Article 142 Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का आर्टिकल 142 - CJP की FIR से लेकर बाबरी केस तक कैसे हुआ इस्तेमाल?
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को ‘पूर्ण न्याय’ के लिए असाधारण आदेश देने की शक्ति देता है। NEET प्रदर्शन की FIR, अयोध्या में 5 एकड़ जमीन, विवाह-विच्छेद और भोपाल गैस त्रासदी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह शक्ति व्यापक है, लेकिन असीमित नहीं।
Article 142 Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को NEET-UG 2026 में कथित पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़े छात्रों और युवाओं के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने कहा कि 20 से 25 जुलाई 2026 के प्रदर्शनों से जुड़ी दूसरी FIR भी आगे नहीं बढ़ाई जाएंगी। हालांकि, दिल्ली पुलिस को 2,873 ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति दी गई, जिनके बारे में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि या हिंसा में शामिल होने की बात कही गई थी।मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह फैसला दिया। इसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। कोर्ट ने माना कि सामान्य रूप से प्रदर्शन में शामिल हुए छात्रों का भविष्य लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्रवाई से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
यही वजह है कि Article 142 एक बार फिर चर्चा में है। सवाल यह है कि आखिर संविधान का यह अनुच्छेद सुप्रीम कोर्ट को ऐसी कौन-सी शक्ति देता है, जिसके तहत वह सामान्य कानूनी प्रक्रिया से अलग जाकर किसी मामले में राहत दे सकता है?
Article 142 क्या है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की ‘पूर्ण न्याय’ की शक्ति कहा जाता है?
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में “Complete Justice” यानी पूर्ण न्याय करने के लिए जरूरी आदेश या डिक्री जारी करने की शक्ति देता है। संविधान के अनुसार कोर्ट ऐसा आदेश किसी भी लंबित मामले में दे सकता है और उसका आदेश पूरे भारत में लागू किया जा सकता है।इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट जब चाहे कोई भी नया नियम बना सकता है। Article 142 का उद्देश्य ऐसी स्थिति में न्याय पूरा करना है, जहां सामान्य कानूनी प्रावधान किसी मामले का प्रभावी समाधान देने के लिए पर्याप्त न हों।
इसी वजह से इसे सुप्रीम कोर्ट की विशेष और असाधारण शक्ति माना जाता है। यह शक्ति केवल सुप्रीम कोर्ट के पास है, हाई कोर्ट या निचली अदालतों के पास नहीं।
NEET प्रदर्शन की FIR में Article 142 क्यों लगाया गया?
जुलाई 2026 में NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में CJP के नेतृत्व में देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए। 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। दिल्ली में हुई हिंसा में 200 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की रिपोर्ट सामने आई थी।इसके बाद दिल्ली और दूसरे राज्यों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज की गईं। बाद में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के साथ बिहार, महाराष्ट्र, असम और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट से इन मामलों को खत्म करने की मांग की।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से Article 142 का इस्तेमाल कर मामलों को व्यापक रूप से बंद करने का आग्रह किया। सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत में भी 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को आगे नहीं बढ़ाने और नई FIR नहीं दर्ज करने की बात सामने आई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सामने रखी गई FIR को रद्द कर दिया और यह भी कहा कि उसी अवधि के उन्हीं प्रदर्शनों से जुड़ी अन्य FIR को भी आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। कोर्ट ने इसे युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए Complete Justice का उपयुक्त मामला माना।
लेकिन राहत सभी के लिए बिना शर्त नहीं थी। दिल्ली पुलिस द्वारा चिन्हित 2,873 लोगों के खिलाफ, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि या हिंसा में भूमिका को लेकर गंभीर आपत्ति थी, कानून के अनुसार अलग से FIR दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई। यानी Article 142 का इस्तेमाल सामान्य प्रदर्शनकारियों को राहत देने के लिए हुआ, लेकिन गंभीर आरोपों वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला रखा गया।
इस फैसले के बाद CJP ने 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित मार्च वापस ले लिया।
अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने के लिए भी लगा था Article 142
Article 142 Ayodhya verdict इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद में 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया और केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया।लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि 1949 में मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखे जाने और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटनाओं में कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन हुआ था। कोर्ट ने माना कि मुस्लिम पक्ष को मस्जिद से गैरकानूनी तरीके से बेदखल किया गया था।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार को अयोध्या में प्रमुख स्थान पर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिया, ताकि वहां मस्जिद का निर्माण किया जा सके। यह 5 एकड़ जमीन विवादित 2.77 एकड़ जमीन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि कोर्ट द्वारा मुस्लिम पक्ष के लिए दिए गए एक अलग उपचार यानी रेमेडी का हिस्सा थी।
कोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा था कि किए गए गलत काम का उपचार होना चाहिए और न्याय तभी पूरा होगा जब मुस्लिम पक्ष को हुए नुकसान को भी ध्यान में रखा जाए।
शादी खत्म करने में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी शक्ति का इस्तेमाल किया
Article 142 की एक और अहम मिसाल Shilpa Sailesh v. Varun Sreenivasan मामले में 2023 में सामने आई। संविधान पीठ ने माना कि अगर कोई विवाह पूरी तरह टूट चुका है और उसके दोबारा सामान्य होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट Article 142 के तहत irretrievable breakdown of marriage यानी विवाह के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर तलाक दे सकता है।यह महत्वपूर्ण इसलिए था क्योंकि Hindu Marriage Act में उस समय irretrievable breakdown को तलाक का स्वतंत्र वैधानिक आधार नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह शक्ति हर मामले में अपने आप लागू नहीं होगी। कोर्ट को तथ्यों और परिस्थितियों से पूरी तरह संतुष्ट होना होगा कि विवाह वास्तव में खत्म हो चुका है और उसे जारी रखना दोनों पक्षों के लिए उचित नहीं है।
इस मामले में Article 142 का इस्तेमाल कानून को बदलने के लिए नहीं, बल्कि किसी विशेष मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया गया।
भोपाल गैस त्रासदी में भी इस्तेमाल हुआ था Article 142
Article 142 का इतिहास इससे भी पुराना है। 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड और भारत सरकार के बीच मुआवजे को लेकर समझौता हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में इस समझौते को मंजूरी दी और इसी प्रक्रिया में Article 142 की शक्ति का इस्तेमाल हुआ।बाद में आपराधिक मामलों को खत्म करने से जुड़ा हिस्सा विवाद में आया और 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश की समीक्षा करते हुए आपराधिक कार्यवाही बहाल कर दी। यानी Article 142 का इस्तेमाल हुआ, लेकिन यह शक्ति भी न्यायिक समीक्षा से ऊपर नहीं थी।
क्या Article 142 से सुप्रीम कोर्ट कुछ भी कर सकता है?
यहीं Article 142 को समझने की सबसे जरूरी बात आती है। यह शक्ति बहुत व्यापक जरूर है, लेकिन असीमित नहीं है।सुप्रीम कोर्ट Article 142 के जरिए संविधान को नजरअंदाज नहीं कर सकता, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता और ऐसे व्यक्ति के कानूनी अधिकार नहीं छीन सकता जिसे अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं मिला हो। यह शक्ति मौजूदा कानून को पूरा करने के लिए है, उसकी जगह नया कानून बनाने के लिए नहीं।
दूसरे शब्दों में, Article 142 का इस्तेमाल कानून में मौजूद किसी कमी को दूर करने और किसी खास मामले में न्याय को पूरा करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन इससे संसद द्वारा बनाए गए कानून को मनमाने तरीके से बदला या खत्म नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट खुद भी इस शक्ति के इस्तेमाल में सावधानी की बात कहता रहा है। Article 142 कोई ऐसा रास्ता नहीं है जिससे हर मामले में सामान्य कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सके।
NEET केस से फिर सामने आया Article 142 का असली मकसद
NEET प्रदर्शन मामले में Article 142 का इस्तेमाल एक बार फिर इसी विचार को सामने लाता है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी करने का नाम नहीं है। कोर्ट ने सामान्य प्रदर्शन में शामिल युवाओं के भविष्य पर लंबे समय तक चलने वाली FIR और आपराधिक कार्रवाई के असर को ध्यान में रखा, लेकिन गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गुंजाइश भी छोड़ी।अयोध्या में 5 एकड़ जमीन, विवाह के पूरी तरह टूट जाने पर तलाक और NEET प्रदर्शन की FIR जैसे अलग-अलग मामलों से यह समझ आता है कि Article 142 Supreme Court को असाधारण परिस्थितियों में ऐसा समाधान देने की शक्ति देता है, जिससे कानून की सामान्य प्रक्रिया के साथ-साथ न्याय का व्यापक उद्देश्य भी पूरा हो सके।
लेकिन इस शक्ति की सबसे बड़ी सीमा यही है कि इसका इस्तेमाल अपवाद के तौर पर होना चाहिए, सामान्य नियम के रूप में नहीं।
FAQ (Frequently Asked Questions):
संविधान का अनुच्छेद 142 क्या है?
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी लंबित मामले में “Complete Justice” यानी पूर्ण न्याय के लिए जरूरी आदेश या डिक्री जारी करने की शक्ति देता है। सुप्रीम कोर्ट का ऐसा आदेश पूरे भारत में लागू किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत कौन-कौन सी विशेष शक्तियां प्राप्त हैं?
इसके तहत सुप्रीम कोर्ट किसी मामले में पूर्ण न्याय के लिए जरूरी आदेश दे सकता है। यह शक्ति खास तौर पर तब महत्वपूर्ण होती है, जब सामान्य कानूनी प्रावधान किसी असाधारण स्थिति में पूरा और प्रभावी समाधान देने के लिए पर्याप्त न हों।
Article 142 को ‘पूर्ण न्याय’ की शक्ति क्यों कहा जाता है?
क्योंकि संविधान सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में न्याय पूरा करने के लिए जरूरी आदेश देने की विशेष शक्ति देता है। इसका उद्देश्य कानूनी प्रक्रिया में मौजूद कमी को दूर करके मामले का प्रभावी और न्यायसंगत समाधान देना है।
सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने के लिए Article 142 का इस्तेमाल क्यों किया?
NEET-UG 2026 के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में कोर्ट ने सामान्य प्रदर्शन में शामिल छात्रों और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखा। 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़ी FIR बंद की गईं, जबकि 2,873 गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के खिलाफ अलग कार्रवाई की अनुमति दी गई।
अयोध्या-बाबरी भूमि मामले में Article 142 का इस्तेमाल कैसे हुआ?
2019 के अयोध्या फैसले में विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को देने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष के लिए अयोध्या में 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इसे हुए अन्याय के उपचार और पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए Article 142 के तहत दिया था।
क्या Article 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां असीमित हैं?
नहीं। Article 142 बहुत व्यापक शक्ति है, लेकिन यह संविधान, मौलिक अधिकारों और कानून की मूल सीमाओं से ऊपर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसका इस्तेमाल संसद के कानून को मनमाने तरीके से बदलने या किसी व्यक्ति के बिना सुनवाई के कानूनी अधिकार छीनने के लिए नहीं कर सकता।