India Supports Cuba : UN में क्यूबा पर प्रतिबंधों को लेकर घिरा अमेरिका, भारत समेत 130 देशों ने क्यों किया विरोध?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत समेत 130 देशों ने अमेरिका से क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। अमेरिका और इजराइल सहित 17 देशों ने विरोध किया, जबकि 25 देश मतदान से दूर रहे। प्रस्ताव पारित हुआ, लेकिन यह अमेरिका पर प्रतिबंध हटाने की कानूनी बाध्यता नहीं डालता।
India Supports Cuba : भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अमेरिका से क्यूबा पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग वाले प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। 28 अक्टूबर 2026 को हुए मतदान में 130 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि अमेरिका और इजराइल समेत 17 देशों ने इसके खिलाफ वोट किया। 25 देश मतदान से दूर रहे। पिछले साल इस प्रस्ताव के समर्थन में 165 देशों ने वोट दिया था। इस बार समर्थन घटने के बावजूद प्रस्ताव पारित हो गया। हालांकि, यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और इससे अमेरिका पर अपने प्रतिबंध हटाने की मजबूरी नहीं बनती।
क्यूबा पर प्रतिबंधों के खिलाफ भारत ने क्या कहा?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि वह ऐसे कानूनों और नियमों का विरोध करता है, जिनका असर दूसरे देशों की संप्रभुता, विकास और लोगों की खुशहाली पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की काउंसलर सौम्या नायर ने कहा कि भारत सभी देशों से ऐसे नियमों को वापस लेने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने की अपील दोहराता है।भारत ने यह भी कहा कि क्यूबा में जरूरी दवाओं की कमी, खाद्य उत्पादन में गिरावट और ईंधन की सीमित उपलब्धता ने वहां के लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। इन हालात का असर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, पानी की सप्लाई, खाद्य वितरण और परिवहन जैसी जरूरी सुविधाओं पर भी पड़ा है। भारत का कहना है कि प्रतिबंध हटने से क्यूबा के लोगों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विकास के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।

पिछले साल से 35 वोट कम मिले, जर्मनी-इटली मतदान से दूर रहे
193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस बार प्रस्ताव के पक्ष में 130, विरोध में 17 और 25 वोट मतदान से दूर रहने के रहे। 2025 में 165 देशों ने प्रतिबंध हटाने के पक्ष में वोट दिया था, जबकि 7 देशों ने विरोध किया और 12 देश मतदान से दूर रहे। यानी एक साल में प्रस्ताव के समर्थन में 35 वोट कम हो गए।इस बार जर्मनी और इटली जैसे यूरोपीय देशों ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने के बजाय मतदान से दूरी बनाई। अमेरिका और इजराइल के अलावा बोस्निया-हर्जेगोविना, चेकिया, लिथुआनिया, स्लोवेनिया, मोरक्को, यूक्रेन और संयुक्त अरब अमीरात उन देशों में शामिल थे, जिन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया।
अमेरिका ने दूसरे देशों को अपना रुख बदलने के लिए मनाने की कोशिश की थी। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत माइक वॉल्ट्ज ने मतदान के बाद इसे कूटनीतिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं सहित कई देशों के रुख में बदलाव आया है। हालांकि, वोटों के आंकड़े यह अपने आप साबित नहीं करते कि हर देश ने किस वजह से अपना फैसला बदला।
आजाद होने के बाद भी क्यूबा पर अमेरिका का दबदबा रहा
1898 में स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद क्यूबा स्पेन के नियंत्रण से बाहर आ गया। हालांकि, इसके बाद भी देश को तुरंत पूरी आजादी नहीं मिली। अमेरिका ने वहां सैन्य कब्जा किया और 1902 में क्यूबा औपचारिक रूप से स्वतंत्र हुआ। इसके बावजूद क्यूबा की राजनीति, सेना और अर्थव्यवस्था पर अमेरिका का काफी प्रभाव बना रहा। वहां की जमीन, चीनी उद्योग और कारोबार में अमेरिकी कंपनियों की बड़ी हिस्सेदारी थी।1959 में क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो ने अपने साथियों के साथ मिलकर तानाशाह फुल्गेंसियो बतिस्ता की सरकार को सत्ता से हटा दिया। बतिस्ता के खिलाफ संघर्ष के दौरान कास्त्रो को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी। सत्ता में आने के बाद उन्होंने देश में बड़े बदलाव किए और समाजवादी नीतियां अपनाईं। सरकार ने अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया और जमीन तथा उद्योगों पर अपना नियंत्रण बढ़ाया।
फिदेल कास्त्रो ने 1959 से 2008 तक क्यूबा की सत्ता संभाली। 2006 में बीमारी के कारण उन्होंने अस्थायी रूप से सत्ता अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप दी थी। 2008 में राउल आधिकारिक रूप से राष्ट्रपति बने।

1960 से जारी है अमेरिका और क्यूबा के बीच विवाद
अमेरिका ने 1960 में क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने शुरू किए थे। बाद के वर्षों में इनका दायरा बढ़ाया गया। इन प्रतिबंधों ने दोनों देशों के व्यापार और आर्थिक संबंधों को लंबे समय से प्रभावित किया है। क्यूबा का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसकी आर्थिक मुश्किलें बढ़ी हैं और लोगों को भोजन, दवाओं तथा ईंधन की कमी का सामना करना पड़ रहा है।दूसरी ओर, अमेरिका का कहना है कि क्यूबा की आर्थिक परेशानियों के लिए वहां की सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने क्यूबा पर दबाव बढ़ाया है। हाल के महीनों में ईंधन की कमी और बिजली संकट ने भी देश की स्थिति को गंभीर बनाया है। क्यूबा के बिजली ग्रिड में बड़े स्तर पर खराबी आने से लाखों लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा।
अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद सोवियत संघ के करीब आया क्यूबा
कास्त्रो सरकार के फैसलों से अमेरिका और क्यूबा के रिश्ते बिगड़ते चले गए। अमेरिका ने क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए और दोनों देशों के बीच व्यापार पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं। इससे क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। इसके बाद क्यूबा ने सोवियत संघ के साथ अपने संबंध मजबूत किए। सोवियत संघ ने उसे आर्थिक और सैन्य मदद दी।शीत युद्ध के दौरान क्यूबा सोवियत संघ का करीबी सहयोगी बन गया। इससे अमेरिका की चिंता और बढ़ी। 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान दोनों महाशक्तियां परमाणु युद्ध के करीब पहुंच गई थीं।
अमेरिका और क्यूबा के बीच लंबे समय तक तनाव बना रहा। करीब 88 साल बाद, मार्च 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने क्यूबा का दौरा किया। यह 1928 के बाद किसी मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली क्यूबा यात्रा थी। इस दौरे से दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने की कोशिश को नई दिशा मिली।
कास्त्रो को मारने के लिए कई साजिशों की रिपोर्टें
फिदेल कास्त्रो अमेरिका के सबसे बड़े विरोधियों में गिने जाते थे। उनके शासनकाल में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA पर उन्हें मारने की साजिशें रचने के आरोप लगे। कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि कास्त्रो की हत्या के लिए सिगार में जहर मिलाने और अन्य गुप्त तरीकों समेत सैकड़ों योजनाओं पर विचार किया गया था। हालांकि, हत्या की कोशिशों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं।

एक चर्चित साजिश में कास्त्रो की पूर्व प्रेमिका मारिता लॉरेंज का नाम भी सामने आया था। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्हें कास्त्रो को जहर देने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन योजना सफल नहीं हुई। कास्त्रो की हत्या के लिए जहरीले सिगार और अन्य तरीकों से जुड़ी कहानियां लंबे समय तक चर्चा में रहीं।
फिदेल कास्त्रो का 25 नवंबर 2016 को क्यूबा की राजधानी हवाना में 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने करीब पांच दशक तक देश की राजनीति पर निर्णायक प्रभाव बनाए रखा और अमेरिका के साथ उनका टकराव आधुनिक इतिहास के सबसे लंबे राजनीतिक विवादों में से एक बना रहा।
UN में अमेरिका-क्यूबा के प्रतिनिधियों के बीच तनाव
मतदान से पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका और क्यूबा के प्रतिनिधियों के बीच तनाव भी देखने को मिला। मंगलवार को दोनों पक्षों के बीच बहस के दौरान तीखी नोकझोंक हुई और सदन में धक्का-मुक्की की स्थिति बनने की खबरें आईं।

अमेरिकी दूत माइक वॉल्ट्ज ने आरोप लगाया कि क्यूबा के राजनयिक रिचर्ड तुर दे ला कॉन्सेप्सियोन ने एक अमेरिकी राजनयिक के साथ मारपीट की। वॉल्ट्ज ने कहा कि क्यूबा के इस अधिकारी को अमेरिका से वापस भेजा जाएगा। यह आरोप अमेरिकी पक्ष की ओर से लगाया गया था।क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज ने मतदान के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों को क्यूबा के लोगों पर सामूहिक सजा थोपने जैसा बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी दबाव के बावजूद क्यूबा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता रहेगा। अमेरिका ने क्यूबा की सरकार की नीतियों को उसकी आर्थिक समस्याओं की प्रमुख वजह बताया है। इस तरह दोनों देशों के बीच प्रतिबंधों को लेकर पुराना विवाद अब भी जारी है।
UN का प्रस्ताव अमेरिका को प्रतिबंध हटाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हर साल क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंध खत्म करने की मांग वाला प्रस्ताव पेश किया जाता रहा है। 1992 से इस मुद्दे पर लगातार मतदान होता रहा है, हालांकि 2020 में कोविड महामारी के दौरान यह प्रक्रिया नहीं हुई थी। इस बार भी महासभा ने प्रतिबंध खत्म करने की मांग दोहराई।लेकिन महासभा का यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। इसका राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व है, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रुख का पता चलता है। प्रतिबंध हटाने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है। इसलिए प्रस्ताव पारित होने के बावजूद अमेरिकी नीति में तुरंत बदलाव की गारंटी नहीं है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारत ने UN में अमेरिका के Cuba Embargo के खिलाफ वोट क्यों दिया?
भारत ने कहा कि ऐसे प्रतिबंधों का असर दूसरे देशों की संप्रभुता और विकास पर पड़ सकता है। भारत ने क्यूबा में दवाओं, भोजन और ईंधन की कमी का भी उल्लेख किया और प्रतिबंध जल्द हटाने का समर्थन किया।
Cuba पर US Economic Embargo क्या है और इसे कब लगाया गया था?
यह अमेरिका की ओर से क्यूबा पर लगाए गए आर्थिक, व्यापारिक और वित्तीय प्रतिबंधों का समूह है। इनकी शुरुआत 1960 में हुई थी और बाद के वर्षों में इनका दायरा बढ़ाया गया।
UN General Assembly में Cuba के समर्थन में कितने देशों ने वोट दिया?
28 अक्टूबर 2026 को हुए मतदान में 130 देशों ने अमेरिका से क्यूबा पर प्रतिबंध हटाने की मांग वाले प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। 17 देशों ने विरोध किया और 25 देश मतदान से दूर रहे।
US Embargo on Cuba के खिलाफ UN Resolution का क्या मतलब है?
इस प्रस्ताव के जरिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अमेरिकी प्रतिबंध हटाने की मांग दोहराई है। यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रुख को दिखाता है, लेकिन अपने आप अमेरिका की नीति नहीं बदलता।
क्या UN का प्रस्ताव अमेरिका को Cuba पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए बाध्य कर सकता है?
नहीं। महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। अमेरिकी प्रतिबंध हटाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की कार्रवाई जरूरी है।
इस बार Cuba Embargo के खिलाफ वोट करने वाले देशों की संख्या पिछले साल से क्यों घटी?
इस बार प्रस्ताव के समर्थन में 130 वोट पड़े, जबकि पिछले साल 165 देशों ने समर्थन किया था। अमेरिका ने दूसरे देशों को अपना रुख बदलने के लिए मनाने की कोशिश की थी। जर्मनी और इटली जैसे देशों ने इस बार मतदान से दूरी बनाई, लेकिन हर देश के फैसले के पीछे की वजह अलग हो सकती है।
India-Cuba Relations पर इस UN Voting का क्या असर पड़ सकता है?
भारत के वोट से क्यूबा के प्रति उसका कूटनीतिक समर्थन स्पष्ट हुआ है। हालांकि, केवल इस मतदान के आधार पर दोनों देशों के व्यापार या द्विपक्षीय संबंधों में किसी बड़े बदलाव का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।