भारत सरकार अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बने कंटेंट को लेकर और सख्त नियम लाने की तैयारी कर रही है। 21 अप्रैल 2026 को सरकार ने आईटी नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत AI से तैयार किए गए किसी भी वीडियो, फोटो या अन्य विजुअल कंटेंट पर स्पष्ट और लगातार दिखने वाला लेबल अनिवार्य किया जा सकता है।
इस प्रस्ताव का मकसद लोगों को यह साफ जानकारी देना है कि जो कंटेंट वे देख रहे हैं, वह असली है या तकनीक के जरिए बनाया गया है।
क्या है नया प्रस्ताव
Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) ने अपने मसौदा नियमों में बदलाव सुझाते हुए कहा है कि अब केवल “स्पष्ट रूप से दिखने वाला” लेबल काफी नहीं होगा।
नई व्यवस्था के तहत AI से तैयार कंटेंट पर ऐसा लेबल होना चाहिए जो पूरे समय स्क्रीन पर दिखाई दे। यानी अगर कोई वीडियो AI से बना है, तो उसके शुरू से लेकर अंत तक यह जानकारी लगातार दिखती रहनी चाहिए।
यह बदलाव पहले के नियमों से अलग है, जहां सिर्फ इतना जरूरी था कि लेबल साफ दिखाई दे।
सुझाव देने की समय सीमा बढ़ी
सरकार ने इस प्रस्ताव पर लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगने की समय सीमा भी बढ़ा दी है। अब लोग 7 मई 2026 तक अपनी राय दे सकते हैं, जबकि पहले यह तारीख 29 अप्रैल तय की गई थी।
सरकार का कहना है कि वह सभी सुझावों को गंभीरता से देखेगी और उन्हें गोपनीय तरीके से रखा जाएगा, ताकि लोग बिना किसी डर के अपनी राय दे सकें।

क्यों जरूरी समझे जा रहे हैं ये नियम
सरकार के अनुसार, हाल के समय में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही फर्जी वीडियो, भ्रामक जानकारी और आपत्तिजनक कंटेंट भी बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं।
इसी को देखते हुए पहले भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे YouTube और X के लिए नियम कड़े किए गए थे।
उन नियमों के तहत गैर-कानूनी कंटेंट को तीन घंटे के भीतर हटाना और AI से बने कंटेंट को साफ तौर पर चिन्हित करना जरूरी किया गया था। अब नए प्रस्ताव के जरिए इन नियमों को और मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
क्या-क्या और बदलाव हो सकते हैं
आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधन सिर्फ AI लेबलिंग तक सीमित नहीं हैं। सरकार “न्यूज और करंट अफेयर्स” से जुड़े कंटेंट को लेकर भी दायरा बढ़ाना चाहती है।
इसका मतलब है कि अब सोशल मीडिया पर खबरें या जानकारी साझा करने वाले आम यूजर्स, इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स भी कानूनी दायरे में आ सकते हैं, जैसा कि अभी पंजीकृत मीडिया संस्थानों पर लागू होता है।
इसके अलावा, सरकार यह भी चाहती है कि सोशल मीडिया कंपनियां मंत्रालय द्वारा जारी सलाह, दिशा-निर्देश और प्रक्रियाओं का पालन करें।
आलोचना भी हुई
इन प्रस्तावों को लेकर कुछ संगठनों और विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई है। Internet Freedom Foundation (IFF) ने कहा है कि बार-बार नए बदलाव सुझाने से लोगों में “कंसल्टेशन थकान” हो सकती है।
उनका कहना है कि पहले से चल रही चर्चा के दौरान नए प्रस्ताव जोड़ना सही तरीका नहीं है और इससे नीति बनाने की प्रक्रिया में स्पष्टता की कमी दिखाई देती है।
IFF ने यह भी कहा कि नया नियम पहले से ज्यादा सख्त है, क्योंकि अब पूरे समय लेबल दिखाना अनिवार्य होगा, जो सभी यूजर्स पर लागू होगा – सिर्फ मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नहीं।
सरकार का रुख
इस मुद्दे पर सरकार का कहना है कि वह सभी पक्षों की राय सुनने के लिए तैयार है। हाल ही में आईटी मंत्रालय ने सोशल मीडिया कंपनियों और सिविल सोसायटी समूहों के साथ बैठक भी की थी।
आईटी सचिव S Krishnan ने कहा था कि मंत्रालय सुझावों के लिए खुला है और सभी फैसले कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही लिए जाएंगे।
क्या होगा इसका असर
अगर ये नियम लागू होते हैं, तो डिजिटल दुनिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है। लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि कौन-सा कंटेंट असली है और कौन-सा AI से बनाया गया है।
इससे फर्जी खबरों और गलत जानकारी को रोकने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि इससे कंटेंट बनाने वालों पर अतिरिक्त बोझ भी पड़ेगा और उन्हें हर पोस्ट में नए नियमों का पालन करना होगा।
संतुलन की जरूरत
इस पूरे मुद्दे में सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखना है। एक तरफ लोगों को गलत जानकारी से बचाना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सरकार को ऐसा रास्ता चुनना होगा, जिससे दोनों पक्षों का ध्यान रखा जा सके।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, AI कंटेंट पर सख्त लेबलिंग का प्रस्ताव डिजिटल दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। यह कदम पारदर्शिता और भरोसे को बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

