India Rejects Hague Court Ruling: सिंधु जल समझौते पर भारत ने क्यों ठुकराया फैसला, रतले प्रोजेक्ट पर भी रोक - जानिए क्या है पूरा मामला?
भारत ने हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के सिंधु जल समझौते को लागू मानने वाले फैसले को खारिज कर दिया है। रतले परियोजना पर कुछ अंतरिम पाबंदियां लगाई गई हैं, जबकि भारत कोर्ट के अधिकार क्षेत्र और कार्यवाही को ही अवैध मानता है।
India Rejects Hague Court Ruling: भारत और पाकिस्तान के बीच करीब 66 साल पुराने सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने 31 अगस्त 2026 को कहा कि सिंधु जल समझौता अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत को इसके तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के रतले जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydro-Electric Plant) के निर्माण को लेकर भी कुछ अंतरिम पाबंदियां लगाई हैं।
हालांकि भारत ने इस फैसले को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस तथाकथित कोर्ट को कभी मान्यता नहीं दी और इसके फैसलों को भी स्वीकार नहीं करता। भारत का कहना है कि इस मध्यस्थता निकाय का गठन ही सिंधु जल समझौते की शर्तों के खिलाफ हुआ है।
हेग कोर्ट ने सिंधु जल समझौते पर क्या फैसला दिया?
31 अगस्त को PCA ने पाकिस्तान की ओर से शुरू की गई कार्यवाही में दो अहम फैसले दिए। पहला फैसला सिंधु जल समझौते की स्थिति को लेकर था और दूसरा रतले हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट पर अंतरिम उपायों से जुड़ा था। PCA यानी Permanent Court of Arbitration (स्थायी मध्यस्थता न्यायालय) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो अलग-अलग देशों के बीच होने वाले विवादों को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने में मदद करती है। इसका मुख्यालय नीदरलैंड्स के हेग शहर में है। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते से जुड़े विवाद में भी PCA के तहत मध्यस्थता की कार्यवाही हुई है।
कोर्ट ने भारत के अप्रैल 2025 के उस फैसले को भी देखा, जिसमें पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को 'अबेयंस' (abeyance) में रखने की घोषणा की थी। भारत ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से खत्म नहीं करता, तब तक समझौता अब लागू नहीं माना जाएगा।
लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। उसके मुताबिक भारत का 'अबेयंस' में रखना व्यवहार में समझौते को निलंबित या खत्म करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि समझौते में किसी एक पक्ष को इसे एकतरफा तरीके से निलंबित या समाप्त करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समझौता तभी बदला या खत्म किया जा सकता है, जब भारत और पाकिस्तान दोनों मिलकर नया समझौता करें। इसलिए उसके निष्कर्ष के मुताबिक सिंधु जल समझौता अभी भी पूरी तरह लागू है और पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से जुड़ी उसकी जिम्मेदारियां बनी हुई हैं।
सिंधु जल समझौता क्या है?
सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। इसमें विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी और वह समझौते का हस्ताक्षरकर्ता भी है। करीब नौ साल चली बातचीत के बाद 19 सितंबर 1960 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।
समझौते के तहत सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया। रावी, ब्यास और सतलुज यानी पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल का अधिकार मुख्य रूप से भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब यानी पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि पश्चिमी नदियों पर भी भारत को कुछ सीमित इस्तेमाल, खासकर निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति है।

समझौते में विवाद सुलझाने के लिए भी अलग व्यवस्था बनाई गई है। पहले स्थायी सिंधु आयोग के स्तर पर मुद्दे सुलझाने की कोशिश होती है। तकनीकी अंतर के मामलों में न्यूट्रल एक्सपर्ट (Neutral Expert) और कुछ विवादों में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (Court of Arbitration) की व्यवस्था है।
रतले प्रोजेक्ट पर क्या हुआ?
हेग कोर्ट का दूसरा फैसला जम्मू-कश्मीर में बन रहे रतले हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट से जुड़ा है। यह चिनाब नदी पर बना रन-ऑफ-द-रिवर यानी नदी के प्राकृतिक बहाव पर आधारित जलविद्युत प्रोजेक्ट है।
पाकिस्तान ने रतले और किशनगंगा जलविद्युत परियोजनाओं की कुछ डिजाइन विशेषताओं पर आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि इनसे सिंधु जल समझौते की शर्तों का पालन नहीं होता। इन तकनीकी सवालों की जांच के लिए विश्व बैंक की ओर से नियुक्त न्यूट्रल एक्सपर्ट की अलग प्रक्रिया भी चल रही है।
पाकिस्तान ने रतले प्रोजेक्ट पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। कोर्ट ने उसकी मांग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, लेकिन कुछ अंतरिम उपाय जरूर लागू किए।
कोर्ट के मुताबिक भारत रतले बांध की दीवार और पावर इनटेक स्ट्रक्चर में तय स्तर से ऊपर कंक्रीटिंग नहीं कर सकता। यह रोक न्यूट्रल एक्सपर्ट के अंतिम फैसले के 90 दिन बाद तक लागू रहेगी। न्यूट्रल एक्सपर्ट का अंतिम फैसला फिलहाल जुलाई 2027 के आसपास आने की उम्मीद है। भारत को रतले प्रोजेक्ट के निर्माण कार्यक्रम में होने वाले बदलावों की जानकारी भी देनी होगी।
हालांकि पाकिस्तान की दो अन्य मांगों को कोर्ट ने मंजूर नहीं किया। इनमें भारत को रतले प्रोजेक्ट का निर्माण अपने जोखिम पर करने की स्पष्ट घोषणा और समझौते के साथ पूर्ण अनुपालन के लिए अलग अंतरिम आदेश की मांग शामिल थी।
भारत ने फैसला क्यों ठुकराया?
भारत का विरोध केवल इस फैसले तक सीमित नहीं है। भारत शुरू से ही इस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की वैधता पर सवाल उठाता रहा है।
भारत का कहना है कि सिंधु जल समझौते के तहत एक ही तकनीकी विवाद को समानांतर रूप से दो अलग प्रक्रियाओं में नहीं ले जाया जा सकता। पाकिस्तान ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का रास्ता चुना था, जबकि भारत ने इन्हीं तकनीकी मुद्दों की जांच के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया को उचित माना था।
विश्व बैंक ने दोनों प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया, लेकिन भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। भारत का कहना है कि यह प्रक्रिया समझौते की व्यवस्था के खिलाफ है। विश्व बैंक के मुताबिक दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं और समझौते में दोनों के लिए प्रावधान मौजूद हैं।
31 अगस्त के फैसले के बाद विदेश मंत्रालय ने फिर कहा कि भारत ने इस तथाकथित कोर्ट को कभी मान्यता नहीं दी है। मंत्रालय ने कोर्ट के गठन को ही सिंधु जल समझौते का गंभीर उल्लंघन बताया और कहा कि इस निकाय को भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार नहीं है।
भारत ने यह भी दोहराया कि अप्रैल 2025 में लिया गया सिंधु जल समझौते को अबेयंस में रखने का उसका फैसला अभी भी लागू है। यानी नई दिल्ली के नजरिए से इस फैसले से भारत की अपनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल इस विवाद में दो प्रक्रियाएं अलग-अलग चल रही हैं। हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने समझौते की स्थिति को लेकर अपना फैसला दे दिया है और रतले प्रोजेक्ट पर अंतरिम उपाय भी तय किए हैं। दूसरी ओर, न्यूट्रल एक्सपर्ट रतले और किशनगंगा परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़े तकनीकी सवालों की जांच कर रहे हैं। उनका अंतिम फैसला जुलाई 2027 के आसपास आने की उम्मीद है।
इसका मतलब यह नहीं है कि रतले प्रोजेक्ट पूरी तरह बंद हो गया है। फिलहाल रोक कुछ खास निर्माण गतिविधियों और तय स्तर से ऊपर कंक्रीटिंग पर है। इसके अलावा निर्माण कार्यक्रम में बदलाव की रिपोर्टिंग भी करनी होगी।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि भारत और पाकिस्तान इस अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं और अपने बिल्कुल अलग रुख के बीच आगे कैसे बढ़ते हैं। भारत इस कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर रहा है, जबकि कोर्ट ने समझौते को पूरी तरह लागू बताया है। ऐसे में सिंधु जल समझौते पर दोनों देशों का टकराव आगे भी जारी रहने की संभावना है।
FAQ (Frequently Asked Questions):
भारत ने Hague Court के Indus Waters Treaty Ruling को क्यों खारिज किया?
भारत ने इसे इसलिए खारिज किया क्योंकि वह इस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को मान्यता नहीं देता। भारत का कहना है कि इसका गठन ही सिंधु जल समझौते की शर्तों के खिलाफ हुआ है और इसकी कार्यवाही अवैध है।
India ने Hague Court के अधिकार क्षेत्र पर क्या कहा?
भारत का कहना है कि इस तथाकथित कोर्ट को भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। भारत ने इसकी स्थापना और कार्यवाही दोनों को सिंधु जल समझौते के खिलाफ बताया है।
Indus Waters Treaty क्या है?
यह भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ जल बंटवारे का समझौता है। इसके तहत रावी, ब्यास और सतलुज भारत के लिए तथा सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं, हालांकि दोनों देशों को कुछ सीमित अधिकार भी दिए गए हैं।
India और Pakistan के बीच Indus Waters Treaty कब हुई थी?
सिंधु जल समझौते पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक ने इसकी बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
Hague Court ने Indus Waters Treaty पर क्या फैसला दिया?
कोर्ट ने कहा कि समझौता अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत इसके तहत अपनी जिम्मेदारियों से बंधा है। साथ ही रतले परियोजना पर कुछ अंतरिम निर्माण पाबंदियां लगाई गई हैं।
भारत के अनुसार Hague Court को इस मामले में Jurisdiction क्यों नहीं है?
भारत का कहना है कि पाकिस्तान की ओर से शुरू की गई मध्यस्थता प्रक्रिया समझौते में मौजूद विवाद समाधान व्यवस्था के अनुरूप नहीं थी और समान मुद्दों पर न्यूट्रल एक्सपर्ट की प्रक्रिया के साथ समानांतर कोर्ट बनाना गलत है। इसलिए भारत इस कोर्ट को वैध नहीं मानता।