Bihar Drug Crisis : बिहार में शराबबंदी के 10 साल, क्या सस्ते नशे की चपेट में आ रहे हैं बिहार के किशोर?
बिहार में शराबबंदी के 10 साल बाद नशीले पदार्थों की तस्करी नई चुनौती बन रही है। जनवरी से मई 2026 के बीच NDPS एक्ट के तहत 1,905 मामले दर्ज हुए। गांजा, हेरोइन, नशीली गोलियों और इंजेक्शन की जब्ती बढ़ने के बीच किशोरों तक नशे की पहुंच और नशामुक्ति केंद्रों की सीमित उपलब्धता पर चिंता जताई गई है।
Bihar Drug Crisis : बिहार में 5 अप्रैल 2016 को शराबबंदी लागू की गई थी। इसका मकसद शराब की लत और उससे जुड़ी सामाजिक व आर्थिक समस्याओं को कम करना था। पिछले 10 साल में पुलिस ने राज्यभर में करीब 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त की और शराबबंदी से जुड़े मामलों में लगभग 7.15 लाख गिरफ्तारियां कीं। औसतन हर दिन करीब 8,650 लीटर शराब जब्त हुई और 196 गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन इसी दौरान नशीले पदार्थों की तस्करी और इस्तेमाल से जुड़ी एक दूसरी चुनौती भी सामने आई है। पुलिस के आंकड़ों में गांजा, हेरोइन, नशीली गोलियों और इंजेक्शन की बरामदगी बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। खास चिंता इस बात की है कि सस्ता नशा किशोरों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक पहुंच रहा है।इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में पुलिस रिकॉर्ड, सरकारी आंकड़ों, डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर बताया गया कि बिहार में ड्रग्स का बाजार अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। इसकी पहुंच छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक बढ़ने की आशंका है। तस्करी के लिए नए रास्तों और तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि नशे की लत से जूझ रहे लोगों के इलाज की व्यवस्था इस चुनौती के मुकाबले सीमित है। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ड्रग्स का बढ़ता इस्तेमाल केवल शराबबंदी की वजह से हुआ है। पुलिस और डॉक्टरों ने इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और आपूर्ति से जुड़े कारण भी बताए हैं।
2026 के पहले 5 महीने में ही 1,905 NDPS केस दर्ज
बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज यानी NDPS एक्ट के तहत 697 मामले दर्ज हुए थे। 2022 में इनकी संख्या 1,822 थी। इसके मुकाबले जनवरी से मई 2026 के बीच ही 1,905 मामले दर्ज किए गए। यानी पांच महीने का आंकड़ा 2022 के पूरे साल के मुकाबले 83 अधिक है। हालांकि, अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि 2026 का आंकड़ा केवल पांच महीने का है।गांजे की जब्ती में भी बड़ा बदलाव दर्ज हुआ। 2022 में पुलिस ने करीब 16,692 किलोग्राम गांजा जब्त किया था, जबकि 2025 में यह मात्रा बढ़कर 31,915 किलोग्राम हो गई। वहीं, नशीली गोलियों की बरामदगी 2022 में 29,762 थी। जनवरी से मई 2026 के बीच पुलिस ने करीब 9.29 लाख गोलियां जब्त कीं। इनमें अवैध रूप से हासिल की गई नींद की दवाएं, ओपिओइड दर्द निवारक और चिंता कम करने वाली दवाओं के साथ नकली गोलियां भी शामिल हो सकती हैं।
नशीले इंजेक्शन की जब्ती में भी तेजी आई है। 2022 में 3,677 इंजेक्शन बरामद हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 63,208 हो गए। जनवरी से मई 2026 के बीच यह आंकड़ा 3,83,066 तक पहुंच गया। खांसी के सिरप की जब्ती भी बड़ी मात्रा में दर्ज की गई। पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार, 2022 में 63,095 बोतलें, 2023 में 2.64 लाख, 2024 में 1.17 लाख और 2025 में 3.41 लाख बोतलें जब्त की गईं। 2026 के पहले पांच महीनों में करीब 2.92 लाख बोतलें बरामद हुईं।
हेरोइन की बरामदगी के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। पूरे 2025 में करीब 65.08 किलोग्राम हेरोइन जब्त हुई थी, जबकि 2026 के पहले पांच महीनों में ही 51.92 किलोग्राम बरामद की गई। पुलिस के आंकड़ों में हेरोइन के साथ स्मैक और ब्राउन शुगर से जुड़े मामलों को भी शामिल किया गया है। ये आंकड़े नशीले पदार्थों की बरामदगी और पुलिस कार्रवाई का पैमाना बताते हैं; इनसे अकेले राज्य में नशा करने वालों की वास्तविक संख्या का पता नहीं चलता।

शराब महंगी हुई तो सस्ते नशे का बाजार बढ़ने की आशंका
बिहार में शराबबंदी के बाद शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। अवैध बाजार में इसकी कीमत भी बढ़ गई। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दूसरे राज्यों में करीब 650 से 750 रुपये में मिलने वाली 750 मिलीलीटर की एक व्हिस्की की बोतल बिहार के अवैध बाजार में लगभग 1,500 रुपये में बिक सकती है। इसके मुकाबले मिलावटी ब्राउन शुगर का एक छोटा पैकेट 300 से 500 रुपये में उपलब्ध होने की बात कही गई है।अधिकारी का कहना है कि कुछ लोग कीमत और नशे के असर की तुलना करते हुए सस्ते नशीले पदार्थों की ओर जा सकते हैं। एक बार इस्तेमाल शुरू होने के बाद निर्भरता बढ़ने का जोखिम भी रहता है। हालांकि, यह पुलिस अधिकारियों का आकलन है; शराबबंदी और ड्रग्स के इस्तेमाल के बीच संबंध को समझने के लिए व्यापक सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन भी जरूरी हैं।
डॉक्टरों और पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, कोविड-19 महामारी के दौरान हुए पलायन ने भी कुछ इलाकों में नशे के बाजार को फैलाने में भूमिका निभाई हो सकती है। लॉकडाउन के दौरान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और गुजरात से कई मजदूर व फैक्टरी कर्मचारी अपने घर लौटे थे। अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कुछ लोग दूसरे राज्यों में नशीले पदार्थों के संपर्क में आए थे। उनके लौटने के बाद कुछ नशीले पदार्थों, संपर्कों और इस्तेमाल के तरीकों की जानकारी भी स्थानीय स्तर पर पहुंची हो सकती है।
शुरुआत में ग्रामीण इलाकों में गांजा और अफीम जैसे पौधों से मिलने वाले नशीले पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ने की बात कही गई। अब पुलिस और डॉक्टरों के मुताबिक, बाजार में हेरोइन, अर्ध-कृत्रिम और कृत्रिम नशीले पदार्थों के साथ दवाओं के गलत इस्तेमाल की चुनौती भी बढ़ रही है।
म्यांमार से पूर्वोत्तर के रास्ते बिहार पहुंच रही ड्रग्स की खेप
बिहार की भौगोलिक स्थिति नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए महत्वपूर्ण है। राज्य की सीमा नेपाल से लगती है और यहां से पूर्वोत्तर तथा देश के अन्य हिस्सों तक जाने वाले सड़क और रेल मार्ग गुजरते हैं। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, कुछ खेप पहले बिहार से होकर दूसरे राज्यों तक जाती थीं, लेकिन अब नेटवर्क के कुछ हिस्से बिहार में ही ग्राहकों तक पहुंचने लगे हैं।पुलिस के अनुसार, गांजा नेपाल, त्रिपुरा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से बिहार पहुंचता है। इसकी कुछ खेप आगे उत्तर और पश्चिम भारत के बाजारों तक भेजी जाती है। चरस की आपूर्ति मुख्य रूप से नेपाल से होने की बात कही गई है। अफीम के अवशेष से जुड़ा डोडा या पोस्ता भूसा नेपाल, झारखंड और बिहार के कुछ हिस्सों से आता है। पुलिस अधिकारियों ने बिहार-झारखंड सीमा के जंगलों के पास अवैध पोस्ता खेती मिलने की जानकारी भी दी है।
हेरोइन और मेथामफेटामाइन जैसे नशीले पदार्थों की तस्करी में पूर्वोत्तर के रास्तों का इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के सीमावर्ती क्षेत्र को आम तौर पर ‘डेथ ट्रायंगल’ कहा जाता है। इस क्षेत्र में अवैध नशीले पदार्थों का उत्पादन लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। म्यांमार में अवैध प्रयोगशालाओं से मेथामफेटामाइन जैसी कृत्रिम ड्रग्स तैयार होने की बात भी सामने आती रही है।
अधिकारियों के अनुसार, मिजोरम और मणिपुर की सीमाओं से कुछ खेप भारत में दाखिल होती हैं और फिर चंफाई, आइजोल तथा सिलचर के रास्ते असम तक पहुंचती हैं। अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग से असम के तिनसुकिया तक एक अन्य संभावित रास्ते पर भी पुलिस की नजर है। अधिकारियों को आशंका है कि इस मार्ग का इस्तेमाल जांच से बचने के लिए किया जा सकता है।
बिहार में पूर्वी चंपारण, किशनगंज, वैशाली और भोजपुर जैसे जिलों का नाम भी कुछ तस्करी मार्गों के संदर्भ में सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, गांजा और अन्य नशीले पदार्थों की खेप इन रास्तों से गुजर सकती है। हालांकि, हर जिले में दर्ज मामलों को एक ही नेटवर्क से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
‘कोटा’ नाम का नशा बना पुलिस के लिए नई चुनौती
बिहार में पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘कोटा’ नाम से पहचाने जा रहे नशीले पदार्थ की बढ़ती मौजूदगी पर चिंता जताई है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इसे कच्ची हेरोइन का एक रूप बताया जाता है। इसका इस्तेमाल आमतौर पर सिगरेट के साथ सूंघकर किया जाता है। अधिकारियों के वर्णन के अनुसार, यह छोटे दानों जैसा दिखता है और इसे साबुन की डिब्बी जैसे कंटेनर में रखा जाता है, क्योंकि दबाव पड़ने पर इसका स्वरूप बदल सकता है।पुलिस के मुताबिक, एक डिब्बे में लगभग 10 से 12 ग्राम पदार्थ हो सकता है, जिसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर बेचा जाता है। ऐसे एक डिब्बे से करीब 400 से 500 छोटी शीशियों में सामग्री तैयार किए जाने की जानकारी अधिकारियों ने दी है। उनके अनुसार, इस तरह की खेप म्यांमार से पूर्वोत्तर के रास्ते भारत पहुंचती है और फिर दूसरे राज्यों में भेजी जाती है।
अधिकारियों के बताए अनुमान के मुताबिक, पहले एक डिब्बे की कीमत करीब 25,000 से 30,000 रुपये थी और छोटी शीशी 100 से 150 रुपये में बिकती थी। जब्ती और गिरफ्तारियां बढ़ने के बाद एक डिब्बे की कीमत लगभग 50,000 रुपये और एक शीशी की कीमत 300 से 400 रुपये तक पहुंचने की बात कही गई है। छोटे हिस्सों में बिक्री के कारण इसे बेचने के लिए बड़े कारोबारी निवेश की जरूरत कम हो सकती है, जिससे छोटे स्तर पर तस्करी करने वालों के लिए भी रास्ता खुलता है।
हालांकि, ‘कोटा’ नाम और उसकी संरचना को लेकर पुलिस अधिकारियों की जानकारी को आधिकारिक प्रयोगशाला जांच से अलग समझना चाहिए। नशीले पदार्थों की सही पहचान और उनकी मिलावट का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी होती है।
तस्करी के लिए ट्रेन, छोटे पैकेट और छिपे हुए खांचे
पुलिस के मुताबिक, नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले अब ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं जिनमें खेप को पहचानना मुश्किल हो सकता है। छोटी गोलियां, कैप्सूल, इंजेक्शन और शीशियां सामान्य सामान के बीच छिपाकर ले जाई जा सकती हैं। एक अधिकारी के मुताबिक, जेब या बैग में रखी दवाओं की पहचान केवल देखकर करना आसान नहीं होता। कई मामलों में पुलिस को पहले से मिली सूचना के आधार पर कार्रवाई करनी पड़ती है।कुछ मामलों में तस्करी के लिए महिलाओं को भी इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आई है। मुजफ्फरपुर की एक महिला पुलिस अधिकारी के मुताबिक, जांच के दौरान पेटीकोट और ब्लाउज में विशेष खांचे बनाए जाने के मामले मिले हैं। बच्चों या परिवार के साथ यात्रा करने पर किसी यात्री की गतिविधि सामान्य लग सकती है। भीड़भाड़ वाली ट्रेनों में छोटी खेपों का पता लगाना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई वाहक शुरुआत में कमीशन या बिहार में मौजूद किसी सप्लायर से मिले पैसों के बदले खेप ले जाते हैं। दो-तीन बार सफल होने के बाद कुछ लोग खुद पैसा लगाकर काम शुरू कर देते हैं और अपने परिचितों को भी इस नेटवर्क से जोड़ने लगते हैं। अधिकारियों के अनुमान के अनुसार, ‘कोटा’ से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों में लगभग 80 प्रतिशत के संबंध वैशाली जिले से रहे हैं। वहां से कुछ लोग मजदूरी के लिए पूर्वोत्तर जाते हैं और इसी दौरान तस्करी के नेटवर्क के संपर्क में आ सकते हैं।
तस्कर कानून की जानकारी का भी इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। NDPS एक्ट में नशीले पदार्थ की मात्रा के आधार पर सजा के प्रावधान अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, गांजे की छोटी मात्रा की सीमा एक किलोग्राम और व्यावसायिक मात्रा की सीमा 20 किलोग्राम है। पुलिस का कहना है कि इसी वजह से कुछ खेपों को कई वाहकों में बांट दिया जाता है, ताकि हर व्यक्ति के पास कम मात्रा मिले। हालांकि, किसी मामले में कानूनी परिणाम केवल बरामद मात्रा पर निर्भर नहीं करता; अन्य तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों की भी भूमिका होती है।
स्थानीय स्तर पर नशीले पदार्थ चाय की दुकानों, पान-सिगरेट की दुकानों और सड़क किनारे के विक्रेताओं के जरिए भी बेचे जाने की बात सामने आई है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह नेटवर्क हमेशा किसी एक बड़े गिरोह के रूप में काम नहीं करता। इसमें वाहक, पैसा लगाने वाले, सप्लायर और नए लोगों की भर्ती करने वाले अलग-अलग लोग हो सकते हैं।
मिलावट भी एक गंभीर खतरा है। जांच अधिकारियों ने चॉक पाउडर, पिसी चीनी, कैफीन पाउडर, माल्टेड ड्रिंक पाउडर और यहां तक कि सूखे पशु-मल जैसी चीजों को मिलावट के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की आशंका जताई है। इससे नशीले पदार्थ की वास्तविक मात्रा और असर का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है। एक जांच अधिकारी ने बताया कि डायजेपाम जैसी दवा को कमजोर हेरोइन का असर बढ़ाने के लिए मिलाया जा सकता है। ऐसी दवाएं सांस लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं और जानलेवा साबित हो सकती हैं।
पटना समेत कई जिलों में बढ़ रहे मामले
पुलिस के मुताबिक, पटना लंबे समय से NDPS मामलों में अधिक संख्या वाले जिलों में शामिल रहा है। 2025 में जिले में 372 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि जनवरी से मई 2026 के बीच ही 389 मामले सामने आए। यानी पांच महीने में दर्ज मामलों की संख्या पिछले पूरे साल से अधिक हो गई।आरा, बक्सर, रोहतास और पटना के कुछ हिस्सों में भी नशीले पदार्थों का कारोबार दिखाई देने की बात अधिकारियों ने कही है। इसके अलावा समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली के राघोपुर क्षेत्र में नए हॉटस्पॉट उभरने की जानकारी दी गई है। इन इलाकों में मामलों का बढ़ना स्थानीय स्तर पर आपूर्ति और इस्तेमाल के फैलाव की ओर संकेत कर सकता है, लेकिन वास्तविक स्थिति समझने के लिए जब्ती के साथ-साथ इलाज, सर्वे और जिला-स्तरीय आंकड़ों को भी देखना जरूरी है।
बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स में पिछले साल अप्रैल में संगठित ड्रग्स तस्करी से निपटने के लिए नारकोटिक्स सेल बनाई गई थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस सेल ने 10 अक्टूबर 2026 तक करीब 52.32 करोड़ रुपये मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए और 315 लोगों को गिरफ्तार किया। इसमें से 25.58 करोड़ रुपये की जब्ती 2026 में हुई।
इसके अलावा, सितंबर 2025 में राज्य सरकार ने मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो की स्थापना की। इसमें 2022 में गठित एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स और पुलिस के मद्यनिषेध विंग को मिलाया गया। इसका उद्देश्य शराबबंदी से जुड़े मामलों के साथ नशीले पदार्थों की तस्करी पर भी कार्रवाई करना है।
किशोरों तक पहुंच रहा सस्ता नशा, पुलिस की चिंता बढ़ी
पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सस्ते नशीले पदार्थ किशोरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं तक पहुंच रहे हैं। संसद की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति की 2023 की रिपोर्ट में उद्धृत एक राष्ट्रीय सर्वे के अनुमान के अनुसार, बिहार में 10 से 17 साल की उम्र के करीब 99,000 लोग गांजे, 40,000 ओपिओइड, 29,000 इनहेलेंट और 8,000 सेडेटिव के इस्तेमाल से जुड़े अनुमानित आंकड़ों में शामिल थे। ये सर्वे आधारित अनुमान हैं, न कि वर्तमान समय में नशे की लत से प्रभावित बच्चों की निश्चित संख्या।किशोरों से जुड़े पुलिस रिकॉर्ड में भी बदलाव दिखाई देता है। राज्य के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2023 के सात वर्षों में NDPS एक्ट के तहत 11 किशोरों को हिरासत में लिया गया था, जबकि 2024 में अकेले 50 किशोरों को हिरासत में लिया गया। यह आंकड़ा कानून के तहत दर्ज मामलों और हिरासत को दर्शाता है, न कि सभी किशोरों में नशे के इस्तेमाल की दर को।
पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार के मुताबिक, नशे के आदी मरीजों का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले गांजा और दूसरे पौधों से मिलने वाले पदार्थों पर निर्भरता के मामले ज्यादा दिखते थे, लेकिन अब अर्ध-कृत्रिम और कृत्रिम नशीले पदार्थों तथा हेरोइन की लत से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ने की बात सामने आ रही है।
डॉ. कुमार के अनुसार, युवा कई बार दोस्तों के दबाव या जिज्ञासा में नशे का इस्तेमाल शुरू करते हैं और उन्हें यह अंदाजा नहीं होता कि बाद में इसे छोड़ना कितना मुश्किल हो सकता है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि 150 से 200 रुपये खर्च करने वाले युवाओं के लिए छोटी मात्रा में सस्ते नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं। इसी वजह से सड़क किनारे के विक्रेता और छोटे स्तर पर होने वाली बिक्री रोकना भी जरूरी है।
नशामुक्ति केंद्रों में पहुंचने वाले लोगों की संख्या करीब 20 गुना बढ़ी
ड्रग्स संकट का असर इलाज की जरूरत में भी दिखाई देता है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, बिहार में मंत्रालय से सहायता पाने वाले नशामुक्ति केंद्रों के लाभार्थियों की संख्या 2022-23 में 1,487 थी। यह 2023-24 में 1,639 और 2024-25 में बढ़कर 29,429 हो गई। दो साल में यह संख्या लगभग 20 गुना हो गई।यह आंकड़ा केवल मंत्रालय से सहायता पाने वाले केंद्रों के लाभार्थियों का है। इसे बिहार में नशे की लत से प्रभावित कुल लोगों की संख्या नहीं माना जा सकता। लाभार्थियों की संख्या बढ़ने के पीछे नशे की समस्या बढ़ने के साथ इलाज तक पहुंच, जागरूकता और रिपोर्टिंग में बदलाव जैसे कारण भी हो सकते हैं। मंत्रालय ने इस बढ़ोतरी के कारणों पर इंडियन एक्सप्रेस के सवाल का जवाब नहीं दिया था।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र से सहायता प्राप्त नशामुक्ति सुविधाएं राज्य के एक-तिहाई से भी कम जिलों में संचालित थीं। इससे इलाज की उपलब्धता और भौगोलिक पहुंच को लेकर सवाल उठते हैं। केंद्र सरकार की नशा मुक्त भारत अभियान योजना का उद्देश्य जागरूकता, रोकथाम और नशे से प्रभावित लोगों के उपचार व पुनर्वास को बढ़ावा देना है। जुलाई 2026 में केंद्र ने देशभर में नशामुक्ति और पुनर्वास सुविधाओं के विस्तार की जानकारी भी दी थी।
बिहार पुलिस की स्पेशल ब्रांच और ऑपरेशंस के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने कहा कि केवल पुलिस कार्रवाई से नशीले पदार्थों की समस्या पर काबू पाना पर्याप्त नहीं होगा। उनके मुताबिक, समुदाय की भागीदारी और समाज में नशे के खिलाफ प्रतिरोध पैदा करना जरूरी है। उन्होंने पंजाब के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार और समाज को मिलकर काम करना होगा।
बिहार में शराबबंदी के 10 साल बाद सामने आए आंकड़े बताते हैं कि पुलिस की चुनौती अब केवल अवैध शराब पकड़ने तक सीमित नहीं है। नशीली दवाओं, हेरोइन, गांजा और नए पदार्थों की तस्करी रोकने के साथ किशोरों को इससे बचाना और इलाज की सुविधाएं बढ़ाना भी जरूरी है। पुलिस की जब्ती और गिरफ्तारियां इस समस्या के एक हिस्से को दिखाती हैं; इसके दीर्घकालिक समाधान के लिए रोकथाम, समय पर इलाज, पुनर्वास और स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही अहम होगी।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Bihar में 10 साल की Liquor Ban Policy के बाद Drug Addiction का संकट क्यों बढ़ रहा है?
पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के मुताबिक, शराबबंदी के बाद अवैध शराब महंगी हुई, जबकि नशीले पदार्थों का एक सस्ता बाजार विकसित हुआ। कोविड के दौरान दूसरे राज्यों से लौटे कुछ मजदूरों के जरिए नए पदार्थों और संपर्कों के फैलने की आशंका भी जताई गई है। हालांकि, ड्रग्स संकट को केवल शराबबंदी का परिणाम मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
Bihar में युवाओं के बीच कौन-से Drugs का इस्तेमाल बढ़ रहा है?
पुलिस के आंकड़ों में गांजा, हेरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, नशीली गोलियों, इंजेक्शन और कफ सिरप की जब्ती बढ़ने के संकेत मिलते हैं। अधिकारियों ने ‘कोटा’ नाम से पहचाने जा रहे पदार्थ को भी नई चुनौती बताया है। किसी पदार्थ की वास्तविक संरचना और उसके प्रभाव की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
Bihar में NDPS Cases की संख्या में कितना बदलाव आया है?
बिहार में 2019 में NDPS एक्ट के तहत 697 मामले दर्ज हुए थे। 2022 में यह संख्या 1,822 थी, जबकि जनवरी से मई 2026 के बीच 1,905 मामले दर्ज किए गए। 2026 का आंकड़ा केवल पांच महीनों का है।
Bihar में शराबबंदी और Illegal Drug Trafficking के बीच क्या संबंध बताया जा रहा है?
कुछ पुलिस अधिकारियों का मानना है कि शराब की ऊंची अवैध कीमतों के कारण कुछ लोग सस्ते नशीले पदार्थों की ओर जा सकते हैं। लेकिन तस्करी के नेटवर्क, सीमावर्ती रास्ते, कोविड के दौरान पलायन और नशीले पदार्थों की उपलब्धता भी इस समस्या से जुड़े कारक बताए गए हैं। इसलिए दोनों के बीच संबंध को एकमात्र कारण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
Bihar में Drugs की Smuggling किन रास्तों से हो रही है?
पुलिस के मुताबिक, गांजा नेपाल, त्रिपुरा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से बिहार पहुंचता है। हेरोइन, मेथामफेटामाइन और ‘कोटा’ की कुछ खेपों के लिए मिजोरम, मणिपुर, असम और पूर्वोत्तर के दूसरे मार्गों का इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। बिहार में पूर्वी चंपारण, किशनगंज, वैशाली और भोजपुर जैसे जिलों का नाम भी कुछ तस्करी मार्गों के संदर्भ में लिया गया है।
Bihar में किशोरों और युवाओं को Drug Addiction से बचाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
राज्य में स्पेशल टास्क फोर्स की नारकोटिक्स सेल और मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। केंद्र का नशा मुक्त भारत अभियान जागरूकता, रोकथाम, उपचार और पुनर्वास पर जोर देता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, परिवार, स्कूल, स्थानीय समुदाय और स्वास्थ्य सेवाओं की भागीदारी भी जरूरी है।
Bihar में Drug Rehabilitation Centres की उपलब्धता और नशामुक्ति व्यवस्था कैसी है?
केंद्रीय सहायता प्राप्त नशामुक्ति केंद्रों में बिहार के लाभार्थियों की संख्या 2022-23 के 1,487 से बढ़कर 2024-25 में 29,429 हो गई। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी सुविधाएं राज्य के एक-तिहाई से भी कम जिलों में थीं। इसलिए बढ़ती जरूरत के साथ इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास सेवाओं की पहुंच बढ़ाना एक अहम चुनौती है।