भारत में लगभग 16 साल बाद होने जा रही जनगणना 2027 (Census 2027) कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है। यह आज़ाद भारत की पहली ऐसी जनगणना होगी, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा सभी जातियों की गणना की जाएगी। इतना ही नहीं, यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी।
केंद्र सरकार ने पहले चरण यानी हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन (Housing Listing Operation-HLO) लगभग पूरे देश में पूरा कर लिया है। अब दूसरा चरण पॉपुलेशन एन्यूमरेशन (Population Enumeration-PE) शुरू होने जा रहा है। सबसे पहले यह प्रक्रिया 17 अगस्त 2026 से लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फबारी वाले क्षेत्रों में शुरू होगी। इसके बाद फरवरी 2027 में देश के बाकी हिस्सों में जनगणना होगी।
इस बार केवल जनसंख्या की गिनती ही नहीं होगी, बल्कि सरकार देश की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर को पहले से कहीं अधिक विस्तार से समझने की कोशिश करेगी।

96 साल बाद सभी जातियों की गिनती
भारत में आखिरी बार 1931 की ब्रिटिश जनगणना में सभी जातियों की विस्तृत गणना की गई थी। आजादी के बाद से होने वाली सभी जनगणनाओं में केवल SC और ST समुदायों की अलग-अलग गणना होती रही, जबकि अन्य जातियों का डेटा आधिकारिक रूप से नहीं जुटाया गया।
ऐसे में Census 2027 पहली बार देश के सभी समुदायों का आधिकारिक जातिगत डेटा उपलब्ध कराएगी। यही वजह है कि इस जनगणना को सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जाति कैसे दर्ज होगी, क्या कोई प्रमाण पत्र दिखाना होगा?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि जाति व्यक्ति के स्वयं के घोषित (Self Declaration) आधार पर दर्ज की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है तो डिजिटल सिस्टम में संबंधित राज्य की अधिकृत सूची उपलब्ध रहेगी, जिससे सही श्रेणी दर्ज की जा सके। वहीं SC और ST के अलावा अन्य सभी लोगों के लिए जाति का विवरण उसी तरह दर्ज किया जाएगा, जैसा वे स्वयं बताएंगे।

इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी व्यक्ति से जाति प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा। गणनाकर्मी केवल वही जाति दर्ज करेगा, जो उत्तरदाता बताएगा।
पहली बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी
Census 2027 भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी। इस बार गणनाकर्मी मोबाइल या टैबलेट आधारित डिजिटल सिस्टम के माध्यम से जानकारी दर्ज करेंगे।
सरकार ने पहली बार नागरिकों को Self Enumeration यानी स्वयं अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी दिया है। बर्फबारी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग 17 अगस्त से 31 अगस्त तक ऑनलाइन अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। इसके बाद गणनाकर्मी घर-घर जाकर जानकारी का सत्यापन करेंगे।
डिजिटल व्यवस्था से डेटा एंट्री की गति बढ़ने के साथ-साथ गलतियों की संभावना भी कम होने की उम्मीद है।
इस बार कौन-कौन से नए सवाल पूछे जा सकते हैं?
सरकार द्वारा अंतिम प्रश्नावली जल्द अधिसूचित किए जाने की संभावना है। शुरुआती अभ्यास (रिहर्सल) और अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार इस बार लगभग 28 सवाल पूछे जा सकते हैं।
पहली बार कई नई जानकारियां भी एकत्र की जाएंगी। इनमें व्यक्ति की जाति के अलावा यह जानकारी भी शामिल हो सकती है कि परिवार पैक्ड या बोतलबंद पानी इस्तेमाल करता है या नहीं। प्रवास (Migration) के कारणों में पहली बार प्राकृतिक आपदाओं को भी अलग श्रेणी के रूप में शामिल किया जा सकता है।
शिक्षा संबंधी जानकारी भी पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज होगी। पहले जहां व्यक्ति अपनी शैक्षणिक योग्यता स्वयं बताता था, वहीं अब विस्तृत कोडिंग सिस्टम के माध्यम से योग्यता दर्ज किए जाने की तैयारी है।
माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान भी दर्ज होगा
Census 2027 में पहली बार उत्तरदाता से उसके माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान की जानकारी भी ली जा सकती है।
यदि किसी व्यक्ति को माता-पिता की पूरी जन्मतिथि याद नहीं है और केवल जन्म वर्ष पता है, तो उसी वर्ष के आधार पर जानकारी दर्ज की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार इसका उद्देश्य केवल जनसांख्यिकीय अध्ययन करना है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस जानकारी के लिए कोई दस्तावेज या प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी।
आधार और पासपोर्ट की जानकारी क्यों ली जाएगी?
इस बार जनगणना में पासपोर्ट नंबर उपलब्ध होने पर दर्ज किया जा सकता है। वहीं आधार संख्या देना पूरी तरह स्वैच्छिक (Voluntary) रहेगा।
यदि कोई व्यक्ति आधार संख्या साझा नहीं करना चाहता तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी और जनगणना प्रक्रिया पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
सरकार का कहना है कि इन जानकारियों का उद्देश्य केवल सांख्यिकीय विश्लेषण है, न कि किसी व्यक्ति की पहचान सत्यापित करना।
नागरिकता पर पड़ेगा क्या असर?
माता-पिता के जन्मस्थान और जन्मतिथि से जुड़े सवालों को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि जनगणना का डेटा किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करने, कानूनी कार्रवाई करने, सरकारी लाभ देने या सार्वजनिक रूप से जारी करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जनगणना अधिनियम के तहत व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह गोपनीय रहती है। इसलिए उत्तरदाता द्वारा दी गई जानकारी केवल सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए उपयोग की जाएगी, किसी कानूनी जांच के लिए नहीं।
2011 की जाति गणना का डेटा सरकार ने जारी क्यों नहीं किया?
Census 2027 में जाति गणना को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब 2011 में भी सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) हुई थी, तो उसका डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
दरअसल, 2011 की SECC सामान्य जनगणना का हिस्सा नहीं थी। इसे Census Act, 1948 के तहत नहीं कराया गया था, बल्कि अलग सर्वे के रूप में आयोजित किया गया था। यही वजह रही कि उसे जनगणना जैसी वैधानिक मान्यता भी नहीं मिली।
सबसे बड़ी समस्या डेटा की गुणवत्ता रही। लोगों ने अपनी जाति अलग-अलग तरीके से लिखवाई। किसी ने उपजाति बताई, किसी ने गोत्र, किसी ने स्थानीय नाम और किसी ने जाति की अलग वर्तनी लिखवाई। परिणाम यह हुआ कि पूरे देश में करीब 46 लाख अलग-अलग जाति नाम दर्ज हो गए, जबकि 1931 की जनगणना में कुल लगभग 4,147 जातियां दर्ज थीं।
केंद्र सरकार ने कई बार संसद में कहा कि 2011 का जातिगत डेटा त्रुटियों से भरा हुआ था, इसलिए उसे नीति निर्माण के लिए भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।
इस बार सरकार ने क्या बदला है?
सरकार का दावा है कि Census 2027 में 2011 जैसी स्थिति नहीं बनने दी जाएगी। इसकी सबसे बड़ी वजह डिजिटल तकनीक और आधुनिक डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम हैं।
इस बार पूरी जनगणना डिजिटल माध्यम से होगी। गणनाकर्मी मोबाइल या टैबलेट के जरिए जानकारी दर्ज करेंगे। अधिकारियों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिटिक्स की मदद से अलग-अलग वर्तनी, समान जातियों के विभिन्न स्थानीय नाम और डुप्लीकेट एंट्री को पहचानकर उनका वर्गीकरण पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीक तरीके से किया जा सकेगा।
हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि गणनाकर्मी जाति का फैसला नहीं करेगा। वह केवल वही जानकारी दर्ज करेगा जो व्यक्ति स्वयं बताएगा।
NPR और Census 2027 में अंतर
कई लोगों के मन में यह भ्रम है कि Census 2027 के साथ राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) भी अपडेट किया जाएगा। फिलहाल ऐसा नहीं है।
सरकार ने NPR को इस जनगणना से अलग रखा है। यानी Census 2027 और NPR दो अलग-अलग प्रक्रियाएं रहेंगी।
अधिकारियों के अनुसार जनगणना का उद्देश्य देश की जनसंख्या, सामाजिक संरचना, शिक्षा, रोजगार, आवास और अन्य जनसांख्यिकीय आंकड़े जुटाना है। जबकि NPR का उद्देश्य अलग प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
माता-पिता की जन्म जानकारी क्यों ली जा रही है?
इस बार पहली बार माता-पिता के जन्मस्थान और जन्मतिथि से जुड़े सवाल पूछे जाने की तैयारी है। इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इन जानकारियों का उद्देश्य केवल यह समझना है कि देश की आबादी का सामाजिक और जनसांख्यिकीय स्वरूप समय के साथ किस तरह बदल रहा है।
यदि किसी व्यक्ति को अपने माता-पिता की पूरी जन्मतिथि नहीं पता है, तो केवल जन्म वर्ष भी स्वीकार किया जाएगा। इसके लिए किसी प्रकार का प्रमाण पत्र या दस्तावेज दिखाने की आवश्यकता नहीं होगी।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जनगणना में दी गई व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग नागरिकता तय करने, कानूनी कार्रवाई करने, सरकारी लाभ देने या सार्वजनिक रूप से जारी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
पहले बर्फीले इलाकों में जनगणना होगी
देशभर में जनगणना एक साथ नहीं कराई जाती। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई इलाके सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से कट जाते हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में जनगणना पहले कराई जाती है।
सरकार के कार्यक्रम के अनुसार इन इलाकों में 17 अगस्त 2026 से सेल्फ-एन्यूमरेशन शुरू होगी। इसके बाद सितंबर में घर-घर जाकर जनसंख्या गणना होगी और अक्टूबर की शुरुआत में संशोधन (Revisional Round) किया जाएगा। देश के बाकी हिस्सों में जनसंख्या की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 रहेगी।
Census 2027 इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?
यह केवल जनसंख्या गिनने का अभियान नहीं है। Census 2027 से मिलने वाले आंकड़े अगले कई वर्षों तक सरकारों की नीतियों का आधार बनेंगे।
इसी डेटा के आधार पर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, शहरी विकास, ग्रामीण योजनाएं, संसाधनों का वितरण और कई कल्याणकारी योजनाओं की योजना तैयार की जाती है।
सभी जातियों की गणना होने से पहली बार स्वतंत्र भारत में सामाजिक संरचना की आधिकारिक तस्वीर भी सामने आएगी। यही वजह है कि इस जनगणना पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, शोध संस्थानों और नीति विशेषज्ञों की विशेष नजर बनी हुई है।
FAQ
प्रश्न: Census 2027 में पहली बार क्या नया होने जा रहा है?
उत्तर: यह भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी और पहली बार SC-ST के अलावा सभी जातियों की आधिकारिक गणना की जाएगी।
प्रश्न: क्या जाति बताने के लिए प्रमाण पत्र दिखाना होगा?
उत्तर: नहीं। जाति व्यक्ति के स्वयं के घोषणा (Self Declaration) के आधार पर दर्ज की जाएगी और किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होगी।
प्रश्न: क्या आधार नंबर देना अनिवार्य होगा?
उत्तर: नहीं। आधार संख्या देना पूरी तरह स्वैच्छिक रहेगा।
प्रश्न: माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान क्यों पूछा जाएगा?
उत्तर: सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य केवल जनसांख्यिकीय अध्ययन और सांख्यिकीय विश्लेषण करना है, न कि नागरिकता तय करना।
प्रश्न: 2011 की जाति जनगणना का डेटा जारी क्यों नहीं हुआ था?
उत्तर: सरकार के अनुसार 2011 SECC में लगभग 46 लाख अलग-अलग जाति नाम दर्ज हुए थे, जिससे डेटा त्रुटिपूर्ण और अविश्वसनीय माना गया।
प्रश्न: Census 2027 और NPR में क्या अंतर है?
उत्तर: Census 2027 जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया है, जबकि NPR अलग प्रशासनिक उद्देश्य वाली व्यवस्था है। फिलहाल दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग रखी गई हैं।

