Ladakh Elected Body: लद्दाख को जमीन-भाषा पर अधिकार, लेकिन कानून-व्यवस्था पर पेच; आखिर क्यों नाराज हैं नेता?
केंद्र और लद्दाख संगठनों के बीच निर्वाचित यूटी निकाय पर बातचीत हुई। जमीन, संस्कृति, भाषा और पर्यावरण पर विधायी अधिकार का प्रस्ताव है, लेकिन कानून-व्यवस्था पर स्पष्टता बाकी है। एलएबी-केडीए ने बड़े प्रशासनिक बदलावों से पहले लोकतांत्रिक निकाय की मांग की है।
Ladakh Elected Body: लद्दाख में लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर केंद्र और क्षेत्रीय संगठनों के बीच बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है। 9 सितंबर को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय की उपसमिति और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के नेताओं के बीच बैठक हुई। केंद्र ने प्रस्तावित यूनियन टेरिटरी स्तर की निर्वाचित संस्था को जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों जैसे विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देने की बात कही। लेकिन कानून-व्यवस्था किसके नियंत्रण में होगी, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। यही मुद्दा लद्दाख के नेताओं के लिए सबसे अहम बना हुआ है।बैठक में एलएबी के चेयरमैन चेरिंग दोरजे, केडीए के सह-अध्यक्ष असगर करबलई और सज्जाद कारगिली, लद्दाख के सांसद हाजी हनीफा जान और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक शामिल हुए। बातचीत में प्रस्तावित निर्वाचित निकाय के साथ संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा देने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।
जमीन, जंगल और संस्कृति पर अधिकार देने की तैयारी
गृह मंत्रालय की ओर से रखे गए प्रस्ताव के मुताबिक लद्दाख में बनने वाली यूनियन टेरिटरी स्तर की संस्था का चुनाव सीधे जनता के जरिए होगा। उसे जमीन, संस्कृति और भाषा, जंगल, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों तथा संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत केंद्र शासित प्रदेश के लिए आरक्षित दूसरे विषयों पर विधायी अधिकार दिए जा सकते हैं।इसके अलावा इस निर्वाचित संस्था को कार्यकारी, बजटीय, योजना बनाने और वित्तीय अधिकार देने की भी बात कही गई है। यानी प्रस्ताव सिर्फ एक सलाहकार निकाय बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लद्दाख के स्थानीय प्रशासन में चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में है।
मई और जुलाई में हुई पिछली बातचीत के बाद भी केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच एक ऐसे स्वदेशी या विशेष मॉडल पर चर्चा चल रही थी, जो लद्दाख की जरूरतों के मुताबिक हो। लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने 9 सितंबर की बैठक के बाद कहा कि अनुच्छेद 371 के तहत ऐसे ही एक विशेष प्रशासनिक मॉडल के व्यापक स्वरूप पर चर्चा हुई और लोकतंत्र को मजबूत करना लक्ष्य है।
लेकिन एलएबी और केडीए की नजर में अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन अधिकारों का वास्तविक दायरा कितना होगा।
Law and Order पर अटका सबसे बड़ा सवाल
लद्दाख के नेताओं ने बैठक में कानून-व्यवस्था के अधिकार को लेकर स्पष्ट जवाब मांगा। उनका कहना है कि अगर निर्वाचित संस्था को जमीन, संस्कृति, पर्यावरण और दूसरे अहम विषयों पर अधिकार दिए जाते हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था उसके नियंत्रण में नहीं रहती, तो स्थानीय सरकार के पास प्रभावी प्रशासन के लिए सीमित शक्ति रह सकती है।एलएबी और केडीए ने पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों का उदाहरण देते हुए इस मुद्दे पर स्पष्टता मांगी है। वे चाहते हैं कि कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारों का दायरा साफ तौर पर तय किया जाए और निर्वाचित सरकार की भूमिका स्पष्ट हो। अभी केंद्र की ओर से इस विषय पर अंतिम व्यवस्था सामने नहीं आई है।
यही वजह है कि 9 सितंबर की बैठक को पूर्ण राजनीतिक समझौता मानना जल्दबाजी होगी। बैठक के बाद लद्दाख के प्रतिनिधियों ने कहा कि उन्हें प्रस्तावित निर्वाचित निकाय का वह विस्तृत ड्राफ्ट नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। सोनम वांगचुक और केडीए के सज्जाद कारगिली ने बैठक को लेकर निराशा जताई।
Sixth Schedule की जगह Article 371 से रास्ता?
लद्दाख के संगठन लंबे समय से संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। उनकी प्रमुख चिंताओं में जमीन, रोजगार, संस्कृति, भाषा और स्थानीय पहचान की सुरक्षा शामिल है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश बना था, लेकिन उसे विधानसभा नहीं दी गई। इसके बाद स्थानीय स्तर पर निर्वाचित विधायी संस्था और संवैधानिक सुरक्षा की मांग लगातार उठती रही है।अब बातचीत में अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख के लिए अलग संवैधानिक प्रावधान तैयार करने की दिशा में चर्चा हो रही है। इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि लद्दाख को वही व्यवस्था मिले जो छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में है। बल्कि केंद्र और लद्दाख के बीच एक ऐसा अलग मॉडल तैयार करने की कोशिश हो रही है, जो क्षेत्र की परिस्थितियों के मुताबिक हो। प्रस्तावित व्यवस्था में जमीन, पहचान, संस्कृति और स्थानीय प्रशासन की सुरक्षा अहम हिस्से हो सकते हैं।
लद्दाख के नेताओं के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हें आशंका है कि भविष्य में बाहरी निवेश, जमीन के इस्तेमाल और प्रशासनिक फैसलों से क्षेत्र की सामाजिक और पर्यावरणीय संरचना प्रभावित हो सकती है।
2025 की हिंसा के पीड़ितों को मुआवजे का भरोसा
बैठक में 24 सितंबर 2025 की हिंसा का मुद्दा भी उठा। उस समय लेह में राज्य का दर्जा और लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत और करीब 80 लोग घायल हुए थे। यह लद्दाख आंदोलन के सबसे गंभीर घटनाक्रमों में से एक था।एलएबी और केडीए के मुताबिक गृह मंत्रालय ने हिंसा में मारे गए लोगों और घायलों के लिए मुआवजा देने का आश्वासन दिया है। हालांकि प्रदर्शन से जुड़े मामलों को लेकर दोनों संगठनों ने सभी केस एक साथ वापस लेने की मांग रखी है। उनका कहना है कि इन्हें चरणबद्ध तरीके से नहीं, बल्कि एक साथ वापस लिया जाना चाहिए।
सरकार की ओर से इस मुद्दे पर विचार किए जाने की बात कही गई है, लेकिन सभी मामलों को तत्काल वापस लेने पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है।
ड्राफ्ट नहीं मिला, इसलिए नाराजगी भी बरकरार
लद्दाख के नेताओं को उम्मीद थी कि 9 सितंबर की बैठक में प्रस्तावित निर्वाचित निकाय का विस्तृत ड्राफ्ट सामने आएगा। लेकिन बैठक में ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय आगे की चर्चा के लिए सवालों की सूची दी गई। सोनम वांगचुक ने कहा कि मई में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई थी, बैठक में उनमें से कई बातें दोहराई गईं और कोई बड़ी नई प्रगति नहीं हुई।वहीं सरकार की तरफ से बैठक को सकारात्मक बताया गया है। इसका मतलब यह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत बंद नहीं हुई है, लेकिन अभी अंतिम ढांचा तय होना बाकी है।
आगे की बातचीत अक्टूबर के पहले सप्ताह में होने की संभावना है। इसमें प्रस्तावित संवैधानिक प्रावधान के ड्राफ्ट पर चर्चा हो सकती है। लद्दाख के संगठन चाहते हैं कि निर्वाचित निकाय के गठन के लिए जल्द कानून बनाया जाए और उसके बाद चुनाव कराए जाएं।
बड़े फैसलों से पहले निर्वाचित सरकार की मांग
एलएबी और केडीए ने एक और बात स्पष्ट कर दी है। उनका कहना है कि जब तक लद्दाख के लिए प्रस्तावित निर्वाचित यूटी स्तर की संस्था नहीं बन जाती, तब तक शासन व्यवस्था, जमीन के हस्तांतरण और दूसरे महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों में कोई बड़ा या ऐसा बदलाव नहीं किया जाना चाहिए जिसे बाद में वापस लेना मुश्किल हो।दोनों संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर निर्वाचित निकाय बनने से पहले ऐसे बड़े फैसले किए गए तो वे दोबारा सार्वजनिक आंदोलन शुरू करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। सितंबर 2026 की बातचीत से पहले भी एलएबी ने कहा था कि ठोस प्रगति नहीं हुई तो आंदोलन तेज किया जा सकता है।
इस पूरे विवाद की जड़ 2019 के बाद की राजनीतिक व्यवस्था में है। लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश तो बना, लेकिन उसके पास अपनी विधानसभा नहीं है। अब केंद्र और स्थानीय संगठनों के बीच बातचीत इस बात पर केंद्रित है कि लद्दाख को किस तरह की निर्वाचित संस्था और संवैधानिक सुरक्षा दी जाए।
फिलहाल तस्वीर यह है कि Ladakh Elected Body के गठन पर बातचीत आगे बढ़ रही है और जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों पर विधायी अधिकार देने का प्रस्ताव सामने आया है। लेकिन कानून-व्यवस्था, अधिकारों की पूरी सीमा और संवैधानिक सुरक्षा का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है। इसलिए इसे लद्दाख की मांगों का अंतिम समाधान नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही बातचीत का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाना चाहिए।
FAQ (Frequently Asked Questions):
Ladakh Elected Body को कौन-कौन से powers देने का प्रस्ताव है?
प्रस्तावित निर्वाचित यूटी स्तर की संस्था को जमीन, संस्कृति और भाषा, जंगल, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों तथा अनुच्छेद 240 के तहत केंद्र शासित प्रदेश के लिए आरक्षित अन्य विषयों पर विधायी अधिकार देने की बात कही गई है। उसे कार्यकारी, बजटीय, योजना और वित्तीय अधिकार भी दिए जाने का प्रस्ताव है।
Ladakh UT Elected Body में Law and Order Powers को लेकर क्या विवाद है?
लद्दाख के नेता चाहते हैं कि कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारों की स्थिति स्पष्ट हो और निर्वाचित सरकार की इसमें प्रभावी भूमिका रहे। अभी इस मुद्दे पर केंद्र की ओर से स्पष्ट अंतिम व्यवस्था सामने नहीं आई है।
Ladakh Legislative Powers के तहत किन subjects पर authority मिलेगी?
प्रस्ताव के अनुसार जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों जैसे विषयों पर विधायी अधिकार दिए जा सकते हैं। अनुच्छेद 240 के तहत यूटी के लिए आरक्षित दूसरे विषय भी इसके दायरे में आ सकते हैं।
Ladakh Sixth Schedule की मांग क्यों की जा रही है?
एलएबी और केडीए लंबे समय से जमीन, रोजगार, संस्कृति, भाषा और स्थानीय पहचान की संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। छठी अनुसूची के जरिए ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय स्वायत्तता और सुरक्षा का प्रावधान है, इसलिए लद्दाख में भी इसकी मांग उठती रही है।
Leh Apex Body और Kargil Democratic Alliance की मुख्य मांगें क्या हैं?
दोनों संगठन लद्दाख में यूटी स्तर की निर्वाचित विधायी संस्था, संवैधानिक सुरक्षा, जमीन और स्थानीय पहचान की रक्षा, 2025 की हिंसा से जुड़े मामलों की वापसी और पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग कर रहे हैं। साथ ही वे निर्वाचित निकाय बनने से पहले बड़े अपरिवर्तनीय प्रशासनिक बदलावों का विरोध कर रहे हैं।