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Jamaica Slavery Reparations Petition: गुलामी के मुआवजे पर ब्रिटेन को घेरने पहुंचा जमैका, किंग चार्ल्स से मांगा कानूनी जवाब - क्या ब्रिटेन देगा मुआवजा?

जमैका ने गुलामी के दौर की ऐतिहासिक जिम्मेदारी तय करने के लिए किंग चार्ल्स III से प्रिवी काउंसिल में तीन कानूनी सवाल भेजने की मांग की है। देश ब्रिटेन से क्षतिपूर्ति की संभावित कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट कराना चाहता है।

Jamaica Slavery Reparations Petition: गुलामी के मुआवजे पर ब्रिटेन को घेरने पहुंचा जमैका, किंग चार्ल्स से मांगा कानूनी जवाब - क्या ब्रिटेन देगा मुआवजा?

Jamaica Slavery Reparations Petition: जमैका ने ब्रिटिश शासन के दौरान अफ्रीकी लोगों की गुलामी को लेकर अब कानूनी रास्ता अपनाया है। जमैका की संस्कृति मंत्री ओलिविया ग्रेंज के नेतृत्व में सरकार ने 7 सितंबर 2026 को किंग चार्ल्स III के पास एक याचिका दाखिल की। इसमें किंग से कहा गया है कि वह तीन अहम कानूनी सवालों को ज्यूडिशियल कमेटी ऑफ द प्रिवी काउंसिल के सामने भेजें। यह कमेटी जमैका के लिए सर्वोच्च अपीलीय अदालत है। खास बात यह है कि मौजूदा याचिका में सीधे किसी रकम की मांग नहीं की गई है। जमैका पहले यह कानूनी स्थिति साफ कराना चाहता है कि गुलामी और अफ्रीकी लोगों को जबरन जमैका ले जाना उस समय के कानून के तहत वैध था या नहीं और क्या ब्रिटेन पर आज कोई क्षतिपूर्ति देने की कानूनी जिम्मेदारी बनती है।

जमैका ने किंग चार्ल्स से तीन सवालों का जवाब मांगा

जमैका की याचिका का केंद्र अटलांटिक पार अफ्रीकी लोगों की गुलामी है। सरकार चाहती है कि प्रिवी काउंसिल यह देखे कि अफ्रीकी लोगों को जबरन पकड़ना, जमैका ले जाना और उन्हें गुलाम बनाकर रखना अंग्रेजी कानून के तहत कभी वैध था या नहीं। दूसरा सवाल यह है कि क्या ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ब्रिटेन पर आज जमैका के लोगों को किसी तरह की क्षतिपूर्ति या कानूनी राहत देने की जिम्मेदारी बनती है।यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जमैका ने राजनीतिक बातचीत के साथ अब कानूनी रास्ता भी अपनाया है। सरकार का कहना है कि इन सवालों का जवाब मिलने के बाद ही वह अपनी अगली रणनीति तय करेगी। यह याचिका 1833 के ज्यूडिशियल कमेटी एक्ट के तहत दाखिल की गई है, जिसके तहत ब्रिटिश सम्राट कुछ संवैधानिक महत्व के मामलों पर प्रिवी काउंसिल से सलाह मांग सकता है।
जमैका सरकार ने इस कदम को राष्ट्रमंडल के किसी देश की ओर से गुलामी के लिए क्षतिपूर्ति के सवाल को इस कानूनी रास्ते से आगे बढ़ाने की पहली कोशिश बताया है।

किंग्स्टन, जमैका में ड्यूक और डचेस ऑफ़ कैम्ब्रिज की यात्रा से पहले, यूनाइटेड किंगडम से गुलामी के लिए मुआवज़े की मांग को लेकर आयोजित एक रैली में एक प्रदर्शनकारी ने एक साइन-बोर्ड पकड़ा हुआ है [Credit: Gilbert Bellamy/Reuters]
किंग्स्टन, जमैका में ड्यूक और डचेस ऑफ़ कैम्ब्रिज की यात्रा से पहले, यूनाइटेड किंगडम से गुलामी के लिए मुआवज़े की मांग को लेकर आयोजित एक रैली में एक प्रदर्शनकारी ने एक साइन-बोर्ड पकड़ा हुआ है [Credit: Gilbert Bellamy/Reuters]

ब्रिटेन ने गुलाम मालिकों को दिया था मुआवजा, कर्ज 2015 में खत्म हुआ

जमैका की संस्कृति मंत्री ओलिविया ग्रेंज ने ब्रिटेन के पुराने मुआवजा सिस्टम को भी इस मामले में अहम बताया है। ब्रिटेन ने 1833 में गुलामी खत्म करने के बाद गुलाम बनाए गए लोगों को मुआवजा देने के बजाय गुलाम मालिकों को करीब 2 करोड़ पाउंड का भुगतान किया था। इस भुगतान को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बड़ा कर्ज लिया था, जिसका बोझ कई पीढ़ियों तक बना रहा और ब्रिटेन के रिकॉर्ड के मुताबिक यह कर्ज 2015 में पूरी तरह चुकाया गया।ग्रेंज का तर्क है कि अगर गुलामी के दौर में इंसानों को संपत्ति मानकर उनके मालिकों को मुआवजा दिया गया और उस व्यवस्था का आर्थिक असर इतने लंबे समय तक चला, तो आज गुलामी झेलने वाले लोगों के वंशजों के लिए किसी कानूनी राहत की संभावना पर सवाल क्यों नहीं उठाया जाना चाहिए।
हालांकि, जमैका की मौजूदा याचिका में ब्रिटेन से कोई निश्चित रकम नहीं मांगी गई है। ग्रेंज ने साफ कहा है कि सरकार पहले कानूनी सवालों का जवाब चाहती है।

जोंग नरसंहार की बरसी पर उठाया गया कदम

जमैका की यह याचिका जोंग नरसंहार की बरसी के मौके पर दाखिल हुई। 1781 में जोंग नाम के ब्रिटिश जहाज पर बड़ी संख्या में गुलाम बनाए गए अफ्रीकी लोगों को समुद्र में फेंक दिया गया था। जहाज के मालिकों ने बाद में बीमा रकम का दावा किया था। यह घटना अटलांटिक गुलामी के इतिहास में ब्रिटिश दास व्यापार की क्रूरता के सबसे चर्चित उदाहरणों में गिनी जाती है। जमैका सरकार ने इस घटना को अपनी मौजूदा क्षतिपूर्ति मुहिम से भी जोड़ा है।जमैका की सरकार के लिए यह सिर्फ पुराने इतिहास का मामला नहीं है। उसका तर्क है कि गुलामी की विरासत का असर आज भी देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में दिखाई देता है। इसी आधार पर वह ब्रिटेन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर कानूनी जवाब चाहती है।

किंग चार्ल्स की भूमिका क्या है?

किंग चार्ल्स III जमैका के राष्ट्राध्यक्ष हैं, इसलिए याचिका उनके पास पहुंची है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किंग ने जमैका की क्षतिपूर्ति की मांग का समर्थन कर दिया है। उनकी भूमिका इस मामले में प्रिवी काउंसिल के सामने कानूनी सवाल भेजने से जुड़ी है।बकिंघम पैलेस ने कहा है कि किंग गुलामी के इतिहास को बेहतर तरीके से समझने और उससे जुड़े ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने के प्रयासों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने गुलामी के लिए आर्थिक क्षतिपूर्ति देने की मांग को स्वीकार नहीं किया है।
यानी King Charles Jamaica Reparations मामले में अंतिम फैसला देने वाले व्यक्ति नहीं हैं। जमैका उनसे कानूनी सवाल प्रिवी काउंसिल तक पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की मांग कर रहा है।

गुलामी का इतिहास और आज की क्षतिपूर्ति की बहस

अटलांटिक पार दास व्यापार करीब 15वीं से 19वीं सदी के बीच चला। इस दौरान यूरोपीय शक्तियों और बाद में अमेरिका से जुड़े व्यापारियों ने अफ्रीकी लोगों को जबरन पकड़कर अमेरिका और कैरेबियाई उपनिवेशों में पहुंचाया। अनुमान है कि करीब 1.2 से 1.5 करोड़ अफ्रीकी लोगों को अटलांटिक के पार जबरन ले जाया गया और लगभग 1.07 करोड़ लोग अमेरिका तक पहुंच सके। बड़ी संख्या में लोगों की यात्रा के दौरान ही मौत हो गई।हैती का इतिहास भी इस बहस का एक बड़ा उदाहरण है। 1804 में गुलामी के खिलाफ सफल विद्रोह के बाद हैती ने फ्रांस से स्वतंत्रता हासिल की, लेकिन 1825 में फ्रांस ने पूर्व गुलाम मालिकों के नुकसान की भरपाई के नाम पर हैती पर 15 करोड़ गोल्ड फ्रैंक का भुगतान थोप दिया। इस कर्ज को चुकाने में हैती को एक सदी से ज्यादा समय लगा और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक असर पड़ा।
इसी व्यापक ऐतिहासिक बहस के बीच मार्च 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अटलांटिक दास व्यापार और अफ्रीकी लोगों की नस्ली आधार पर गुलामी को “मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध” घोषित करने वाली एक प्रस्तावना को मंजूरी दी। प्रस्ताव के पक्ष में 123 देशों ने वोट किया, जबकि अमेरिका, इजरायल और अर्जेंटीना ने विरोध किया और 52 देशों ने मतदान से दूरी बनाई। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने भी मतदान में हिस्सा नहीं लिया। यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इससे गुलामी के लिए क्षतिपूर्ति की वैश्विक बहस को राजनीतिक समर्थन मिला।
जमैका का कदम इसी लंबे विवाद को अब अदालत की कानूनी बहस में ले जाने की कोशिश है। हालांकि आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किंग चार्ल्स याचिका को प्रिवी काउंसिल के सामने भेजते हैं या नहीं और वहां इन सवालों पर क्या राय सामने आती है।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Jamaica ने Slavery Reparations Petition King Charles को क्यों दी?

जमैका ब्रिटिश शासन के दौरान अफ्रीकी लोगों की गुलामी की कानूनी स्थिति और उसके लिए ब्रिटेन की वर्तमान जिम्मेदारी पर स्पष्ट कानूनी राय चाहता है।

Jamaica UK से Slavery Reparations क्यों मांग रहा है?

जमैका का कहना है कि गुलामी की विरासत का असर आज भी देश पर है। सरकार ब्रिटेन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और संभावित कानूनी राहत का सवाल उठाना चाहती है।

Jamaica की Reparations Petition में क्या मांग की गई है?

मौजूदा याचिका में सीधे पैसे की मांग नहीं है। इसमें किंग चार्ल्स से तीन कानूनी सवाल प्रिवी काउंसिल के पास भेजने को कहा गया है।

King Charles की Slavery Reparations मामले में क्या भूमिका है?

किंग चार्ल्स जमैका के राष्ट्राध्यक्ष हैं। जमैका उनसे कानूनी सवालों को प्रिवी काउंसिल तक भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अनुरोध कर रहा है।

Jamaica ने Privy Council से Legal Advice क्यों मांगी है?

जमैका जानना चाहता है कि अफ्रीकी लोगों को जबरन जमैका ले जाकर गुलाम बनाना अंग्रेजी कानून और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वैध था या नहीं और क्या ब्रिटेन पर आज कोई कानूनी क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी बनती है।

Zong Massacre का Jamaica Reparations Campaign से क्या संबंध है?

जोंग नरसंहार 1781 में गुलाम बनाए गए अफ्रीकी लोगों को समुद्र में फेंके जाने की घटना थी। जमैका ने अपनी याचिका 7 सितंबर को इसकी बरसी के दिन दाखिल की और इस घटना को गुलामी की ऐतिहासिक विरासत से जोड़ते हुए अपनी क्षतिपूर्ति मुहिम का हिस्सा बनाया है।

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