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NRI False Marriage Promise Case: शादी से इनकार करने पर हर बार दर्ज नहीं हो सकती FIR, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से क्यों मचा हड़कंप?

सुप्रीम कोर्ट ने जाम्बिया में रह रहे NRI की FIR रद्द कर दी। महिला ने शादी का वादा कर यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया था। कोर्ट ने कहा, बाद में शादी से इनकार करना शुरुआत से झूठी नीयत साबित नहीं करता।

NRI False Marriage Promise Case: शादी से इनकार करने पर हर बार दर्ज नहीं हो सकती FIR, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से क्यों मचा हड़कंप?

NRI False Marriage Promise Case: सुप्रीम कोर्ट ने जाम्बिया में रहने वाले एक NRI को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ गुजरात के वडोदरा में दर्ज FIR रद्द कर दी है। मामला शादी का वादा करके यौन संबंध बनाने के आरोप से जुड़ा था। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया, लेकिन बाद में अपनी मां के रिश्ते के लिए तैयार नहीं होने की बात कहकर शादी से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायत में दोनों के बीच सहमति से संबंध बनने के संकेत हैं और इसमें ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे लगे कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखे के इरादे से महिला को संबंध बनाने के लिए तैयार किया था।यह फैसला कुणाल रमेशभाई कल्याणी बनाम गुजरात राज्य मामले में 7 सितंबर 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दिया। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को भी पलट दिया, जिसमें मई 2026 में FIR रद्द करने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ बाद में शादी न हो पाने से यह साबित नहीं होता कि शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था।

फेसबुक पर हुई दोस्ती, फिर होटल में दो दिन साथ रहे

शिकायत के अनुसार महिला नवंबर 2022 में फेसबुक के जरिए आरोपी के संपर्क में आई थी। दोनों के बीच बातचीत के बाद रिश्ता आगे बढ़ा। पहली बार दोनों 12 फरवरी 2024 को वडोदरा में मिले। शिकायत के मुताबिक आरोपी महिला को एक होटल में ले गया, जहां दोनों करीब दो दिन रुके।महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया और इसी भरोसे पर दोनों के बीच यौन संबंध बने। शिकायत में कहा गया कि आरोपी ने दिसंबर 2024 तक शादी करने की बात कही थी, लेकिन जनवरी 2025 में उसने बताया कि उसकी मां इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद उसने महिला से शादी करने से इनकार कर दिया।
महिला की शिकायत पर 20 मई 2025 को वडोदरा के सयाजीगंज पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई। इसमें भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 69 लगाई गई थी।

शादी का वादा कब अपराध बनता है?

BNS की धारा 69 में किसी महिला से धोखे से या शादी करने का इरादा न होते हुए शादी का वादा करके यौन संबंध बनाने को अलग अपराध माना गया है। इसमें दोष सिद्ध होने पर 10 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।लेकिन इस प्रावधान में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ शादी का वादा पूरा न होना पर्याप्त नहीं है। यह दिखाना जरूरी है कि संबंध बनाए जाने के समय आरोपी की नीयत ही शादी करने की नहीं थी और उसने उसी धोखे के जरिए महिला को यौन संबंध के लिए तैयार किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को इस मामले में अहम माना। कोर्ट ने अपने आदेश में पहले के दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य फैसले के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके मुताबिक शुरुआत से ही शादी का वादा पूरा न करने की नीयत होने का पर्याप्त आधार होना जरूरी है। अगर वादा उस समय वास्तविक था, लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो सकी, तो हर ऐसा मामला धारा 69 का अपराध नहीं बन जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत में क्या देखा?

सुप्रीम कोर्ट ने FIR में दर्ज महिला के बयान को ही आधार बनाकर देखा कि संबंध किन परिस्थितियों में बने थे। कोर्ट ने पाया कि शिकायत में दोनों के बीच दोस्ती और बाद में प्रेम संबंध विकसित होने की बात कही गई थी।कोर्ट के मुताबिक पहली मुलाकात के दौरान महिला ने आरोपी के साथ संबंध बनाए, लेकिन शिकायत में यह स्पष्ट नहीं था कि उसने केवल शादी के वादे के कारण ही संबंध बनाने की सहमति दी थी। बाद में दोनों के दो दिन होटल में साथ रहने का भी उल्लेख था।
बेंच ने कहा कि शिकायत में ऐसा कोई तथ्य नहीं था जिससे यह पता चले कि आरोपी ने किसी धोखे वाले तरीके से महिला को यौन संबंध के लिए तैयार किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी ने बाद में अपनी मां के विरोध के कारण शादी से इनकार किया, तो यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि अगर शादी का वादा किया भी गया था, तो शुरुआत में उसकी नीयत धोखा देने की नहीं थी।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई पर्याप्त कारण नहीं है और 20 मई 2025 की FIR को रद्द कर दिया।

गुजरात हाईकोर्ट ने पहले क्यों नहीं रद्द की थी FIR?

इस मामले में आरोपी ने पहले गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था। मई 2026 में हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दिया था।हाईकोर्ट ने कहा था कि शादी के ऐसे वादे में फर्क करना जरूरी है, जो ईमानदार इरादे से किया गया हो लेकिन बाद में पूरा न हो पाया हो, और उस वादे में जो शुरुआत से ही शादी करने की नीयत के बिना किया गया हो।
हाईकोर्ट ने आरोपी की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया था कि उसकी मां शादी के लिए तैयार नहीं थी। कोर्ट ने कहा था कि आरोपी को संबंध आगे बढ़ाने से पहले अपनी मां की राय पता करनी चाहिए थी। हाईकोर्ट के मुताबिक बाद में मां की असहमति को शादी न करने का उचित कारण मानना पहली नजर में संदिग्ध था।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी मामले में अलग निष्कर्ष निकाला और कहा कि उपलब्ध शिकायत में शुरुआत से धोखाधड़ी की नीयत साबित करने वाला पर्याप्त तथ्य नहीं है।

आरोपी ने महिला के परिवार से भी संपर्क रखा था

आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में यह भी कहा गया था कि उसका महिला की मां और उसकी मातृ पक्ष की मौसी से संपर्क था। उसके वकील ने बताया था कि आरोपी ने महिला की मां को करीब 40 हजार रुपए आर्थिक मदद के तौर पर भेजे थे।इसके अलावा आरोपी ने मुंबई से करीब 32 हजार रुपए के मोबाइल फोन और कपड़े भी महिला को भेजे थे। बचाव पक्ष ने इन बातों को यह दिखाने के लिए रखा था कि दोनों के बीच संबंध केवल शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं थे और आरोपी का व्यवहार शुरू से धोखाधड़ी करने वाला नहीं था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का FIR रद्द करने का मुख्य आधार इन आर्थिक मदद या सामान भेजने की बात अकेली नहीं थी। कोर्ट ने मुख्य रूप से शिकायत में दर्ज घटनाक्रम और उसमें शुरुआत से धोखे की नीयत के पर्याप्त संकेत नहीं मिलने को आधार बनाया।

इस फैसले का मतलब यह नहीं कि शादी का झूठा वादा अपराध नहीं है

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस तरह नहीं समझना चाहिए कि शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाना अपराध नहीं है। BNS की धारा 69 ऐसे मामलों को स्पष्ट रूप से अपराध मानती है और इसमें 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।फर्क नीयत का है। अगर जांच या उपलब्ध सबूतों से पता चलता है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल महिला को यौन संबंध के लिए तैयार करने के लिए शादी का झूठा वादा किया, तो धारा 69 लागू हो सकती है।
लेकिन अगर शुरुआत में शादी का इरादा था और बाद में परिवार का विरोध, परिस्थितियों में बदलाव या कोई दूसरी वजह सामने आने से रिश्ता टूट गया, तो सिर्फ शादी पूरी न होने को अपने आप आपराधिक धोखा नहीं माना जा सकता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यही अंतर लागू किया।

FAQ (Frequently Asked Questions):

Supreme Court ने NRI को False Marriage Promise Case में राहत क्यों दी?

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायत में दोनों के बीच सहमति से बने रिश्ते के संकेत हैं और शुरुआत से ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे साबित हो कि आरोपी ने धोखे से महिला को यौन संबंध के लिए तैयार किया। बाद में मां के विरोध के कारण शादी से इनकार करना अपने आप में शुरुआती धोखाधड़ी साबित नहीं करता।

False Promise of Marriage क्या होता है?

जब कोई व्यक्ति शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखता, लेकिन महिला को यौन संबंध के लिए तैयार करने के उद्देश्य से शादी का वादा करता है, तो इसे कानून में झूठा या धोखापूर्ण शादी का वादा माना जा सकता है।

शादी का वादा कब Criminal Offence बन सकता है?

सिर्फ शादी का वादा पूरा न होने से अपराध नहीं बनता। अपराध के लिए यह दिखाना जरूरी है कि संबंध बनाए जाने के समय आरोपी की नीयत शादी करने की नहीं थी और उसने इसी धोखे के जरिए महिला को यौन संबंध के लिए तैयार किया था।

BNS की Section 69 क्या कहती है?

BNS की धारा 69 धोखे या शादी करने का इरादा न होते हुए शादी का वादा करके यौन संबंध बनाने को अपराध मानती है। इसमें 10 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। यह अपराध बलात्कार की धारा से अलग प्रावधान के रूप में रखा गया है।

क्या शादी का वादा पूरा न होने पर अपने आप Criminal Case बन जाता है?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में शादी से मुकर जाना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वादा शुरुआत से ही झूठा था। मामले में शुरुआती नीयत और संबंध बनाने की परिस्थितियों को देखा जाएगा।

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