भारत में प्रदूषण से 20 लाख से ज्यादा मौतें! सांसों पर संकट, दिल्ली से यूपी तक घट रही जिंदगी
2023 में भारत में वायु प्रदूषण से 20 लाख से अधिक मौतें जुड़ी थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन से करीब 10 गुना है। प्रदूषण से न केवल सेहत, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी भारी असर पड़ रहा है।
भारत में Air Pollution Deaths in India यानी वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों के आंकड़े देश के सामने गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की तस्वीर पेश करते हैं। 9 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित Earth5R Environmental Research की रिपोर्ट में उद्धृत स्वतंत्र शोध के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से 20 लाख से अधिक मौतें जुड़ी थीं। वहीं, एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुमान के मुताबिक, यदि भारत में सूक्ष्म कणों का प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों तक आ जाए, तो औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा करीब 3.5 साल बढ़ सकती है। समस्या की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि IQAir की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पीएम2.5 का औसत स्तर 48.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा, जबकि डब्ल्यूएचओ की वार्षिक गाइडलाइन केवल 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। यानी प्रदूषण का स्तर निर्धारित सीमा से लगभग 10 गुना अधिक रहा।
भारत में वायु प्रदूषण का संकट कितना गंभीर है?

IQAir की 2025 विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में 143 देशों के बीच भारत को प्रदूषण के मामले में छठे स्थान पर रखा गया। वर्ष 2024 में भारत का औसत पीएम2.5 स्तर 50.6 था, जो 2025 में घटकर 48.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हुआ। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं थी।पीएम2.5 हवा में मौजूद बेहद महीन कण होते हैं, जो फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं। इनसे हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।पर्यावरणविद् और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), दिल्ली के अकादमिक काउंसलर डॉ. शैलेंद्र कुमार ने ईटीवी भारत से बातचीत में कहा कि वायु प्रदूषण अब केवल सर्दियों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे साल बना रहने वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। उनके मुताबिक, अलग-अलग स्वतंत्र अध्ययनों के निष्कर्ष भी इसी खतरे की ओर इशारा करते हैं।
Air Pollution Deaths in India: दिल्ली से यूपी तक जीवन पर असर
प्रदूषण का सबसे गंभीर असर भारत के कई शहरों में दिखाई देता है। 2025 में दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में पांच भारत में थे। गाजियाबाद जिले का लोनी 112.5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के औसत पीएम2.5 स्तर के साथ दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर रहा। दिल्ली चौथे, गाजियाबाद सातवें और उला दसवें स्थान पर थे, जबकि असम-मेघालय सीमा पर स्थित बर्नीहाट तीसरे स्थान पर रहा। दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में 66 भारत में थे। नई दिल्ली लगातार आठवें साल दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी रही।एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार, यदि पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों तक पहुंच जाए, तो दिल्ली के निवासियों की जीवन प्रत्याशा 8.2 साल, बिहार में 5.6 साल, हरियाणा में 5.3 साल और उत्तर प्रदेश में पांच साल तक बढ़ सकती है।वहीं, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आधिकारिक निगरानी आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच सर्दियों में औसत पीएम2.5 स्तर गाजियाबाद में 172, नोएडा में 166 और दिल्ली में 163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। इसी अवधि में कोलकाता में यह 78, मुंबई में 48, चेन्नई में 44 और बेंगलुरु में 39 रहा।
प्रदूषण से मौतों के पीछे क्या हैं प्रमुख कारण?
जीवाश्म ईंधन, कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना, पराली और घरेलू स्तर पर ठोस ईंधन का इस्तेमाल वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।लैंसेट काउंटडाउन के अनुमान के अनुसार, 2022 में भारत में मानव गतिविधियों से पैदा हुए पीएम2.5 प्रदूषण से जुड़ी मौतों में 44 प्रतिशत हिस्सेदारी जीवाश्म ईंधन की थी। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़ी 2.98 लाख मौतें और सड़क परिवहन में पेट्रोल के इस्तेमाल से जुड़ी 2.69 लाख मौतें अनुमानित की गई थीं।सर्दियों में कम हवा और तापमान की उलट स्थिति प्रदूषकों को जमीन के करीब रोक सकती है, लेकिन प्रदूषण पैदा होने की वजह केवल मौसम नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे साल उत्सर्जन के स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है।
प्रदूषण से अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान
वायु प्रदूषण का असर स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लैंसेट काउंटडाउन के अनुसार, 2022 में बाहरी वायु प्रदूषण से जुड़ी समय से पहले हुई मौतों का आर्थिक मूल्य भारत की जीडीपी के 9.5 प्रतिशत के बराबर, यानी 339.4 अरब डॉलर आंका गया। एक अन्य अनुमान में 2019 के दौरान समय से पहले मौतों और बीमारी के कारण उत्पादकता का नुकसान 36.8 अरब डॉलर बताया गया।रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और 15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदान के तहत 13,415 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिनमें से 9,929 करोड़ रुपये खर्च हुए। सीआरईए के विश्लेषण में खर्च का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा सड़क की धूल नियंत्रण पर, 14 प्रतिशत परिवहन पर और 12 प्रतिशत कचरे व जैविक अवशेष जलाने से जुड़ी समस्याओं पर खर्च हुआ।विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि क्या सड़क की धूल पर अधिक खर्च करने से प्रदूषण के दूसरे बड़े स्रोतों पर पर्याप्त कार्रवाई हो पा रही है। उनका सुझाव है कि स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, कचरा प्रबंधन और वैज्ञानिक निगरानी पर भी लगातार काम किया जाए।
निष्कर्ष
Air Pollution Deaths in India के आंकड़े बताते हैं कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सर्दियों में अस्थायी पाबंदियां लगाने के बजाय पूरे साल प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, पारदर्शी निगरानी और सरकारी खर्च की जवाबदेही तय करनी होगी। लक्ष्य केवल प्रदूषण के आंकड़े घटाना नहीं, बल्कि लोगों की प्रदूषित हवा में सांस लेने की मजबूरी कम करना होना चाहिए।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारत में वायु प्रदूषण से कितनी मौतें जुड़ी हैं?
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से 20 लाख से अधिक मौतें जुड़ी थीं।
पीएम2.5 प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक क्यों है?
पीएम2.5 के महीन कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं। इससे हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
वायु प्रदूषण से जीवन प्रत्याशा कितनी घट सकती है?
एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुमान के मुताबिक, यदि भारत में पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों तक आ जाए, तो औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा करीब 3.5 साल बढ़ सकती है।
भारत में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण क्या हैं?
जीवाश्म ईंधन, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, कचरा जलाना, पराली और घरेलू ठोस ईंधन इसके प्रमुख स्रोत हैं।