Ajit Doval Vietnam Visit 2026 : डोभाल की वियतनाम यात्रा में खुफिया सहयोग पर सहमति, चीन के लिहाज से क्यों अहम है यह दौरा?
NSA अजीत डोभाल की वियतनाम यात्रा में दोनों देशों ने रियल टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद से मुकाबले में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। वियतनाम ने गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा के लिए समझौते का प्रस्ताव रखा। दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों के बीच यह साझेदारी अहम है।
Ajit Doval Vietnam Visit 2026 : भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल 1 और 2 नवंबर 2026 को वियतनाम की राजधानी हनोई के दौरे पर थे। भारत में उनकी इस यात्रा की चर्चा बौद्ध मंदिर में दर्शन और वहां किए गए धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर ज्यादा हुई, लेकिन इस दौरे का असली महत्व दोनों देशों के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग में छिपा है। वियतनाम ने भारत के सामने गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान और उनकी सुरक्षा के लिए समझौता करने का प्रस्ताव रखा है। वहीं, दोनों देश रणनीतिक मामलों पर रियल टाइम में सूचनाएं साझा करने और साइबर सुरक्षा, आतंकवाद व समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं।यह घटनाक्रम ऐसे समय आया है, जब दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य और समुद्री गतिविधियों को लेकर वियतनाम समेत कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देश चिंतित हैं। भारत भी इस क्षेत्र में स्वतंत्र, खुले और नियमों पर आधारित इंडो-पैसिफिक व्यवस्था की वकालत करता है। ऐसे में भारत और वियतनाम के बीच बढ़ता सुरक्षा सहयोग केवल दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।
पहले समझिए, डोभाल की हनोई में किन नेताओं से मुलाकात हुई
डोभाल 1 नवंबर को वियतनाम पहुंचे थे। अगले दिन यानी 2 नवंबर को उन्होंने वहां के शीर्ष राजनीतिक, रक्षा और सुरक्षा नेतृत्व के साथ बैठकें कीं। इनमें वियतनाम के उपप्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग, सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री जनरल लुओंग टैम क्वांग और विदेश मंत्री ले होई ट्रुंग शामिल थे। उन्होंने वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और राष्ट्रपति तो लाम से भी मुलाकात की तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं दीं।

भारतीय दूतावास ने रक्षा मंत्री फान वान जियांग के साथ हुई बैठक के बारे में बताया कि दोनों पक्षों ने मौजूदा रक्षा सहयोग की समीक्षा की और इसे आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। वियतनाम के सरकारी बयान के मुताबिक, जियांग ने भारत के रक्षा उद्योगों को दिसंबर 2026 में होने वाले वियतनाम इंटरनेशनल डिफेंस एक्सपो में हिस्सा लेने का न्योता भी दिया।वियतनाम के रक्षा मंत्री ने दोनों देशों के रिश्तों में रक्षा सहयोग को एक महत्वपूर्ण आधार बताया। डोभाल ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग को जरूरी बताया। वियतनाम ने भारत से पुलिस अधिकारियों को संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के लिए प्रशिक्षण देने और 2027 में होने वाले APEC सम्मेलन की सुरक्षा व्यवस्था में अनुभव साझा करने का अनुरोध भी किया।
डोभाल ने हनोई के ऐतिहासिक क्वान सु पगोडा में भी दर्शन किए। यह वियतनाम के राष्ट्रीय बौद्ध संघ का मुख्यालय है। हालांकि, इस यात्रा का सबसे अहम हिस्सा सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री के साथ हुई बैठक रही, जिसमें खुफिया जानकारी और गोपनीय दस्तावेजों से जुड़े प्रस्ताव सामने आए।
रियल टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग पर क्या सहमति बनी?
वियतनाम के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय के मुताबिक, डोभाल और जनरल लुओंग टैम क्वांग की बैठक में दोनों देशों ने रणनीतिक सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करने पर सहमति जताई। इसमें राजनीतिक और रणनीतिक घटनाक्रम से जुड़ा रियल टाइम डेटा शेयर करना भी शामिल है।इसका मतलब है कि दोनों देश क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की जानकारी पहले से ज्यादा तेजी और नियमितता से एक-दूसरे के साथ साझा करने की दिशा में काम करेंगे। बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल, उभरते खतरे और ऐसे गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जो दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को प्रभावित कर सकते हैं।
दोनों पक्षों ने वरिष्ठ नेतृत्व के बीच तेज और भरोसेमंद संवाद व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया। इससे किसी बड़े क्षेत्रीय घटनाक्रम या सुरक्षा संकट के दौरान दोनों सरकारों के बीच संपर्क और सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान हो सकता है।
यहां एक बात समझना जरूरी है। रियल टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग पर सहमति का मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों ने एक-दूसरे को अपनी सभी खुफिया जानकारियों तक पहुंच दे दी है। किस तरह की सूचनाएं साझा होंगी, किन एजेंसियों के बीच होंगी और उनकी सुरक्षा कैसे होगी, यह आगे होने वाली बातचीत और समझौतों पर निर्भर करेगा।
गोपनीय जानकारी की सुरक्षा के लिए अलग समझौता क्यों चाहता है वियतनाम?
बैठक में वियतनाम के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री ने भारत के सामने एक अहम प्रस्ताव रखा। उन्होंने दोनों देशों के बीच गोपनीय जानकारी के आदान-प्रदान और उसकी आपसी सुरक्षा के लिए समझौते की संभावना तलाशने की बात कही।आमतौर पर सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों के पास ऐसी सूचनाएं होती हैं, जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इनमें खुफिया जानकारी, सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज, संवेदनशील तकनीकी विवरण और रणनीतिक आकलन शामिल हो सकते हैं। जब दो देश ऐसी जानकारी साझा करते हैं, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि उसका इस्तेमाल तय उद्देश्य के लिए ही हो और वह किसी अनधिकृत व्यक्ति या एजेंसी तक न पहुंचे।
इसीलिए वियतनाम ऐसा समझौता चाहता है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे से मिली गोपनीय जानकारी की सुरक्षा के नियम तय कर सकें। वियतनाम ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) से इस दिशा में संबंधित भारतीय एजेंसियों के साथ बातचीत आगे बढ़ाने में मदद करने का अनुरोध किया है। NSCS राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में समन्वय करता है और इसकी अध्यक्षता NSA करते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट रहना चाहिए कि डोभाल की यात्रा के दौरान ऐसा कोई नया गोपनीय सूचना समझौता साइन नहीं हुआ। फिलहाल वियतनाम ने प्रस्ताव रखा है और दोनों पक्षों के बीच इस पर आगे बातचीत होनी है।
साइबर सुरक्षा, AI और आतंकवाद पर भी बढ़ेगा सहयोग
भारत और वियतनाम के बीच बातचीत सिर्फ खुफिया सूचनाओं तक सीमित नहीं रही। वियतनाम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया और विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई।दोनों देशों के बीच 2026 में पहले से ही कई सुरक्षा बैठकें हो चुकी हैं। जनवरी में पहला साइबर पॉलिसी डायलॉग आयोजित हुआ। सितंबर में दोनों देशों के बीच पहली साइबर सुरक्षा परामर्श बैठक हुई। इसके बाद 16 अक्टूबर को नई दिल्ली में चौथी उपमंत्री स्तर की सुरक्षा वार्ता हुई। इसमें आर्थिक सुरक्षा, समुद्री सहयोग, आतंकवाद, नई तकनीक और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी।
डोभाल की यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने आतंकवाद से मुकाबले के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाने और सुरक्षा के क्षेत्र में उभरती तकनीकों के इस्तेमाल पर सहयोग बढ़ाने की बात भी की। इस समूह के गठन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। इसके अलावा वियतनाम ने मानव तस्करी, खासकर महिलाओं और बच्चों की तस्करी रोकने तथा सीमा पार अपराध से निपटने के लिए भी भारत के साथ समझौते आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा।
वियतनाम ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में पुलिस अधिकारियों की भागीदारी से जुड़े प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण में भारत की मदद मांगी। इससे साफ है कि दोनों देशों का सुरक्षा सहयोग अब पारंपरिक रक्षा संबंधों से आगे बढ़कर पुलिस, खुफिया एजेंसियों, साइबर सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अपराध तक पहुंच रहा है।
भारत-वियतनाम रक्षा संबंधों में ब्रह्मोस और युद्धपोत की भूमिका
भारत और वियतनाम के रक्षा संबंध कई साल पुराने हैं। जून 2022 में दोनों देशों ने 2030 तक रक्षा साझेदारी के लिए जॉइंट विजन स्टेटमेंट पर सहमति जताई थी। इसी दौरान म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट समझौता भी हुआ। इसके तहत दोनों देश तय शर्तों के अनुसार एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं और लॉजिस्टिक सहयोग का इस्तेमाल कर सकते हैं।भारत ने जून 2022 में वियतनाम को 10 करोड़ डॉलर की रक्षा ऋण सुविधा के तहत बनाए गए 12 हाई-स्पीड गार्ड बोट सौंपे थे। जुलाई 2023 में भारत ने स्वदेशी मिसाइल कॉर्वेट INS Kirpan भी वियतनाम को उपहार में दिया। यह युद्धपोत वियतनाम की नौसेना की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।
इसके बाद रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ा। मई 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की वियतनाम यात्रा के दौरान दोनों देशों ने AI और क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में समझौता किया। समुद्री सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी चर्चा हुई। दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता और शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।
इसी साल 30 मई को भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पुष्टि की कि वियतनाम को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल देने का समझौता साइन हो चुका है। यह मिसाइल भारत और रूस ने मिलकर विकसित की है। हालांकि, समझौते की कीमत, मिसाइलों की संख्या और उनकी डिलीवरी का समय सार्वजनिक नहीं किया गया है। कुछ रिपोर्टों में इसकी कीमत करीब 6,000 करोड़ रुपये बताई गई, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इस सौदे के बाद वियतनाम दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रह्मोस का तीसरा ग्राहक बन सकता है।
दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियां भारत के लिए क्यों अहम हैं?
भारत और वियतनाम के बीच बढ़ते रक्षा और खुफिया सहयोग को समझने के लिए दक्षिण चीन सागर की स्थिति जानना जरूरी है। यह समुद्री क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में शामिल है। चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है, जबकि वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इसके अलग-अलग हिस्सों पर दावे रखते हैं।

चीन की समुद्री गतिविधियों और उसके दावों को लेकर वियतनाम के साथ लंबे समय से विवाद रहा है। इस क्षेत्र में चीन की नौसेना और कोस्ट गार्ड की मौजूदगी, समुद्री गश्त और अन्य गतिविधियां अक्सर तनाव बढ़ाती हैं। 2016 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक ऐतिहासिक दावों के कानूनी आधार को खारिज किया था, हालांकि चीन ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया।इस समुद्री क्षेत्र का महत्व सिर्फ वियतनाम या चीन तक सीमित नहीं है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक, 2023 में दुनिया के समुद्री रास्तों से भेजे गए कुल तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का करीब 37% हिस्सा दक्षिण चीन सागर से होकर गुजरा। भारत के लिए भी यह रास्ता अहम है। एक पुराने आकलन के मुताबिक, भारत के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ होने वाले व्यापार का करीब 55% हिस्सा इन समुद्री मार्गों से गुजरता है।
भारत दक्षिण चीन सागर में किसी एक देश के दावे का समर्थन करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून, खासकर 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS), के तहत विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और नौवहन की स्वतंत्रता की बात करता है। वियतनाम भी समुद्री सुरक्षा और अपने समुद्री अधिकारों को लेकर इसी तरह की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
भारत के लिए वियतनाम इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
वियतनाम भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और इंडो-पैसिफिक रणनीति का एक अहम साझेदार है। दक्षिण-पूर्व एशिया में उसकी भौगोलिक स्थिति उसे समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है। भारत के लिए वियतनाम के साथ बेहतर संबंध दक्षिण चीन सागर और ASEAN देशों के साथ संपर्क मजबूत करने का रास्ता भी हैं।

इसके अलावा, वियतनाम चीन के विकल्प के रूप में उभरती मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था है। वैश्विक कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने के लिए चीन के अलावा दूसरे देशों में भी उत्पादन बढ़ा रही हैं। इसे ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति कहा जाता है। भारत और वियतनाम के बीच बेहतर आर्थिक और तकनीकी सहयोग से दोनों देशों की कंपनियों को ASEAN और वैश्विक बाजारों में नए अवसर मिल सकते हैं।ऊर्जा सुरक्षा भी इस साझेदारी का अहम पहलू है। भारत की सरकारी कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) वियतनाम के समुद्री क्षेत्र में तेल और गैस खोज से जुड़ी परियोजनाओं में लंबे समय से काम कर रही है। दक्षिण चीन सागर में समुद्री अधिकारों को लेकर विवादों के बावजूद भारत ने वियतनाम के साथ ऊर्जा सहयोग जारी रखा है।
दोनों देशों के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर भी समानता दिखाई देती है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले की वियतनाम ने कड़ी निंदा की थी और भारत के प्रति संवेदना जताई थी। वियतनाम ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता की आकांक्षा का भी समर्थन किया है।
व्यापार, विकास और सांस्कृतिक सहयोग भी रिश्तों का आधार
भारत-वियतनाम संबंध केवल रक्षा और सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। भारतीय दूतावास के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 18.28 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें भारत ने वियतनाम को करीब 6.66 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि वियतनाम से भारत का आयात लगभग 11.62 अरब डॉलर रहा। यानी व्यापार का संतुलन वियतनाम के पक्ष में रहा।भारत वियतनाम को इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, मशीनरी, दवाइयां, कृषि उत्पाद, कपास और समुद्री उत्पाद निर्यात करता है। वहीं, भारत वियतनाम से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, प्लास्टिक, कॉफी, चाय, जूते और कपड़े जैसे उत्पाद आयात करता है। मई 2026 में दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 25 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। ASEAN-India Trade in Goods Agreement की समीक्षा और बाजार तक पहुंच आसान बनाना भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण है।
विकास सहयोग के तहत भारत मेकांग-गंगा सहयोग (MGC) के जरिए वियतनाम में क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट्स चलाता है। जुलाई 2026 तक वियतनाम में ऐसे 66 प्रोजेक्ट मंजूर किए गए थे, जिनमें से 56 पूरे हो चुके थे। भारत का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) वियतनाम के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल माई सन मंदिर परिसर के संरक्षण और पुनरुद्धार में भी सहयोग कर रहा है। इसके कुछ मंदिर समूहों का काम पूरा हो चुका है, जबकि दूसरे हिस्सों में काम जारी है।
सितंबर 2024 में टाइफून यागी से वियतनाम में हुई तबाही के बाद भारत ने ऑपरेशन सद्भाव के तहत 35 टन आपात राहत सामग्री भेजी थी। यह सहयोग दोनों देशों के संबंधों में मानवीय सहायता और आपदा प्रबंधन की भूमिका को भी दिखाता है।
साझेदारी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
भारत और वियतनाम के बीच रणनीतिक हितों में समानता है, लेकिन दोनों देश किसी सैन्य गठबंधन की ओर नहीं बढ़ रहे हैं। वियतनाम की रक्षा नीति ‘फोर नो’ सिद्धांत पर आधारित है। इसके तहत वह किसी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होता, एक देश के खिलाफ दूसरे देश का साथ नहीं देता, विदेशी सैन्य ठिकानों की अनुमति नहीं देता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग या उसकी धमकी से बचने की नीति अपनाता है।इसका मतलब है कि भारत और वियतनाम रक्षा सहयोग, प्रशिक्षण और हथियारों की खरीद बढ़ा सकते हैं, लेकिन इसे किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वियतनाम चीन के साथ अपने आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को भी संतुलित रखता है। इसलिए भारत के साथ उसका सहयोग सावधानी से आगे बढ़ता है।
दूसरी चुनौती आर्थिक असंतुलन है। दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है, लेकिन आयात भारत के निर्यात से काफी अधिक है। भारत को दवाइयों, IT सेवाओं, इंजीनियरिंग उत्पादों और तकनीकी क्षेत्र में बाजार पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में देरी और समुद्री परिवहन की सीमाएं व्यापार को प्रभावित करती हैं।
रक्षा सहयोग में भी समझौतों को वास्तविक परियोजनाओं और डिलीवरी में बदलना चुनौती है। भारत की ओर से दी गई रक्षा ऋण सुविधाओं का पूरा उपयोग करने और खरीद प्रक्रिया को समय पर पूरा करने में दोनों देशों को काम करना होगा। वियतनाम के पास रूसी मूल के कई सैन्य प्लेटफॉर्म हैं, इसलिए भारतीय उपकरणों के साथ तकनीकी तालमेल और प्रशिक्षण की जरूरत भी रहेगी। ASEAN देशों के बीच चीन और इंडो-पैसिफिक को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताएं भी क्षेत्रीय सहयोग को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे भारत-वियतनाम सहयोग को मजबूत करने के लिए क्या जरूरी है?
दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए ब्रह्मोस जैसे रक्षा सौदों की डिलीवरी और मौजूदा रक्षा ऋण सुविधाओं के इस्तेमाल में तेजी लानी होगी। भारत गश्ती जहाज, रडार, निगरानी उपकरण और अन्य रक्षा तकनीक के क्षेत्र में वियतनाम के साथ संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण पर काम कर सकता है। इससे वियतनाम की रक्षा क्षमता बढ़ेगी और भारत के रक्षा उद्योग को भी नए बाजार मिलेंगे।आर्थिक मोर्चे पर 2030 तक 25 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को हासिल करने के लिए गैर-टैरिफ बाधाएं कम करना, ASEAN-India Trade in Goods Agreement की समीक्षा पूरी करना और भारतीय दवाइयों, IT, फिनटेक तथा इंजीनियरिंग उत्पादों की पहुंच बढ़ाना जरूरी होगा। दोनों देशों के बीच दुर्लभ खनिजों, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी सप्लाई चेन में सहयोग की भी संभावनाएं हैं।
डिजिटल क्षेत्र में भारत के UPI और वियतनाम की NAPAS भुगतान प्रणाली को जोड़ने की पहल से पर्यटन, व्यापार और ई-कॉमर्स को बढ़ावा मिल सकता है। मई 2026 में दोनों देशों ने QR कोड आधारित भुगतान व्यवस्था को जोड़ने और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
कुल मिलाकर, अजीत डोभाल की वियतनाम यात्रा भारत-वियतनाम संबंधों को रक्षा सहयोग से आगे खुफिया जानकारी, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और कानून प्रवर्तन तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। चीन का दक्षिण चीन सागर में बढ़ता प्रभाव इस साझेदारी को रणनीतिक महत्व जरूर देता है, लेकिन दोनों सरकारों ने डोभाल की बैठकों के बारे में जारी आधिकारिक बयानों में चीन को किसी खास चर्चा का केंद्र नहीं बताया है। इसलिए इस यात्रा को चीन के खिलाफ किसी सैन्य गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह दो देशों के बीच साझा हितों और क्षेत्रीय स्थिरता पर आधारित सहयोग को गहरा करने की कोशिश है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
अजित डोभाल ने वियतनाम का दौरा कब किया?
NSA अजित डोभाल ने 1 और 2 नवंबर 2026 को वियतनाम की राजधानी हनोई का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने वहां के शीर्ष नेताओं और सुरक्षा अधिकारियों से मुलाकात की।
NSA अजित डोभाल की वियतनाम यात्रा का उद्देश्य क्या था?
इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत-वियतनाम के बीच सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने, रक्षा और रणनीतिक सहयोग की समीक्षा करना और इन्हें मजबूत करने के रास्ते तलाशना था।
भारत और वियतनाम के बीच किन सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत हुई?
दोनों देशों के बीच रियल टाइम रणनीतिक सूचनाओं के आदान-प्रदान, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, कानून लागू करने वाली एजेंसियों के सहयोग और सीमा पार अपराधों से निपटने पर बातचीत हुई। गोपनीय जानकारी की सुरक्षा और साझा करने के लिए एक समझौते के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।
भारत और वियतनाम के बीच Enhanced Comprehensive Strategic Partnership क्या है?
यह दोनों देशों के रिश्तों का उच्च स्तर है, जिसके तहत रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, तकनीक, समुद्री सहयोग और क्षेत्रीय मामलों में साझेदारी को मजबूत किया जाता है। मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपनी साझेदारी को इस स्तर तक बढ़ाया था।
भारत और वियतनाम के बीच रक्षा सहयोग क्यों महत्वपूर्ण है?
दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और स्वतंत्र नौवहन का समर्थन करते हैं। रक्षा सहयोग के तहत सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों की खरीद, संयुक्त अभ्यास और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम किया जा रहा है। इससे दोनों देशों की रक्षा क्षमताओं और आपसी तालमेल को मजबूत करने में मदद मिलती है।
क्या भारत वियतनाम को BrahMos मिसाइल बेच रहा है?
हां। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम द्वारा विकसित BrahMos मिसाइलों की आपूर्ति के लिए भारत और वियतनाम के बीच समझौता हुआ है। हालांकि, सौदे की कीमत, मिसाइलों की संख्या और डिलीवरी की समयसीमा जैसी जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं।
भारत और वियतनाम के बीच राजनयिक संबंधों के 55 साल कब पूरे होंगे?
भारत और वियतनाम के बीच 7 जनवरी 1972 को राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे। इस तरह दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 55 साल 7 जनवरी 2027 को पूरे होंगे।