पांच साल में सिर्फ 45 दिन चली उत्तराखंड विधानसभा! आखिर जनता के मुद्दों पर चर्चा से क्यों बच रहा सदन?
उत्तराखंड विधानसभा की बैठकों के दिन हर कार्यकाल के साथ घटते गए हैं। 2022 से 2026 के बीच पांचवीं विधानसभा की कार्यवाही केवल 45 दिन चली, जबकि 2007 से 2012 के दौरान सदन 105 दिन बैठा था। इससे विधायी कामकाज और सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
लोकतंत्र में विधानसभा सिर्फ कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछने और जनता की समस्याओं पर चर्चा करने का सबसे बड़ा मंच भी है। लेकिन उत्तराखंड में इस मंच के कामकाज के दिनों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। Uttarakhand Assembly Session Days के आंकड़े बताते हैं कि राज्य की पांचवीं विधानसभा ने 2022 से 2026 के बीच केवल 45 दिन काम किया। यानी औसतन साल में सिर्फ नौ दिन सदन की कार्यवाही चली। इसके मुकाबले 2007 से 2012 के बीच दूसरी विधानसभा ने कुल 105 दिन बैठकें की थीं।
Uttarakhand Assembly 45 Days: पांच कार्यकालों में कैसे घटती गईं बैठकें?

उत्तराखंड विधानसभा के पांचों कार्यकाल के आंकड़े बताते हैं कि सदन के कामकाज के दिनों में लगातार उतार-चढ़ाव के साथ गिरावट आई है। सबसे ज्यादा बैठकें दूसरी विधानसभा के कार्यकाल में हुईं, जबकि मौजूदा पांचवीं विधानसभा में अब तक सबसे कम दिन सदन चला है।
| विधानसभा का कार्यकालकुल बैठक के दिन2002–200783 दिन2007–2012105 दिन2012–201772 दिन2017–202261 दिन2022–202645 दिन |
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पहली विधानसभा में औसतन हर साल 16.6 दिन सदन चला था। दूसरी विधानसभा में यह औसत 21 दिन रहा। तीसरी विधानसभा में घटकर 14.4 दिन और चौथी में 12.2 दिन रह गया। वहीं, पांचवीं विधानसभा में औसत सिर्फ नौ दिन सालाना दर्ज किया गया। यह आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में Uttarakhand Legislative Assembly Sessions की अवधि लगातार कम होती गई है।
2022 से 2026 तक किस साल कितने दिन चली विधानसभा?
पांचवीं विधानसभा का अंतिम सत्र 28 अक्टूबर 2026 को संपन्न हुआ। इस कार्यकाल में साल-दर-साल सदन की बैठकों का ब्योरा भी चिंता बढ़ाता है।
2022: विधानसभा आठ दिन चली।
2023: सदन की कार्यवाही 10 दिन हुई।
2024: कुल 10 दिन बैठक हुई, जिसमें समान नागरिक संहिता (UCC) पर विशेष सत्र भी शामिल था।
2025: विधानसभा 10 दिन चली।
2026: सदन की कार्यवाही केवल सात दिन हुई।
इन सत्रों में बजट, मानसून और अनुपूरक बजट से जुड़ी बैठकें शामिल थीं। इसके अलावा 2024 में समान नागरिक संहिता को लेकर विशेष सत्र भी आयोजित किया गया था। इस तरह 2022 से 2026 के बीच कुल 45 दिन सदन की कार्यवाही चली।
60 दिन का नियम, फिर भी विधानसभा इतनी कम क्यों बैठी?
उत्तराखंड विधानसभा की कार्य संचालन नियमावली में सालाना 60 बैठक दिवस का मानक बताया गया है। हालांकि, इसे बाध्यकारी कानूनी न्यूनतम सीमा मानना सही नहीं होगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 174 यह प्रावधान करता है कि विधानसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए, लेकिन संविधान साल में कुल बैठक दिनों की कोई निश्चित संख्या तय नहीं करता।इसके बावजूद उत्तराखंड में सदन की कार्यवाही का औसत इस मानक से काफी नीचे रहा है। कम बैठकें होने का मतलब यह है कि विधायकों को बजट, सरकारी नीतियों, विधेयकों और अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए सीमित समय मिलता है। विधानसभा की बैठकें कम होने से विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और उसके फैसलों की समीक्षा करने के अवसर भी सीमित हो सकते हैं। हालांकि, केवल बैठक के दिनों की संख्या से सदन में हुई बहस की गुणवत्ता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
दूसरे राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड की स्थिति कितनी कमजोर?
देहरादून स्थित एसडीसी फाउंडेशन ने पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की वार्षिक रिपोर्टों के आधार पर उत्तराखंड विधानसभा के कामकाज का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इसकी तथ्यपत्रिका Comparative Performance of Uttarakhand Assembly: Gaps and Challenges के मुताबिक, 2024 में उत्तराखंड विधानसभा केवल 10 दिन बैठी, जबकि अध्ययन में शामिल विधानसभाओं का औसत 20 दिन था। इसी वर्ष ओडिशा विधानसभा 42 दिन, केरलम 38 दिन और पश्चिम बंगाल 36 दिन बैठी थी। उत्तराखंड उन राज्यों में शामिल रहा जहां सदन की बैठकें सबसे कम हुईं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में उत्तराखंड विधानसभा में कुल 60 घंटे कार्यवाही हुई और 28 राज्यों के बीच यह 22वें स्थान पर रही।2017 से 2024 के बीच उत्तराखंड विधानसभा औसतन साल में 12 दिन बैठी, जबकि इसी अवधि में केरलम में यह औसत 44 दिन और ओडिशा में 40 दिन था।एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने विधानसभा की कम बैठकों को गंभीर चिंता का विषय बताया। उनके मुताबिक, लोकतंत्र की आत्मा जवाबदेही में है और जब सरकार तथा जनप्रतिनिधि साल में कुछ ही दिन सदन में मिलते हैं, तो शासन और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़े होते हैं।
निष्कर्ष
Uttarakhand Assembly Session Days में लगातार गिरावट केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है। 2007–2012 में 105 दिन बैठने वाली विधानसभा का 2022–2026 के दौरान केवल 45 दिन काम करना चिंता पैदा करता है। सदन में पर्याप्त समय मिलने से विधायकों को जनता के मुद्दे उठाने, सरकारी फैसलों की समीक्षा करने और कानूनों पर गंभीर चर्चा करने का अवसर मिलता है। अब सवाल है कि उत्तराखंड की आने वाली विधानसभा इस गिरावट को रोकने के लिए कितने प्रभावी कदम उठाती है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
पिछले पांच वर्षों में उत्तराखंड विधानसभा का सत्र केवल 45 दिन चलने की बात क्यों कही जा रही है?
2022 से 2026 के बीच पांचवीं विधानसभा की कुल कार्यवाही 45 दिन दर्ज की गई। यह आंकड़ा पांचवीं विधानसभा के अंतिम सत्र के समापन तक का है। इस दौरान औसतन हर साल केवल नौ दिन सदन चला।
उत्तराखंड विधानसभा में सालाना कितने दिन बैठकें होती हैं?
2022 से 2026 के बीच उत्तराखंड विधानसभा औसतन नौ दिन सालाना बैठी। अलग-अलग वर्षों में 2022 में आठ, 2023 में 10, 2024 में 10, 2025 में 10 और 2026 में सात दिन कार्यवाही हुई।v
भारतीय संविधान में राज्य विधानसभा के सत्रों को लेकर क्या प्रावधान हैं?
संविधान के अनुच्छेद 174 के अनुसार, विधानसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। हालांकि, संविधान साल में कुल कितने दिन सदन की बैठक होनी चाहिए, इसकी कोई निश्चित संख्या तय नहीं करता।
विधानसभा की कम बैठकों का कानून निर्माण और सरकार की जवाबदेही पर क्या प्रभाव पड़ता है?
कम बैठकें होने से विधेयकों पर विस्तृत चर्चा, बजट की जांच, जनता की समस्याओं को उठाने और सरकार से सवाल पूछने के अवसर सीमित हो सकते हैं। इससे विधायी निगरानी प्रभावित होने की आशंका रहती है।
उत्तराखंड विधानसभा के सत्र की अवधि बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
विधानसभा का वार्षिक कैलेंडर पहले से तय करना, बजट और मानसून सत्र की अवधि बढ़ाना, लंबित विधायी कार्यों के लिए अतिरिक्त बैठकें बुलाना और सदन में नियमित चर्चा सुनिश्चित करना उपयोगी कदम हो सकते हैं।