इजरायल में सत्ता बचाने के लिए नेतन्याहू का बड़ा दांव! क्या 2 साल बाद आइज़ेनकोट को सौंप देंगे प्रधानमंत्री की कुर्सी?
इजरायल में चुनाव के बाद किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में नेतन्याहू के करीबी नेता गादी आइज़ेनकोट के साथ सत्ता साझा करने और दो साल बाद प्रधानमंत्री पद सौंपने का प्रस्ताव तलाश रहे हैं। हालांकि, आइज़ेनकोट इस व्यवस्था का विरोध कर चुके हैं।
इजरायल की राजनीति में एक बार फिर सत्ता का दिलचस्प खेल शुरू हो गया है। चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइज़ेनकोट, दोनों के सामने सरकार बनाने के लिए बहुमत जुटाने की चुनौती है। इसी बीच Benjamin Netanyahu Power Sharing Deal की चर्चा ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। नेतन्याहू के करीबी नेता विपक्षी खेमे के नेता आइज़ेनकोट के साथ साझा सरकार बनाने और प्रधानमंत्री पद के लिए रोटेशन व्यवस्था का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहे हैं। इसके तहत पहले दो साल नेतन्याहू और उसके बाद आइज़ेनकोट प्रधानमंत्री बन सकते हैं। हालांकि, यह अभी केवल एक राजनीतिक प्रस्ताव है, जिस पर सहमति नहीं बनी है।
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इजरायल की संसद यानी नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। चुनाव के बाद किसी भी बड़े राजनीतिक गठबंधन को यह आंकड़ा हासिल नहीं हुआ है। उपलब्ध चुनावी रुझानों के अनुसार, नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 53 सीटें मिलीं, जबकि आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें हासिल हुईं। अरब दलों के खाते में 19 सीटें गईं। इसका मतलब है कि दोनों प्रमुख खेमों को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों या सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। यही स्थिति इजरायल में नई गठबंधन सरकार के गठन को मुश्किल बना रही है।
Netanyahu-Eisenkot Rotation Deal: दो साल बाद बदल सकता है प्रधानमंत्री?
नेतन्याहू के करीबी नेताओं के बीच एक ऐसी व्यवस्था पर चर्चा हो रही है, जिसमें प्रधानमंत्री पद दोनों नेताओं के बीच साझा किया जा सकता है। प्रस्ताव के मुताबिक, नेतन्याहू पहले दो साल तक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। इसके बाद वह पद छोड़कर आइज़ेनकोट को प्रधानमंत्री बनने का मौका देंगे। इस तरह दोनों नेताओं के बीच एक रोटेशन समझौता हो सकता है।इस प्रस्ताव के पीछे रणनीति यह है कि दोनों राजनीतिक खेमों के बीच मतभेदों के बावजूद एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाई जा सके। इससे नेतन्याहू को सत्ता में बने रहने और आइज़ेनकोट को भविष्य में प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस प्रस्ताव के सामने सबसे बड़ी बाधा खुद आइज़ेनकोट हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में रोटेशन व्यवस्था के तहत भी शामिल नहीं होंगे। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले को रोकने में सरकार की विफलता के लिए नेतन्याहू को जिम्मेदार ठहराया है। इसलिए फिलहाल इस प्रस्ताव पर सहमति की संभावना आसान नहीं दिखती।
Haredi दलों को बाहर रखने की रणनीति, सैन्य भर्ती बना बड़ा मुद्दा
नेतन्याहू के खेमे में एक अन्य विकल्प ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का है, जिसमें अति-रूढ़िवादी यहूदी यानी हरेदी दलों को शामिल न किया जाए। इजरायल की राजनीति में हरेदी समुदाय के युवाओं को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। धार्मिक संस्थानों में पढ़ने वाले कई युवाओं को सैन्य सेवा से छूट देने की व्यवस्था का हरेदी दल समर्थन करते हैं। वहीं, कई अन्य राजनीतिक दल चाहते हैं कि सैन्य सेवा की जिम्मेदारी सभी समुदायों के बीच समान रूप से साझा हो। आइज़ेनकोट सैन्य सेवा में समान भागीदारी के समर्थक रहे हैं। ऐसे में हरेदी दलों के बिना सरकार बनाने का प्रस्ताव कुछ राजनीतिक समूहों के लिए स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त सांसदों का समर्थन जुटाना जरूरी होगा। यह मुद्दा केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इजरायल की सैन्य नीति और राजनीतिक गठबंधन की दिशा भी तय कर सकता है।
विपक्षी सांसदों को तोड़ने की कोशिश या फिर नए चुनाव?
नेतन्याहू के सामने एक और विकल्प विपक्षी दलों के कुछ सांसदों को अपने पक्ष में लाने का है। यदि उनके गठबंधन को कुछ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो 61 सीटों का बहुमत हासिल करना संभव हो सकता है। हालांकि, विपक्षी सांसदों का अपनी पार्टियों से अलग होकर नेतन्याहू का समर्थन करना आसान नहीं होगा। इससे गठबंधन की स्थिरता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। दूसरी ओर, आइज़ेनकोट के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उनके खेमे के पास 48 सीटें हैं। अरब दलों के समर्थन से बहुमत का रास्ता खुल सकता है, लेकिन विपक्ष के कुछ सहयोगी दलों ने अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने पर आपत्ति जताई है। यदि किसी भी पक्ष को सरकार बनाने का रास्ता नहीं मिलता है, तो इजरायल में एक और चुनाव कराना पड़ सकता है। इस बीच राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सरकार बनाने के लिए किसी नेता को औपचारिक जनादेश देना होगा।
निष्कर्ष
Benjamin Netanyahu Power Sharing Deal इजरायल के राजनीतिक संकट से निकलने का एक संभावित रास्ता जरूर है, लेकिन यह समझौता अभी हकीकत से दूर है। नेतन्याहू के करीबी नेता आइज़ेनकोट को प्रधानमंत्री पद में हिस्सेदारी देने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि आइज़ेनकोट सार्वजनिक रूप से ऐसी व्यवस्था को ठुकरा चुके हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या दोनों खेमे अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर साझा सरकार बना पाएंगे या इजरायल को एक और चुनाव का सामना करना पड़ेगा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
क्या बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल में विपक्षी नेता के साथ प्रधानमंत्री पद साझा कर सकते हैं?
ऐसा प्रस्ताव नेतन्याहू के करीबी नेताओं की ओर से चर्चा में है। इसके तहत पहले दो साल नेतन्याहू और उसके बाद गादी आइज़ेनकोट प्रधानमंत्री बन सकते हैं। हालांकि, आइज़ेनकोट ने ऐसी रोटेशन व्यवस्था का विरोध किया है और कोई समझौता नहीं हुआ है।
इजरायल में सत्ता साझा करने का प्रस्ताव क्या है?
प्रस्ताव के अनुसार, एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाई जा सकती है, जिसमें नेतन्याहू और आइज़ेनकोट के राजनीतिक खेमे साथ आएं। प्रधानमंत्री पद को दो साल के अंतराल पर साझा करने का विकल्प भी चर्चा में है।
इजरायल की गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री का चयन कैसे होता है?
इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सरकार को विश्वास मत हासिल करने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। राष्ट्रपति राजनीतिक दलों से परामर्श के बाद सरकार बनाने के लिए एक नेता को जनादेश देते हैं।
नेतन्याहू की नई राजनीतिक रणनीति का उद्देश्य क्या हो सकता है?
इस रणनीति का उद्देश्य स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में विपक्षी खेमे के साथ समझौता करके सरकार बनाना और नए चुनाव की नौबत टालना है। इसके लिए हरेदी दलों के बिना एकता सरकार और विपक्षी सांसदों का समर्थन हासिल करने जैसे विकल्प भी चर्चा में हैं।
इजरायल के राजनीतिक घटनाक्रम का मध्य पूर्व की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
नई सरकार की सैन्य नीति, ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी प्राथमिकताएं मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा गठबंधन सत्ता में आता है और उसकी विदेश नीति क्या रहती है।