EU Carbon Tax on Steel: EU के कार्बन टैक्स पर भारत की दोटूक, पीयूष गोयल ने क्यों कहा- यूरोप खुद मुसीबत बुला रहा है?
बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने EU के स्टील पर कार्बन टैक्स और बढ़ते कारोबारी नियमों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इससे उत्पादन लागत और महंगाई बढ़ सकती है तथा यूरोपीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है। भारत के स्टील निर्यातकों पर भी CBAM और आयात शुल्क का असर पड़ सकता है।
EU Carbon Tax on Steel : भारत के केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ (EU) को चेतावनी दी है कि स्टील पर कार्बन टैक्स और लगातार बढ़ते कारोबारी नियम यूरोप की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 22 अक्टूबर को बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में बोलते हुए गोयल ने कहा कि इन नियमों से उद्योगों की लागत बढ़ेगी, महंगाई पर दबाव पड़ेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरोपीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है। उन्होंने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और स्टील आयात पर लगी पाबंदियों को लेकर भी सवाल उठाए।गोयल का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ऐसे नियम नहीं बनने चाहिए, जिनसे कारोबार करना महंगा हो जाए और दूसरे देशों के निर्यातकों के लिए यूरोपीय बाजार में पहुंचना मुश्किल हो। उन्होंने यूरोपीय संघ को आगाह किया कि दूसरे देशों पर व्यापारिक पाबंदियां लगाने के जवाब में वे देश भी अपने नियम सख्त कर सकते हैं। इससे यूरोपीय कंपनियों के कारोबार पर भी असर पड़ सकता है।
गोयल बोले- नियमों का बोझ बढ़ाकर यूरोप खुद कमजोर हो रहा
गोयल ने कहा कि यूरोपीय संघ में नियमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनके मुताबिक, वहां करीब 75 से 77 नियमों और नियामकीय शर्तों का बोझ कारोबारियों पर है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कंपनियों को हर कदम पर नई शर्तों का पालन करना पड़ेगा, तो वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कैसे कर पाएंगी।

मंत्री ने चेतावनी दी कि स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसी औद्योगिक सामग्री महंगी होने का असर केवल फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे बंदरगाहों, एयरपोर्ट, हाईवे, बिजली-पानी की सुविधाओं और पानी की पाइपलाइन जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत भी बढ़ सकती है। गोयल के मुताबिक, CBAM के साथ वनों की कटाई से जुड़े नियम भी कारोबारियों के लिए अतिरिक्त अनुपालन लागत पैदा कर सकते हैं।उन्होंने जर्मनी के ऑटोमोबाइल सेक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले करीब एक दशक में वहां कारों की बिक्री 15 से 20% तक घटी है। उनके अनुसार, यदि औद्योगिक लागत और बढ़ती है, तो यूरोपीय कंपनियों के लिए दूसरे देशों के उत्पादों से मुकाबला करना और मुश्किल हो सकता है। यह बिक्री में गिरावट और भविष्य के जोखिम को लेकर गोयल का बयान है।
CBAM क्या है, जिससे भारत को भी चिंता?
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM यूरोपीय संघ की ऐसी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य आयातित वस्तुओं में शामिल कार्बन उत्सर्जन की लागत को यूरोप में उत्पादित वस्तुओं पर लागू कार्बन लागत के करीब लाना है। यूरोपीय संघ का तर्क है कि इससे कंपनियां केवल कम पर्यावरणीय लागत वाले देशों में उत्पादन करके प्रतिस्पर्धात्मक फायदा नहीं उठा सकेंगी और स्वच्छ उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।इस व्यवस्था का संक्रमणकालीन चरण 2023 से 2025 तक चला। 1 जनवरी 2026 से CBAM अपने स्थायी चरण में लागू है। इसके तहत निर्धारित वस्तुओं के आयातकों को संबंधित उत्पादों में शामिल कार्बन उत्सर्जन की जानकारी देनी होती है और लागू नियमों के अनुसार CBAM सर्टिफिकेट खरीदकर जमा करने पड़ सकते हैं। इसके दायरे में आयरन और स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
भारत के लिए यह इसलिए अहम है, क्योंकि स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे उत्पाद यूरोपीय बाजार में भेजने वाली कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित उत्पाद में कितना कार्बन उत्सर्जन हुआ है, उसकी गणना कैसे की गई है और लागू नियमों के तहत कितनी लागत बनती है। इसलिए हर भारतीय निर्यातक पर एक समान दर से टैक्स लगने की बात कहना सही नहीं होगा।
स्टील पर 50% आयात शुल्क और CBAM अलग-अलग व्यवस्था
यूरोपीय संघ ने स्टील आयात को लेकर एक अलग व्यापारिक व्यवस्था भी लागू की है। 1 जुलाई 2026 से नई टैरिफ-रेट कोटा व्यवस्था के तहत तय सीमा के भीतर स्टील आयात पर शुल्क-मुक्त सुविधा उपलब्ध है। निर्धारित कोटा से ज्यादा आयात पर संबंधित श्रेणियों में 50% शुल्क लागू हो सकता है। यह शुल्क व्यवस्था CBAM से अलग है।इस अंतर को समझना जरूरी है। CBAM का संबंध आयातित उत्पाद में शामिल कार्बन उत्सर्जन की लागत से है, जबकि स्टील आयात शुल्क और कोटा व्यवस्था का मकसद आयात को नियंत्रित करना और यूरोपीय स्टील उद्योग को संरक्षण देना है। दोनों व्यवस्थाओं का एक साथ असर पड़ने पर कुछ आयातकों और निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है।
भारत ने इन नियमों पर चिंता जताई है। गोयल के मुताबिक, विकसित देशों को पर्यावरण संरक्षण के साथ विकासशील देशों की जरूरतों और उनकी अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में करीब 3 से 3.5% योगदान देता है, जबकि दुनिया की लगभग 17% आबादी यहां रहती है।
वनों की कटाई से जुड़े नियम भी कारोबारियों के लिए चुनौती
गोयल ने यूरोपीय संघ के एंटी-डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन (EUDR) का भी जिक्र किया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूरोपीय बाजार में आने वाले निर्धारित उत्पाद हाल में जंगलों की कटाई या वन क्षरण से जुड़ी जमीन से प्राप्त न हुए हों। इसके तहत संबंधित उत्पादों की उत्पत्ति और सप्लाई चेन का पता लगाने के लिए दस्तावेज और अन्य जानकारी देनी पड़ सकती है।इसका असर रबर, लकड़ी, कॉफी, कोको, सोया और पाम ऑयल जैसी वस्तुओं तथा उनसे बने कुछ उत्पादों से जुड़े कारोबार पर पड़ सकता है। यूरोपीय संघ की मौजूदा समय-सारणी के अनुसार, इस नियम का अनुपालन बड़े और मध्यम कारोबारियों के लिए 30 दिसंबर 2026 से और अधिकांश सूक्ष्म एवं छोटे कारोबारियों के लिए 30 जून 2027 से लागू होना निर्धारित है।
भारत का कहना है कि ऐसे नियमों के कारण निर्यातकों को ट्रेसबिलिटी, दस्तावेजीकरण और अनुपालन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, यूरोपीय संघ इन नियमों को पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति का हिस्सा मानता है।
भारत-EU ट्रेड डील से कारोबार को नई दिशा की उम्मीद
गोयल ने कहा कि भारत अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के साथ दूसरे देशों के साथ संतुलित और पारस्परिक लाभ वाले व्यापारिक संबंध बनाने पर ध्यान दे रहा है। उन्होंने सिंगापुर का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ऐसे साझेदारों के साथ भी कारोबार कर रहा है, जहां CBAM और वनों की कटाई से जुड़े इसी तरह के नियम नहीं हैं।भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर भी बातचीत अहम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। गोयल ने 22 अक्टूबर को कहा कि समझौते पर 2026 के अंत तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है और जरूरी प्रक्रियाओं के बाद यह 2027 की पहली तिमाही में लागू हो सकता है। हालांकि, इसके लिए संबंधित प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी है।
इस समझौते से दोनों पक्षों के कारोबार को बाजार तक पहुंच और निवेश के नए अवसर मिल सकते हैं। लेकिन भारतीय स्टील निर्यातकों के लिए यूरोपीय संघ के कार्बन नियम और आयात शुल्क की व्यवस्था अलग चुनौती बनी रहेगी। आगे उनका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां उत्सर्जन कम करने, लागत नियंत्रित रखने और नए अनुपालन मानकों को पूरा करने के लिए कितनी तेजी से तैयारी करती हैं।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Piyush Goyal ने EU के Carbon Tax on Steel को लेकर क्या चेतावनी दी है?
पीयूष गोयल ने कहा कि स्टील पर कार्बन टैक्स और बढ़ते कारोबारी नियम यूरोप में उत्पादन लागत बढ़ा सकते हैं। इससे महंगाई बढ़ने और यूरोपीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर होने का खतरा है।
EU का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) क्या है?
CBAM यूरोपीय संघ की ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत कुछ आयातित वस्तुओं में शामिल कार्बन उत्सर्जन की लागत को यूरोप में उत्पादित वस्तुओं पर लागू कार्बन लागत के करीब लाने की कोशिश की जाती है। यह व्यवस्था 1 जनवरी 2026 से अपने स्थायी चरण में लागू है।
European Union के Carbon Tax का Indian Steel Exporters पर क्या असर पड़ सकता है?
भारतीय स्टील निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है। इसका वास्तविक असर उत्पाद के कार्बन उत्सर्जन, लागू नियमों और संबंधित आयातक पर पड़ने वाली लागत पर निर्भर करेगा। इससे यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
EU में Steel Imports पर Carbon Tax लगाने का मुख्य उद्देश्य क्या है?
यूरोपीय संघ का उद्देश्य आयातित वस्तुओं में शामिल कार्बन उत्सर्जन की लागत को अपने कार्बन मूल्य निर्धारण सिस्टम के करीब लाना और कंपनियों को स्वच्छ उत्पादन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
CBAM से Indian Steel Industry की Export Cost कैसे बढ़ सकती है?
CBAM के तहत लागू होने वाली कार्बन लागत, उत्सर्जन की रिपोर्टिंग और अनुपालन संबंधी जरूरतों से निर्यात की कुल लागत बढ़ सकती है। हालांकि, लागत का स्तर उत्पाद और लागू नियमों के अनुसार अलग-अलग होगा।
India-EU Free Trade Agreement का Steel और अन्य Industrial Exports पर क्या असर होगा?
मुक्त व्यापार समझौते से बाजार तक पहुंच और व्यापार के अवसर बढ़ सकते हैं। लेकिन इससे CBAM या स्टील आयात से जुड़े दूसरे नियम अपने आप खत्म नहीं होंगे। वास्तविक लाभ समझौते की शर्तों और लागू प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
क्या EU का Carbon Tax भारतीय कंपनियों की European Market में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है?
हां, कार्बन लागत और अनुपालन पर अतिरिक्त खर्च भारतीय कंपनियों के उत्पादों को महंगा बना सकता है। हालांकि, असर हर कंपनी और उत्पाद पर समान नहीं होगा; यह उत्सर्जन स्तर, उत्पादन प्रक्रिया और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।