ने जुलाई 2026 में UCC विधेयक पारित किया था। इसमें शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान हैं और अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। असम के UCC विधेयक में भी अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा गया है।
इसके अलावा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में UCC के लिए समितियां गठित की गई हैं। पश्चिम बंगाल में भी प्रस्तावित UCC बिल की समीक्षा के लिए समिति बनाई गई है। यानी इन राज्यों में प्रक्रिया अभी कानून लागू होने के स्तर तक नहीं पहुंची है।
केंद्र के स्तर पर गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 तक NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य बताया है। मौजूदा रिपोर्टों में NDA शासित राज्यों की संख्या 21 बताई गई है, इसलिए 22 राज्यों का आंकड़ा इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
केरल में UCC का विरोध भी सामने आया
UCC को लेकर देश में सिर्फ समर्थन की आवाजें नहीं हैं। केरल की प्रमुख मुस्लिम धार्मिक संस्था समस्त केरल जेम-इयातुल उलमा पहले भी इसके विरोध में अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है।संस्था के अध्यक्ष मुहम्मद जिफ्री मुथुकोया थंगल ने 2023 में कहा था कि UCC का असर केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं होगा और ईसाई, बौद्ध तथा जैन समुदायों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि मुस्लिम समुदाय में शादी, तलाक और विरासत जैसे विषय धार्मिक नियमों से जुड़े हैं और इन्हें बदलना स्वीकार्य नहीं होगा।
इस तरह UCC को लेकर मौजूदा बहस में दो अलग-अलग सवाल सामने आते हैं। एक तरफ समर्थक इसे समान नागरिक अधिकार, महिलाओं की कानूनी सुरक्षा और व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता से जोड़ते हैं, जबकि विरोध करने वाले पक्ष धार्मिक और सामुदायिक कस्टमरी लॉ तथा व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हैं।
मिजोरम में K. Hrahmo की मांग इसी बहस को एक अलग संदर्भ देती है। यहां मुद्दा केवल धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों का नहीं, बल्कि अनुच्छेद 371G के तहत मिजो कस्टमरी लॉ की संवैधानिक सुरक्षा, आदिवासी समुदायों की स्थिति और गैर-आदिवासी पुरुषों से शादी करने वाली मिजो महिलाओं के अधिकारों का भी है। इसलिए फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि मिजोरम में UCC लागू नहीं हुआ है और न ही राज्य सरकार ने इसे लागू करने की घोषणा की है; अभी मामला BJP विधायक की मांग और इसके विस्तृत अध्ययन की अपील तक सीमित है।

FAQ (Frequently Asked Questions):
मिजोरम में UCC लागू करने की मांग किसने की है?
मिजोरम की पलक विधानसभा सीट से BJP विधायक K. Hrahmo ने राज्य में UCC की जरूरत पर विचार करने की मांग की है।
BJP MLA K. Hrahmo ने Mizoram UCC को लेकर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि गैर-आदिवासी पुरुषों से शादी करने वाली मिजो महिलाओं और उनके बच्चों को कुछ मामलों में कानूनी सुरक्षा की जरूरत हो सकती है। उनके मुताबिक UCC में एक पत्नी की व्यवस्था और तलाक के बाद संपत्ति के बंटवारे से जुड़े प्रावधान ऐसे मामलों में मदद कर सकते हैं।
Mizoram में UCC की demand क्यों उठी है?
ह्राह्मो ने गैर-आदिवासी पुरुषों और मिजो महिलाओं के बीच होने वाली शादियों से जुड़े कथित मामलों को इसका आधार बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पुरुष पत्नी और बच्चों को छोड़ देते हैं और कहा कि UCC ऐसे मामलों में महिलाओं को अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा दे सकता है।
क्या UCC Mizoram की tribal communities पर लागू होगा?
अभी ऐसा कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ह्राह्मो ने कहा है कि आदिवासी समुदायों को UCC से बाहर रखने की व्यवस्था कई राज्यों में है। मिजोरम में किसी भी कानून को लागू करने से पहले राज्य की आदिवासी आबादी और कस्टमरी लॉ की स्थिति पर विचार करना होगा।
Article 371G का Mizoram UCC से क्या connection है?
अनुच्छेद 371G मिजो लोगों की धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं, मिजो कस्टमरी लॉ, उसके आधार पर न्याय व्यवस्था और जमीन के स्वामित्व-हस्तांतरण को विशेष संवैधानिक सुरक्षा देता है। संसद का कानून इन विषयों पर मिजोरम में अपने आप लागू नहीं होता, जब तक विधानसभा इसके लिए प्रस्ताव पारित न करे। इसलिए मिजोरम में UCC की कोई भी प्रक्रिया अनुच्छेद 371G के प्रभाव को ध्यान में रखकर आगे बढ़ानी होगी।