FCRA Bill Explained: सरकार बनाम NGO… विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर किसका होगा अधिकार? जानिए नए FCRA Bill में क्या बदलने वाला है और क्यों मचा है विवाद ?

FCRA Bill Explained

FCRA Bill Explained: मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 पेश किया, जिसके बाद एक बार फिर यह कानून राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया। सरकार का कहना है कि नया संशोधन केवल प्रशासनिक और कानूनी कमियों को दूर करने के लिए लाया गया है, जबकि विपक्ष और कई सामाजिक व धार्मिक संगठनों का आरोप है कि इससे सरकार को विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर व्यापक नियंत्रण मिल जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार वास्तव में किसी NGO, ट्रस्ट या चैरिटेबल संस्था की विदेशी फंड से बनी संपत्ति अपने नियंत्रण में ले सकेगी? नया बिल किन परिस्थितियों में ऐसा करने की अनुमति देता है और यह मौजूदा कानून से कितना अलग है? इन सभी सवालों का जवाब समझने के लिए सबसे पहले FCRA को समझना जरूरी है।

FCRA क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) भारत का वह कानून है जो यह तय करता है कि देश में कौन-सी संस्था, ट्रस्ट, सोसायटी, NGO, एसोसिएशन, कंपनी या व्यक्ति विदेश से मिलने वाले धन, प्रतिभूतियों (Securities) या अन्य विदेशी योगदान (Foreign Contribution) को प्राप्त कर सकता है और उसका उपयोग किस प्रकार करेगा।

इस कानून का उद्देश्य विदेशी सहायता पर रोक लगाना नहीं है। इसका मूल मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाला पैसा पारदर्शी, जवाबदेह और कानूनी व्यवस्था के तहत भारत पहुंचे तथा उसका उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए हो जिसके लिए वह प्राप्त किया गया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय, जो इस कानून का संचालन करता है, लगातार यह कहता रहा है कि FCRA का उद्देश्य वैध सामाजिक कार्यों को रोकना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों में न हो जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय हित के खिलाफ हों।

यही कारण है कि FCRA विदेशी चंदे को प्रतिबंधित नहीं करता, बल्कि उसके लिए विस्तृत नियामक व्यवस्था (Regulatory Framework) तैयार करता है।

विदेशी फंड लेने के लिए कौन-कौन से नियम हैं?

यदि कोई संस्था नियमित रूप से विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करना चाहती है तो उसे पहले गृह मंत्रालय से FCRA Registration लेना होता है। वहीं यदि किसी संस्था को केवल किसी एक विशेष परियोजना या उद्देश्य के लिए एक बार विदेशी अनुदान प्राप्त करना है, तो वह Prior Permission के माध्यम से अनुमति ले सकती है।

कानून के अनुसार विदेश से प्राप्त होने वाला प्रत्येक रुपया केवल FCRA के लिए निर्धारित बैंक खाते में ही जमा होना चाहिए। इसके बाद उसका पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है, ऑडिट कराया जाता है और प्रत्येक वर्ष सरकार के समक्ष इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है।

यानी विदेशी फंड केवल प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके उपयोग, लेखांकन और रिपोर्टिंग की पूरी प्रक्रिया भी कानूनी रूप से अनिवार्य होती है।

 

किन लोगों और संस्थाओं पर लागू होता है यह कानून?

FCRA मुख्य रूप से उन संस्थाओं पर लागू होता है जो विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करती हैं। इनमें ट्रस्ट, NGO, धार्मिक संस्थाएं, चैरिटेबल संगठन, सामाजिक संस्थाएं, शैक्षणिक संस्थान, शोध संस्थान और विभिन्न प्रकार की गैर-लाभकारी संस्थाएं शामिल हो सकती हैं।

वहीं कुछ वर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें किसी भी परिस्थिति में विदेशी योगदान प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। इनमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, सांसद एवं विधायक, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश, समाचार रिपोर्टिंग से जुड़े संपादक तथा राजनीतिक दल शामिल हैं।

सरकार का तर्क है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विदेशी प्रभाव को रोकने के लिए ऐसे प्रतिबंध आवश्यक हैं।

 

क्या भारत अकेला ऐसा कानून लागू करता है?

FCRA को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या केवल भारत में ही विदेशी फंडिंग पर इतने कड़े नियम हैं।

गृह मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में भी विदेशी प्रभाव और विदेशी फंडिंग की निगरानी के लिए अलग-अलग कानून मौजूद हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इन देशों के कानूनों का दायरा FCRA से अलग है। अधिकांश देशों में विदेशी प्रभाव (Foreign Influence) के पंजीकरण पर जोर दिया जाता है, जबकि भारत का FCRA विदेशी योगदान प्राप्त करने, उसके उपयोग और उसके लेखा-जोखा को व्यापक रूप से नियंत्रित करता है। इसलिए इन्हें पूरी तरह समान कानून नहीं माना जा सकता।

 

समय के साथ कैसे सख्त होता गया FCRA

भारत में FCRA पहली बार 1976 में लागू किया गया था। उस समय देश में आपातकाल (Emergency) का दौर था और सरकार विदेशी प्रभाव को लेकर चिंतित थी। उस समय कानून का मुख्य उद्देश्य घरेलू राजनीति और सार्वजनिक संस्थाओं पर बाहरी हस्तक्षेप को नियंत्रित करना था।

इसके बाद 2010 में संसद ने पुराने कानून को पूरी तरह बदलकर नया FCRA लागू किया। इस कानून के तहत पहली बार पांच वर्ष के लिए वैध FCRA Registration की व्यवस्था शुरू की गई। पांच वर्ष पूरे होने पर प्रत्येक संस्था को अपना पंजीकरण नवीनीकृत (Renew) कराना अनिवार्य कर दिया गया।

इसके बाद 2020 में FCRA में सबसे बड़े संशोधनों में से एक किया गया। सभी विदेशी योगदानों को नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक निर्धारित शाखा के माध्यम से प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया गया। प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई। एक NGO द्वारा दूसरे NGO को विदेशी फंड ट्रांसफर करने पर रोक लगा दी गई तथा पदाधिकारियों के लिए आधार या पासपोर्ट की जानकारी देना भी अनिवार्य कर दिया गया।

इन संशोधनों के बाद FCRA केवल विदेशी धन प्राप्त करने का कानून नहीं रहा, बल्कि विदेशी फंडिंग से जुड़ी लगभग पूरी व्यवस्था पर निगरानी रखने वाला कानून बन गया।

2026 में नया संशोधन लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

केंद्र सरकार का कहना है कि मौजूदा कानून में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कमी थी। यदि किसी संस्था का FCRA Registration रद्द हो जाता था, वह स्वयं उसे वापस कर देती थी या उसका नवीनीकरण नहीं होता था, तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का भविष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं था।

सरकार के अनुसार ऐसे मामलों में यह स्पष्ट कानूनी व्यवस्था नहीं थी कि उन संपत्तियों का प्रबंधन कौन करेगा, उनकी देखभाल कैसे होगी और यदि संस्था हमेशा के लिए FCRA प्रणाली से बाहर हो जाए तो उन परिसंपत्तियों का क्या होगा।

इसी कमी को दूर करने के लिए 2026 का संशोधन विधेयक लाया गया है।

 

2026 के बिल में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

नए विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था उन संस्थाओं से जुड़ी है जिनका FCRA Certificate समाप्त हो जाता है।

मौजूदा व्यवस्था में किसी संस्था का पंजीकरण तीन प्रमुख परिस्थितियों में समाप्त हो सकता है। पहला, यदि सरकार कानून के उल्लंघन के कारण उसका पंजीकरण रद्द कर दे। दूसरा, यदि संस्था स्वयं अपना पंजीकरण वापस कर दे। तीसरा, यदि उसका पंजीकरण समय पर नवीनीकृत न हो।

2026 का विधेयक पहली बार Certificate Ceasing की स्पष्ट कानूनी परिभाषा जोड़ता है। इसका अर्थ होगा कि यदि कोई संस्था समय पर Renewal के लिए आवेदन नहीं करती, निर्धारित समय सीमा चूक जाती है या उसका Renewal आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता है, तो उसका FCRA Certificate स्वतः समाप्त माना जाएगा।

यहीं से विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को लेकर नई व्यवस्था लागू होगी।

Designated Authority क्या होगी?

विधेयक के अनुसार सरकार एक Designated Authority (नामित प्राधिकरण) बनाएगी।

यदि किसी संस्था का FCRA Registration रद्द हो जाता है, वह स्वयं उसे वापस कर देती है या उसका प्रमाणपत्र समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी परिसंपत्तियां सबसे पहले इसी प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएंगी।

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रारंभिक हस्तांतरण अस्थायी (Provisional) होगा।

यदि संबंधित संस्था बाद में अपना FCRA Registration दोबारा प्राप्त कर लेती है या उसका Renewal स्वीकृत हो जाता है, तो अप्रयुक्त विदेशी योगदान और उससे बनी परिसंपत्तियां वापस उसी संस्था को लौटा दी जाएंगी।

लेकिन यदि निर्धारित समय के भीतर संस्था अपना Registration बहाल नहीं करा पाती, तब यह हस्तांतरण स्थायी हो जाएगा।

 

स्थायी रूप से सरकार के पास जाने के बाद संपत्तियों का क्या होगा?

यदि किसी संस्था का Registration दोबारा बहाल नहीं होता, तो Designated Authority को उन परिसंपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार मिल जाएगा।

इसके बाद वह उन संपत्तियों को केंद्र सरकार, राज्य सरकार या उनके किसी विभाग को हस्तांतरित कर सकती है। आवश्यकता पड़ने पर उन परिसंपत्तियों को बेचने का अधिकार भी होगा।

ऐसी बिक्री से प्राप्त धन और बची हुई विदेशी राशि भारत की Consolidated Fund of India में जमा कराई जाएगी।

यही प्रावधान पूरे संशोधन विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे विवादास्पद हिस्सा माना जा रहा है।

 

बिल में और क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?

नए विधेयक में पहली बार Key Functionaries की स्पष्ट परिभाषा जोड़ी गई है। इसमें निदेशक, ट्रस्टी, साझेदार, पदाधिकारी और संस्था का संचालन करने वाले अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों को शामिल किया गया है। यदि संस्था FCRA का उल्लंघन करती है तो जिम्मेदारी इन प्रमुख पदाधिकारियों पर भी तय की जा सकेगी।

विधेयक यह भी प्रस्तावित करता है कि Prior Permission के माध्यम से विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को निर्धारित समय सीमा के भीतर उस धन का उपयोग करना होगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम सजा पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का कहना है कि इससे दंड व्यवस्था अधिक संतुलित और अनुपातिक बनेगी।

इसके अलावा किसी भी FCRA अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करने का भी प्रस्ताव है। सरकार का तर्क है कि इससे एक ही मामले में विभिन्न एजेंसियों द्वारा समानांतर जांच की स्थिति से बचा जा सकेगा।

 

देश में कितनी संस्थाओं के पास FCRA Registration है?

PRS Legislative Research के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक FCRA पोर्टल पर 22,498 संस्थाओं का Registration Cancelled, 15,212 Registrations Expired और 14,449 Active FCRA Certificates दर्ज थे।

सरकार का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में Registration समाप्त होने के बावजूद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं होने के कारण प्रशासनिक अनिश्चितता बनी हुई थी। इसी वजह से 2026 संशोधन विधेयक लाने की आवश्यकता महसूस की गई।

 

FCRA Bill पर विवाद क्यों बढ़ गया?

सरकार का कहना है कि 2026 का संशोधन केवल एक प्रशासनिक कमी को दूर करता है। उसके अनुसार जब किसी संस्था का FCRA Registration समाप्त हो जाता है, तब विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का प्रबंधन कैसे होगा, इस बारे में मौजूदा कानून में स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। नया विधेयक इसी प्रक्रिया को कानूनी रूप से स्पष्ट करता है।

लेकिन विपक्ष, कई कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं का मानना है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि इससे सरकार और विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के बीच संबंध पूरी तरह बदल सकते हैं। उनका कहना है कि दशकों से सामाजिक कार्य कर रही संस्थाओं द्वारा बनाई गई संपत्तियां भी सरकार के नियंत्रण में जा सकती हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण है।

 

असली विवाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को लेकर है

इस विधेयक का सबसे विवादित हिस्सा विदेशी फंड से निर्मित परिसंपत्तियों (Foreign Funded Assets) से जुड़ा है।

सरकार का कहना है कि यदि किसी संस्था का FCRA Registration समाप्त हो जाता है, तो विदेशी धन से बनी संपत्तियां भी उसी विदेशी योगदान का हिस्सा मानी जानी चाहिए। इसलिए उनका प्रबंधन किसी अधिकृत सरकारी प्राधिकरण के पास होना चाहिए, ताकि उनका उपयोग सार्वजनिक हित में जारी रह सके।

दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि कई संस्थाओं ने वर्षों पहले विदेशी सहायता से अस्पताल, स्कूल, पुस्तकालय, छात्रावास या अन्य सार्वजनिक संस्थान बनाए थे, लेकिन अब उनका संचालन पूरी तरह भारतीय दान और घरेलू आय से हो रहा है। ऐसे में यदि संस्था केवल इसलिए FCRA Renewal नहीं कराती क्योंकि अब उसे विदेशी फंड की जरूरत नहीं है, तब भी उसकी पुरानी संपत्तियां सरकारी नियंत्रण में जा सकती हैं। उनका मानना है कि यही प्रावधान सबसे अधिक चिंता पैदा करता है।

 

अस्पताल वाले उदाहरण से पूरा विवाद समझिए

PRS Legislative Research ने इस विवाद को समझाने के लिए एक उदाहरण दिया है। मान लीजिए किसी स्वास्थ्य संस्था ने कई वर्ष पहले विदेशी सहायता से एक अस्पताल बनाया था। बाद में उसने विदेशी फंड लेना पूरी तरह बंद कर दिया और अब अस्पताल केवल भारतीय दान, मरीजों से मिलने वाली आय और घरेलू संसाधनों से संचालित हो रहा है।

यदि ऐसी संस्था भविष्य में अपना FCRA Registration Renew नहीं कराती या उसका Renewal आवेदन अस्वीकार हो जाता है, तो प्रस्तावित कानून के अनुसार वही अस्पताल भी Designated Authority के नियंत्रण में जा सकता है, क्योंकि उसका निर्माण कभी विदेशी योगदान से हुआ था।

यदि संस्था बाद में Registration वापस नहीं पा सकी, तो संबंधित प्राधिकरण उस अस्पताल का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकता है, उसे किसी सरकारी विभाग को हस्तांतरित कर सकता है या कानूनी प्रक्रिया के तहत उसका निस्तारण (Disposal) भी कर सकता है। यही उदाहरण पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।

 

क्या नया कानून FCRA से बाहर निकलने का रास्ता कठिन बना देगा?

आलोचकों का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन के बाद किसी संस्था के लिए FCRA प्रणाली से पूरी तरह बाहर निकलना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाएगा।

यदि किसी संस्था ने वर्षों पहले विदेशी सहायता से कोई संपत्ति बनाई है, तो उसे उस संपत्ति पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए लगातार FCRA Registration Renew कराते रहने की मजबूरी हो सकती है, भले ही वह अब विदेश से एक भी रुपया प्राप्त न करती हो।

उनके अनुसार इससे संस्थाएं अनिश्चितकाल तक FCRA व्यवस्था से जुड़ी रहने के लिए बाध्य महसूस कर सकती हैं।

 

मिश्रित फंडिंग वाली संपत्तियों पर भी सवाल

एक और विवाद उन परिसंपत्तियों को लेकर है जिनका निर्माण विदेशी और घरेलू – दोनों प्रकार की फंडिंग से हुआ है। प्रस्तावित विधेयक कहता है कि यदि किसी संपत्ति का निर्माण पूरी तरह या आंशिक रूप से विदेशी योगदान से हुआ है, तो वह प्रारंभिक रूप से पूरी की पूरी Designated Authority के अधीन जाएगी।

हालांकि संस्था बाद में यह दावा कर सकती है कि उसका कुछ हिस्सा घरेलू धन से बना था और वह हिस्सा उसे वापस किया जाए।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि व्यवहारिक रूप से यह तय करना आसान नहीं होगा कि किसी इमारत, अस्पताल, स्कूल या अन्य परिसंपत्ति का कौन-सा हिस्सा विदेशी धन से बना और कौन-सा घरेलू धन से। यही कारण है कि Mixed Funding भी बड़े विवाद का विषय बन गई है।

 

अपील की प्रक्रिया पर भी उठ रहे हैं सवाल

मौजूदा FCRA कानून में Registration रद्द होने की स्थिति में अपील की व्यवस्था मौजूद है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि किसी संस्था का Renewal आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता है, तो परिसंपत्तियां Designated Authority के पास जाने से पहले उसके लिए अलग से सुनवाई (Hearing) या स्वतंत्र अपील का स्पष्ट प्रावधान विधेयक में नहीं दिया गया है।

उनका कहना है कि इससे संस्थाओं को पर्याप्त कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पाएगी।

 

चर्च संगठन सबसे अधिक विरोध क्यों कर रहे हैं?

हालांकि यह विधेयक किसी एक धर्म या समुदाय पर लागू नहीं होता, लेकिन इसका सबसे तीखा विरोध चर्च संगठनों, विशेषकर पूर्वोत्तर भारत से सामने आया है।

मिजोरम, नागालैंड, मेघालय और अन्य राज्यों में बड़ी संख्या में चर्च से जुड़े संगठन विदेशों से मिलने वाले दान की सहायता से स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, वृद्धाश्रम, दिव्यांग सहायता केंद्र और अन्य सामाजिक संस्थाएं संचालित करते हैं।

इन संस्थाओं का कहना है कि यदि भविष्य में किसी कारण उनका FCRA Renewal नहीं हुआ, तो दशकों में विकसित उनकी सामाजिक परिसंपत्तियां भी सरकारी नियंत्रण में जा सकती हैं।

इसी आशंका के कारण पूर्वोत्तर के चर्च संगठनों ने इस विधेयक के खिलाफ खुलकर अभियान शुरू किया है।

 

मिजोरम सरकार ने क्या रुख अपनाया?

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने चर्च नेताओं और विभिन्न धार्मिक संगठनों के साथ बैठक कर इस विधेयक पर चर्चा की।

बैठक के बाद राज्य सरकार ने कहा कि विधेयक के कुछ प्रावधान वर्तमान स्वरूप में स्वीकार नहीं किए जा सकते। राज्य सरकार ने संशोधन संबंधी सुझावों का ज्ञापन तैयार कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करने का निर्णय लिया।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यदि केंद्र सरकार राज्य की चिंताओं पर विचार नहीं करती, तो मिजोरम से सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) के लोकसभा सांसद संसद में इस विधेयक का विरोध करेंगे।

 

विपक्ष और अन्य दलों के आरोप

कांग्रेस की मिजोरम इकाई ने इस विधेयक के विरोध में प्रदर्शन किए और आरोप लगाया कि इससे ईसाई संस्थाएं सबसे अधिक प्रभावित होंगी क्योंकि राज्य की अनेक सामाजिक संस्थाएं विदेशी सहायता पर निर्भर हैं।

पूर्व सांसद चेला कुमार ने आरोप लगाया कि सरकार धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं को निशाना बना रही है।

वहीं DMK सांसद पी. विल्सन ने संसद के बाहर आयोजित एक कार्यक्रम में इस विधेयक की तुलना Enemy Property Act से करते हुए आरोप लगाया कि सरकार अल्पसंख्यक संस्थाओं की संपत्तियों पर नियंत्रण चाहती है।

इसके बाद कई चर्च संगठनों ने देशभर में हस्ताक्षर अभियान, विरोध प्रदर्शन और विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित करने का भी ऐलान किया।

 

सरकार ने आरोपों का क्या जवाब दिया?

केंद्र सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है। गृह मंत्रालय का कहना है कि यह विधेयक किसी धर्म, समुदाय या विचारधारा के खिलाफ नहीं है। FCRA विदेशी फंडिंग को प्रतिबंधित नहीं करता बल्कि उसे पारदर्शी और जवाबदेह बनाता है।

सरकार के अनुसार वर्ष 2024-25 में लगभग 16,200 संस्थाओं को कुल ₹22,963 करोड़ का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट है कि सरकार वैध विदेशी सहायता पर रोक नहीं लगा रही है।

सरकार का कहना है कि जो भी संस्था कानून का पालन करेगी, वह पहले की तरह विदेशी सहायता प्राप्त कर सकती है।

 

धार्मिक स्थलों को लेकर सरकार की विशेष व्यवस्था

विधेयक में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी जोड़ा गया है। यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी परिसंपत्ति स्थायी रूप से Designated Authority के पास चली जाती है, तो उस धार्मिक स्थल की मूल धार्मिक पहचान (Religious Character) को बनाए रखना प्राधिकरण की कानूनी जिम्मेदारी होगी।

सरकार का कहना है कि इस प्रावधान का उद्देश्य धार्मिक स्थलों की प्रकृति में किसी प्रकार का बदलाव रोकना है।

 

सरकार विदेशी नागरिकों को लेकर भी क्यों सख्त है?

सरकार का कहना है कि जिन संस्थाओं को विदेश से आर्थिक सहायता मिलती है, उनका संचालन ऐसे व्यक्तियों के हाथ में होना चाहिए जिनका भारत से स्पष्ट और सत्यापित संबंध हो।

इसी कारण सरकार FCRA पंजीकृत संस्थाओं के प्रमुख पदों पर विदेशी नागरिकों को लेकर पहले से अधिक सख्त नियमों का समर्थन करती है।

सरकार यह भी कहती है कि FCRA राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी फंडिंग से जुड़ा केंद्रीय कानून है, इसलिए किसी भी जांच से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना उचित है।

 

FAQ

  1. FCRA Bill क्या है?
    FCRA Bill 2026 विदेशी योगदान (Foreign Contribution) और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े नियमों में संशोधन का प्रस्ताव है।
  2. सरकार विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण क्यों चाहती है?
    सरकार का कहना है कि FCRA Registration समाप्त होने के बाद ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था नहीं थी। नया विधेयक उसी कमी को दूर करता है।
  3. FCRA कानून का उद्देश्य क्या है?
    इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग को पारदर्शी, जवाबदेह और राष्ट्रीय हित के अनुरूप बनाए रखना है।
  4. यह कानून किन संस्थाओं पर लागू होता है?
    यह विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले ट्रस्ट, NGO, सोसायटी, धार्मिक संस्थाओं, चैरिटेबल संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं पर लागू होता है।
  5. क्या सभी NGO इस कानून के दायरे में आते हैं?
    नहीं। केवल वे संस्थाएं जो विदेश से धन प्राप्त करती हैं या प्राप्त करना चाहती हैं, FCRA के दायरे में आती हैं।
  6. नए संशोधन में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
    Designated Authority की स्थापना, विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का नया ढांचा, Certificate Ceasing की व्यवस्था, Key Functionaries की परिभाषा, सजा में कमी और जांच के लिए केंद्र की पूर्व अनुमति जैसे बदलाव प्रस्तावित हैं।
  7. विदेशी फंड प्राप्त करने के लिए क्या नियम हैं?
    संस्था को गृह मंत्रालय से FCRA Registration या Prior Permission लेनी होती है। विदेशी धन निर्धारित बैंक खाते में प्राप्त करना, उसका ऑडिट कराना और हर वर्ष सरकार को रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है।