क्या खत्म होने की कगार पर है FM रेडियो? सरकार से राहत की मांग कर रही इंडस्ट्री, नहीं तो बंद हो सकते हैं रेडियो स्टेशन

एक समय था जब सुबह की शुरुआत FM रेडियो के गानों, RJ की आवाज और ट्रैफिक अपडेट से होती थी। कार हो, मोबाइल हो या दुकान – FM रेडियो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा था। लेकिन अब देश का प्राइवेट FM रेडियो सेक्टर गंभीर आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। विज्ञापन कम हो रहे हैं, खर्च लगातार बढ़ रहा है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की वजह से रेडियो की कमाई पर बड़ा असर पड़ा है।

इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर जल्द बड़े नीतिगत बदलाव नहीं किए गए, तो आने वाले समय में कई और FM स्टेशन बंद हो सकते हैं। रेडियो कंपनियां अब सरकार से राहत और नियमों में बदलाव की मांग कर रही हैं, ताकि यह सेक्टर दोबारा मजबूत हो सके।

 

FM रेडियो इंडस्ट्री आखिर संकट में क्यों?

भारत में पिछले कुछ सालों में डिजिटल मीडिया और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। लोग अब गाने सुनने के लिए Spotify, YouTube Music, JioSaavn और दूसरे ऐप्स का इस्तेमाल ज्यादा करने लगे हैं। ऐसे में FM रेडियो का पारंपरिक मॉडल कमजोर पड़ता जा रहा है।

दूसरी तरफ विज्ञापन बाजार भी बदल गया है। पहले कंपनियां रेडियो पर बड़े स्तर पर विज्ञापन देती थीं, लेकिन अब डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर रेडियो कंपनियों की कमाई पर पड़ा है।

इंडस्ट्री का कहना है कि कमाई घटने के बावजूद लाइसेंस फीस, GST, टावर चार्ज और स्पेक्ट्रम फीस जैसे खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इससे कंपनियों के लिए काम चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

 

रेडियो कंपनियों की सरकार से 5 बड़ी मांगें

  1. प्राइवेट FM चैनलों को न्यूज चलाने की अनुमति मिले

फिलहाल भारत में प्राइवेट FM रेडियो चैनलों को स्वतंत्र रूप से न्यूज प्रसारित करने की अनुमति नहीं है। वे केवल सीमित सरकारी समाचार या तय फॉर्मेट में जानकारी दे सकते हैं।

रेडियो कंपनियों का कहना है कि आज सिर्फ गानों के भरोसे टिके रहना मुश्किल हो गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पहले ही म्यूजिक सेक्टर पर कब्जा कर चुके हैं। ऐसे में अगर FM चैनलों को न्यूज और करंट अफेयर्स प्रसारित करने की अनुमति मिले, तो रेडियो की उपयोगिता और लोकप्रियता बढ़ सकती है।

कंपनियों का तर्क है कि सोशल मीडिया पर लाखों लोग बिना किसी नियंत्रण के न्यूज कंटेंट बना रहे हैं, जबकि FM रेडियो पहले से सरकारी नियमों के तहत काम करता है। इसलिए रेडियो को भी भरोसेमंद न्यूज प्लेटफॉर्म बनने का मौका मिलना चाहिए।

FM radio on the verge of extinction
  1. 2030 के बाद लाइसेंस रिन्यूअल बाजार के हिसाब से हो

प्राइवेट FM रेडियो कंपनियों का कहना है कि मौजूदा ऑक्शन मॉडल अब पुराना पड़ चुका है। जब FM फेज – 3 लाइसेंस दिए गए थे, तब बाजार की स्थिति अलग थी। लेकिन अब मीडिया इंडस्ट्री पूरी तरह बदल चुकी है।

रेडियो कंपनियों की मांग है कि 2030 के बाद लाइसेंस रिन्यूअल की कीमतें पुराने मॉडल की बजाय मौजूदा बाजार के हिसाब से तय की जाएं। उनका कहना है कि अगर बहुत ज्यादा फीस ली गई तो छोटे और मध्यम शहरों में रेडियो स्टेशन चलाना मुश्किल हो जाएगा।

 

  1. एनुअल लाइसेंस फीस खत्म की जाए

इंडस्ट्री की सबसे बड़ी मांगों में से एक है – एनुअल लाइसेंस फीस खत्म करना। रेडियो कंपनियों का कहना है कि उनकी कुल कमाई का बड़ा हिस्सा फीस और टैक्स में चला जाता है। ऐसे में कंटेंट सुधारने, नई टेक्नोलॉजी लाने और छोटे शहरों में विस्तार करने के लिए पैसा नहीं बचता।

कंपनियों के मुताबिक अगर यह फीस कम या खत्म की जाती है, तो वे बेहतर प्रोग्रामिंग और स्थानीय कंटेंट पर निवेश कर पाएंगी।

 

  1. GST 18% से घटाकर 5% किया जाए

प्राइवेट FM सेक्टर पर फिलहाल 18 प्रतिशत GST लागू है। रेडियो कंपनियों का कहना है कि यह दर बहुत ज्यादा है।उनकी मांग है कि GST को घटाकर 5 प्रतिशत किया जाए, ताकि रेडियो इंडस्ट्री दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले प्रतिस्पर्धा कर सके।

इंडस्ट्री का कहना है कि कम GST से कंपनियों को राहत मिलेगी और वे नई नौकरियां भी पैदा कर सकेंगी।

 

  1. स्मार्टफोन में FM फीचर जरूरी किया जाए

आज के ज्यादातर स्मार्टफोन में FM रेडियो फीचर बंद या हटाया जा चुका है। रेडियो इंडस्ट्री चाहती है कि सरकार मोबाइल कंपनियों के लिए FM रिसीवर एक्टिव रखना अनिवार्य करे।

रेडियो कंपनियों का कहना है कि आपदा, नेटवर्क फेल होने या इमरजेंसी जैसी स्थितियों में FM रेडियो सबसे भरोसेमंद माध्यम साबित होता है।

कोविड महामारी और कई प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी रेडियो ने लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी।

 

डिजिटल स्ट्रीमिंग और कॉपीराइट पर भी विवाद

रेडियो सेक्टर लंबे समय से कॉपीराइट नियमों में राहत की मांग कर रहा है।

कंपनियां चाहती हैं कि उन्हें FM प्रसारण के साथ – साथ डिजिटल लाइव स्ट्रीमिंग यानी साइमलकास्ट की भी अनुमति मिले। इससे लोग मोबाइल ऐप्स और इंटरनेट पर भी FM चैनल सुन सकेंगे।

लेकिन मौजूदा रॉयल्टी और कॉपीराइट नियमों की वजह से यह प्रक्रिया आसान नहीं है।

इंडस्ट्री का कहना है कि अगर डिजिटल स्ट्रीमिंग को सही तरीके से अनुमति दी जाए, तो FM रेडियो नए दौर में खुद को बेहतर तरीके से ढाल सकता है।

 

बड़े शहरों में बंद होने लगे FM स्टेशन

संकट का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। हाल ही में HT Media ने मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में अपने कुछ FM रेडियो लाइसेंस सरेंडर करने का फैसला किया।

इससे पहले TV Today Network भी कई शहरों में अपने रेडियो ऑपरेशन बंद कर चुका है। वहीं Red FM ने भी मुंबई में अपना एक स्टेशन बंद किया था। यह संकेत माना जा रहा है कि इंडस्ट्री अब गंभीर आर्थिक दबाव में है।

 

रोजगार पर भी पड़ रहा असर

FM स्टेशनों के बंद होने से हजारों लोगों की नौकरियां प्रभावित हुई हैं। RJ, प्रोड्यूसर, टेक्निकल स्टाफ, मार्केटिंग टीम और कंटेंट क्रिएटर्स जैसे कई पेशों से जुड़े लोग इस संकट का असर झेल रहे हैं।

रेडियो इंडस्ट्री सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि स्थानीय रोजगार का भी बड़ा स्रोत रही है। छोटे शहरों में कई युवाओं को इसी सेक्टर ने करियर का मौका दिया।

 

सरकार की कमाई भी हो रही प्रभावित

प्राइवेट FM रेडियो ऐसा मीडिया सेक्टर है जो सरकार को सीधे लाइसेंस फीस देता है। DTH के बाद यह उन चुनिंदा मीडिया सेक्टर्स में शामिल है जो सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत रहे हैं। लेकिन अगर स्टेशन बंद होते रहे, तो इसका असर सरकारी कमाई पर भी पड़ेगा।

 

‘मन की बात’ और रेडियो की ताकत

रेडियो की पहुंच आज भी देश के छोटे शहरों और गांवों तक है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी “मन की बात” कार्यक्रम के जरिए रेडियो को संवाद का मजबूत माध्यम बनाया।

हर महीने करोड़ों लोग रेडियो और दूसरे प्लेटफॉर्म्स पर इस कार्यक्रम को सुनते हैं। इससे यह साफ होता है कि रेडियो आज भी देश में प्रभावी माध्यम बना हुआ है। इसी वजह से इंडस्ट्री का सवाल है कि अगर रेडियो इतना अहम है, तो उसे बचाने के लिए जरूरी नीतिगत मदद क्यों नहीं मिल रही?

 

क्या रेडियो का भविष्य खतरे में है?

मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि FM रेडियो पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसे बदलते दौर के हिसाब से खुद को बदलना पड़ेगा। अब केवल गाने चलाने से काम नहीं चलेगा। लोकल न्यूज, हाइपरलोकल कंटेंट, पॉडकास्ट, डिजिटल स्ट्रीमिंग और इंटरैक्टिव प्रोग्रामिंग जैसे नए प्रयोग जरूरी होंगे।

इसके साथ ही सरकार को भी नीतियों में बदलाव करना होगा, ताकि इंडस्ट्री आर्थिक रूप से टिक सके।

 

समय रहते फैसला जरूरी

रेडियो कंपनियों का कहना है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो आने वाले वर्षों में कई और स्टेशन बंद हो सकते हैं। इसका असर सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय संस्कृति, भाषाओं, रोजगार और सूचना के सबसे सस्ते माध्यम पर भी पड़ेगा।

आज भी देश के करोड़ों लोग FM रेडियो सुनते हैं। ऐसे में यह सिर्फ एक बिजनेस सेक्टर नहीं बल्कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा माध्यम है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सरकार रेडियो इंडस्ट्री की “मन की बात” सुनती है या नहीं।