TRAI ने Satellite D2D सेवा के लिए की सिफारिश, L-band और S-band से सीधे स्मार्टफोन पर नेटवर्क का रास्ता खुला !
TRAI ने 5 नवंबर 2026 को सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाताओं के लिए नया अनुमति ढांचा सुझाया। इसमें L-band और S-band से स्मार्टफोन को सीधे सैटेलाइट से जोड़ने वाली D2D सेवा और मोबाइल स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल का प्रस्ताव है। अब केंद्र सरकार इन सिफारिशों पर फैसला करेगी।
भारत में मोबाइल फोन को सीधे सैटेलाइट से जोड़ने वाली Direct-to-Device (D2D) तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने 5 नवंबर 2026 को सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क प्रदाताओं के लिए नया अनुमति ढांचा बनाने और D2D सेवाओं को मंजूरी देने की सिफारिश की है।
इस प्रस्ताव के तहत L-band और S-band जैसे सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के साथ-साथ टेलीकॉम कंपनियों के मौजूदा मोबाइल स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल भी किया जा सकेगा। इससे उन इलाकों में कनेक्टिविटी पहुंचाने के नए विकल्प बन सकते हैं जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल है। हालांकि, ये अभी TRAI की सिफारिशें हैं। इन्हें लागू करने के लिए केंद्र सरकार का फैसला जरूरी होगा।
TRAI ने क्या सिफारिश की है?
TRAI ने Telecommunications Act, 2023 के तहत Satellite Communication Network Provider Authorisation नाम से नई अनुमति श्रेणी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसका मकसद ऐसी कंपनियों को सैटेलाइट नेटवर्क उपलब्ध कराने की अनुमति देना है, जो अपना नेटवर्क दूसरी अधिकृत कंपनियों को इस्तेमाल के लिए दे सकें।
इस मॉडल को Satellite Communication Network-as-a-Service (SCNaaS) कहा गया है। इसके तहत सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाता अपनी नेटवर्क क्षमता टेलीकॉम ऑपरेटरों और अन्य पात्र सेवा प्रदाताओं को दे सकेंगे। ग्राहक तक सेवा पहुंचाने का काम अधिकृत सेवा प्रदाता करेंगे। नई अनुमति पाने वाली SCN कंपनियां सीधे आम ग्राहकों को टेलीकॉम सेवा नहीं बेच सकेंगी।
TRAI ने इस अनुमति को पूरे देश के लिए रखने और इसकी अवधि अधिकतम 20 साल तय करने की सिफारिश की है। इसके बाद इसे 20 साल तक और बढ़ाने का विकल्प भी होगा।

Direct-to-Device तकनीक कैसे काम करेगी?
आमतौर पर मोबाइल फोन को नेटवर्क से जोड़ने के लिए मोबाइल टावर या बेस स्टेशन की जरूरत होती है। Direct-to-Device तकनीक में सैटेलाइट सीधे ऐसे स्मार्टफोन से संपर्क कर सकता है, जो संबंधित तकनीक और फ्रीक्वेंसी को सपोर्ट करता हो।
इससे पहाड़ी इलाकों, जंगलों, समुद्री क्षेत्रों और दूरदराज के उन स्थानों पर कनेक्टिविटी देने में मदद मिल सकती है जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल या महंगा है।
हालांकि, D2D तकनीक का मतलब यह नहीं है कि हर स्मार्टफोन हर जगह बिना टावर के सामान्य मोबाइल नेटवर्क की तरह काम करने लगेगा। इसके लिए सैटेलाइट कवरेज, फोन में जरूरी हार्डवेयर, उपलब्ध स्पेक्ट्रम और टेलीकॉम कंपनी के साथ साझेदारी जरूरी होगी।
TRAI ने सैटेलाइट आधारित D2D सेवा के लिए दो रास्ते सुझाए हैं।
पहले मॉडल में Mobile Satellite Service (MSS) के लिए तय L-band और S-band स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल होगा। इन फ्रीक्वेंसी बैंड के जरिए सैटेलाइट सीधे उन स्मार्टफोन से संपर्क कर सकेंगे जिनमें इन्हें सपोर्ट करने वाले जरूरी हार्डवेयर मॉड्यूल मौजूद होंगे।
TRAI ने सुझाव दिया है कि इन सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के बाद केंद्र सरकार स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों को भविष्य में भारत में बिकने वाले फोन में जरूरी मॉड्यूल शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करे।
इसका मतलब है कि मौजूदा सभी स्मार्टफोन में यह सुविधा उपलब्ध होने की गारंटी नहीं है। जिन फोन में जरूरी हार्डवेयर नहीं होगा, उनमें यह सेवा इस्तेमाल करने के लिए नए डिवाइस की जरूरत पड़ सकती है।
दूसरे मॉडल में सैटेलाइट कनेक्टिविटी के लिए टेलीकॉम कंपनियों को पहले से आवंटित मोबाइल स्पेक्ट्रम यानी IMT spectrum का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
TRAI ने इसके लिए 600 MHz, 700 MHz, 800 MHz, 900 MHz, 1800 MHz और 2100 MHz बैंड का सुझाव दिया है। इस व्यवस्था में सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाता और मोबाइल ऑपरेटर के बीच समझौता जरूरी होगा।
इस मॉडल के लिए संबंधित मोबाइल फ्रीक्वेंसी चैनल पर अधिकार रखने वाली एक या अधिक टेलीकॉम कंपनियों को मिलकर देश के सभी 22 लाइसेंस प्राप्त सेवा क्षेत्रों में उस चैनल का आवंटन रखना होगा और सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाता को उसके इस्तेमाल की अनुमति देनी होगी।
TRAI ने इस सेवा को non-interference, non-protection basis पर चलाने की सिफारिश की है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि सैटेलाइट सेवा मौजूदा मोबाइल और दूसरे रेडियो नेटवर्क के काम में रुकावट नहीं डाल सकेगी। साथ ही, सैटेलाइट सेवा को दूसरे नेटवर्क से किसी तरह की सुरक्षा का दावा करने का अधिकार भी नहीं होगा।
क्या अब बिना मोबाइल टावर के फोन पर नेटवर्क मिलेगा?
D2D तकनीक का एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि मोबाइल टावर की पहुंच से बाहर के इलाकों में भी फोन को कनेक्टिविटी मिल सके। उदाहरण के लिए, किसी पहाड़ी इलाके में जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, वहां सैटेलाइट के जरिए फोन को नेटवर्क मिल सकता है।
लेकिन इसे सामान्य मोबाइल नेटवर्क का पूरी तरह विकल्प समझना सही नहीं होगा। इसकी उपलब्धता सैटेलाइट कवरेज, फोन की तकनीकी क्षमता, इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम और सेवा प्रदाता पर निर्भर करेगी।
इसके अलावा, TRAI की सिफारिशों में यह तय नहीं किया गया है कि शुरुआत में ग्राहकों को कॉलिंग, मैसेजिंग और इंटरनेट की कौन-कौन सी सुविधाएं मिलेंगी। इन सेवाओं की वास्तविक उपलब्धता और क्षमता आगे की तकनीकी व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
Jio, Airtel और Vi को क्या फायदा हो सकता है?
TRAI का प्रस्ताव सैटेलाइट कंपनियों और पारंपरिक टेलीकॉम ऑपरेटरों के बीच साझेदारी का रास्ता खोल सकता है। इससे Reliance Jio, Bharti Airtel और Vodafone Idea जैसी कंपनियां अपने मौजूदा नेटवर्क के साथ सैटेलाइट कनेक्टिविटी जोड़ने के विकल्प तलाश सकती हैं।
Airtel की सैटेलाइट क्षेत्र में Eutelsat OneWeb के साथ साझेदारी है। वहीं Vodafone Idea ने AST SpaceMobile के साथ सैटेलाइट आधारित D2D कनेक्टिविटी के लिए रणनीतिक समझौता किया है। ये मौजूदा साझेदारियां हैं। इनका मतलब यह नहीं है कि TRAI की नई सिफारिशों के तहत इन कंपनियों की D2D सेवाएं शुरू हो गई हैं।
इस प्रस्ताव से टेलीकॉम कंपनियों को उन इलाकों में नेटवर्क की पहुंच बढ़ाने का एक और विकल्प मिल सकता है जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क का विस्तार मुश्किल है। हालांकि, सेवा शुरू करने के लिए उन्हें जरूरी अनुमति, स्पेक्ट्रम और सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाता के साथ समझौता करना होगा।
TRAI ने स्पेक्ट्रम और फीस को लेकर क्या प्रस्ताव दिया है?
TRAI ने नई अनुमति के साथ स्पेक्ट्रम आवंटन और कंपनियों पर लागू होने वाली फीस की शर्तें भी सुझाई हैं।
- मुख्य वित्तीय प्रस्ताव इस प्रकार हैं:
1- अनुमति शुल्क: SCN Provider Authorisation के लिए Adjusted Gross Revenue (AGR) का 8% शुल्क प्रस्तावित है। इसके लिए न्यूनतम अनुमति शुल्क नहीं रखने की सिफारिश की गई है।
2- स्पेक्ट्रम शुल्क: केंद्र सरकार से FSS या MSS स्पेक्ट्रम आवंटित होने पर न्यूनतम सालाना शुल्क ₹3,500 प्रति MHz रखने का प्रस्ताव है।
3- एंट्री फीस: नई अनुमति के लिए ₹37.5 लाख की एंट्री फीस सुझाई गई है।
4- शुरुआती बैंक गारंटी: ₹45 लाख की शुरुआती गारंटी का प्रस्ताव है।
5- न्यूनतम इक्विटी और नेटवर्थ: दोनों के लिए ₹60 लाख की शर्त सुझाई गई है।
6- आवेदन शुल्क: आवेदन प्रक्रिया के लिए ₹10,000 का शुल्क प्रस्तावित है।
यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है। ₹3,500 प्रति MHz का न्यूनतम सालाना शुल्क तभी लागू होगा, जब केंद्र सरकार SCN प्रदाता को FSS या MSS स्पेक्ट्रम आवंटित करेगी।
वहीं, टेलीकॉम कंपनियों को अपने पहले से आवंटित IMT स्पेक्ट्रम का D2D सेवा में इस्तेमाल करने पर अतिरिक्त स्पेक्ट्रम शुल्क नहीं देना होगा। उनके मौजूदा स्पेक्ट्रम शुल्क के नियम जारी रहेंगे।
भारत में D2D सेवा कब शुरू हो सकती है?
TRAI ने अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) को भेजी हैं। अब सरकार इन प्रस्तावों की समीक्षा करेगी और यह तय करेगी कि इन्हें किस रूप में लागू किया जाए। TRAI की सिफारिशें अपने आप में अंतिम सरकारी मंजूरी नहीं हैं।
सरकार की मंजूरी के बाद कंपनियों को नई अनुमति, स्पेक्ट्रम आवंटन, तकनीकी शर्तों और साझेदारी से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसके अलावा, L-band और S-band आधारित सेवा के लिए भविष्य के स्मार्टफोन में जरूरी हार्डवेयर की उपलब्धता भी अहम होगी।
IMT स्पेक्ट्रम आधारित D2D सेवा के मामले में TRAI ने 2027 में होने वाले World Radiocommunication Conference (WRC-27) के नतीजों का इंतजार किए बिना सेवा की अनुमति देने का सुझाव दिया है। हालांकि, WRC-2027 के बाद भारत सरकार इस विषय पर जो फैसला लेगी, उसे आगे लागू करने की सिफारिश भी की गई है।
निष्कर्ष
TRAI की सिफारिशें भारत में सैटेलाइट और मोबाइल नेटवर्क को एक साथ इस्तेमाल करने के लिए नया ढांचा तैयार करने की दिशा में अहम कदम हैं।
इससे भविष्य में दूरदराज के इलाकों तक स्मार्टफोन कनेक्टिविटी पहुंचाने के विकल्प बढ़ सकते हैं। अब इस प्रस्ताव का भविष्य केंद्र सरकार के फैसले, स्पेक्ट्रम आवंटन और कंपनियों की तकनीकी तैयारियों पर निर्भर करेगा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
TRAI की नई Satellite D2D service क्या है और यह कैसे काम करेगी?
Satellite Direct-to-Device सेवा में सैटेलाइट सीधे ऐसे स्मार्टफोन से संपर्क करता है जो संबंधित तकनीक को सपोर्ट करता हो। इससे मोबाइल टावर की पहुंच से बाहर के इलाकों में भी कनेक्टिविटी देने में मदद मिल सकती है।
Direct-to-Device तकनीक से मोबाइल फोन को सैटेलाइट से कैसे जोड़ा जाएगा?
इसके लिए सैटेलाइट L-band और S-band जैसे फ्रीक्वेंसी बैंड का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरे मॉडल में टेलीकॉम कंपनियों के मौजूदा IMT स्पेक्ट्रम के जरिए भी सैटेलाइट कनेक्टिविटी दी जा सकती है।
क्या भारत में बिना मोबाइल टावर के स्मार्टफोन पर नेटवर्क मिलेगा?
कुछ दूरदराज इलाकों में सैटेलाइट के जरिए नेटवर्क मिल सकता है। लेकिन यह सुविधा हर जगह और हर फोन पर उपलब्ध नहीं होगी। इसके लिए सैटेलाइट कवरेज, फोन की क्षमता और सेवा प्रदाता की व्यवस्था जरूरी होगी।
TRAI के नए सैटेलाइट फ्रेमवर्क से Jio, Airtel और Vi को क्या फायदा होगा?
ये कंपनियां सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाताओं के साथ साझेदारी करके अपने नेटवर्क की पहुंच बढ़ा सकती हैं। इससे उन क्षेत्रों में कनेक्टिविटी देने का विकल्प मिलेगा जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल है। हालांकि, सेवा शुरू करने के लिए जरूरी सरकारी मंजूरी और तकनीकी तैयारियां पूरी करनी होंगी।
क्या Satellite-to-Smartphone सेवा के लिए नया स्मार्टफोन खरीदना होगा और यह भारत में कब शुरू होगी?
हर फोन में यह सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। MSS आधारित सेवा के लिए L-band और S-band को सपोर्ट करने वाले हार्डवेयर की जरूरत पड़ सकती है। फिलहाल सेवा शुरू होने की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं हुई है।