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Certificate of Deposit Rates में बड़ी गिरावट, $127 अरब के FCNR फ्लो ने बदली बैंकों की फंडिंग तस्वीर

आरबीआई की विशेष योजना के तहत बैंकों में रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा जमा आने से सिस्टम में नकदी बढ़ गई है। इसका सीधा असर Certificate of Deposit Rates पर पड़ा है। तीन महीने की CD दरें मार्च के 7.30-8% से घटकर करीब 6.30% रह गई हैं।

Certificate of Deposit Rates में बड़ी गिरावट, $127 अरब के FCNR फ्लो ने बदली बैंकों की फंडिंग तस्वीर

भारत के बैंकिंग सिस्टम में डॉलर की रिकॉर्ड आमद ने शॉर्ट-टर्म फंडिंग की तस्वीर बदल दी है। Reserve Bank of India की विशेष योजना के तहत विदेशी मुद्रा जमा में जबरदस्त उछाल आया, जिससे बैंकों के पास नकदी की उपलब्धता बढ़ गई। इसका सीधा असर Certificate of Deposit Rates पर देखने को मिला है। तीन महीने की CD दरें अब करीब 6.30% तक आ गई हैं, जबकि मार्च के अंत में यह 7.30-8% के आसपास थीं।

Certificate of Deposit Rates क्यों गिरीं?

बैंकों के लिए Certificate of Deposit यानी CD एक महत्वपूर्ण शॉर्ट-टर्म फंडिंग साधन है। बैंक इन्हें जारी करके आमतौर पर संस्थागत निवेशकों से छोटी अवधि के लिए पैसा जुटाते हैं। जब बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त liquidity होती है, तो बैंकों को इस तरह के इंस्ट्रूमेंट के जरिए अतिरिक्त फंड जुटाने की जरूरत कम हो जाती है। यही स्थिति हाल के महीनों में देखने को मिली है। आरबीआई की विशेष FCNR(B) योजना के तहत विदेशी मुद्रा का बड़ा प्रवाह भारतीय बैंकिंग सिस्टम में आया। इससे बैंकों की फंडिंग जरूरत कम हुई और Certificate of Deposit Rates पर दबाव बढ़ा। Crest Finserv के आंकड़ों के मुताबिक, तीन महीने की CD दरें 5 जून को 7.09-7.23% थीं, जो अगस्त के अंत तक घटकर करीब 6.30% रह गईं। मार्च के अंत में यही दरें 7.30-8% के दायरे में थीं।

$127 अरब के FCNR फ्लो ने बढ़ाई बैंकिंग सिस्टम की Liquidity

आरबीआई की विशेष योजना ने उम्मीद से कहीं ज्यादा विदेशी मुद्रा आकर्षित की। 31 अगस्त तक इस पहल के तहत कुल $136.4 अरब की विदेशी मुद्रा जुटाई गई। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा FCNR(B) जमा का रहा, जो करीब $127.2 अरब था। इसके अलावा करीब $5.3 अरब Overseas Foreign Currency Borrowings (OFCBs) और $3.9 अरब External Commercial Borrowings (ECBs) के जरिए आए। यानी कुल रकम में FCNR(B) की हिस्सेदारी लगभग 93% रही। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाजार में इस योजना से आने वाले प्रवाह का अनुमान इससे काफी कम लगाया जा रहा था। रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआती अनुमानों की तुलना में वास्तविक FCNR(B) mobilisation कई गुना अधिक रहा।

Banks को CD से पैसा जुटाने की जरूरत क्यों कम हुई?

जब बैंकों के पास पर्याप्त फंड उपलब्ध होता है, तो वे महंगे शॉर्ट-टर्म उधार पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। FCNR(B) जमा के बढ़ने से यही हुआ। बैंक पहले से ही बढ़ती credit demand को पूरा करने के लिए wholesale funding और CDs पर निर्भर कर रहे थे। घरेलू retail deposits की वृद्धि कई बार loan demand के साथ कदम नहीं मिला पा रही थी। ऐसे में CDs बैंकों के लिए फंडिंग का एक अहम माध्यम बन गई थीं। लेकिन विदेशी मुद्रा के बड़े प्रवाह के बाद तस्वीर बदल गई। सितंबर की शुरुआत में बैंकिंग सिस्टम में liquidity करीब Rs 7.8 लाख करोड़ तक पहुंच गई, जबकि 5 जून को यह लगभग Rs1.85 लाख करोड़ थी। इस अतिरिक्त liquidity ने बैंकों की CD के जरिए पैसा जुटाने की जरूरत कम कर दी। नतीजतन CD issuance में भी कमी आई और दरें नीचे आने लगीं। अगस्त में बैंकों ने करीब Rs 68,130 करोड़ के CDs जारी किए, जो जुलाई के ₹95,945 करोड़ से काफी कम था।

Source- Hindustan Times
Source- Hindustan Times

Central Bank of India की CD दरों में भी दिखा असर

इस बदलाव को बैंकों की वास्तविक borrowing में भी देखा जा सकता है। Central Bank of India ने मंगलवार को दिसंबर में maturity वाली CDs के जरिए Rs 1,000 करोड़ जुटाए, जिसके लिए उसे करीब 6.38% की दर मिली। इसकी तुलना में बैंक ने 27 अगस्त को समान maturity के लिए ₹500 करोड़ करीब 6.60% की दर पर जुटाए थे। मार्च में तीन महीने की CDs के जरिए Rs 250 करोड़ जुटाने पर दर करीब 7.15% थी। यानी कुछ ही महीनों में CD के जरिए फंड जुटाने की लागत में स्पष्ट गिरावट आई है। Jana Small Finance Bank के Treasury Head Gopal Tripathi के मुताबिक, FCNR(B) inflows और overall system liquidity बढ़ने से बैंकों की CD के जरिए फंड जुटाने की जरूरत कम हुई है।

RBI की FCNR(B) योजना ने कैसे काम किया?

आरबीआई ने जून 2026 में बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए विशेष व्यवस्था शुरू की थी। इसके तहत बैंकों को 3 से 5 साल की FCNR(B) deposits पर अपेक्षाकृत आकर्षक ब्याज दर देने में मदद मिली और उनके currency hedging costs को कम करने के लिए विशेष swap window उपलब्ध कराई गई। इसका उद्देश्य विदेशों में रहने वाले भारतीयों से डॉलर जमा आकर्षित करना था, ताकि भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति मजबूत हो सके और रुपये पर बाहरी दबाव को संभालने में मदद मिले। इस योजना को 2013 की FCNR(B) mobilisation पहल से भी जोड़ा गया है, जब भारतीय बैंकों ने करीब $26 अरब की विदेशी मुद्रा जुटाई थी। इस बार जुटाई गई राशि उस स्तर से कई गुना ज्यादा रही। हालांकि, इस योजना की असाधारण सफलता का एक दूसरा पहलू भी है। इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने के बाद बैंकिंग सिस्टम में रुपये की liquidity भी काफी बढ़ी है। अब आरबीआई के सामने इस अतिरिक्त liquidity को मैनेज करने की चुनौती है।

$136 अरब के फ्लो का Banking Sector पर क्या असर?

रिकॉर्ड FCNR(B) inflows ने भारतीय बैंकिंग सिस्टम को अल्पावधि में मजबूत liquidity cushion दिया है। इससे बैंकों को wholesale funding पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है और loan growth को सपोर्ट करने की क्षमता बढ़ सकती है। लेकिन इतना बड़ा liquidity surplus अपने साथ चुनौतियां भी लाता है। अगर सिस्टम में पैसा लंबे समय तक जरूरत से ज्यादा बना रहता है, तो आरबीआई को liquidity absorption के लिए अलग-अलग monetary tools का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ, इन विदेशी मुद्रा जमा का बड़ा हिस्सा कई वर्षों की अवधि के लिए होता है। इसलिए आज आया डॉलर inflow भविष्य में बैंकों और केंद्रीय बैंक के लिए संबंधित देनदारियां भी पैदा करता है। इस बीच, FCNR(B) विशेष swap window 31 अगस्त को समाप्त हो गई और इसके बाद कई बड़े बैंकों ने FCNR(B) deposits पर ब्याज दरों में कटौती शुरू कर दी है।

Certificate of Deposit Rates में आगे क्या हो सकता है?

FCNR(B) योजना के खत्म होने के बाद अब बैंकों के लिए फंडिंग बाजार धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है। हालांकि, योजना के दौरान आई बड़ी liquidity का असर तुरंत खत्म नहीं होगा। जब तक बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी मौजूद रहती है, तब तक CDs की मांग और उनकी ब्याज दरों पर दबाव बना रह सकता है। वहीं, अगर आने वाले महीनों में liquidity धीरे-धीरे कम होती है और credit demand मजबूत बनी रहती है, तो बैंकों को फिर से wholesale funding का सहारा लेना पड़ सकता है। इसलिए Certificate of Deposit Rates की अगली दिशा काफी हद तक सिस्टम liquidity, credit growth और बैंकों की deposit mobilisation पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष

आरबीआई की विशेष FCNR(B) पहल ने भारतीय बैंकों के लिए रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा जुटाने में सफलता हासिल की है। $127.2 अरब के FCNR flows और कुल $136.4 अरब के विदेशी मुद्रा mobilisation ने बैंकिंग सिस्टम में liquidity बढ़ाई, जिसका सीधा असर Certificate of Deposit Rates में गिरावट के रूप में सामने आया। अब असली चुनौती इस अतिरिक्त liquidity को संतुलित तरीके से मैनेज करने की होगी।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Certificate of Deposit Rates में गिरावट क्यों आई है?

बैंकों में FCNR(B) deposits के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने से liquidity बढ़ी है। इससे बैंकों की short-term funding के लिए CDs पर निर्भरता कम हुई और CD rates नीचे आईं।

FCNR(B) deposits क्या होते हैं?

FCNR(B) यानी Foreign Currency Non-Resident (Bank) deposits ऐसे बैंक deposits हैं जिनमें NRI अपनी विदेशी मुद्रा को निर्धारित अवधि के लिए विदेशी मुद्रा में ही जमा रख सकते हैं।

$127 अरब के FCNR flows का क्या महत्व है?

यह भारतीय बैंकों में विदेशी मुद्रा के रिकॉर्ड प्रवाह को दर्शाता है। इस रकम ने देश के foreign exchange position और banking-system liquidity को मजबूत करने में मदद की है।

Banks Certificate of Deposit क्यों जारी करते हैं?

बैंक CDs के जरिए institutional investors से short-term funds जुटाते हैं। इसका इस्तेमाल liquidity और credit requirements को पूरा करने के लिए किया जाता है।

क्या CD rates आगे और गिर सकती हैं?

यह बैंकिंग सिस्टम की liquidity, credit demand और banks की funding requirements पर निर्भर करेगा। पर्याप्त liquidity बनी रहने पर CD rates पर नीचे की ओर दबाव रह सकता है।

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