BrahMos-NG Missile: 1,500 KM रेंज और 2027-28 में नया अवतार; जानिए ब्रह्मोस-NG को लेकर क्या है भारत का मेगा प्लान?
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख जयतीर्थ जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस-NG मिसाइल का पहला प्रोटोटाइप 2027-28 तक तैयार करने का लक्ष्य है। कंपनी 1,500 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइल पर भी विचार कर रही है, लेकिन यह अभी शुरुआती कॉन्सेप्ट चरण में है।
BrahMos-NG Missile: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का अगला संस्करण ब्रह्मोस-NG 2027 या 2028 तक प्रोटोटाइप चरण में पहुंच सकता है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जयतीर्थ जोशी ने 22 अक्टूबर को ANI को दिए इंटरव्यू में यह जानकारी दी। कंपनी इस मिसाइल में स्वदेशी तकनीक और आधुनिक सामग्रियों का इस्तेमाल बढ़ाने पर काम कर रही है। इसके साथ ही, 1,500 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइल का विकल्प भी कंपनी के भविष्य के रोडमैप में है, लेकिन अभी यह शुरुआती कॉन्सेप्ट चरण में है। यानी इस रेंज वाली मिसाइल को तैयार या तैनात मानना सही नहीं होगा।
2027-28 तक ब्रह्मोस-NG का पहला प्रोटोटाइप बनाने की तैयारी
डॉ. जयतीर्थ जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस-NG अभी डेवलपमेंट स्टेज में है। इसमें मौजूदा सिस्टम की तुलना में अधिक स्वदेशी सामग्री, नई तकनीक और आधुनिक मटेरियल इस्तेमाल करने की योजना है। इन बदलावों के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी R&D पर व्यापक काम करना होगा। कंपनी ने इसके लिए अपनी योजना तैयार कर ली है और विकास कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है।

ब्रह्मोस-NG का पूरा नाम नेक्स्ट जेनरेशन ब्रह्मोस है। इसे मौजूदा मिसाइल परिवार का छोटा, हल्का और अधिक आधुनिक संस्करण बनाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है। इससे खास तौर पर लड़ाकू विमानों से मिसाइल के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इसकी अंतिम क्षमताओं और तकनीकी विशेषताओं का पूरा ब्योरा विकास आगे बढ़ने के बाद ही सामने आएगा।
1,500 किमी रेंज वाली मिसाइल अभी शुरुआती चरण में
ब्रह्मोस एयरोस्पेस मिसाइल की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए चरणबद्ध तरीके से काम कर रही है। जोशी ने बताया कि जमीन, समुद्र और हवा से किए गए परीक्षणों में मिसाइल की पहले की 290 किलोमीटर की रेंज से आगे की क्षमता को भी परखा गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि 1,500 किलोमीटर की रेंज वाला संस्करण तैयार हो चुका है।जोशी के अनुसार, 1,500 किलोमीटर की रेंज कंपनी के भविष्य के रोडमैप का हिस्सा है और फिलहाल कॉन्सेप्ट स्टेज में है। मिसाइल सिस्टम में आगे के अपग्रेड को लेकर कंपनी अपने रूसी जॉइंट वेंचर पार्टनर के साथ बातचीत कर रही है। इसलिए इस परियोजना को अभी प्रस्तावित विकास योजना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

सुखोई-30 से लॉन्च होने वाली ब्रह्मोस में विदेशी देशों की रुचि
जोशी ने बताया कि कुछ ऐसे देशों ने हवा से लॉन्च की जाने वाली ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है, जिनकी वायुसेना में सुखोई-30 लड़ाकू विमान मौजूद हैं। कुछ देशों ने ब्रह्मोस-NG में भी दिलचस्पी जताई है। कंपनी की योजना इस नए संस्करण को पहले एयरबोर्न कॉन्फिगरेशन यानी विमान से लॉन्च किए जाने वाले रूप में विकसित करने की है।कंपनी ने इन देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस एयरोस्पेस सभी इच्छुक पक्षों के साथ बातचीत कर रही है। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी घरेलू जरूरतों के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, रुचि दिखाए जाने को पक्के निर्यात समझौते के बराबर नहीं माना जा सकता।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी विदेशी सेनाओं की दिलचस्पी
जोशी ने कहा कि युद्ध में मिसाइल के प्रदर्शन के बाद विदेशी सेनाएं इसकी तकनीकी और परिचालन क्षमताओं को लेकर ज्यादा सवाल कर रही हैं। उनके मुताबिक, आधुनिक सेनाओं को ऐसे हथियार चाहिए जो तेजी से बदलते युद्ध के हालात में प्रभावी ढंग से काम कर सकें।उन्होंने दावा किया कि पिछले साल हुए सैन्य अभियान के दौरान ब्रह्मोस ने वास्तविक परिस्थितियों में लक्ष्यों को सटीकता से निशाना बनाया और पूरे अभियान में कोई मिसाइल इंटरसेप्ट नहीं हुई। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने पहली बार सक्रिय युद्ध में इस हथियार प्रणाली का इस्तेमाल किया था। जोशी ने पाकिस्तान के नूर खान सहित प्रमुख एयरबेस को निशाना बनाए जाने का भी उल्लेख किया। ये बातें कंपनी प्रमुख के बयान पर आधारित हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित तकनीकी आकलन से अलग समझना चाहिए।
ब्रह्मोस भारत के रक्षा निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। जोशी ने इसे देश की रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया। भारत के कुल रक्षा निर्यात का मूल्य ₹38,400 करोड़ तक पहुंचने और सालाना 62.7% वृद्धि का आंकड़ा भी सामने आया है। यह पूरे देश के रक्षा निर्यात का आंकड़ा है, केवल ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री का नहीं।
अगले पांच साल में उत्पादन और सप्लाई चेन बढ़ाने पर जोर
ब्रह्मोस एयरोस्पेस की प्राथमिकताओं में सशस्त्र बलों से मिले मौजूदा ऑर्डर समय पर पूरे करना, R&D में तेजी लाना और मिसाइल के अलग-अलग सिस्टम व सब-सिस्टम की सप्लाई करने वाली कंपनियों की संख्या बढ़ाना शामिल है।जोशी के मुताबिक, हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ स्थित उत्पादन इकाइयों में काम तेजी से चल रहा है। कंपनी विशेष तकनीकों के विकास और परीक्षण के लिए ‘टेक-ब्रिक्स’ स्थापित करने की योजना भी बना रही है। इसका मकसद अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस के लिए जरूरी तकनीकों पर काम तेज करना है।
कंपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ हर सिस्टम और सब-सिस्टम के लिए पहले मौजूद एक-दो सप्लायर के बजाय करीब 45 सप्लायर विकसित करना चाहती है। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने, जरूरत पड़ने पर तेजी से सप्लाई करने और गुणवत्ता व कीमत के मामले में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

नौसेना के लिए ₹661.50 करोड़ का नया रक्षा सौदा
रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर 2026 को ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदने का ₹661.50 करोड़ का अनुबंध किया। यह सौदा ‘बाय इंडियन-आईडीडीएम’ श्रेणी के तहत हुआ है। परियोजना में कम से कम 68% स्वदेशी सामग्री का प्रावधान है और इसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) समेत भारतीय उद्योगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया जाएगा। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इससे अगले तीन वर्षों में रोजगार सृजन और भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूती मिलने की उम्मीद है।यह सौदा ब्रह्मोस के मौजूदा उत्पादन और घरेलू मांग को पूरा करने की योजना का हिस्सा है। वहीं, ब्रह्मोस-NG और 1,500 किलोमीटर रेंज वाले संभावित संस्करण पर काम कंपनी की लंबी अवधि की तकनीकी योजनाओं से जुड़ा है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
BrahMos-NG Missile का Prototype कब तक तैयार होने की उम्मीद है?
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जयतीर्थ जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस-NG का पहला प्रोटोटाइप 2027 या 2028 तक तैयार करने का लक्ष्य है। इसके लिए नई तकनीक, आधुनिक सामग्रियों और स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाने पर काम चल रहा है।
BrahMos-NG और मौजूदा BrahMos Missile में क्या अंतर होगा?
ब्रह्मोस-NG को मौजूदा ब्रह्मोस का छोटा, हल्का और अधिक आधुनिक संस्करण बनाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है। इसमें स्वदेशी तकनीक और आधुनिक सामग्रियों का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना है। इसकी पूरी तकनीकी विशेषताएं अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं।
BrahMos Missile की Range को 1,500 Km तक बढ़ाने की योजना किस चरण में है?
डॉ. जोशी के मुताबिक, 1,500 किलोमीटर रेंज वाला संस्करण फिलहाल कॉन्सेप्ट स्टेज में है। कंपनी मिसाइल की रेंज बढ़ाने पर चरणबद्ध तरीके से काम कर रही है और आगे के अपग्रेड को लेकर अपने रूसी जॉइंट वेंचर पार्टनर से बातचीत कर रही है।
BrahMos-NG को सबसे पहले किस प्रकार के Platform पर विकसित किया जाएगा?
कंपनी की योजना ब्रह्मोस-NG को सबसे पहले एयरबोर्न कॉन्फिगरेशन में विकसित करने की है। इसका मतलब है कि शुरुआती संस्करण को विमान से लॉन्च किए जाने के लिए तैयार किया जाएगा।
Sukhoi-30 Fighter Jets के साथ BrahMos Missile को Integrate करने में किन देशों ने रुचि दिखाई है?
डॉ. जयतीर्थ जोशी ने बताया कि कुछ ऐसे देशों ने हवा से लॉन्च होने वाली ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है, जिनके पास सुखोई-30 लड़ाकू विमान हैं। हालांकि, उन्होंने इन देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। कंपनी इच्छुक पक्षों के साथ बातचीत कर रही है।
BrahMos-NG में Indigenous Technology और स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना क्या है?
कंपनी नई तकनीकों और आधुनिक सामग्रियों के साथ स्वदेशी सामग्री का हिस्सा बढ़ाना चाहती है। इसके लिए व्यापक R&D की जरूरत होगी। सप्लाई चेन में ज्यादा भारतीय कंपनियों को जोड़ने की योजना भी इसी दिशा का हिस्सा है।
BrahMos Missile के Defence Exports से भारत की Defence Industry को क्या फायदा हो सकता है?
ब्रह्मोस की विदेशी बाजारों में मांग से भारतीय रक्षा उद्योग को निर्यात के अवसर मिल सकते हैं। उत्पादन बढ़ने और सप्लायर नेटवर्क के विस्तार से भारतीय कंपनियों, MSMEs, तकनीकी विकास और रोजगार को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि, वास्तविक लाभ निर्यात ऑर्डर, उत्पादन और डिलीवरी पर निर्भर करेगा।