भारत में महिलाओं की मौत का रिकॉर्ड तक नहीं! 122 जिलों में 40% से भी कम पंजीकरण, जानिए क्यों छूट जाती हैं हजारों जिंदगियां
भारत में करीब हर तीन में से एक मौत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाती। NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं की मौत का पंजीकरण पुरुषों से 9 प्रतिशत अंक कम है। जाति, गरीबी, उम्र और ग्रामीण-शहरी अंतर इस असमानता को और गहरा करते हैं।
किसी परिवार में मौत होने पर अंतिम संस्कार और दूसरे रीति-रिवाजों के बीच एक जरूरी प्रक्रिया अक्सर पीछे छूट जाती है - मृत्यु का सरकारी पंजीकरण। इसका असर सिर्फ सरकारी आंकड़ों पर नहीं पड़ता, बल्कि संपत्ति के उत्तराधिकार, पेंशन, बीमा और दूसरे कानूनी अधिकारों पर भी पड़ सकता है। Female Death Registration in India को लेकर सामने आई रिसर्च बताती है कि देश में महिलाओं की मौत दर्ज होने की संभावना पुरुषों से कम है। यानी लैंगिक असमानता का असर जीवन के बाद भी खत्म नहीं होता।
भारत में हर तीन में से एक मौत सरकारी रिकॉर्ड से बाहर

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, परिवारों द्वारा बताई गई कुल मौतों में से 70.8 प्रतिशत का ही नागरिक अधिकारियों के पास पंजीकरण हुआ था। इसका मतलब है कि सर्वे में दर्ज लगभग 30 प्रतिशत मौतें सरकारी रिकॉर्ड में शामिल नहीं थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के बुलेटिन में प्रकाशित नंदिता सैकिया और उनके सहयोगियों के अध्ययन में देशभर की 84,390 मौतों का विश्लेषण किया गया। इसमें भौगोलिक और लैंगिक असमानता सामने आई। देश के 707 जिलों में से 122 जिलों में महिलाओं की 40 प्रतिशत से भी कम मौतें दर्ज हुईं। बिहार के 38 में से 37 जिलों में महिलाओं की मृत्यु पंजीकरण दर 60 प्रतिशत से नीचे रही। झारखंड के सभी जिलों में यह स्तर 60 प्रतिशत से कम था। अरुणाचल प्रदेश के कुरुंग कुमे जिले में महिलाओं की केवल 5 प्रतिशत मौतें ही दर्ज हो पाईं।
Female Death Registration in India: पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का रिकॉर्ड कमजोर क्यों?
NFHS-5 के अनुसार, पुरुषों की करीब 73 प्रतिशत मौतों का पंजीकरण हुआ, जबकि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा सिर्फ 64 प्रतिशत था। यानी दोनों के बीच 9 प्रतिशत अंकों का अंतर है। 2025 में PLOS ONE में प्रकाशित शीटल वर्मा और उनके सहयोगियों के अध्ययन ने भी इस लैंगिक अंतर की पुष्टि की। रिसर्च के मुताबिक, संपन्न परिवारों में मृत्यु पंजीकरण की दर बेहतर थी, लेकिन लगभग हर आर्थिक वर्ग में महिलाओं की मौत दर्ज होने की संभावना पुरुषों से कम रही। इसके पीछे संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। घर या कृषि भूमि के स्वामित्व और संपत्ति के हस्तांतरण के दौरान पुरुष की मृत्यु का प्रमाणपत्र परिवार के लिए अधिक तत्काल जरूरी हो सकता है। गुजरात पर अगस्त 2026 में Frontiers in Public Health में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी इस पहलू की पड़ताल की। इसमें संपत्ति के उत्तराधिकार, घर पर महिलाओं की मृत्यु, पंचायत कार्यालयों की प्रशासनिक बाधाओं और मातृ मृत्यु तथा आत्महत्या जैसी सामाजिक रूप से संवेदनशील मौतों की कम रिपोर्टिंग को संभावित कारणों के रूप में रेखांकित किया गया।
ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा परेशानी, बच्चे और बुजुर्ग भी पीछे

मृत्यु पंजीकरण में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच भी बड़ा अंतर है। NFHS-5 के 79,449 मौतों के विश्लेषण के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में 34 प्रतिशत मौतें दर्ज नहीं हुईं, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 16.7 प्रतिशत था। गरीब परिवारों में यह अंतर और गंभीर था। ग्रामीण क्षेत्रों के सबसे गरीब परिवारों में 50.2 प्रतिशत मौतें पंजीकृत नहीं हुईं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 26.3 प्रतिशत था। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की 39.8 प्रतिशत मौतें दर्ज नहीं हुईं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 19.6 प्रतिशत था। उम्र के लिहाज से भी तस्वीर चिंताजनक है। बच्चों की मौतों के पंजीकरण की दर कम रहती है, वयस्क उम्र में इसमें सुधार होता है और बुजुर्गों में फिर गिरावट आती है। 18 से 59 वर्ष के पुरुषों में पंजीकरण दर 82.2 प्रतिशत और महिलाओं में 71.4 प्रतिशत थी। 85 वर्ष से अधिक उम्र में यह घटकर पुरुषों में 70.3 प्रतिशत और महिलाओं में 64.9 प्रतिशत रह गई।
आकांक्षी जिलों में भी बड़ी चुनौती
केंद्र सरकार ने 2018 में 112 पिछड़े जिलों में विकास की गति बढ़ाने के लिए आकांक्षी जिला कार्यक्रम शुरू किया था। लेकिन NFHS-5 के 76,592 मौतों के विश्लेषण में इन जिलों में मृत्यु पंजीकरण की स्थिति कमजोर मिली। आकांक्षी जिलों में केवल 54.4 प्रतिशत मौतें दर्ज हुईं, जबकि अन्य जिलों में यह आंकड़ा 73.7 प्रतिशत था। यानी 19.3 प्रतिशत अंकों का अंतर। अध्ययन के मुताबिक, घरेलू संपत्ति इस अंतर को समझाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल थी। हालांकि, कुल अंतर का 57.5 प्रतिशत हिस्सा अध्ययन में शामिल कारकों से स्पष्ट नहीं हो पाया। विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु पंजीकरण को केवल प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया नहीं समझना चाहिए। इससे सरकार को यह जानने में मदद मिलती है कि किस क्षेत्र में, किस उम्र और किस सामाजिक समूह में कितनी मौतें हो रही हैं।
मृत्यु पंजीकरण की व्यवस्था में क्या बदलाव जरूरी?

भारत को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें परिवारों को खुद सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बजाय स्थानीय स्तर पर मदद मिले। पंचायतों, शहरी निकायों, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी नेटवर्क के जरिए लोगों को पंजीकरण प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी दी जा सकती है। डिजिटल पंजीकरण को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन जिन परिवारों के पास इंटरनेट या डिजिटल जानकारी नहीं है, उनके लिए ऑफलाइन सहायता भी उपलब्ध होनी चाहिए। इसके साथ ही सरकार को जिला स्तर पर उम्र और लिंग के आधार पर मृत्यु पंजीकरण के आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक करने चाहिए। एक और जरूरी पहलू सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता है। NFHS-5 में मृत्यु पंजीकरण का अनुमान करीब 71 प्रतिशत था, जबकि बाद के आधिकारिक नागरिक पंजीकरण आंकड़ों में इससे अधिक पूर्णता दिखाई गई है। दोनों आंकड़ों की गणना के तरीके और समयावधि अलग हैं। इसलिए इनकी तुलना करते समय अंतर को समझना और स्वतंत्र सत्यापन करना जरूरी है।
निष्कर्ष
Female Death Registration in India का मुद्दा केवल सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के कानूनी अधिकारों, संपत्ति के उत्तराधिकार, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों से जुड़ा है। जब किसी महिला, बच्चे या बुजुर्ग की मौत सरकारी आंकड़ों से छूट जाती है, तो उनकी जरूरतों और समस्याओं की सही तस्वीर भी सामने नहीं आ पाती। देश की मजबूत नागरिक पंजीकरण व्यवस्था वही होगी, जिसमें हर व्यक्ति की मौत को समान महत्व और आधिकारिक पहचान मिले।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारत में महिलाओं के मृत्यु पंजीकरण की दर पुरुषों की तुलना में कितनी कम है?
NFHS-5 के अनुसार, पुरुषों की करीब 73 प्रतिशत मौतें दर्ज हुईं, जबकि महिलाओं की 64 प्रतिशत। यानी महिलाओं के पंजीकरण की दर 9 प्रतिशत अंक कम रही।
महिला मृत्यु पंजीकरण में सबसे अधिक लैंगिक अंतर किन राज्यों में देखा गया है?
अध्ययन के मुताबिक, बिहार के 38 में से 37 जिलों में महिलाओं की मृत्यु पंजीकरण दर 60 प्रतिशत से कम थी। झारखंड के सभी जिलों में भी यह स्तर 60 प्रतिशत से नीचे रहा।
भारत में महिलाओं के मृत्यु पंजीकरण से जुड़ी रिपोर्ट किस सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित है?
इस विश्लेषण में मुख्य रूप से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5), 2019-21 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा PLOS ONE और अन्य शोध पत्रों के निष्कर्ष भी शामिल हैं।
महिलाओं के मृत्यु पंजीकरण में कमी के पीछे कौन-कौन से सामाजिक और आर्थिक कारण हैं?
गरीबी, संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े प्रोत्साहन, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी कार्यालयों की दूरी, दस्तावेजी प्रक्रियाएं और सामाजिक भेदभाव इसके संभावित कारण हैं।
मृत्यु पंजीकरण महिलाओं के कानूनी अधिकारों और सरकारी योजनाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
मृत्यु प्रमाणपत्र संपत्ति के उत्तराधिकार, पेंशन, बीमा और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में जरूरी हो सकता है। इसके अलावा, सही मृत्यु आंकड़े सरकार को स्वास्थ्य योजनाएं और सार्वजनिक नीतियां बनाने में मदद करते हैं।