कनाडा के पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा में अलग देश बनने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। यहां अलगाववादियों ने दावा किया है कि उन्होंने स्वतंत्रता जनमत संग्रह यानी रेफरेंडम की प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी संख्या से कहीं ज्यादा हस्ताक्षर जुटा लिए हैं। इस घटनाक्रम ने पूरे कनाडा की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
अलगाववादी नेताओं के अनुसार उन्होंने करीब 3 लाख हस्ताक्षर चुनाव अधिकारियों को सौंप दिए हैं, जबकि रेफरेंडम पर विचार के लिए लगभग 1.78 लाख हस्ताक्षरों की जरूरत थी। इसके बाद अब यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अल्बर्टा और कनाडा के रिश्तों पर बड़ा सवाल बन गया है।
हालांकि अभी यह तय नहीं है कि रेफरेंडम होगा या नहीं, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अल्बर्टा में केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है।
आखिर अल्बर्टा में क्या हो रहा है?
अल्बर्टा कनाडा का एक समृद्ध और तेल उत्पादन के लिए मशहूर प्रांत है। यहां लंबे समय से कुछ समूह यह कहते रहे हैं कि केंद्र सरकार यानी ओटावा उनकी जरूरतों और हितों को नजरअंदाज करती है।
अब इसी नाराजगी ने अलग देश बनने की मांग को फिर हवा दे दी है। अलगाववादी नेताओं का कहना है कि अल्बर्टा आर्थिक रूप से मजबूत है और उसे अपने संसाधनों पर ज्यादा अधिकार मिलना चाहिए। उनका आरोप है कि कनाडा की संघीय सरकार पर्यावरण नियमों और दूसरी नीतियों के जरिए प्रांत के तेल उद्योग को कमजोर कर रही है।
कितने हस्ताक्षर जुटे?
अलगाववादी संगठनों ने बताया कि उन्होंने करीब 3,02,000 हस्ताक्षर जमा किए हैं। यह संख्या जरूरी सीमा से काफी ज्यादा है। नियमों के अनुसार जनमत संग्रह की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए लगभग 1,78,000 वैध हस्ताक्षरों की जरूरत थी।
अलगाववादी नेता मिच सिल्वेस्ट्रे ने इसे “ऐतिहासिक दिन” बताया। उन्होंने कहा कि यह अल्बर्टा की राजनीतिक यात्रा में बड़ा मोड़ है।
क्या अब तुरंत रेफरेंडम होगा?
इतने हस्ताक्षर जुट जाना अपने आप में रेफरेंडम की गारंटी नहीं है। अब चुनाव प्राधिकरण “इलेक्शंस अल्बर्टा” इन हस्ताक्षरों की जांच करेगा। फिलहाल अदालत के एक आदेश के कारण यह प्रक्रिया रुकी हुई है। इसके अलावा कई कानूनी चुनौतियां भी सामने आ चुकी हैं।
आदिवासी समूहों ने क्यों दी चुनौती?
अल्बर्टा के कई फर्स्ट नेशंस यानी आदिवासी समूहों ने अदालत में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि अगर अल्बर्टा कनाडा से अलग होता है तो इससे उनके ऐतिहासिक समझौते और अधिकार प्रभावित होंगे।
इन समूहों का तर्क है कि कनाडा सरकार के साथ हुए समझौतों को नजरअंदाज करके अलगाव संभव नहीं है। अदालत इस मामले पर जल्द फैसला दे सकती है। अगर फैसला आदिवासी समूहों के पक्ष में जाता है तो पूरी प्रक्रिया रुक भी सकती है।

जनता कितना समर्थन कर रही?
सर्वे बताते हैं कि अल्बर्टा में अलग देश बनने के विचार को अभी भी सीमित समर्थन मिला हुआ है। करीब 30% लोग ऐसे हैं जो अलगाव के पक्ष में बताए जा रहे हैं।
यानी अभी बहुमत इस विचार के साथ नहीं दिख रहा।हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा पहले की तुलना में काफी ज्यादा है और आने वाले समय में इसमें बदलाव हो सकता है।
अल्बर्टा में अलगाव की भावना क्यों बढ़ी?
अल्बर्टा में लंबे समय से यह भावना रही है कि उनका प्रांत बाकी कनाडा से अलग पहचान रखता है। यहां की राजनीति आमतौर पर ज्यादा रूढ़िवादी मानी जाती है, जबकि केंद्र सरकार पर उदारवादी सोच का प्रभाव माना जाता है।
अलगाववादी नेताओं का कहना है कि ओटावा में बैठे लोग अल्बर्टा की आर्थिक जरूरतों को नहीं समझते।
तेल उद्योग सबसे बड़ा मुद्दा
अल्बर्टा की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल और गैस उद्योग पर आधारित है। पर्यावरण नियमों और जलवायु परिवर्तन से जुड़े कानूनों को लेकर यहां काफी नाराजगी है।
अलगाववादी नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण तेल उद्योग को नुकसान हो रहा है। उनका कहना है कि पाइपलाइन परियोजनाओं में देरी और पर्यावरण नियमों की वजह से रोजगार और कारोबार प्रभावित हुआ है।
क्या कनाडा में पहले भी अलगाव की मांग उठी?
कनाडा में अलगाववाद कोई नया मुद्दा नहीं है। फ्रेंच भाषा वाले प्रांत क्यूबेक में भी दशकों से अलग देश बनने की मांग चलती रही है।
1995 में वहां जनमत संग्रह भी हुआ था, जिसमें बहुत कम अंतर से अलगाव का प्रस्ताव खारिज हो गया था। हालांकि हाल के वर्षों में क्यूबेक में अलगाववादी आंदोलन कमजोर पड़ा है। अब अल्बर्टा में बढ़ती मांग ने कनाडा की राजनीति को फिर अस्थिर कर दिया है।
अमेरिका का नाम क्यों जुड़ रहा?
इस मुद्दे में अमेरिका का नाम आने से विवाद और बढ़ गया है। अमेरिका के कुछ नेताओं ने अल्बर्टा को “प्राकृतिक साझेदार” बताया है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि अल्बर्टा के पास विशाल प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका के लिए अहम साझेदार बन सकता है।
इस बयान के बाद कनाडा में कई लोगों ने नाराजगी जताई। आलोचकों का कहना है कि बाहरी समर्थन कनाडा की एकता को कमजोर कर सकता है।
आलोचक क्या कह रहे?
अलगाववादी आंदोलन का विरोध भी तेज हो रहा है। अल्बर्टा के पूर्व उपमुख्यमंत्री थॉमस लुकाजुक ने इसे “देशद्रोह जैसा कदम” बताया।
उनका कहना है कि ज्यादातर कनाडाई और अल्बर्टा के लोग देश की एकता चाहते हैं। कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अलगाव की मांग प्रांत की नाराजगी जरूर दिखाती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अलग देश बनना बेहद कठिन होगा।
अगर अलगाव के पक्ष में वोट पड़ गए तो क्या होगा?
मान लीजिए कि रेफरेंडम होता है और लोग अलगाव के पक्ष में मतदान करते हैं, तब भी प्रक्रिया आसान नहीं होगी। इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई, संविधान से जुड़े सवाल और संघीय सरकार के साथ बातचीत शुरू होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि कनाडा से अलग होना कई सालों तक चलने वाली जटिल प्रक्रिया बन सकता है।
आगे क्या होने वाला है?
अगर कानूनी अड़चनें दूर हो जाती हैं तो अक्टूबर में मतदान हो सकता है। यह वोटिंग दूसरे संवैधानिक मुद्दों और आव्रजन जैसे सवालों के साथ कराई जा सकती है। हालांकि अदालत का फैसला इस पूरी प्रक्रिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या कनाडा की राजनीति बदल रही?
विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे रेफरेंडम सफल हो या नहीं, अल्बर्टा में बढ़ती अलगाववादी भावना कनाडा की राजनीति पर लंबे समय तक असर डाल सकती है। यह मुद्दा अब सिर्फ छोटे समूहों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मुख्य राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन चुका है।
निष्कर्ष:
अल्बर्टा में बढ़ती अलगाव की मांग ने कनाडा के सामने बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है। तेल उद्योग, केंद्र सरकार की नीतियों और क्षेत्रीय पहचान को लेकर लंबे समय से चल रही नाराजगी अब खुले राजनीतिक आंदोलन में बदलती दिख रही है।
हालांकि कानूनी चुनौतियां और सीमित जनसमर्थन अभी इस आंदोलन के सामने बड़ी बाधाएं हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर जुटना यह जरूर दिखाता है कि अल्बर्टा में बदलाव की मांग पहले से ज्यादा मजबूत हो चुकी है।

