Abhishek Singhvi Tata Trusts : टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच तकरार तेज, अभिषेक मनु सिंघवी की एंट्री से क्यों गरमाया कॉर्पोरेट जगत?
Tata Trusts ने Tata Sons के साथ विवाद में वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को प्रतिनिधि बनाया है। विवाद N. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति, Tata Sons की संभावित लिस्टिंग और Trusts के विशेष मतदान अधिकारों की व्याख्या को लेकर है।
Abhishek Singhvi Tata Trusts: टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच चल रहा विवाद अब कानूनी मोड़ की ओर बढ़ता दिख रहा है। टाटा ट्रस्ट्स ने वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए जोड़ा है। यह कदम ऐसे समय आया है जब टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को अगले 5 साल के लिए फिर से चेयरमैन बनाए रखने का समर्थन किया है और कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग का रास्ता अपनाने की दिशा में भी आगे बढ़ा है। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी रखता है, इन दोनों मुद्दों पर अलग रुख रखता है। अब विवाद का केंद्र शेयरहोल्डर अधिकार, टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में ट्रस्ट्स के विशेष अधिकार और कंपनी की लिस्टिंग जैसे मुद्दे बन गए हैं।
अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या कहा?

सिंघवी ने टाटा ट्रस्ट्स की ओर से मामले में उतरने के बाद कहा कि वह इस विवाद में “दुख और अफसोस” के साथ शामिल हो रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मुद्दों को आपसी सहमति और बातचीत से सुलझाया जा सकता था।उन्होंने कहा कि किसी शेयरहोल्डर-ओनर के मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, अगर शेयरहोल्डर-ओनर के अधिकारों को इस तरह सीमित किया जाता है कि वे कंपनी के फैसलों में प्रभावी भूमिका ही न निभा सकें, तो यह भारत की कॉरपोरेट गवर्नेंस व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़े करेगा।
सिंघवी का टाटा समूह से पुराना संबंध भी रहा है। वह पहले रतन टाटा के साथ करीब से काम कर चुके हैं और उनका कहना है कि वह विवाद में शामिल दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों को जानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें दोनों पक्षों के प्रति सम्मान है।
उनका तर्क है कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच 100 साल से ज्यादा पुराने रिश्ते को इस स्तर तक पहुंचना अस्वाभाविक लगता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर ट्रस्ट्स की सर्वसम्मति की शर्त और उसके वीटो अधिकार दशकों से लागू रहे हैं, तो उन्हें अब नजरअंदाज करने का आधार क्या है।
टाटा-मिस्त्री केस का फैसला फिर चर्चा में क्यों?
इस विवाद में 2021 का सुप्रीम कोर्ट का टाटा-मिस्त्री फैसला भी महत्वपूर्ण हो गया है। टाटा ट्रस्ट्स इसी फैसले के कुछ हिस्सों को अपने पक्ष के समर्थन में सामने रख रहा है।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में टाटा ट्रस्ट्स को दिए गए विशेष अधिकारों और उनकी भूमिका पर विचार किया था। फैसले में ट्रस्ट्स की भूमिका, उनके विशेष वोटिंग अधिकारों और शेयरहोल्डिंग से जुड़े प्रावधानों की चर्चा हुई थी।
सिंघवी का तर्क है कि उस फैसले में टाटा ट्रस्ट्स की स्थिति और उसके विशेष अधिकारों को लेकर जो बातें कही गई थीं, उन्हें मौजूदा विवाद में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सीधे तौर पर मौजूदा चंद्रशेखरन विवाद का फैसला नहीं है। वर्तमान विवाद में आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की संबंधित शर्तों की व्याख्या और उनके इस्तेमाल का सवाल अलग से तय होना है।

टाटा संस की लिस्टिंग पर भी दोनों पक्षों की राय अलग
चंद्रशेखरन की नियुक्ति के अलावा टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग भी विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा है।भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया था। इसके बाद कंपनी ने इस श्रेणी से बाहर निकलने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने का आवेदन दिया था। सितंबर 2026 में आरबीआई ने इस आवेदन को खारिज कर दिया।
इसका मतलब यह है कि टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के तौर पर लागू नियामकीय नियमों का पालन करना होगा, जिसमें लिस्टिंग से जुड़ी जरूरत भी शामिल है। इसी वजह से टाटा संस के बोर्ड ने कंपनी की पब्लिक लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का समर्थन किया है।
लेकिन टाटा ट्रस्ट्स इस रास्ते के पक्ष में नहीं है। ट्रस्ट्स टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी रखता है और उसका मानना है कि कंपनी की लिस्टिंग के बजाय दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। नोएल टाटा ने भी लिस्टिंग के बजाय वैकल्पिक रास्तों की बात कही है।
इस तरह विवाद का एक हिस्सा बोर्ड और चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़ा है, जबकि दूसरा हिस्सा टाटा संस की भविष्य की कॉरपोरेट संरचना और लिस्टिंग से संबंधित है।
मामला अब कोर्ट तक क्यों पहुंच सकता है?
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मतभेद अब केवल बोर्डरूम की चर्चा तक सीमित नहीं रह गया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि उसके विशेष अधिकारों और उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स की भूमिका को नजरअंदाज करके लिए गए फैसलों की वैधता पर सवाल उठता है।यही वजह है कि टाटा ट्रस्ट्स ने अभिषेक मनु सिंघवी को अपनी ओर से प्रतिनिधित्व के लिए चुना है। दूसरी तरफ टाटा संस की कानूनी स्थिति से जुड़े पक्ष में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे की भूमिका सामने आई है।
हालांकि, यह कहना अभी सही नहीं होगा कि अदालत ने चंद्रशेखरन की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया है या टाटा ट्रस्ट्स के पक्ष में कोई अंतिम फैसला आ चुका है। मौजूदा स्थिति में विवादित प्रावधानों की कानूनी व्याख्या और आगे की कार्रवाई मुख्य मुद्दा है।
टाटा समूह के लिए यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस का संबंध सिर्फ शेयरहोल्डिंग तक सीमित नहीं है। ट्रस्ट्स की बड़ी हिस्सेदारी, टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में दिए गए विशेष अधिकार और समूह की प्रमुख कंपनियों पर टाटा संस की होल्डिंग—इन सबका असर इस विवाद को व्यापक कॉरपोरेट गवर्नेंस के सवाल से जोड़ता है।
सिंघवी ने भी इसी पहलू पर जोर देते हुए कहा है कि अगर शेयरहोल्डर-ओनर के अधिकारों को कमजोर किया जाता है तो इसका असर सिर्फ टाटा समूह तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की कई कंपनियों में कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर व्यापक सवाल खड़े हो सकते हैं।
फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच विवाद के तीन प्रमुख केंद्र दिखाई दे रहे हैं—चंद्रशेखरन का दूसरा कार्यकाल, ट्रस्ट्स के विशेष शेयरहोल्डर अधिकार और टाटा संस की संभावित लिस्टिंग। आगे यह विवाद बातचीत से सुलझता है या कानूनी प्रक्रिया में जाता है, यह संबंधित पक्षों की अगली कार्रवाई और अदालत के सामने रखे जाने वाले तर्कों पर निर्भर करेगा।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Abhishek Singhvi ने Tata Trusts के लिए क्या भूमिका संभाली है?
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को Tata Trusts ने मौजूदा Tata Sons विवाद में अपना प्रतिनिधि बनाया है। वह Trusts के शेयरधारक अधिकारों, Articles of Association और बोर्ड के फैसलों से जुड़े कानूनी मुद्दों पर उसका पक्ष रखेंगे।
Tata Trusts और Tata Sons के बीच dispute क्या है?
विवाद मुख्य रूप से N. चंद्रशेखरन की Tata Sons के चेयरमैन के रूप में अगले पांच साल के लिए दोबारा नियुक्ति और Tata Sons की प्रस्तावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर है। Tata Trusts का कहना है कि इन फैसलों में उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स के विशेष अधिकारों और कंपनी के Articles of Association का पालन जरूरी है।
Tata Sons dispute अब court तक क्यों पहुंच रहा है?
Tata Trusts का आरोप है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति वाला प्रस्ताव उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स के लिए निर्धारित मतदान शर्त पूरी किए बिना मंजूर किया गया। इसी कानूनी मतभेद और लिस्टिंग विवाद के कारण Trusts कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है।
Abhishek Singhvi ने Tata dispute पर क्या कहा?
सिंघवी ने कहा कि वह इस मामले में “sadness and regret” के साथ उतर रहे हैं क्योंकि मुद्दों को आपसी सहमति से हल नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा कि शेयरधारक-मालिकों के अधिकारों को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता और Tata Trusts तथा Tata Sons के लंबे संबंध को तोड़ना उचित नहीं होगा।
Tata Trusts के shareholder rights को लेकर विवाद क्या है?
Tata Trusts के पास Tata Sons में करीब 66% हिस्सेदारी है। Trusts का कहना है कि कंपनी के Articles of Association में उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स को विशेष affirmative voting rights दिए गए हैं और कुछ फैसलों के लिए उनका समर्थन जरूरी है। मौजूदा विवाद इसी अधिकार की व्याख्या और उसके इस्तेमाल से जुड़ा है।