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₹770 करोड़ का रडार सौदा! अब दुश्मन के छोटे ड्रोन भी नहीं बच पाएंगे भारतीय सेना की नजरों से?

भारतीय सेना की कम ऊंचाई पर हवाई सुरक्षा मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ 770 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है। नए LLLR-I रडार लड़ाकू विमानों के साथ मिनी और माइक्रो ड्रोन का भी पता लगाकर उन्हें ट्रैक कर सकेंगे।

₹770 करोड़ का रडार सौदा! अब दुश्मन के छोटे ड्रोन भी नहीं बच पाएंगे भारतीय सेना की नजरों से?

आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन रडार की पकड़ से बचकर सैन्य ठिकानों और संवेदनशील क्षेत्रों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए Indian Army Lightweight Radar Deal के तहत रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के साथ 770 करोड़ रुपये का अनुबंध किया।इस सौदे के तहत सेना को बेहतर लो-लेवल लाइटवेट रडार (LLLR-I) मिलेंगे। इनका उद्देश्य कम ऊंचाई पर हवाई निगरानी में मौजूद कमियों को दूर करना और दुश्मन के ड्रोन सहित दूसरे हवाई खतरों का समय रहते पता लगाने की क्षमता बढ़ाना है।

आखिर क्या है Indian Army Lightweight Radar Deal?

Indian Army Lightweight Radar Deal भारतीय सेना की वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है। इसके तहत मिलने वाले LLLR-I रडार लड़ाकू विमानों के साथ मिनी और माइक्रो ड्रोन जैसे छोटे हवाई लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम होंगे।रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, यह प्रणाली हवाई लक्ष्यों को प्राथमिकता के आधार पर पहचान सकती है। इससे सेना को संभावित खतरे का आकलन करने और अपनी हथियार प्रणालियों तक जरूरी जानकारी पहुंचाने में मदद मिलेगी। यह रडार डीआरडीओ की इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (LRDE) द्वारा विकसित एशलेशा रडार का उन्नत संस्करण है। इसका उत्पादन भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड करेगी।

छोटे ड्रोन को कैसे पकड़ेगा नया LLLR-I रडार?

नए रडार की सबसे बड़ी खासियत इसकी आधुनिक तकनीक और 360 डिग्री निगरानी क्षमता है। पुराने एशलेशा रडार में सेमी-एक्टिव ऐरे एंटीना का इस्तेमाल होता है, जबकि LLLR-I में गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) तकनीक वाले चार स्थिर फेज्ड-ऐरे पैनल लगाए गए हैं। इस डिजाइन में घूमने वाले हिस्सों की जरूरत नहीं होती। डिजिटल बीम-फॉर्मिंग और त्रि-आयामी प्रोसेसिंग की मदद से यह कम रडार क्रॉस-सेक्शन वाले छोटे ड्रोन को भी पहचान सकता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं:

360 डिग्री निगरानी: चार स्थिर पैनल अलग-अलग दिशाओं में हवाई गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करते हैं।

छोटे ड्रोन की पहचान: मिनी और माइक्रो ड्रोन जैसे छोटे लक्ष्यों का पता लगाने की क्षमता।

लक्ष्यों की ट्रैकिंग: निगरानी के दौरान हवाई लक्ष्यों की गतिविधियों को ट्रैक करना।

हथियार प्रणालियों से संपर्क: वायर और वायरलेस लिंक के जरिए संबंधित प्रणालियों तक डेटा पहुंचाना।

आसानी से तैनाती: मैन-पोर्टेबल डिजाइन के कारण मैदानी इलाकों, रेगिस्तान और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल की सुविधा।

भारतीय सेना को कम ऊंचाई पर रडार की जरूरत क्यों?

लंबी दूरी के रडार को कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों का पता लगाने में भौगोलिक बाधाओं और पृथ्वी की वक्रता के कारण मुश्किल हो सकती है। ड्रोन अक्सर इसी कम ऊंचाई वाले हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करते हैं।LLLR-I जैसे रडार वायु रक्षा नेटवर्क में इन कमियों को पूरा करने के लिए तैयार किए गए हैं। सेना ऐसे रडार चाहती रही है, जो 0.001 वर्ग मीटर जितने छोटे रडार क्रॉस-सेक्शन वाले लक्ष्य का भी पता लगा सकें। यह आकार एक माइक्रो ड्रोन के रडार क्रॉस-सेक्शन के उदाहरण के तौर पर बताया गया है।ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ड्रोन खतरे की गंभीरता सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, चार दिन तक चली सैन्य कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान ने पश्चिमी मोर्चे पर सैन्य और नागरिक ठिकानों की ओर तुर्किये और चीन मूल के ड्रोन सहित कई ड्रोन भेजे थे। भारतीय सेना की वायु रक्षा इकाइयों ने बड़ी संख्या में इन ड्रोन को मार गिराया था।

₹770 करोड़ के सौदे से भारत की रक्षा क्षमता को क्या फायदा?

Indian Army Lightweight Radar Deal का उद्देश्य केवल सेना की निगरानी क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वदेशी रक्षा उत्पादन को भी प्रोत्साहित करना है। रक्षा मंत्रालय ने इसे वायु रक्षा प्रणालियों के स्वदेशीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।BEL के जरिए इन रडार का उत्पादन देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती दे सकता है। इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) सहित घरेलू उद्योगों को भी लाभ मिलने की संभावना है।हालांकि, इस सौदे से सेना की परिचालन क्षमता में कितना सुधार होगा, यह रडार की तैनाती, वास्तविक परिस्थितियों में उसके प्रदर्शन और अन्य वायु रक्षा प्रणालियों के साथ उसके समन्वय पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष

Indian Army Lightweight Radar Deal भारत की कम ऊंचाई वाली हवाई सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। 770 करोड़ रुपये के इस अनुबंध के तहत मिलने वाले LLLR-I रडार लड़ाकू विमानों से लेकर छोटे ड्रोन तक की निगरानी में मदद करेंगे। आधुनिक AESA तकनीक, 360 डिग्री कवरेज और स्वदेशी उत्पादन के साथ यह प्रणाली ड्रोन से पैदा होने वाले खतरे का मुकाबला करने में भारतीय सेना की क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Indian Army Lightweight Radar Deal कितने रुपये का है?

रक्षा मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ 770 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है।

BEL का LLLR-I रडार क्या है?

यह कम ऊंचाई पर हवाई लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने वाला हल्का रडार है। इसे डीआरडीओ के एशलेशा रडार के उन्नत संस्करण के रूप में विकसित किया गया है।

क्या नया रडार छोटे ड्रोन का पता लगा सकता है?

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह लड़ाकू विमानों के साथ मिनी और माइक्रो ड्रोन का भी पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में सक्षम है।

LLLR-I रडार में कौन-सी तकनीक इस्तेमाल हुई है?

इसमें गैलियम नाइट्राइड आधारित AESA तकनीक वाले चार स्थिर फेज्ड-ऐरे पैनल हैं, जो 360 डिग्री निगरानी में मदद करते हैं।

इस सौदे से भारत को क्या फायदा होगा?

इससे सेना की कम ऊंचाई पर हवाई निगरानी क्षमता मजबूत होगी और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

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