मेडिकल डिवाइस से मरीजों की सुरक्षा पर कितना बड़ा खतरा? Medical Device Safety in India के नए आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
भारत में मेडिकल डिवाइस से जुड़े गंभीर प्रतिकूल मामलों की संख्या छह साल में करीब तीन गुना बढ़ी है। 2025 में ऐसे 2,176 मामले दर्ज हुए। लेकिन इनकी निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई सवाल अब भी कायम हैं।
भारत में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों की सुरक्षा अब एक गंभीर चिंता बनती जा रही है। मरीजों की जान बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले पेसमेकर, वेंटिलेटर, स्टेंट और सिरिंज जैसे उपकरणों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी कितनी प्रभावी है, इस पर सवाल उठ रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत सामने आए नए आंकड़ों ने देश की मेडिकल डिवाइस मॉनिटरिंग व्यवस्था और उसकी पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है।
छह साल में गंभीर मामलों में करीब तीन गुना बढ़ोतरी

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 10 सितंबर के आदेश के बाद IPC ने 27 अक्टूबर को यह डेटा उपलब्ध कराया। इससे पहले आयोग गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के आंकड़ों को प्रतिबंधित जानकारी बताकर सार्वजनिक नहीं कर रहा था।गंभीर प्रतिकूल घटनाएं वे मेडिकल घटनाएं होती हैं, जिनसे मरीज की जान को खतरा हो सकता है, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है या गंभीर स्वास्थ्य नुकसान हो सकता है। IPC के आंकड़ों में 2020 से 2025 के बीच कुल 9,373 ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिन्हें आयोग ने प्राप्त किया और उनकी समीक्षा की। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर घटना सीधे मेडिकल डिवाइस की खराबी के कारण हुई।
Medical Device Safety in India: निगरानी के आंकड़े क्या बताते हैं?
भारत में मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए साल 2015 में मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI) शुरू किया गया था। इसे IPC संचालित करता है। इसके तहत देशभर के 775 निगरानी केंद्रों से मेडिकल डिवाइस से जुड़ी घटनाओं की जानकारी जुटाई जाती है। IPC की वार्षिक रिपोर्टों में मेडिकल डिवाइस एडवर्स इवेंट्स (MDAEs) की कुल संख्या तो दी जाती थी, लेकिन गंभीर मामलों को अलग श्रेणी में सार्वजनिक नहीं किया जाता था। आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2024-25 में 14,584 MDAEs दर्ज किए गए, जिनमें से केवल 22 मामलों को जरूरी कार्रवाई के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भेजा गया। इसी तरह 2023-24 में 10,269 MDAEs में से 16 मामले और 2022-23 में 3,868 मामलों में से 12 मामले CDSCO को भेजे गए। इन सूचियों में सर्जिकल ग्लव्स, सिरिंज, यूरिन बैग, कैथेटर और बीपी मॉनिटर जैसे उपकरण शामिल थे। कुछ रिपोर्टों में वेंटिलेटर, ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट और स्टेंट जैसे उपकरणों का भी उल्लेख किया गया।
मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी जानकारी पर क्यों लगा पर्दा?

इस मामले में सबसे अहम सवाल पारदर्शिता का है। इंडियन एक्सप्रेस ने मेडिकल डिवाइस की श्रेणी और निर्माता से जुड़ी जानकारी मांगी थी, लेकिन IPC ने इसे सार्वजनिक करने पर आपत्ति जताई। आयोग ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने दलील दी कि निर्माता का नाम और अन्य विवरण साझा करने से संबंधित कंपनियों की व्यावसायिक गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। इसके लिए RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया गया। IPC का यह भी कहना था कि किसी प्रतिकूल घटना के लिए डिवाइस को जिम्मेदार ठहराना हमेशा संभव नहीं है, क्योंकि मामला किसी प्रक्रिया में हुई चूक के कारण भी हो सकता है।इसका मतलब है कि मरीजों को नुकसान पहुंचाने वाली हर घटना के पीछे उपकरण की खराबी होना अभी स्थापित नहीं है। लेकिन मेडिकल डिवाइस की गुणवत्ता और संभावित जोखिमों की बेहतर जांच की जरूरत जरूर सामने आती है।
अमेरिका में मेडिकल डिवाइस की शिकायतों का सार्वजनिक रिकॉर्ड
मेडिकल डिवाइस की निगरानी के मामले में अमेरिका का उदाहरण भी सामने आया है। वहां अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) का MAUDE डेटाबेस उपलब्ध है, जिसमें मेडिकल उपकरणों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं और समस्याओं की रिपोर्ट दर्ज होती है। इस डेटाबेस में डिवाइस के ब्रांड, निर्माता, मॉडल और घटना के प्रकार जैसी विस्तृत जानकारियां देखी जा सकती हैं। इससे मरीजों और शोधकर्ताओं को संभावित जोखिमों को समझने में मदद मिलती है। भारत में भी मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा को लेकर ऐसी पारदर्शी व्यवस्था की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे मरीजों को उपकरणों से जुड़े जोखिमों की विश्वसनीय जानकारी मिल सके।
निष्कर्ष
Medical Device Safety in India का मुद्दा केवल मेडिकल उपकरणों की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा है। छह वर्षों में गंभीर प्रतिकूल घटनाओं में करीब तीन गुना बढ़ोतरी निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताती है। साथ ही, उपकरणों की पहचान, निर्माता की जवाबदेही और जांच के नतीजों से जुड़ी जानकारी में पारदर्शिता भी जरूरी है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
मेडिकल डिवाइस से होने वाले गंभीर नुकसान क्या हैं?
ऐसी प्रतिकूल घटनाएं जिनसे मरीज की जान को खतरा हो, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़े या गंभीर स्वास्थ्य नुकसान हो, गंभीर प्रतिकूल घटनाएं कहलाती हैं।
मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की संख्या क्यों बढ़ रही है?
उपलब्ध आंकड़े बढ़ोतरी दिखाते हैं, लेकिन इसके पीछे उपकरणों की खराबी, उपयोग में गलती, प्रक्रियागत चूक या बेहतर रिपोर्टिंग में से किसका कितना योगदान है, यह स्पष्ट नहीं है।
भारत में मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा की निगरानी कौन करता है?
भारतीय भेषज संहिता आयोग (IPC) मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया के तहत प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी करता है। CDSCO नियामक स्तर पर आवश्यक कार्रवाई करता है।
मेडिकल डिवाइस से होने वाले नुकसान की शिकायत कहां दर्ज कराई जा सकती है?
मरीज या स्वास्थ्यकर्मी मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटना की जानकारी संबंधित अस्पताल और MvPI के निगरानी तंत्र के माध्यम से दर्ज करा सकते हैं।
मरीज मेडिकल डिवाइस के इस्तेमाल के दौरान अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं?
मरीज उपकरण के इस्तेमाल से पहले डॉक्टर से उसकी जरूरत, संभावित जोखिम और विकल्पों की जानकारी लें। किसी असामान्य परेशानी पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।