पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अब ब्रिटेन ने भी बड़ा कदम उठाया है। ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मिशन के तहत ड्रोन, लड़ाकू विमान और युद्धपोत भेजेगी। इस मिशन का मकसद दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक को सुरक्षित रखना बताया जा रहा है।
ब्रिटेन के रक्षा मंत्री John Healey ने मंगलवार को 40 से ज्यादा देशों के रक्षा मंत्रियों की वर्चुअल बैठक में इस योजना का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि यह मिशन पूरी तरह रक्षात्मक होगा और इसका उद्देश्य व्यावसायिक जहाजों को सुरक्षित माहौल देना है।
दरअसल, पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ा हुआ है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर कड़ा नियंत्रण बना रखा है, जबकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर दबाव बढ़ाने के लिए नाकेबंदी जैसी कार्रवाई जारी रखी है। इसी वजह से दुनिया भर में तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता बढ़ गई है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) इसी रास्ते से होकर गुजरता है। अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो उसका असर सीधे दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ता है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। कई देशों को डर है कि अगर यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहा तो ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। इसी वजह से ब्रिटेन और उसके सहयोगी देश इस रास्ते को सुरक्षित बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
ब्रिटेन क्या-क्या भेजेगा?
ब्रिटेन ने इस मिशन के लिए कई आधुनिक सैन्य उपकरण और तकनीक तैनात करने का फैसला किया है। इसमें खास तौर पर ऐसे सिस्टम शामिल हैं जो समुद्र में बिछाई गई माइंस यानी बारूदी सुरंगों का पता लगा सकते हैं और उन्हें निष्क्रिय कर सकते हैं।
ब्रिटिश नौसेना के “बीहाइव” मॉड्यूलर सिस्टम के जरिए हाई-स्पीड ड्रोन बोट्स भी इस्तेमाल की जाएंगी। ये बिना चालक वाली नावें समुद्र में संभावित खतरों की पहचान करेंगी और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई भी कर सकेंगी।
इसके अलावा ब्रिटेन अपने अत्याधुनिक टाइफून लड़ाकू विमान भी तैनात करेगा। ये विमान होर्मुज क्षेत्र में हवाई गश्त करेंगे ताकि किसी भी संभावित हमले या खतरे पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।
ब्रिटिश सरकार ने बताया कि युद्धपोत HMS Dragon पहले ही मध्य पूर्व की ओर रवाना हो चुका है। यह एयर डिफेंस क्षमता वाला आधुनिक युद्धपोत है, जिसमें Sea Viper जैसे एडवांस सिस्टम लगे हुए हैं। यह ड्रोन और मिसाइल हमलों से बचाव करने में सक्षम माना जाता है।
इसके साथ ही RFA Lyme Bay नाम का एक और ब्रिटिश जहाज भी अपग्रेड किया जा रहा है। इसमें आधुनिक बिना चालक वाले सिस्टम लगाए जा रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर इसे “मदरशिप” की तरह इस्तेमाल किया जा सके।

मिशन पर 115 मिलियन पाउंड का खर्च
ब्रिटेन ने इस पूरे अभियान के लिए 115 मिलियन पाउंड की अतिरिक्त फंडिंग का भी ऐलान किया है। यह पैसा खास तौर पर ड्रोन सिस्टम, माइंस खोजने वाली तकनीक और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर खर्च किया जाएगा।
रक्षा मंत्री जॉन हीली ने कहा कि यह कदम केवल ब्रिटेन के हितों की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार को स्थिर रखने के लिए भी जरूरी है। उनके मुताबिक, अगर समुद्री रास्ते सुरक्षित नहीं रहे तो उसका असर आम लोगों की जिंदगी और महंगाई पर भी पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि सहयोगी देशों के साथ मिलकर यह मिशन स्वतंत्र, भरोसेमंद और रक्षात्मक तरीके से चलाया जाएगा।
पहले से तैनात हैं हजार से ज्यादा ब्रिटिश सैनिक
ब्रिटेन ने साफ किया है कि वह पहले से ही इस क्षेत्र में सक्रिय है। मौजूदा समय में 1000 से ज्यादा ब्रिटिश सैन्यकर्मी पश्चिम एशिया में तैनात हैं। इनमें ड्रोन हमलों से निपटने वाली टीमें और फास्ट जेट स्क्वॉड्रन शामिल हैं।
इन बलों का इस्तेमाल ब्रिटिश नागरिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए किया जा रहा है। अब नए मिशन के बाद ब्रिटेन की मौजूदगी और मजबूत हो जाएगी।
अमेरिका-ईरान तनाव बना बड़ी वजह
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। कुछ समय पहले दोनों देशों के बीच संघर्ष इतना बढ़ गया था कि युद्ध जैसी स्थिति बन गई थी। हालांकि अप्रैल में संघर्ष विराम लागू हुआ, लेकिन हालात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में कहा था कि यह सीजफायर “बहुत कमजोर स्थिति” में है। दूसरी तरफ ईरान लगातार अमेरिका और इजराइल पर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाने का आरोप लगा रहा है।
दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर होर्मुज क्षेत्र में हमले करने के आरोप भी लगाए हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा बढ़ गया है।
ब्रिटेन की राजनीति में भी असर
यह फैसला ऐसे समय आया है जब ब्रिटेन की घरेलू राजनीति में भी उथल-पुथल चल रही है। प्रधानमंत्री Keir Starmer पर उनकी ही पार्टी के कई सांसद सवाल उठा रहे हैं। कुछ सांसदों ने उनसे इस्तीफा देने तक की मांग की है।
इसी बीच रक्षा मंत्री जॉन हीली ने सार्वजनिक रूप से स्टार्मर का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय कई बड़े संकटों से गुजर रही है और ऐसे वक्त में राजनीतिक अस्थिरता ब्रिटेन के हित में नहीं होगी।
डाउनिंग स्ट्रीट की ओर से भी बयान जारी कर कहा गया कि सरकार की पहली प्राथमिकता होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलना और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही सामान्य करना है।
क्या इससे तनाव और बढ़ सकता है?
हालांकि ब्रिटेन और उसके सहयोगी देश इस मिशन को “रक्षात्मक” बता रहे हैं, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी सैन्य मौजूदगी से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
ईरान पहले ही विदेशी सैन्य ताकतों की बढ़ती गतिविधियों पर नाराजगी जता चुका है। ऐसे में अगर किसी भी पक्ष की तरफ से छोटी सी गलती होती है तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
दूसरी ओर यूरोप और पश्चिमी देशों का कहना है कि अगर समुद्री रास्तों को सुरक्षित नहीं किया गया तो दुनिया भर में तेल संकट, महंगाई और सप्लाई चेन की समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता का असर सीधे तेल बाजार पर दिखाई देता है। जैसे ही किसी हमले या तनाव की खबर आती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
अगर यह मिशन सफल रहता है और समुद्री व्यापार सामान्य होता है तो तेल कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि संघर्ष बढ़ता है तो दुनिया के कई देशों को महंगे तेल और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। ऐसे में होर्मुज क्षेत्र में स्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी मानी जा रही है।

