586 एकड़ जमीन, 160 एकड़ जंगल पर कटाई के आरोप! विशाखापत्तनम में Google के AI हब पर क्यों उठे सवाल?
विशाखापत्तनम में Google के 15 अरब डॉलर के एआई हब के लिए 586 एकड़ जमीन आवंटित हुई है। करीब 160 एकड़ वन क्षेत्र की सफाई के आरोपों के बीच पानी, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय लोगों की आजीविका को लेकर सवाल उठे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में भारत को बड़ी पहचान दिलाने वाला एक प्रोजेक्ट अब पर्यावरण और स्थानीय लोगों की आजीविका को लेकर सवालों के घेरे में है। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में Google के प्रस्तावित डेटा सेंटर परिसर के लिए राज्य सरकार ने तीन गांवों में कुल 586 एकड़ जमीन आवंटित की है। वहीं, करीब 160 एकड़ वन क्षेत्र की सफाई और पहाड़ियों को समतल करने के आरोपों ने विवाद बढ़ा दिया है। Google Data Center Visakhapatnam Controversy के केंद्र में अब तीन बड़े सवाल हैं- जंगल और जलस्रोतों पर कितना असर पड़ेगा, परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियां कितनी पर्याप्त हैं और स्थानीय लोगों को इसका कितना फायदा मिलेगा?करीब 15 अरब डॉलर यानी लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश से विकसित किए जा रहे इस एआई हब में बड़े डेटा सेंटर और अंतरराष्ट्रीय समुद्र के नीचे बिछाई गई इंटरनेट केबलों का नेटवर्क शामिल होगा। निर्माण अप्रैल 2026 में शुरू हुआ था और कंपनी के मुताबिक, यह सुविधा 2028 में चालू हो सकती है।
Google Data Center Visakhapatnam Controversy, 586 एकड़ जमीन और जंगल कटाई के आरोप

विशाखापत्तनम में Google के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के तहत तीन परिसर विकसित किए जाने की योजना है। राज्य सरकार ने तीन गांवों में कुल 586 एकड़ जमीन आवंटित की है। अदाविवारम-मुदासरलोवा गांव क्षेत्र में काम शुरू हो चुका है।इस परियोजना को लेकर आरोप हैं कि करीब 160 एकड़ वन क्षेत्र साफ किया जा रहा है और जमीन को समतल करने के लिए पहाड़ियों को काटा जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी परियोजना की लोकेशन पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि यह वन्यजीव अभयारण्य और एक जलाशय के नजदीक है।हालांकि, वन क्षेत्र की कटाई और परियोजना के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़े इन आरोपों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। इनका आकलन संबंधित मंजूरियों, जमीन के रिकॉर्ड और पर्यावरणीय अध्ययन के आधार पर किया जाना जरूरी है।
गांववालों की जमीन और आजीविका पर क्यों मंडरा रहा संकट?
स्थानीय लोगों का कहना है कि संबंधित जमीन उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार रही है। तारलुवाड़ा की पूर्व सरपंच पयाला कोंडम्मा के मुताबिक, सर्वे के दौरान अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि जमीन उन्हीं के पास रहेगी।वहीं, किसान अप्पलराजू ने आरोप लगाया कि जिस जमीन का आवंटन उन्हें कई साल पहले किया गया था, अब उसे उनसे वापस लिया जा रहा है।ये शिकायतें Google Data Center Land Dispute को केवल जमीन के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि स्थानीय लोगों के अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े सवाल भी उठाती हैं। बड़े निवेश से रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, लेकिन इसका लाभ तभी व्यापक होगा जब प्रभावित परिवारों की शिकायतों का समाधान हो और उन्हें उचित अवसर मिलें।फिलहाल, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना से प्रभावित लोगों के लिए कितने रोजगार तय किए गए हैं या उनकी शिकायतों के समाधान के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
पानी की खपत और पर्यावरणीय मंजूरी पर क्या हैं सवाल?
विशाखापत्तनम के इस डेटा सेंटर को लेकर पानी की उपलब्धता और पर्यावरणीय मंजूरी दो प्रमुख मुद्दे हैं। डेटा सेंटर में सर्वर लगातार काम करते हैं, जिससे गर्मी पैदा होती है। इसे नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक बिजली और पानी की खपत पर असर डाल सकती है।Google ने कहा है कि उसने परियोजना की योजना बनाते समय पानी से जुड़े जोखिमों का आकलन किया और उन्नत एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने का फैसला किया। कंपनी के मुताबिक, यह तकनीक लिक्विड कूलिंग की तुलना में कम पानी इस्तेमाल करेगी।हालांकि, Google Data Center Water Concerns केवल कूलिंग सिस्टम तक सीमित नहीं हैं। पूरे परिसर में पानी की कुल खपत, स्थानीय जलस्रोतों पर प्रभाव और संचालन के दौरान पानी की जरूरत का आकलन भी जरूरी है। एयर-कूलिंग अपनाने का मतलब यह नहीं है कि पूरे परिसर में पानी की खपत शून्य हो जाएगी।पर्यावरणीय मंजूरी को लेकर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई भी हुई है। राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे के अनुसार, निर्माण क्षेत्र के आधार पर पर्यावरणीय मंजूरी दी गई थी। परियोजना के संचालन से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।यहां अहम अंतर समझना जरूरी है: निर्माण के लिए दी गई मंजूरी और संचालन के दौरान पानी, ऊर्जा, प्रदूषण तथा आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। इस मामले में अदालत का अंतिम फैसला क्या होगा, यह उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट नहीं है।
Google का AI हब रोजगार देगा, लेकिन स्थानीय लोगों को कितना फायदा?
Google को उम्मीद है कि यह परियोजना क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों और रोजगार को बढ़ावा देगी। बड़े डेटा सेंटर के निर्माण से निर्माण कार्य, तकनीकी सेवाओं, रखरखाव और अन्य सहायक कारोबार में अवसर पैदा हो सकते हैं।लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी नौकरियां स्थानीय लोगों को मिलेंगी और परियोजना से होने वाला आर्थिक लाभ पर्यावरणीय तथा सामाजिक लागत की तुलना में कितना होगा। उपलब्ध जानकारी में स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों की निश्चित संख्या या भर्ती से जुड़ी कोई विस्तृत योजना नहीं दी गई है।Google AI Data Center Vizag की सफलता का आकलन सिर्फ निवेश की राशि या तकनीकी क्षमता से नहीं किया जा सकता। इसके लिए रोजगार के वास्तविक आंकड़े, स्थानीय लोगों की भागीदारी, पानी और बिजली की खपत तथा पर्यावरणीय प्रभावों की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी।
इंडोनेशिया और चीन से क्या सबक मिलते हैं?
दुनिया के दूसरे हिस्सों में डेटा सेंटर के विस्तार ने भी पानी और बिजली की उपलब्धता से जुड़े सवाल पैदा किए हैं। इंडोनेशिया के बाटम द्वीप पर कुछ निवासियों ने पानी की आपूर्ति बाधित होने की शिकायत की है। उनकी चिंता है कि घरेलू जरूरतों के लिए पानी नहीं मिल रहा, जबकि डेटा सेंटर को पर्याप्त आपूर्ति मिल रही है। स्थानीय लोगों के विरोध की घटनाएं भी सामने आई हैं।यह उदाहरण अपने आप में यह साबित नहीं करता कि विशाखापत्तनम में भी ऐसा ही होगा। लेकिन यह दिखाता है कि बड़े डेटा सेंटर की योजना बनाते समय स्थानीय जल आपूर्ति और घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देना कितना जरूरी है।दूसरी ओर, चीन के उलानचाब शहर में करीब 90 डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रत्येक केंद्र को 80 प्रतिशत से अधिक बिजली सीधे पवन ऊर्जा से मिलने की योजना है। क्षेत्र की ठंडी जलवायु से भी कूलिंग की जरूरत कम हो सकती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि डेटा सेंटर का पर्यावरणीय प्रभाव उसकी तकनीक, स्थान, ऊर्जा स्रोत और संसाधनों के प्रबंधन पर निर्भर करता है। विशाखापत्तनम में भी पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र निगरानी से यह समझने में मदद मिलेगी कि परियोजना स्थानीय पर्यावरण के लिए कितनी टिकाऊ है।
निष्कर्ष
Google Data Center Visakhapatnam Controversy भारत के बढ़ते एआई निवेश और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती को सामने लाती है। करीब 15 अरब डॉलर का निवेश रोजगार और तकनीकी विकास के अवसर पैदा कर सकता है, लेकिन जंगल, जलस्रोतों और स्थानीय आजीविका से जुड़े सवालों के जवाब भी जरूरी हैं। परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा कितनी प्रभावी ढंग से होती है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Google Data Center Visakhapatnam Controversy क्या है?
विशाखापत्तनम में Google के प्रस्तावित डेटा सेंटर को लेकर करीब 160 एकड़ वन क्षेत्र की सफाई, पहाड़ियों को काटने, पानी की उपलब्धता, पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय लोगों की जमीन से जुड़े सवाल उठे हैं।
Google के विशाखापत्तनम डेटा सेंटर प्रोजेक्ट में कितना निवेश हो रहा है?
दिए गए विवरण के अनुसार, करीब 15 अरब डॉलर यानी लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश से एआई हब विकसित किया जा रहा है।
Google ने विशाखापत्तनम में AI डेटा सेंटर बनाने का फैसला क्यों किया?
परियोजना का उद्देश्य बड़े डेटा सेंटर और अंतरराष्ट्रीय समुद्री इंटरनेट केबल नेटवर्क वाला एआई हब विकसित करना है। हालांकि, इस स्थान को चुनने के विस्तृत कारणों की जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
स्थानीय लोग परियोजना का विरोध क्यों कर रहे हैं?
स्थानीय लोगों ने जमीन और आजीविका से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता वन क्षेत्र, पहाड़ियों, जलाशय और वन्यजीव अभयारण्य के नजदीक निर्माण को लेकर चिंतित हैं।
क्या Google के डेटा सेंटर से पानी की कमी बढ़ सकती है?
इसकी पुष्टि के लिए परियोजना की कुल जल खपत, स्थानीय जलस्रोतों की स्थिति और घरेलू जरूरतों पर संभावित प्रभाव के आंकड़ों की जरूरत है। Google ने कम पानी इस्तेमाल करने वाली एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने की बात कही है, लेकिन इससे कुल जल खपत शून्य नहीं हो जाती।