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India Azerbaijan Relations : अजरबैजान के राष्ट्रपति से मिले जयशंकर, क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदलेंगे भारत-अजरबैजान के रिश्ते?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 अक्टूबर 2026 को बाकू में अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेयहुन बैरामोव से मुलाकात की। ऑपरेशन सिंदूर के बाद आए तनाव के बीच दोनों देशों ने व्यापार, ऊर्जा, निवेश और 7,200 किलोमीटर लंबे नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।

India Azerbaijan Relations : अजरबैजान के राष्ट्रपति से मिले जयशंकर, क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदलेंगे भारत-अजरबैजान के रिश्ते?

India Azerbaijan Relations : भारत और अज़रबैजान के बीच रिश्तों को सुधारने की कोशिश तेज होती दिख रही है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 अक्टूबर 2026 को अज़रबैजान की राजधानी बाकू में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाकात की। बातचीत में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, पर्यटन और परिवहन संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया गया। यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अज़रबैजान ने पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताया था, जबकि भारत के आर्मेनिया के साथ रक्षा संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया और भारतीय पर्यटकों के बीच अज़रबैजान के बहिष्कार की अपील भी हुई। अब दोनों पक्ष आर्थिक हितों और क्षेत्रीय सहयोग को ध्यान में रखते हुए संबंधों को फिर पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

जयशंकर की यात्रा से रिश्ते सुधारने की कोशिश

जयशंकर ने राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने की साझा कोशिश में अलीयेव का सकारात्मक रुख महत्वपूर्ण है। इसके बाद अज़रबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव के साथ हुई बैठक में द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की गई।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 अक्टूबर 2026 को अज़रबैजान की राजधानी बाकू में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाकात की।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 अक्टूबर 2026 को अज़रबैजान की राजधानी बाकू में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाकात की।

जयशंकर ने बातचीत को उपयोगी बताते हुए कहा कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं और व्यापार तथा निवेश बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं हैं। दोनों पक्षों ने तेल और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग जारी रखने के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी आर्थिक साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा की। जयशंकर ने बायरामोव को भारत आने का निमंत्रण भी दिया। दोनों देशों ने व्यापार और अन्य सहयोग क्षेत्रों में प्रतिनिधिमंडलों के आदान-प्रदान पर सहमति जताई।यह आठ साल बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री की अज़रबैजान की पहली अलग द्विपक्षीय यात्रा थी। इससे पहले सितंबर 2026 में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति अलीयेव की मुलाकात हुई थी। जयशंकर ने अपनी यात्रा को उसी बातचीत को आगे बढ़ाने वाला कदम बताया।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों बिगड़े भारत-अज़रबैजान के संबंध

भारत और अज़रबैजान के बीच तनाव की प्रमुख वजह दोनों देशों की क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताएं रही हैं। मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया।इस दौरान अज़रबैजान ने पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताया और भारतीय सैन्य कार्रवाई पर आपत्ति व्यक्त की। अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के लोगों के प्रति एकजुटता दिखाई, मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। उसने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील भी की। भारत में इस रुख को पाकिस्तान के पक्ष में झुकाव के तौर पर देखा गया।
तुर्किये ने भी पाकिस्तान का समर्थन किया और भारत की कार्रवाई की आलोचना की। उसने ऑपरेशन सिंदूर को पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन बताया और कहा कि इससे बड़े युद्ध का खतरा बढ़ सकता है। इस संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की ओर से तुर्किये में बने सोंगर ड्रोन के इस्तेमाल की खबरें भी सामने आई थीं।
इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर भारत में तुर्किये और अज़रबैजान की यात्रा का बहिष्कार करने की अपील तेज हो गई। कई भारतीय ट्रैवल कंपनियों ने भी अपने कदम बदले। ईजमायट्रिप ने यात्रियों को सलाह दी कि वे बहुत जरूरी होने पर ही इन देशों की यात्रा करें। इक्सिगो ने तुर्किये, चीन और अज़रबैजान के लिए फ्लाइट तथा होटल बुकिंग रोकने की घोषणा की थी, जबकि ट्रैवोमिंट ने कथित तौर पर दोनों देशों के ट्रैवल पैकेज रोक दिए थे।
उस समय एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, मेकमायट्रिप ने एक सप्ताह में तुर्किये और अज़रबैजान की बुकिंग में 60 प्रतिशत गिरावट और कैंसिलेशन में 250 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की थी। ये आंकड़े उस समय की रिपोर्टों से जुड़े हैं, इन्हें मौजूदा बुकिंग का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

भारतीय पर्यटकों से अज़रबैजान को भी हुआ नुकसान

अज़रबैजान ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय पर्यटकों के बीच लोकप्रियता हासिल की थी। वहां आधुनिक शहरों, ऐतिहासिक इमारतों और कैस्पियन सागर के किनारे बसे पर्यटन स्थलों के कारण भारतीय यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2014 में करीब 4,853 भारतीय अज़रबैजान पहुंचे थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर लगभग 2.44 लाख हो गई।2023 में करीब 1.17 लाख भारतीय पर्यटक अज़रबैजान पहुंचे थे, जो वहां आने वाले कुल पर्यटकों के छह प्रतिशत से कम थे। 2024 में भारतीयों की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत तक पहुंच गई। बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से अप्रैल 2025 के बीच 80 हजार से अधिक भारतीय अज़रबैजान गए थे। उस अवधि में यह संख्या वहां आने वाले कुल पर्यटकों की लगभग 11 प्रतिशत थी।
अज़रबैजान के पर्यटन बोर्ड के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया था कि एक भारतीय पर्यटक औसतन एक यात्रा पर करीब 1 लाख से 1.3 लाख रुपये खर्च करता है। इस हिसाब से भारतीय पर्यटकों की संख्या में बड़ी गिरावट का असर होटल, परिवहन, पर्यटन सेवाओं और स्थानीय कारोबार पर पड़ सकता था। हालांकि, बहिष्कार की अपील के बाद अज़रबैजान की अर्थव्यवस्था को कुल कितना नुकसान हुआ, इसका कोई एक आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

पाकिस्तान से करीबी और आर्मेनिया के साथ भारत के रक्षा संबंध

भारत-अज़रबैजान संबंधों में तनाव की एक और वजह आर्मेनिया के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी है। आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र को लेकर लंबे समय तक संघर्ष और विवाद रहे हैं। भारत ने इस दौरान आर्मेनिया के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया और उसे कई तरह के सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए।इनमें पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, स्वाति वेपन-लोकेटिंग रडार, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, तोपें और गोला-बारूद जैसे उपकरण शामिल हैं। आर्मेनिया भारत की स्वदेशी एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) का पहला विदेशी ग्राहक भी बना। उसने भारत-फ्रांस सहयोग से बनी ट्रेजन 155 एमएम तोपें भी खरीदी हैं। एंटी-टैंक हथियारों और दूसरे सैन्य उपकरणों की आपूर्ति भी भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग का हिस्सा रही है। हालांकि, अलग-अलग प्रणालियों की डिलीवरी और आपूर्ति की स्थिति एक जैसी नहीं है, इसलिए सभी उपकरणों को एक ही समय पर पूरी तरह तैनात मानना सही नहीं होगा।
अज़रबैजान ने भारत के आर्मेनिया के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग पर आपत्ति जताई है।

दूसरी ओर, पाकिस्तान और अज़रबैजान के बीच राजनीतिक, रक्षा और कूटनीतिक संबंध मजबूत रहे हैं। दोनों देश नागोर्नो-काराबाख विवाद में एक-दूसरे के रुख का समर्थन करते रहे हैं। पाकिस्तान ने अज़रबैजान की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया, जबकि अज़रबैजान ने जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का साथ दिया और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के मंचों पर भी भारत के खिलाफ पाकिस्तानी पक्ष के समर्थन में बयान दिए।

रक्षा क्षेत्र में अज़रबैजान ने पाकिस्तान और चीन के संयुक्त उत्पादन वाले JF-17 ब्लॉक-III लड़ाकू विमानों की खरीद का समझौता भी किया है। इसके अलावा, पाकिस्तान, तुर्किये और अज़रबैजान की सेनाएं ‘थ्री ब्रदर्स’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास करती रही हैं। इससे तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को बढ़ावा मिला है।पाकिस्तान और आर्मेनिया के संबंधों में भी बदलाव आया है। 31 अगस्त 2025 को शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने राजनयिक संबंध स्थापित करने की दिशा में औपचारिक कदम उठाया। इससे पहले पाकिस्तान आर्मेनिया को मान्यता न देने वाला एकमात्र देश था। यह बदलाव बताता है कि दक्षिण काकेशस क्षेत्र में पुराने समीकरण स्थायी नहीं हैं और देश अपने हितों के अनुसार संबंधों को नया रूप दे रहे हैं।

SCO की सदस्यता को लेकर भी हुआ था विवाद

सितंबर 2025 में अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने आरोप लगाया था कि भारत ने अज़रबैजान को शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनने से रोकने में भूमिका निभाई। अज़रबैजान में यह धारणा बनी कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने के कारण भारत ने ऐसा किया।भारत ने इस आरोप को स्वीकार नहीं किया था। भारतीय पक्ष के मुताबिक, उस शिखर सम्मेलन में समय की कमी के कारण अज़रबैजान और आर्मेनिया की सदस्यता के मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने जानबूझकर अज़रबैजान की सदस्यता रोक दी थी। हालांकि, इस विवाद ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ाया।

अप्रैल 2026 से शुरू हुई रिश्ते सुधारने की प्रक्रिया

जयशंकर की यात्रा से पहले भी दोनों देशों ने बातचीत के जरिए मतभेद कम करने की कोशिश की थी। 3 अप्रैल 2026 को भारत के विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने बाकू में अज़रबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाकात की। इसी दौरान भारत-अज़रबैजान विदेश कार्यालय परामर्श का छठा दौर आयोजित हुआ। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सिबी जॉर्ज और अज़रबैजान की ओर से उप विदेश मंत्री एलनूर मम्मादोव ने किया।बैठक में व्यापार, तकनीक, पर्यटन, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा, संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर चर्चा हुई। सीमा पार आतंकवाद से निपटने और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे भी बातचीत में शामिल रहे। दोनों पक्षों ने अगली वार्ता नई दिल्ली में आयोजित करने पर सहमति जताई थी।
इसके बाद सितंबर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अलीयेव की SCO शिखर सम्मेलन के दौरान हुई मुलाकात ने बातचीत को आगे बढ़ाने का अवसर दिया। अक्टूबर में अज़रबैजान में आयोजित एशिया में संवाद और विश्वास-निर्माण उपायों पर सम्मेलन (CICA) के सातवें शिखर सम्मेलन में भारत की ओर से विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह भी शामिल हुए।
इसी अवधि में इजरायल से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों को लेकर भी अलग-अलग देशों के रुख चर्चा में रहे। संयुक्त राष्ट्र में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भाषण के दौरान कई देशों के प्रतिनिधियों ने बहिष्कार किया, जबकि अज़रबैजान के प्रतिनिधि मौजूद रहे। इस रुख की तुर्किये में आलोचना भी हुई। इन घटनाओं को भारत और अज़रबैजान के बीच बदलते राजनयिक माहौल के संदर्भ में देखा जा रहा है, हालांकि इन्हें दोनों देशों के संबंध सुधरने का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।

ईरान से भारतीयों की वापसी में अज़रबैजान की मदद

दोनों देशों के संबंधों में व्यावहारिक सहयोग का एक उदाहरण मार्च 2026 में देखने को मिला। पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने और ईरान के हवाई क्षेत्र में आवाजाही प्रभावित होने के बाद भारत ने वहां मौजूद अपने नागरिकों को निकालने के लिए वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल किया। इस दौरान अज़रबैजान ने ईरान से निकलने वाले भारतीय नागरिकों को अपने क्षेत्र से सुरक्षित गुजरने में मदद की।30 मार्च 2026 को अज़रबैजान स्थित भारतीय दूतावास ने इस सहयोग के लिए वहां के अधिकारियों का आभार जताया था। जयशंकर ने अपनी हालिया यात्रा में भी भारतीय नागरिकों, खासकर ईरान से निकाले गए छात्रों की मदद के लिए अज़रबैजान सरकार को धन्यवाद दिया। उन्होंने अज़रबैजान में रह रहे भारतीय छात्रों की देखभाल के लिए भी आभार जताया।
यह सहयोग दिखाता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय संकटों के दौरान दोनों देशों के बीच समन्वय की गुंजाइश बनी हुई है।

व्यापार और ऊर्जा में सहयोग बढ़ाने की गुंजाइश

भारत और अज़रबैजान के बीच व्यापार में कच्चे तेल की अहम भूमिका है। भारत के विदेश मंत्रालय के द्विपक्षीय विवरण के मुताबिक, 2025 में दोनों देशों का कुल व्यापार 40.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर रहा। इसमें भारत का निर्यात 22.6 करोड़ डॉलर और आयात 17.5 करोड़ डॉलर था। भारत के आयात में मुख्य रूप से कच्चा तेल शामिल है। 2022 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 1.88 अरब डॉलर बताया गया था, इसलिए हाल के वर्षों में व्यापार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की तुलना करते समय तेल की कीमतों और आयात की मात्रा में बदलाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।ऊर्जा क्षेत्र में भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) की अज़रबैजान में बड़ी हिस्सेदारी है। कंपनी ने वहां तेल और गैस क्षेत्रों तथा बाकू-त्बिलिसी-जेहान (BTC) तेल पाइपलाइन में 1.2 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। नवंबर 2024 में इक्विनोर से अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदने के बाद अज़ेरी-चिराग-गुनाशली तेल और गैस क्षेत्र में ओवीएल की हिस्सेदारी 2.925 प्रतिशत और बीटीसी पाइपलाइन में 3.097 प्रतिशत हो गई थी।
इसके बावजूद दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में विविधता की गुंजाइश है। कच्चे तेल पर निर्भरता के अलावा फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सेवाओं, विनिर्माण, खनन और तकनीक में सहयोग बढ़ाया जा सकता है। जयशंकर और बायरामोव की बैठक में व्यापार तथा निवेश के साथ इन क्षेत्रों में संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। अज़रबैजान के लिए भारत बड़ा बाजार है, जबकि भारत के लिए अज़रबैजान कैस्पियन क्षेत्र और यूरोप तक पहुंच बनाने में उपयोगी साझेदार हो सकता है।

INSTC से भारत को मिलेगा वैकल्पिक व्यापार मार्ग

भारत और अज़रबैजान के बीच बातचीत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) भी रहा। यह भारत, ईरान और रूस की पहल से शुरू हुआ बहु-माध्यमीय परिवहन नेटवर्क है। इसके लिए अंतर-सरकारी समझौते पर 12 सितंबर 2000 को हस्ताक्षर किए गए थे। इसका उद्देश्य समुद्री, सड़क और रेल मार्गों को जोड़कर भारत से रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक माल पहुंचाने के लिए वैकल्पिक रास्ता तैयार करना है।

इस गलियारे का पश्चिमी मार्ग अज़रबैजान से होकर गुजरता है। भारत से माल समुद्री रास्ते से ईरान पहुंच सकता है, फिर सड़क या रेल नेटवर्क के जरिए कैस्पियन सागर के बंदरगाहों तक और वहां से रूस की ओर भेजा जा सकता है। वास्तविक मार्ग माल, उपलब्ध परिवहन सुविधा और सीमा प्रक्रियाओं के अनुसार बदल सकता है। INSTC के जरिए भारत को पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना उत्तरी बाजारों तक पहुंचने का विकल्प मिलता है।भारत के लिए इस गलियारे का महत्व सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। इससे माल ढुलाई की लागत और समय घटाने की संभावना है, साथ ही ऊर्जा और औद्योगिक सामान की आपूर्ति के नए विकल्प खुल सकते हैं। हालांकि, रूस और ईरान पर लगे प्रतिबंध, वित्तीय लेन-देन की मुश्किलें, सीमा शुल्क की प्रक्रियाएं और परिवहन नेटवर्क में असमानता इसके संचालन को प्रभावित करती हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के तहत मध्य एशिया और काकेशस में बुनियादी ढांचे पर बढ़ते निवेश के बीच भारत के लिए अपने संपर्क मार्गों को प्रभावी बनाना भी महत्वपूर्ण है।
जयशंकर ने बैठक में कहा कि दोनों देश INSTC में शामिल हैं और इसके बेहतर संचालन के लिए आपसी समन्वय बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। हवाई संपर्क बढ़ाने और अज़रबैजान के पेशेवरों की भारत के तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (ITEC) में भागीदारी फिर शुरू करने तथा बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। अज़रबैजान के विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों का विस्तार पर्यटन, कारोबार और छात्रों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दे सकता है।

अतेशगाह मंदिर भारत-अज़रबैजान के पुराने संबंधों का प्रतीक

जयशंकर ने बाकू के पास स्थित ऐतिहासिक अतेशगाह अग्नि मंदिर का भी दौरा किया। इसकी तस्वीरें साझा करते हुए उन्होंने इसे भारत और अज़रबैजान के लोगों के बीच पुराने सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया। यह मंदिर अज़रबैजान के अबशेरोन प्रायद्वीप में सुराखानी के पास स्थित है। ‘अतेशगाह’ फारसी शब्द है, जिसका अर्थ ‘अग्नि का घर’ है। इस इलाके में प्राकृतिक गैस जमीन से निकलती थी, जिससे आग की लपटें उठती थीं और इस स्थान को धार्मिक महत्व मिला।

मंदिर परिसर की मौजूदा इमारतें मुख्य रूप से 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच बनीं। यहां पारसी अग्नि-पूजा परंपरा से जुड़े इतिहास के साथ भारतीय व्यापारियों और श्रद्धालुओं के संपर्क के प्रमाण भी मिलते हैं। मंदिर की दीवारों पर देवनागरी और गुरुमुखी लिपि में लिखे अभिलेख मौजूद हैं। भारतीय दूतावास के मुताबिक, यहां देवनागरी में 18 अभिलेख हैं, जिनमें से ज्यादातर की शुरुआत ‘ओम श्री गणेशाय नमः’ से होती है। देवी ज्वाला जी का उल्लेख भी एक दर्जन से अधिक बार मिलता है और छह अभिलेखों में स्वस्तिक चिह्न हैं।अज़रबैजान ने यूनेस्को को दिए दस्तावेजों में इस स्थल को मुल्तान के श्रद्धालुओं के तीर्थस्थल और दार्शनिक केंद्र के रूप में वर्णित किया है। मुल्तान आज पाकिस्तान में है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा रहा है। व्यापारियों और यात्रियों के जरिए कैस्पियन क्षेत्र तक संपर्क बना और मंदिर के निर्माण तथा रखरखाव में भारतीय समुदायों का योगदान माना जाता है।
यूनेस्को को दिए गए दस्तावेजों के अनुसार, आसपास पेट्रोलियम उद्योग के विस्तार के बाद 1883 में यहां पूजा बंद हो गई थी। 1975 में इसे संग्रहालय के रूप में खोला गया। आज यह स्थल भारत और अज़रबैजान के बीच पुराने व्यापारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संपर्क की याद दिलाता है।

अज़रबैजान के लिए भारत क्यों अहम है

अज़रबैजानी राजनीतिक विश्लेषक डॉ. वासिफ हुसेनोव के मुताबिक, दोनों देशों के संबंधों में नई गति आई है और आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि भारत अज़रबैजान के लिए बड़ा बाजार है, जबकि अज़रबैजान भारत को कैस्पियन क्षेत्र, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है। उन्होंने फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सेवाओं और खनन जैसे क्षेत्रों में भी संभावनाओं का उल्लेख किया है।अज़रबैजान में भारतीय कारोबार और ऊर्जा निवेश पहले से मौजूद हैं। ओवीएल की तेल और गैस क्षेत्र में हिस्सेदारी इसका उदाहरण है। दोनों देशों के बीच पर्यटन, शिक्षा और फिल्म निर्माण के जरिए भी संपर्क बढ़ा है। हुसेनोव के अनुसार, हाल के वर्षों में करीब 30 भारतीय फिल्मों की शूटिंग अज़रबैजान में हुई है और इस साल लगभग 500 भारतीय छात्रों के वहां पढ़ाई शुरू करने की संभावना है। ये आंकड़े उनके आकलन के तौर पर देखे जाने चाहिए।
भारत के लिए अज़रबैजान से संबंध सुधारने का एक और महत्व है। पाकिस्तान और तुर्किये के साथ अज़रबैजान के करीबी रिश्ते हैं, लेकिन भारत के अपने आर्थिक और रणनीतिक हित भी हैं। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह आर्मेनिया के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखते हुए अज़रबैजान के साथ व्यापार, ऊर्जा और परिवहन संपर्क के अवसरों को भी आगे बढ़ाए। दोनों देशों के बीच बेहतर संवाद क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद से निपटने जैसे मुद्दों पर भी सहयोग की संभावना खोल सकता है।

पाकिस्तान में बातचीत को लेकर नाराजगी

भारत और अज़रबैजान के बीच बढ़ते संपर्क पर पाकिस्तान में कुछ टिप्पणीकारों ने नाराजगी जताई है। पाकिस्तानी एक्सपर्ट अहमत खान ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि अज़रबैजान उन देशों को क्यों आमंत्रित कर रहा है, जिन्हें पाकिस्तान का विरोधी माना जाता है। उन्होंने भारत के साथ बातचीत को अज़रबैजान की विदेश नीति में बदलाव के तौर पर पेश किया और पाकिस्तान को अपने रक्षा हितों, खासकर JF-17 लड़ाकू विमानों से जुड़े मामलों में सावधान रहने की सलाह दी।

खान ने यह भी आरोप लगाया कि मुश्किल समय में पाकिस्तान के साथ खड़े होने वाले देशों की संख्या सीमित रही है। ये उनके व्यक्तिगत राजनीतिक विचार और आशंकाएं हैं; इन्हें किसी सरकार के आधिकारिक रुख या किसी प्रमाणित सुरक्षा घटना का निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।दूसरी ओर, अज़रबैजान के विदेश मंत्री बायरामोव ने जयशंकर के साथ बैठक के बाद कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कुछ मतभेदों ने द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहयोग की संभावनाओं को प्रभावित किया। उन्होंने बातचीत को खुला और रचनात्मक बताते हुए उम्मीद जताई कि इससे संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने का आधार बनेगा। जयशंकर ने भी कहा कि दोनों देश स्वतंत्र निर्णय लेने वाले देश हैं और अपने संबंधों को आगे बढ़ा सकते हैं।

भारत-अज़रबैजान संबंधों के आगे की राह

जयशंकर की यात्रा को दोनों देशों के बीच पूर्ण सामान्य स्थिति लौट आने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की करीबी, कश्मीर पर उसके पुराने बयान और आर्मेनिया के साथ भारत के रक्षा संबंध ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मतभेद बने रह सकते हैं। लेकिन हालिया बातचीत से यह स्पष्ट है कि दोनों देश इन मतभेदों के बावजूद व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और लोगों के बीच संपर्क को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं।भारत के लिए INSTC को प्रभावी बनाना, ऊर्जा निवेश सुरक्षित रखना और कच्चे तेल से आगे व्यापार का विस्तार करना महत्वपूर्ण होगा। अज़रबैजान के लिए भारत बड़ा बाजार, निवेशक और एशिया से संपर्क का संभावित साझेदार है। अब संबंधों में सुधार कितना टिकाऊ होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों सरकारें बातचीत को ठोस आर्थिक सहयोग और नियमित राजनयिक संपर्क में कितना बदल पाती हैं।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Operation Sindoor के बाद India और Azerbaijan के संबंधों में तनाव क्यों आया था?

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अज़रबैजान ने पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताया और भारत की सैन्य कार्रवाई पर आपत्ति व्यक्त की। दूसरी ओर, भारत ने आर्मेनिया के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है। इन अलग-अलग क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के कारण दोनों देशों के संबंधों में तनाव आया।

S. Jaishankar की Azerbaijan Visit का मुख्य उद्देश्य क्या है?

23 अक्टूबर 2026 को हुई यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत-अज़रबैजान संबंधों की समीक्षा करना और व्यापार, निवेश, ऊर्जा, पर्यटन, हवाई संपर्क तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) में सहयोग बढ़ाने के रास्ते तलाशना था। जयशंकर ने राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाकात की।

Azerbaijan ने Operation Sindoor के दौरान Pakistan का समर्थन किस तरह किया था?

अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के लोगों के प्रति एकजुटता जताई, मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की और भारत की सैन्य कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी। उसने भारत और पाकिस्तान से संयम बरतने तथा बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील भी की थी।

India और Azerbaijan के बीच Trade और Energy Cooperation बढ़ाने पर क्या चर्चा हुई?

दोनों देशों ने व्यापार, निवेश और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। भारत की कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड की अज़रबैजान के तेल और गैस क्षेत्रों तथा BTC पाइपलाइन में हिस्सेदारी है। दोनों पक्षों ने फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में भी व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं पर जोर दिया।

International North-South Transport Corridor India और Azerbaijan के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

INSTC भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र और रूस के रास्ते मध्य एशिया तथा यूरोप तक माल पहुंचाने का वैकल्पिक मार्ग देता है। इसके पश्चिमी मार्ग में अज़रबैजान की अहम भूमिका है। बेहतर संपर्क से माल ढुलाई के समय और लागत में कमी आने की संभावना है।

India-Azerbaijan Diplomatic Reset का दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?

संबंध सुधरने से व्यापार, ऊर्जा निवेश, पर्यटन, शिक्षा और परिवहन संपर्क में सहयोग बढ़ सकता है। भारत को अज़रबैजान के जरिए कैस्पियन क्षेत्र और यूरोप तक संपर्क मजबूत करने का अवसर मिलेगा, जबकि अज़रबैजान को भारत के बड़े बाजार और निवेश का लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर दोनों देशों की आगे की बातचीत और ठोस फैसलों पर निर्भर करेगा।

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