DPDP Act Media Challenge : मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून को चुनौती, अंबानी-अदाणी सहित 21 पब्लिशर्स क्यों पहुंचे सुप्रीम कोर्ट ?
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने DPDP कानून के पत्रकारिता, गोपनीय सूत्रों और RTI पर संभावित असर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 21 मीडिया संगठनों की ओर से दायर याचिका पर अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी; फिलहाल कानून पर रोक नहीं लगी है।
DPDP Act Media Challenge : भारत के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने केंद्र सरकार के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस एसोसिएशन में 21 मीडिया संगठनों के डिजिटल संस्थान शामिल हैं, जिनमें उद्योगपति मुकेश अंबानी के नेटवर्क18 और गौतम अदाणी के मीडिया समूह से जुड़ा NDTV भी शामिल हैं। प्रकाशकों का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है, जिससे प्रेस की स्वतंत्रता और जनहित में की जाने वाली खोजी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में कानून के कई प्रावधानों और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई है। प्रकाशकों ने इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने और कानून पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होनी है।
DNPA में इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, जी, NDTV और नेटवर्क18 सहित 21 प्रमुख समाचार संगठनों के डिजिटल मीडिया संस्थान शामिल हैं। याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है। इसमें स्वतंत्र खोजी पत्रकार युक्ता मुडगल भी याचिकाकर्ता हैं।
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) क्या है?
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) भारत में डिजिटल समाचार प्रकाशित करने वाले प्रमुख मीडिया संस्थानों का संगठन है। इसकी स्थापना 21 सितंबर 2018 को हुई थी। इसका उद्देश्य डिजिटल मीडिया संस्थानों के साझा हितों की रक्षा करना, डिजिटल पत्रकारिता के विकास को बढ़ावा देना और सरकार तथा नियामक संस्थाओं के सामने उद्योग से जुड़े मुद्दों को उठाना है।इसके सदस्यों में 21 मीडिया पब्लिशर्स आते हैं, जिनमें लोकमत, द इंडियन एक्सप्रेस, जी मीडिया, दैनिक जागरण, ईनाडु, एबीपी ग्रुप, इंडिया टीवी, मातृभूमि, मलयाला मनोरमा, इंडिया टुडे, द हिंदू, दैनिक भास्कर, नेटवर्क18, टाइम्स इंटरनेट, एचटी डिजिटल, एनडीटीवी, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, द मैसूर प्रिंटर्स, अमर उजाला और टाइम्स ग्रुप जैसे प्रमुख मीडिया संस्थान शामिल हैं। यह सरकारी संगठन नहीं, बल्कि समाचार प्रकाशकों का संगठन है।

अगस्त 2023 में बना था कानून, नवंबर 2025 में अधिसूचित हुए नियम
डिजिटल निजी डेटा की सुरक्षा के लिए संसद ने 11 अगस्त 2023 को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य लोगों के डिजिटल निजी डेटा की सुरक्षा करना और उस डेटा का इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय करना है।इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 3 जनवरी 2025 को इस कानून से जुड़े नियमों का मसौदा जारी किया था। सरकार ने आम लोगों, उद्योगों, स्टार्टअप और दूसरे संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे थे। सरकार के मुताबिक, नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में उसे कुल 6,915 सुझाव मिले। दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई में भी संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श किया गया।
इसके बाद केंद्र सरकार ने 14 नवंबर 2025 को DPDP रूल्स, 2025 अधिसूचित किए। सरकार ने इन नियमों को लोगों के निजी डेटा की सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में जिम्मेदार तरीके से डेटा के इस्तेमाल के लिए जरूरी बताया। नियमों में अलग-अलग प्रावधानों के पालन के लिए 18 महीने तक की चरणबद्ध समय-सीमा भी रखी गई।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 भारत में लोगों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून है। संसद ने इसे 11 अगस्त 2023 को पारित किया था। इसके साथ जुड़े नियम 2025 में अधिसूचित किए गए।
इस कानून में दो महत्वपूर्ण शब्द इस्तेमाल किए गए हैं।
पहला, डेटा फिड्यूशियरी, यानी वह संस्था या कंपनी जो लोगों के व्यक्तिगत डेटा को इकट्ठा करने या उसका इस्तेमाल करने के उद्देश्य और तरीके तय करती है।
दूसरा, डेटा प्रिंसिपल, यानी वह व्यक्ति जिसका निजी डेटा इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस कानून को सरल, आसानी से समझने योग्य, तर्कसंगत और इस्तेमाल में आसान बनाने के लिए SARAL यानी Simple, Accessible, Rational and Actionable के सिद्धांत पर तैयार किया गया है।
उदाहरण के लिए, अगर आप किसी ऑनलाइन शॉपिंग ऐप पर अपना नाम, फोन नंबर और पता देते हैं, तो आप डेटा प्रिंसिपल हैं। उस डेटा को संभालने और इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी निभाने वाली कंपनी डेटा फिड्यूशियरी हो सकती है।
मीडिया कंपनियों को कानून से क्या आपत्ति है?
DNPA ने 10 अगस्त 2026 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को विस्तृत प्रतिवेदन देकर DPDP एक्ट और नियमों के लागू होने से जुड़ी चिंताएं बताई थीं। इसके बाद 25 अगस्त को DNPA के प्रतिनिधियों और मंत्रालय के अधिकारियों के बीच बैठक हुई थी।
मीडिया संस्थानों की मुख्य आपत्ति यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट या अलग सुरक्षा का प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि पत्रकारों का काम सामान्य कारोबारी गतिविधियों से अलग होता है। वे कई बार भ्रष्टाचार, कंपनियों की गड़बड़ियों या चुनाव से जुड़ी अनियमितताओं की जांच के लिए लोगों की निजी जानकारी जुटाते हैं। ऐसी जांच में संबंधित व्यक्ति को पहले से बताना या उसकी सहमति लेना मुश्किल हो सकता है।
DNPA का तर्क है कि अगर पत्रकारों पर डेटा इस्तेमाल करने से जुड़े सभी नियम उसी तरह लागू होते हैं, जैसे दूसरी कंपनियों पर होते हैं, तो जनहित की खबरें तैयार करना मुश्किल हो सकता है।
एसोसिएशन के मुताबिक, यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन में पत्रकारिता के लिए ऐसे प्रावधान मौजूद हैं।
6 अक्टूबर को दायर की गई यह याचिका 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई हुई।
'सहमति लेनी पड़ी तो न्यूजरूम बंद हो जाएंगे'
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने दलील दी कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से समाचार संस्थानों के कामकाज पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले उसी व्यक्ति की सहमति पर निर्भर रहना पड़े, तो खोजी पत्रकारिता का उद्देश्य प्रभावित होगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और मीडिया के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से यह भी कहा कि वे इस बारे में सुझाव दें कि कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं।अदालत में सुनवाई के दौरान उठाया गया मुख्य सवाल यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए पत्रकारों को जनहित में जानकारी जुटाने और प्रकाशित करने की पर्याप्त स्वतंत्रता कैसे दी जाए। फिलहाल अदालत ने इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
सहमति और नोटिस से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति
DNPA ने DPDP एक्ट की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को चुनौती दी है। इसके अलावा DPDP नियम, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून के नोटिस, सहमति और निजी डेटा मिटाने से जुड़े प्रावधान पत्रकारों, संपादकों और संवाददाताओं के सामान्य कामकाज से मेल नहीं खाते। खोजी पत्रकारिता में कई बार भ्रष्टाचार, सरकारी अधिकारियों के कथित कदाचार या कॉरपोरेट गड़बड़ियों से जुड़ी निजी जानकारी जुटानी पड़ती है।
प्रकाशकों की दलील है कि यदि जांच के विषय में शामिल व्यक्ति को पहले सूचना देनी पड़े या उससे सहमति लेनी पड़े, तो वह सबूत मिटा सकता है, गवाहों पर दबाव डाल सकता है या जांच को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, कानून में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि हर खोजी खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य होगा। प्रकाशकों की आपत्ति यह है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से कानून की व्याख्या और उसके पालन को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
पुराने विधेयकों में थी पत्रकारिता के लिए छूट
याचिका में डेटा सुरक्षा कानून के पुराने मसौदों का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, 2018 के पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल की धारा 47 में पत्रकारिता के उद्देश्य से छूट का प्रावधान था। 2019 और 2021 के प्रस्तावित विधेयकों में भी पत्रकारिता से जुड़ी छूट शामिल थी।याचिका के अनुसार, 2022 के ड्राफ्ट डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल में पत्रकारिता के लिए अलग छूट बरकरार नहीं रखी गई। इसके बजाय केंद्र सरकार की ओर से अधिसूचित की जाने वाली छूट की व्यवस्था पर विचार किया गया।
प्रकाशकों का तर्क है कि अंतिम कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा नहीं होने से समाचार संस्थानों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि शोध, अभिलेखीकरण और सांख्यिकीय काम जैसी कुछ गतिविधियों को छूट मिल सकती है, लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता को वैसी स्पष्ट सुरक्षा क्यों नहीं दी गई।
सरकारी शक्तियों से गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का डर
याचिका में DPDP एक्ट की धारा 36, नियम 23 और नियमों की सातवीं अनुसूची से जुड़े प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है। धारा 36 निर्धारित परिस्थितियों में केंद्र सरकार को डेटा फिड्यूशियरी और मध्यस्थों से जानकारी मांगने की शक्ति देती है।DNPA का आरोप है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं। याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक निगरानी, आवश्यकता और आनुपातिकता की शर्तों तथा प्रभावित व्यक्ति को सूचना देने जैसे सुरक्षा उपायों की कमी पर सवाल उठाए हैं।
प्रकाशकों को आशंका है कि इन शक्तियों के जरिए पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान सामने आ सकती है। भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट अनियमितताओं या चुनावी गड़बड़ियों की जानकारी देने वाले लोग अक्सर अपनी पहचान गोपनीय रखना चाहते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्रोत की पहचान उजागर होने का डर व्हिसलब्लोअर को जानकारी साझा करने से रोक सकता है।
यह याचिकाकर्ताओं की दलील है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सरकार को हर मामले में पत्रकारों के सूत्रों की पहचान हासिल करने का असीमित अधिकार मिल गया है।
खबरों तक पहुंच रोकने की सरकारी शक्ति को भी चुनौती
याचिका में DPDP एक्ट की धारा 37(1) पर भी सवाल उठाए गए हैं। यह प्रावधान निर्धारित परिस्थितियों में केंद्र सरकार को सार्वजनिक पहुंच पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति देता है।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आम जनता के हित में जानकारी तक पहुंच सीमित करने की शक्ति का दायरा बहुत व्यापक है और इसका इस्तेमाल समाचारों के प्रसार को रोकने के लिए किया जा सकता है। प्रकाशकों ने इस प्रावधान के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट सीमाएं और सुरक्षा उपाय तय करने की मांग की है।
इस मुद्दे का संबंध केवल पत्रकारों के डेटा इस्तेमाल से नहीं, बल्कि जनता तक जानकारी पहुंचने की प्रक्रिया से भी है। हालांकि, सरकार की इस शक्ति की वैधता और इसके दायरे पर अंतिम फैसला अदालत को करना है।
डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की स्वतंत्रता पर सवाल
DNPA ने DPDP एक्ट की धाराओं 18, 19 और 27 के तहत डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया के गठन और शक्तियों को भी चुनौती दी है।बोर्ड को निजी डेटा के उल्लंघन और कानून के तहत निर्धारित दायित्वों से जुड़े मामलों की जांच करने तथा जुर्माना लगाने जैसी शक्तियां दी गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन कार्यपालिका करती है और कानून में न्यायिक सदस्य की अनिवार्य नियुक्ति का प्रावधान नहीं है।
उनका तर्क है कि जब कोई संस्था मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले मामलों में निर्णय ले सकती है, तो उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संस्थागत सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
यह चुनौती बोर्ड की संरचना और निर्णय लेने की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवाल उठाती है। अदालत को इन दलीलों पर विचार करना बाकी है।
RTI कानून में बदलाव को भी चुनौती
याचिका में DPDP एक्ट की धारा 44(3) को भी चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के जरिए सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट, 2005 की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है, जो व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से संबंधित है।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए प्रावधान से निजी जानकारी के खुलासे पर व्यापक रोक लग सकती है, भले ही किसी मामले में उसका संबंध सार्वजनिक गतिविधियों से हो, वह किसी सरकारी अधिकारी के आधिकारिक कामकाज से जुड़ी हो या उसे सार्वजनिक करना बड़े जनहित में जरूरी हो।
प्रकाशकों के मुताबिक, पहले के प्रावधान में निजी जानकारी और जनता के जानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की गुंजाइश थी। उनका दावा है कि नए बदलाव से जनहित में जानकारी सामने लाना कठिन हो सकता है।
इस दलील के समर्थन में याचिका में सुप्रीम कोर्ट के एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया यानी इलेक्टोरल बॉन्ड मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निजता की सुरक्षा के नाम पर जनता के जानने के मौलिक अधिकार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फरवरी 2026 में DPDP एक्ट के जरिए RTI कानून में किए गए बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को भेजी गई थीं।
अगस्त में सरकार के साथ हुई थी बैठक
याचिका के अनुसार, DNPA ने 10 अगस्त 2026 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को विस्तृत प्रतिवेदन देकर DPDP एक्ट और नियमों के लागू होने से जुड़ी चिंताएं बताई थीं। इसके बाद 25 अगस्त को DNPA के प्रतिनिधियों और मंत्रालय के अधिकारियों के बीच बैठक हुई थी।प्रकाशकों ने अदालत में कहा कि उन्होंने सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखीं, लेकिन पत्रकारिता के लिए स्पष्ट लिखित छूट का प्रावधान नहीं किया गया। यह विवरण याचिकाकर्ताओं के पक्ष पर आधारित है; इसे सरकार की ओर से स्वतंत्र रूप से घोषित आश्वासन नहीं माना जाना चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की याचिका और अंतरिम रोक लगाने की मांग पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होनी है। अदालत को यह देखना होगा कि चुनौती दिए गए प्रावधानों से निजता की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच किस तरह का संतुलन बनता है और क्या पत्रकारिता के लिए अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा की जरूरत है।फिलहाल DPDP एक्ट को असंवैधानिक घोषित नहीं किया गया है और न ही इस याचिका के आधार पर कानून पर रोक लगने का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। मामला अब इस सवाल पर केंद्रित है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के नियम लागू करते समय खोजी पत्रकारिता, गोपनीय सूत्रों और जनता के जानने के अधिकार की पर्याप्त रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारतीय News Publishers ने Digital Personal Data Protection Act को Supreme Court में चुनौती क्यों दी?
भारतीय समाचार प्रकाशकों ने DPDP Act, 2023 को चुनौती दी है क्योंकि उनका कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं है। उन्हें आशंका है कि निजी डेटा से जुड़े नियम खोजी पत्रकारिता, जनहित में जानकारी प्रकाशित करने और प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
DNPA की याचिका में Digital Privacy Law को लेकर क्या आपत्तियां उठाई गई हैं?
DNPA ने कानून की कई धाराओं और DPDP Rules, 2025 के कुछ नियमों को चुनौती दी है। याचिका में डेटा से जुड़े नोटिस और सहमति की शर्तों, निजी जानकारी मिटाने के अधिकार, सरकार की सूचना मांगने की शक्तियों, Data Protection Board की स्वतंत्रता और RTI Act में किए गए बदलाव पर सवाल उठाए गए हैं।
Ambani के Network18 और Adani के NDTV का इस मामले से क्या संबंध है?
Network18, मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह से जुड़ा है, जबकि NDTV, गौतम अदाणी के मीडिया कारोबार का हिस्सा है। दोनों समाचार समूहों के डिजिटल संस्थान DNPA में शामिल हैं। DNPA ने 21 समाचार संगठनों की ओर से पत्रकारिता पर कानून के संभावित प्रभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
Digital Personal Data Protection Act का Investigative Journalism पर क्या असर पड़ सकता है?
प्रकाशकों को आशंका है कि निजी डेटा से जुड़े नियम भ्रष्टाचार, सरकारी अधिकारियों के कथित कदाचार और कॉरपोरेट अनियमितताओं की जांच को मुश्किल बना सकते हैं। उनका कहना है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से कानूनी अनिश्चितता बढ़ सकती है। हालांकि, कानून का वास्तविक प्रभाव उसके प्रावधानों की व्याख्या और लागू होने की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
क्या Privacy Law के तहत पत्रकारों को किसी व्यक्ति की जांच से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है?
कानून में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि हर खोजी रिपोर्ट के लिए संबंधित व्यक्ति की पूर्व सहमति लेना अनिवार्य होगा। हालांकि, DNPA का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से नोटिस और सहमति से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है। इसी कारण प्रकाशक विशेष कानूनी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
इस कानून से Journalists के Confidential Sources की सुरक्षा को लेकर क्या चिंताएं हैं?
DNPA को आशंका है कि सरकार की ओर से डेटा फिड्यूशियरी और मध्यस्थों से जानकारी मांगने की शक्तियों का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर करने के लिए हो सकता है। इससे भ्रष्टाचार या अन्य जनहित के मामलों में जानकारी देने वाले व्हिसलब्लोअर हतोत्साहित हो सकते हैं। यह याचिकाकर्ताओं की आशंका है, न कि अदालत द्वारा स्थापित निष्कर्ष।
Supreme Court में DPDP Act की चुनौती का भारतीय मीडिया पर क्या प्रभाव हो सकता है?
इस मामले का फैसला यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डेटा सुरक्षा के नियमों और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि अदालत पत्रकारिता के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत मानती है, तो इससे समाचार संस्थानों के कामकाज पर असर पड़ सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है; कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।