Anti Quota Protest: आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ क्यों बढ़ रही है नाराजगी? करणी सेना से लेकर सोशल मीडिया आंदोलन तक पूरी कहानी

Anti Quota Protest

भारत में आरक्षण नीति (Reservation Policy) हमेशा से ही सामाजिक और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा रही है। लेकिन 2026 में एक बार फिर आरक्षण को लेकर विरोध की आवाजें तेज होती दिखाई दे रही हैं। सोशल मीडिया से शुरू हुई बहस अब सड़कों तक पहुंच रही है। इसे लेकर Anti Quota Protest का एक नया दौर देखने को मिल रहा है, जिसमें कुछ समूह मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं।

हाल के दिनों में महाराष्ट्र के नागपुर में Reservation Hatao Andolan (RHA) का पहला बड़ा जमीनी प्रदर्शन हुआ, वहीं राजस्थान में श्री राजपूत करणी सेना (Karni Sena) ने UGC की जातीय समानता से जुड़ी गाइडलाइंस का विरोध करते हुए बड़ा आंदोलन किया। इसके अलावा NEET विवाद के दौरान चर्चा में आए छात्र नेता हर्ष दुबे भी आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।

हालांकि यह आंदोलन अभी एकजुट राजनीतिक आंदोलन का रूप नहीं ले पाया है, लेकिन सोशल मीडिया और कुछ राज्यों में हुए प्रदर्शनों ने आरक्षण को लेकर पुरानी बहस को फिर से तेज कर दिया है।

Anti Quota Protest
Image : 3 अगस्त को करणी सेना के महिपाल सिंह मकराना की अगुवाई में हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी दफ़्तर और राजस्थान के मुख्यमंत्री आवास तक मार्च करने की कोशिश की। (तस्वीरें: करणी सेना/सोशल मीडिया) Credit : India Today

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालयों में समानता और भेदभाव रोकने से जुड़ी UGC की नई गाइडलाइंस को लेकर हुई। UGC की ओर से जारी किए गए Equity Regulations 2026 को लेकर कुछ सवर्ण संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने आपत्ति जताई।

विरोध करने वालों का आरोप था कि इन नियमों से शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित शिकायतों की व्यवस्था और मजबूत होगी, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है। प्रदर्शनकारियों ने इसे “अन्यायपूर्ण” बताते हुए कहा कि इससे मेरिट प्रभावित होगी और सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है।

हालांकि दूसरी ओर समर्थकों का कहना है कि ऐसे नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और कमजोर वर्गों को सुरक्षित माहौल देना है।

इसी विवाद के बाद आरक्षण व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया पर विरोधी आवाजें तेजी से बढ़ने लगीं।

 

हर्ष दुबे कौन हैं और आरक्षण विरोध की आवाज कैसे बने?

NEET पेपर लीक विवाद के दौरान एक टीवी डिबेट में हर्ष दुबे चर्चा में आए थे। बहस के दौरान उन्होंने आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था छात्रों के बीच तनाव पैदा कर रही है और कुछ मामलों में आत्महत्या जैसी घटनाओं से भी जुड़ी हुई है।

इसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें हजारों लोगों ने फॉलो करना शुरू किया और उन्होंने कई इंटरव्यू भी दिए।

अब हर्ष दुबे दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। उनका अभियान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर है।

हालांकि दिल्ली पुलिस की ओर से अभी तक उन्हें प्रदर्शन की आधिकारिक अनुमति नहीं दी गई है। सोशल मीडिया पर अनुमति मिलने का दावा किए जाने के बाद नई दिल्ली के डीसीपी को सफाई देनी पड़ी थी कि ऐसा कोई अप्रूवल जारी नहीं किया गया है।

 

Reservation Hatao Andolan: सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचा आंदोलन

आरक्षण विरोधी बहस को सबसे ज्यादा गति Reservation Hatao Andolan (RHA) के जरिए मिली। यह अभियान शुरुआत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर शुरू हुआ था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, RHA के इंस्टाग्राम पेज ने कुछ ही समय में लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए। इस प्लेटफॉर्म के जरिए आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग उठाई जा रही है।

इस आंदोलन की मुख्य मांग मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण (Income Based Reservation) लागू करने की है।

RHA की ओर से कुछ सुझाव भी सामने रखे गए हैं, जिनमें आर्थिक स्थिति को आरक्षण का आधार बनाने, एक परिवार को एक बार आरक्षण का लाभ देने, सभी वर्गों के लिए न्यूनतम योग्यता अंक तय करने और समय-समय पर आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने जैसी मांगें शामिल हैं।

आंदोलन से जुड़े लोगों का तर्क है कि गरीबी किसी एक जाति तक सीमित नहीं है, इसलिए आर्थिक पिछड़ापन आरक्षण का मुख्य आधार होना चाहिए।

 

नागपुर में Reservation Hatao Movement की पहली रैली

Reservation Hatao Movement (RHM) ने 30 जुलाई को महाराष्ट्र के नागपुर में अपनी पहली जमीन पर रैली आयोजित की।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आंदोलन के आयोजकों ने बताया था कि इस मार्च में करीब 1,000 से 2,000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद थी।

आयोजकों ने कहा कि नागपुर की यह रैली देशभर में चलाए जाने वाले अभियान की शुरुआत है। इस अभियान का उद्देश्य भारत की आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग करना है।

उन्होंने इसकी तुलना CJP आंदोलन से भी की, जो शुरुआत में ऑनलाइन अभियान था और बाद में सड़क पर बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया।

 

लखनऊ में सवर्ण संगठनों का प्रदर्शन

इसके कुछ दिन बाद, 3 अगस्त को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सवर्ण मोर्चा और स्वर्ण समाज के सदस्यों ने प्रदर्शन किया। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने शहर के शहीद स्मारक और हजरतगंज क्षेत्र में प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने UGC के नियमों को पूरी तरह वापस लेने और जाति आधारित आरक्षण खत्म करने की मांग की।

उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें अब तक लोकतंत्र से कोई फायदा नहीं मिला है।

कुल मिलाकर, आरक्षण विरोधी आंदोलन अब सोशल मीडिया से निकलकर अलग-अलग राज्यों में जमीन पर दिखाई देने लगा है। आने वाले समय में यह मुद्दा देश की राजनीति और सामाजिक बहस में और बड़ा रूप ले सकता है।

 

जयपुर में करणी सेना का प्रदर्शन, UGC नियम वापस लेने की मांग

इसके एक दिन बाद जयपुर में श्री राजपूत करणी सेना के हजारों समर्थक सड़कों पर उतरे। संगठन के प्रमुख महिपाल सिंह मकराना के नेतृत्व में यह रैली जयपुर पहुंची।

Image : श्री राजपूत करणी सेना के प्रमुख महिपाल सिंह मकराना

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, करणी सेना ने UGC के 2026 इक्विटी रेगुलेशन (समानता नियम) को वापस लेने की मांग को लेकर करीब 24 दिनों तक 800 किलोमीटर की यात्रा की थी। इसके बाद यह रैली जयपुर में आयोजित की गई।

करणी सेना की मुख्य मांग UGC के नियमों को वापस लेना थी। इसके अलावा संगठन ने कई अन्य मांगें भी रखीं।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, करणी सेना ने जाति आधारित कानूनों की समीक्षा, पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण और केंद्र स्तर पर EWS आरक्षण के नियमों को आसान बनाने जैसी मांगें भी उठाईं।

 

पुलिस से टकराव, लाठीचार्ज और पानी की बौछार

करणी सेना के सदस्य जयपुर कलेक्ट्रेट की ओर बढ़े। इसके बाद उन्होंने बीजेपी कार्यालय और मुख्यमंत्री आवास की तरफ जाने की कोशिश की।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। बैरिकेड तोड़े जाने के बाद पुलिस ने पानी की बौछार (वॉटर कैनन) का इस्तेमाल किया और लाठीचार्ज किया।

महिपाल सिंह मकराना ने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों को भी चोट लगी, जिसके कारण एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई।

 

बीजेपी के खिलाफ वोट की शपथ

पुलिस कार्रवाई के बाद महिपाल सिंह मकराना ने समर्थकों को शपथ दिलाई कि वे आने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनावों में बीजेपी को वोट नहीं देंगे।

दैनिक भास्कर के अनुसार, मकराना ने कहा कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनावों में बीजेपी का विरोध करेंगे और पार्टी को हराने की कोशिश करेंगे।

करणी सेना ने सरकार को 7 दिन का अल्टीमेटम दिया है। संगठन ने मांगें पूरी नहीं होने पर जयपुर घेराव और राजस्थान बंद की चेतावनी दी है।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी सरकार पर “तानाशाही रवैया” अपनाने का आरोप लगाया, हालांकि उन्होंने आरक्षण के पक्ष या विरोध में कोई टिप्पणी नहीं की।

 

विशाखापट्टनम में NEET छात्रों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन

इसके बाद 3 अगस्त को आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में जन जागरण समिति के तहत NEET अभ्यर्थियों ने आरक्षण विरोधी अभियान के समर्थन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन में शामिल युवाओं ने अपने मुंह पर काली पट्टी बांध रखी थी और हाथों में पोस्टर लिए हुए थे।

उन्होंने जाति आधारित आरक्षण खत्म करने, आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति बनाने, आरक्षण का लाभ केवल एक पीढ़ी तक सीमित करने, सभी के लिए न्यूनतम योग्यता अंक तय करने, समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा करने और चुनाव के समय आरक्षण के वादों को खत्म करने जैसी मांगें रखीं।

जहां देश के कई राज्यों में सड़कों पर प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, वहीं डिजिटल दुनिया में भी आरक्षण विरोधी आवाजें और मांगें तेजी से बढ़ रही हैं।

सोशल मीडिया आज के समय में किसी भी आंदोलन को बड़ा बनाने का माध्यम बन गया है, इसलिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर चल रही यह मुहिम लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हालांकि, ऑनलाइन आंदोलन को लेकर कुछ सीमाएं और चुनौतियां भी हैं, जिन पर आगे चर्चा की जाएगी।

 

आरक्षण विरोधी अभियान के लिए सोशल मीडिया बना बड़ा मंच

आरक्षण विरोधी आंदोलन अब सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ रहा है। छात्र वेदांत द्वारा शुरू किए गए Reservation Hatao Andolan (RHA) को अब इंफ्लुएंसर अजीत भारती आगे बढ़ा रहे हैं।

Image : अजीत भारती

RHA ने जाति आधारित आरक्षण की जगह “आय आधारित आरक्षण” (Income-based Reservation) लागू करने के लिए पांच नीतिगत सुझाव सामने रखे हैं।

हालांकि RHA फिलहाल सड़कों पर आंदोलन करने के बजाय सोशल मीडिया के जरिए लोगों के बीच एक विचार और बहस तैयार करने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। वहीं, आरक्षण विरोधी अभियान का चर्चित चेहरा बने हर्ष दुबे अभी भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति का इंतजार कर रहे हैं।

दरअसल, हर्ष दुबे ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि उन्हें प्रदर्शन की अनुमति मिल गई है। इसके बाद नई दिल्ली के डीसीपी को सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी कि अभी तक ऐसी कोई अनुमति जारी नहीं की गई है।

पहले पूरी तरह आरक्षण खत्म करने की मांग थी

शुरुआत में आरक्षण विरोधी आंदोलन से जुड़े कई लोग पूरी आरक्षण व्यवस्था खत्म करने की मांग कर रहे थे। लेकिन ऐसा करना राजनीतिक और संवैधानिक रूप से काफी मुश्किल माना जाता है। इसके अलावा ऐसे किसी भी बदलाव को न्यायिक जांच का सामना करना पड़ सकता है।

RHA के संस्थापक वेदांत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि उन्होंने इंस्टाग्राम पर यह पेज एक उद्देश्य के साथ शुरू किया था। उनका मकसद ऐसे मुद्दे पर देशभर में चर्चा शुरू करना था, जिस पर कई लोग खुलकर बात करने से भी बचते थे।

वेदांत ने कहा कि कई लोग तुरंत आंदोलन शुरू करने की उम्मीद करते हैं, लेकिन उनका पहला लक्ष्य बहस और बातचीत को बढ़ावा देना था। उनके अनुसार, बिना संवाद के कोई भी आंदोलन लंबे समय तक टिकाऊ समाधान नहीं दे सकता।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि RHA का अकाउंट किसी ने “हाइजैक” नहीं किया है, जैसा कि कुछ लोग दावा कर रहे थे।

 

RHA के पांच प्रमुख सुझाव

RHA ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि गरीबी की कोई जाति नहीं होती।

RHA के प्रस्तावों में मुख्य रूप से ये बातें शामिल हैं:

  • जाति आधारित आरक्षण की जगह आय आधारित आरक्षण लागू किया जाए।
  • “एक परिवार, एक आरक्षण, एक बार” का नियम बनाया जाए।
  • सभी वर्गों के लिए न्यूनतम योग्यता अंक तय किए जाएं।
  • आरक्षित सीटें खाली रहने पर उन्हें सामान्य वर्ग में ट्रांसफर किया जाए।
  • समय-समय पर आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जाए और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके समुदायों को आरक्षण सूची से बाहर किया जाए।

इसके अलावा RHA ने “सनसेट क्लॉज” (Sunset Clause) लागू करने की मांग की है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे शिक्षा में असमानता कम होती जाए, वैसे-वैसे आरक्षण व्यवस्था को धीरे-धीरे खत्म करने की योजना बनाई जाए।

संगठन ने यह भी मांग की है कि राजनीतिक दल चुनावों के दौरान नए आरक्षण देने या आरक्षण बढ़ाने के वादे न कर सकें।

 

सोशल मीडिया से तैयार की जा रही नई बहस

अपने पांच सूत्रीय प्रस्तावों के अलावा RHA सोशल मीडिया के जरिए आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी करने की कोशिश कर रहा है।

इसके पोस्ट अक्सर मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था की आलोचना करते हैं। संगठन का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को नुकसान होता है और योग्यता (Merit) की जगह जाति को ज्यादा महत्व मिलता है।

RHA ने UGC के 2026 इक्विटी रेगुलेशन का भी विरोध किया था। संगठन का दावा है कि इन नियमों से आरक्षण व्यवस्था और मजबूत होगी और शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

RHA अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लगातार वीडियो और ग्राफिक्स शेयर कर समर्थकों को जोड़ने और अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

 

RHA का फोकस सड़क आंदोलन नहीं, बहस पर है

RHA ने आरक्षण की बहस को जाति पहचान के बजाय मेरिट, समानता और आर्थिक न्याय के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश की है।

फिलहाल संगठन का ध्यान देशभर में सड़क पर बड़े प्रदर्शन करने के बजाय आरक्षण को लेकर चर्चा को मुख्यधारा में लाने पर ज्यादा है।

हालांकि विशाखापट्टनम में हुए प्रदर्शन में RHA के विचारों को समर्थन मिला था, लेकिन संगठन अभी हर्ष दुबे की तरह देशव्यापी सड़क आंदोलन शुरू करने की दिशा में नहीं दिख रहा है।

 

क्या सरकार ने भारत में आरक्षण व्यवस्था को बदलने की कोशिश की है?

जहां Reservation Hatao Andolan (RHA) भारत की आरक्षण नीति में बड़े बदलाव की मांग कर रहा है, वहीं केंद्र सरकार की ओर से पहले बनाई गई समितियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में सुधार पर ध्यान दिया है। इन समितियों की सिफारिशें अलग-अलग वर्गों से जुड़ी थीं।

2017 में केंद्र सरकार ने जस्टिस जी. रोहिणी आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने केंद्रीय OBC आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) की सिफारिश की थी। इसका उद्देश्य था कि पिछड़े वर्गों के अंदर आरक्षण का लाभ कुछ ही समुदायों तक सीमित न रहे, बल्कि सभी पिछड़े समुदायों को बराबर फायदा मिले।

वहीं, 2019 में बने बीपी शर्मा विशेषज्ञ समिति ने OBC की क्रीमी लेयर (Creamy Layer) के नियमों में बदलाव और उन्हें आसान बनाने का सुझाव दिया था।

हालांकि, इन दोनों समितियों ने कभी भी जाति की जगह आय को आरक्षण का आधार बनाने या आरक्षण व्यवस्था को धीरे-धीरे खत्म करने की सिफारिश नहीं की थी।

 

आरक्षण में समय-समय पर बदलाव हुए, लेकिन बड़े सुधार बाकी

OBC क्रीमी लेयर के नियमों में समय-समय पर बदलाव किए गए हैं। लेकिन रोहिणी आयोग की OBC उप-वर्गीकरण वाली सिफारिशों को अभी तक केंद्र सरकार ने लागू नहीं किया है।

इस लिहाज से देखें तो RHA का एजेंडा मौजूदा सुधारों से ज्यादा बड़ा और संरचनात्मक बदलाव की मांग करता है।

RHA जहां पूरी आरक्षण व्यवस्था के आधार में बदलाव की बात कर रहा है, वहीं सरकार की पिछली समितियां केवल मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाने पर केंद्रित थीं।

 

रामदास अठावले ने आरक्षण खत्म करने की मांग का विरोध किया

इस बीच, केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने RHA के इंस्टाग्राम पेज की तस्वीर शेयर करते हुए उस पर क्रॉस का निशान लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व देश के युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उन्होंने कहा कि “कोई भी हमारे आरक्षण के अधिकार को नहीं छीन सकता।”

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कोई आरक्षण खत्म करने की कोशिश करेगा तो जिन लोगों ने पीढ़ियों तक इसके लिए संघर्ष किया है, वे इसकी रक्षा करना जानते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा दिया गया संवैधानिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित है।

 

क्या ऑनलाइन आंदोलन बड़े आंदोलन में बदलेगा?

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आरक्षण विरोधी आंदोलन केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है या फिर देशभर में एक बड़ा आंदोलन बन जाता है।

इसके लिए जरूरी होगा कि अलग-अलग आरक्षण विरोधी समूहों को एक साझा नेतृत्व, एक समान एजेंडा और लंबे समय तक जनता का समर्थन मिले।

फिलहाल राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं। लेकिन CJP विरोध प्रदर्शन से बनी पृष्ठभूमि के बीच आरक्षण विरोधी आवाजें अब सड़कों तक पहुंचने लगी हैं और यह मुद्दा फिर से देश की सबसे संवेदनशील राजनीतिक बहसों में शामिल होता दिख रहा है।

 

FAQ

1. आरक्षण विरोधी प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?

आरक्षण विरोधी प्रदर्शन मुख्य रूप से मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी आर्थिक आधार पर आरक्षण और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।

 

2. करणी सेना ने ‘नो वोट’ अभियान की घोषणा क्यों की?

करणी सेना ने UGC Equity Regulations 2026 के विरोध में सरकार पर दबाव बनाने के लिए आगामी स्थानीय चुनावों में बीजेपी के खिलाफ मतदान की अपील की।

 

3. प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?

प्रदर्शनकारी आरक्षण व्यवस्था में समीक्षा, आर्थिक आधार को प्राथमिकता, UGC नियमों में बदलाव और आरक्षण लाभ के बेहतर वितरण जैसी मांगें उठा रहे हैं।

 

4. सरकार ने आरक्षण विरोध पर क्या प्रतिक्रिया दी है?

सरकार की ओर से कहा गया है कि संविधान में दिए गए आरक्षण प्रावधान सुरक्षित हैं। सामाजिक न्याय से जुड़े नेताओं ने आरक्षण खत्म करने की मांगों का विरोध किया है।

 

5. करणी सेना की इस आंदोलन में क्या भूमिका है?

करणी सेना ने UGC Equity Regulations के खिलाफ राजस्थान में बड़ा प्रदर्शन किया और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा समेत कई मांगें उठाईं।

 

6. आरक्षण नीति को लेकर विवाद क्यों बना हुआ है?

आरक्षण नीति को लेकर विवाद इसलिए बना हुआ है क्योंकि एक पक्ष इसे ऐतिहासिक सामाजिक असमानता दूर करने का माध्यम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे आर्थिक आधार पर पुनर्गठित करने की मांग करता है।

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