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DGCA Green Aviation Fuel Norms Ready : 2027 से विमानों के ईंधन में 1% ग्रीन फ्यूल मिलाने की तैयारी, क्या महंगा होगा हवाई सफर?

भारत में 2027 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के ATF में 1% SAF मिलाने का प्रस्ताव है। लक्ष्य 2030 तक 5% और 2040 तक 20% करने का है। SAF पारंपरिक जेट फ्यूल से 2-3 गुना महंगा है, जिससे एयरलाइंस की लागत और टिकट किराये बढ़ सकते हैं।

DGCA Green Aviation Fuel Norms Ready : 2027 से विमानों के ईंधन में 1% ग्रीन फ्यूल मिलाने की तैयारी, क्या महंगा होगा हवाई सफर?

DGCA Green Aviation Fuel Norms Ready : भारत में हवाई यात्रा को पर्यावरण के लिहाज से कम नुकसानदेह बनाने के लिए सरकार सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के इस्तेमाल की तैयारी कर रही है। नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने नेशनल पॉलिसी ऑन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। इसमें जनवरी 2027 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) में 1% SAF मिलाना प्रस्तावित है। यह हिस्सा 2030 तक बढ़ाकर 5% और 2040 तक 20% करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, ड्राफ्ट को अभी नागरिक उड्डयन मंत्रालय की मंजूरी मिलनी बाकी है। इसलिए इसे फिलहाल अंतिम नीति नहीं माना जा सकता।

2027 से 2030 तक हर साल बढ़ेगी ग्रीन फ्यूल की मात्रा

ड्राफ्ट के मुताबिक, नीति को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहला चरण 2027 से 2030 तक होगा। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के ईंधन में SAF मिलाने का लक्ष्य 2027 में 1%, 2028 में 2%, 2029 में 3% और 2030 में 5% रखा गया है।दूसरा चरण 2031 से 2040 तक चलेगा। इस अवधि के लिए 2040 तक 20% SAF इस्तेमाल करने का लक्ष्य प्रस्तावित है। हालांकि, 2030 के बाद के लक्ष्य अभी संकेतात्मक हैं। इनके आधार पर अगले चरण की अनिवार्य मात्रा तय करने में प्रस्तावित नेशनल काउंसिल ऑन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (NC-SAF) की भूमिका होगी।
इस नीति के तहत केवल भारत में बना SAF ही पारंपरिक विमान ईंधन में मिलाया जाएगा। ईंधन कंपनियां इसे SAF बनाने वाली यूनिट, रिफाइनरी या बीच के स्टोरेज सेंटर पर ATF में मिलाकर एयरपोर्ट तक पहुंचाएंगी। प्रस्ताव में एयरलाइंस के लिए यह शर्त भी रखी गई है कि वे अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की सालाना ईंधन जरूरत का कम से कम 90% भारत के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से पूरा करें। इसका मकसद 'इकनॉमिक टैंकरिंग' रोकना है। इसमें एयरलाइंस सस्ता ईंधन लेने के लिए किसी दूसरे देश से जरूरत से ज्यादा ईंधन लेकर उड़ान भरती हैं।
घरेलू उड़ानों, नॉन-शेड्यूल्ड अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटरों और यात्रियों या माल के बिना चलने वाली मानवीय सहायता, मेडिकल, इमरजेंसी और मेंटेनेंस उड़ानों को इस अनिवार्यता से छूट देने का प्रस्ताव है।

खेती के कचरे और इस्तेमाल किए तेल से बनेगा SAF

सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल एक तरह का वैकल्पिक विमान ईंधन है, जिसे खेती से निकलने वाले अवशेष, इस्तेमाल किया हुआ कुकिंग ऑयल, जैविक कचरे और दूसरे वेस्ट मटेरियल से बनाया जा सकता है। कुछ तकनीकों में ग्रीन हाइड्रोजन, रिन्यूएबल बिजली और कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल करके भी इसे तैयार किया जाता है।SAF को तय तकनीकी मानकों के मुताबिक तैयार और प्रमाणित किया जाता है। यह पारंपरिक ATF के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है और इसके लिए विमानों के मौजूदा इंजन या डिजाइन में बदलाव की जरूरत नहीं होती। उत्पादन के तरीके के आधार पर पारंपरिक जेट फ्यूल की तुलना में इसके इस्तेमाल से जीवनचक्र के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 80% तक कमी आ सकती है।
सरकार का उद्देश्य केवल विदेश से SAF खरीदना नहीं, बल्कि देश में इसका उत्पादन और सप्लाई चेन तैयार करना भी है। ड्राफ्ट के अनुमान के मुताबिक, 2030 तक भारत में ATF की कुल खपत करीब 1.42 करोड़ टन हो सकती है। इसमें से लगभग 77 लाख टन खपत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में होगी। वहीं, 2040 तक भारत में सालाना करीब 1 करोड़ टन SAF उत्पादन की क्षमता विकसित करने का अनुमान है। इसके लिए 70 से 85 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत पड़ सकती है।

सामान्य जेट फ्यूल से 2-3 गुना महंगा, एयरलाइंस पर बढ़ेगा खर्च

SAF की सबसे बड़ी चुनौती इसकी कीमत है। ड्राफ्ट के मुताबिक, यह पारंपरिक विमान ईंधन से करीब 2 से 3 गुना महंगा हो सकता है। ऐसे में एयरलाइंस को शुरुआत में कम मात्रा में SAF इस्तेमाल करने पर भी अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। सरकार शुरुआती दौर में ईंधन कंपनियों को उत्पादन के लिए प्रोत्साहन देने की व्यवस्था पर विचार कर रही है। इसके तहत करीब 500 करोड़ रुपये का SAF इनोवेशन सीड फंड बनाने का प्रस्ताव भी सामने आया है।मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की सितंबर तिमाही में इंडिगो को 1,879.1 करोड़ रुपये का नेट लॉस हुआ था। इसी अवधि में उसका फ्यूल बिल 67.2% बढ़कर 9,966.8 करोड़ रुपये पहुंच गया। ऐसे में SAF की बढ़ती हिस्सेदारी एयरलाइंस के खर्च पर और दबाव डाल सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआत में 1% ब्लेंडिंग से कुल ईंधन खर्च पर असर सीमित रह सकता है, लेकिन 2030 तक यह हिस्सा 5% होने पर लागत बढ़ेगी। एयरलाइंस इस अतिरिक्त खर्च को टिकट की कीमतों में शामिल करती हैं तो हवाई यात्रा कुछ महंगी हो सकती है। हालांकि, किरायों पर वास्तविक असर SAF की उपलब्धता, कीमत, सरकारी सहायता और बाजार में प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करेगा। अभी टिकटों की कीमत में कितनी बढ़ोतरी होगी, इसका पक्का अनुमान नहीं है।

DGCA के तहत बनेगा SAF रजिस्ट्री सिस्टम

ड्राफ्ट में DGCA के तहत नेशनल SAF रजिस्ट्री बनाने का प्रस्ताव है। इसके जरिए SAF के उत्पादन, खरीद-बिक्री, ATF में ब्लेंडिंग और उससे होने वाली उत्सर्जन में कमी का रिकॉर्ड रखा जाएगा। हर लेनदेन को डिजिटल तरीके से ट्रैक और वेरिफाई किया जा सकेगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि ईंधन कहां बना, किस कच्चे माल से तैयार हुआ और उससे उत्सर्जन में कितनी कमी आई।इसके अलावा नेशनल काउंसिल ऑन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (NC-SAF) बनाने का प्रस्ताव है। इसकी सह-अध्यक्षता पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सचिव करेंगे। काउंसिल नीति के क्रियान्वयन, निगरानी और अलग-अलग मंत्रालयों के बीच तालमेल का काम करेगी।
ईंधन कंपनियों और एयरक्राफ्ट ऑपरेटरों के लिए तय नियमों का पालन जरूरी होगा। ऐसा नहीं करने पर जुर्माना लगाया जा सकता है। एयरपोर्ट अथॉरिटी और ऑपरेटरों को SAF के स्टोरेज, हैंडलिंग और सप्लाई के लिए जरूरी सुविधाएं तैयार करनी होंगी। सरकार शुरुआती चरण में उत्पादन बढ़ाने के लिए वित्तीय और टैक्स से जुड़ी सहायता पर भी विचार कर रही है। यह नीति नेशनल बायोफ्यूल पॉलिसी 2018 के तहत लागू की जाएगी।

CORSIA से जुड़ा है भारत का ग्रीन फ्यूल लक्ष्य

SAF नीति का एक बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) की CORSIA व्यवस्था है। इसका पूरा नाम कार्बन ऑफसेटिंग एंड रिडक्शन स्कीम फॉर इंटरनेशनल एविएशन है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन की निगरानी की जाती है और तय आधार स्तर से अधिक उत्सर्जन की भरपाई के लिए एयरलाइंस को कार्बन क्रेडिट या अन्य मान्य उपाय अपनाने होते हैं।CORSIA का अनिवार्य चरण 2027 से शुरू होगा। इसमें भारत के अंतरराष्ट्रीय उड़ान संचालन करने वाले एयरलाइंस भी शामिल होंगे। SAF के इस्तेमाल से उत्सर्जन कम होता है, इसलिए एयरलाइंस की ऑफसेटिंग जरूरत घट सकती है। हालांकि, CORSIA के तहत 2027 से SAF मिलाना अपने आप में अनिवार्य नहीं है। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए SAF ब्लेंडिंग के जो लक्ष्य तय करने का प्रस्ताव दिया है, वे देश की अलग नीति का हिस्सा हैं।
फिलहाल SAF पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार है और इसे अंतिम रूप देने से पहले मंत्रालय की मंजूरी और आगे की प्रक्रिया बाकी है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत में पर्याप्त मात्रा में सस्ता SAF तैयार हो, उसकी गुणवत्ता की जांच और प्रमाणन हो तथा रिफाइनरी से लेकर एयरपोर्ट तक पूरी सप्लाई चेन समय पर तैयार की जा सके।

FAQ (Frequently Asked Questions):

DGCA की ग्रीन एविएशन फ्यूल पॉलिसी क्या है?

यह भारत में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए पारंपरिक विमान ईंधन ATF में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) मिलाने की प्रस्तावित नीति है। इसका उद्देश्य विमानन क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना और देश में ग्रीन फ्यूल का उत्पादन बढ़ाना है।

भारत में विमानों के ईंधन में Sustainable Aviation Fuel की कितनी मात्रा मिलाई जाएगी?

ड्राफ्ट के अनुसार, 2027 में 1%, 2028 में 2%, 2029 में 3% और 2030 में 5% SAF मिलाने का प्रस्ताव है। 2040 तक इसे 20% करने का लक्ष्य रखा गया है।

2027 से विमानों के ईंधन में कितना SAF मिलाना प्रस्तावित है?

जनवरी 2027 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले ATF में 1% SAF मिलाने का प्रस्ताव है।

2030 और 2040 तक SAF ब्लेंडिंग का लक्ष्य क्या है?

2030 तक 5% और 2040 तक 20% SAF ब्लेंडिंग का लक्ष्य प्रस्तावित है। 2030 के बाद के लक्ष्य अभी संकेतात्मक हैं और आगे की अनिवार्य मात्रा तय की जानी है।

Sustainable Aviation Fuel कैसे बनाया जाता है?

SAF को खेती के अवशेष, इस्तेमाल किए हुए कुकिंग ऑयल, जैविक कचरे और अन्य वेस्ट मटेरियल से बनाया जा सकता है। कुछ तकनीकों में ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल बिजली का भी इस्तेमाल होता है।

क्या ग्रीन एविएशन फ्यूल से हवाई टिकट महंगे हो सकते हैं?

हां, इसकी वजह से एयरलाइंस की ईंधन लागत बढ़ सकती है। SAF सामान्य जेट फ्यूल से करीब 2-3 गुना महंगा है। एयरलाइंस अतिरिक्त खर्च यात्रियों पर डालती हैं तो टिकट के दाम बढ़ सकते हैं, हालांकि इसका वास्तविक असर अभी तय नहीं है।

CORSIA क्या है और भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

CORSIA ICAO की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने की व्यवस्था है। इसका अनिवार्य चरण 2027 से शुरू होगा। भारत की अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी इसके दायरे में आएंगी। SAF के इस्तेमाल से उत्सर्जन और उसकी भरपाई के लिए जरूरी ऑफसेट कम करने में मदद मिल सकती है।

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