₹2,814 करोड़ की क्रिटिकल मिनरल योजना को कैबिनेट की मंजूरी, लिथियम और निकेल के 4 प्लांट लगेंगे
केंद्र सरकार ने क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत लिथियम और निकेल के चार प्लांट लगाए जाएंगे। पात्र निवेश पर 30% पूंजी सब्सिडी मिलेगी और योजना 2030-31 तक लागू रहेगी।
इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरण बनाने में लिथियम और निकेल जैसे खनिजों की अहम भूमिका है। लेकिन भारत में इन खनिजों को इस्तेमाल के लायक बनाने और उनसे उच्च गुणवत्ता वाले पदार्थ तैयार करने की क्षमता अभी सीमित है। इस वजह से देश को इनके तैयार उत्पादों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस निर्भरता को कम करने और घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने ₹2,814 करोड़ की Critical Mineral Processing Scheme को मंजूरी दी है। इसके तहत देश में लिथियम और निकेल के चार प्लांट लगाने के लिए कंपनियों को आर्थिक मदद दी जाएगी।
क्या है क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग योजना?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर 2026 को इस योजना को मंजूरी दी। इसका मकसद भारत में लिथियम और निकेल के कच्चे माल को प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाले पदार्थ तैयार करने की क्षमता बढ़ाना है।
इस योजना के लिए पांच वर्षों में कुल ₹2,814 करोड़ का बजट रखा गया है। यह वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू रहेगी। सरकार चाहती है कि देश में ही इन खनिजों से जुड़े उत्पाद तैयार हों, ताकि दूसरे देशों पर निर्भरता कम हो और उद्योगों को जरूरी कच्चा माल आसानी से मिल सके।

योजना के तहत कितने प्लांट लगाए जाएंगे?
सरकार इस योजना के तहत कुल चार प्लांट लगाने में मदद करेगी। इनमें दो प्लांट लिथियम और दो प्लांट निकेल के लिए होंगे।
• लिथियम प्लांट: दो प्लांट लगाए जाएंगे। प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 30 kt यानी 30 हजार टन होगी।
• निकेल प्लांट: दो प्लांट लगाए जाएंगे। प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 50 kt यानी 50 हजार टन होगी।
निकेल को प्रोसेस करते समय कोबाल्ट भी एक दूसरे उत्पाद के रूप में मिल सकता है। इससे भारत में कोबाल्ट की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस योजना में कोबाल्ट के लिए अलग प्लांट लगाने का लक्ष्य नहीं है।
कंपनियों को कितनी सब्सिडी मिलेगी?
योजना के तहत कंपनियों को उनके योग्य निवेश पर 30% तक सरकारी मदद मिलेगी। हर प्लांट के लिए सरकार ने मदद की अधिकतम सीमा भी तय की है।
• लिथियम प्लांट: प्रत्येक कंपनी को अधिकतम ₹500 करोड़ की मदद मिलेगी।
• निकेल प्लांट: प्रत्येक कंपनी को अधिकतम ₹900 करोड़ की मदद मिलेगी।
इसका मतलब है कि प्लांट लगाने में होने वाले योग्य खर्च का एक हिस्सा सरकार देगी। यह पूरी राशि एक साथ नहीं मिलेगी। कंपनियों को तय काम पूरा करने और प्रोजेक्ट की प्रगति के आधार पर तीन चरणों में सहायता दी जाएगी।

कंपनियों का चयन कैसे होगा?
योजना के तहत कंपनियों का चयन दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में यह देखा जाएगा कि कंपनी के पास प्लांट लगाने की जरूरी तकनीक और क्षमता है या नहीं। इसके बाद योग्य कंपनियों से आर्थिक बोली मांगी जाएगी।
लिथियम और निकेल, दोनों के लिए दो-दो कंपनियों का चयन होगा। इसमें उस योग्य कंपनी को प्राथमिकता मिलेगी जो प्लांट लगाने के लिए सरकार से सबसे कम आर्थिक मदद मांगेगी। इससे कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सरकारी पैसे का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।
भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स क्यों जरूरी हैं?
क्रिटिकल मिनरल्स ऐसे खनिज हैं जिनकी जरूरत देश के उद्योग, नई तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े कामों में होती है। इनकी सप्लाई रुकने पर इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा जैसे कई क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।
भारत ने जुलाई 2023 में 30 क्रिटिकल मिनरल्स की सूची जारी की थी। इसमें लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिज शामिल हैं।
इनका इस्तेमाल कई जरूरी क्षेत्रों में होता है:
- 1- • इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी: लिथियम और निकेल का इस्तेमाल बैटरी बनाने में होता है।
- 2- • ऊर्जा भंडारण: बिजली को स्टोर करने वाले Battery Energy Storage Systems (BESS) में भी इनकी जरूरत होती है।
- 3- • इलेक्ट्रॉनिक्स: कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और तकनीकी सामान बनाने में इन खनिजों का इस्तेमाल होता है।
- 4- • रक्षा क्षेत्र: आधुनिक रक्षा उपकरण और नई तकनीक तैयार करने में भी इनकी जरूरत होती है।
- स्टील उद्योग: निकेल का इस्तेमाल खास तरह के स्टील और दूसरे औद्योगिक उत्पाद बनाने में किया जाता है।
भारत क्रिटिकल मिनरल्स के लिए दूसरे देशों पर क्यों निर्भर है?
भारत के सामने बड़ी चुनौती सिर्फ खनिजों की उपलब्धता नहीं है, बल्कि उन्हें इस्तेमाल के लायक बनाने की क्षमता भी है। लिथियम, निकेल और कोबाल्ट से जुड़े तैयार और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के लिए भारत काफी हद तक दूसरे देशों से होने वाले आयात पर निर्भर है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि दुनिया में इन खनिजों को तैयार करने वाले प्लांट कुछ ही देशों में ज्यादा हैं। ऐसे में अगर किसी देश में राजनीतिक तनाव, व्यापार पर रोक या सप्लाई से जुड़ी परेशानी आती है, तो भारत के उद्योगों पर भी असर पड़ सकता है।
इसी जोखिम को कम करने के लिए देश में प्रोसेसिंग प्लांट लगाना जरूरी है। नई योजना का मकसद भारत की Critical Mineral Supply Chain यानी जरूरी खनिजों की पूरी सप्लाई व्यवस्था को मजबूत करना है।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन से कैसे अलग है यह योजना?
केंद्र सरकार ने 29 जनवरी 2025 को National Critical Mineral Mission (NCMM) को मंजूरी दी थी। इस मिशन का मकसद देश में क्रिटिकल मिनरल्स की खोज, खनन, प्रोसेसिंग और दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही दूसरे देशों में मौजूद खनिज संसाधनों तक भारत की पहुंच बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है। इस मिशन के लिए कुल ₹16,300 करोड़ का बजट रखा गया है।
वहीं, नई ₹2,814 करोड़ की योजना का दायरा इससे छोटा है। इसका मुख्य मकसद भारत में लिथियम और निकेल के चार प्लांट लगाने के लिए कंपनियों को आर्थिक मदद देना है। यानी यह योजना देश में खनिजों को तैयार करने की क्षमता बढ़ाने पर खास ध्यान देती है।
क्या इस योजना में रेयर अर्थ मिनरल्स और सेमीकंडक्टर भी शामिल हैं?
भारत की क्रिटिकल मिनरल्स सूची में रेयर अर्थ एलिमेंट्स भी शामिल हैं। लेकिन इस नई योजना के तहत मदद सिर्फ लिथियम और निकेल के चार प्लांट के लिए दी जाएगी। रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग और सेमीकंडक्टर बनाने के लिए इस योजना में अलग से कोई मदद तय नहीं की गई है। हालांकि, देश में जरूरी खनिजों की सप्लाई बेहतर होने से इन उद्योगों को भी लंबे समय में फायदा मिल सकता है।
उद्योग और निवेश पर क्या असर पड़ सकता है?
इस योजना से भारत में खनिजों को तैयार करने वाले उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। देश में लिथियम और निकेल के प्लांट लगने से बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, बिजली स्टोर करने वाली तकनीक और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को लंबे समय में फायदा हो सकता है।
इसके अलावा, भारत में ही तैयार खनिज उत्पाद मिलने से दूसरे देशों से इनकी खरीद पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे देश के उद्योगों को जरूरी सामान मिलने में आसानी होगी और भारत की खनिज सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है।
हालांकि, इसका असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कितनी जल्दी प्लांट लगाती हैं, उन्हें जरूरी तकनीक और कच्चा माल मिलता है या नहीं और उत्पादन कब शुरू होता है।
आगे क्या होगा?
अब योजना के तहत कंपनियों की तकनीकी क्षमता की जांच होगी। इसके बाद आर्थिक बोली के आधार पर उनका चयन किया जाएगा। चुनी गई कंपनियों को तय नियमों के अनुसार प्लांट लगाने होंगे। सरकार की ओर से आर्थिक मदद भी काम की प्रगति और तय लक्ष्यों के आधार पर तीन चरणों में दी जाएगी।
निष्कर्ष
₹2,814 करोड़ की क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग योजना भारत में लिथियम और निकेल के प्लांट लगाने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और रक्षा जैसे उद्योगों को जरूरी खनिज देश में ही मिल सकेंगे। हालांकि, दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने के लिए प्लांट लगाने के साथ जरूरी तकनीक और कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाना भी जरूरी होगा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग योजना क्या है?
यह केंद्र सरकार की ₹2,814 करोड़ की योजना है। इसका मकसद भारत में लिथियम और निकेल के चार प्लांट लगाने के लिए कंपनियों को आर्थिक मदद देना है।
इस योजना के तहत कितने प्लांट लगाए जाएंगे?
कुल चार प्लांट लगाए जाएंगे। इनमें दो लिथियम और दो निकेल के लिए होंगे।
कंपनियों को कितनी सब्सिडी मिलेगी?
योग्य निवेश पर 30% तक सरकारी मदद मिलेगी। लिथियम प्लांट के लिए प्रति कंपनी अधिकतम ₹500 करोड़ और निकेल प्लांट के लिए ₹900 करोड़ की सीमा तय की गई है।
क्या इस योजना में कोबाल्ट भी शामिल है?
कोबाल्ट के लिए अलग प्लांट लगाने का लक्ष्य नहीं है। हालांकि, निकेल को प्रोसेस करते समय कोबाल्ट भी दूसरे उत्पाद के रूप में मिल सकता है।
यह योजना कब तक लागू रहेगी?
यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच वर्षों के लिए लागू रहेगी।